‘‘युवाओं को तम्बाकू सेवन से दूर रहना चाहिए‘‘: प्रो0 डा0 रमा कान्त

‘‘अधिकांश तम्बाकू सेवन 18 वर्ष से पहले ही आरम्भ होता है। इसीलिए बच्चों एवं युवाओं को तम्बाकू जनित जानलेवा रोगों एवं व्याधियों के बारे में जानकारी देना अनिवार्य है जिससे कि वें जिन्दगी चुनें, तम्बाकू नहीं’’ कहा छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डा0 रमा कान्त ने। प्रो0 डा0 रमा कान्त, लक्ष्मणपुरी, फैज़ाबाद रोड स्थित फारमेटिव डे कालेज के छात्रों को सम्बोधित कर रहे थे। प्रो0 रमा कान्त भारत के पहले सर्जन हैं जिनको वर्ष 2005 में विश्व  स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक का विशेष अंतर्राष्ट्रीय पुरूस्कार मिला है।

फारमेटिव डे कालेज की प्राधानाचार्या सुश्री अर्चना सक्सेना ने कहा कि ‘‘मैं अपने शैक्षिक संस्थान परिसर को तम्बाकू मुक्त रखने का पूरा प्रयास करती हूँ। बच्चों और युवाओं को तम्बाकू से दूर रहना चाहिए’’।

प्रो0 डा0 रमा कान्त ने कहा कि ‘‘बच्चों एवं युवाओं में तम्बाकू नियंत्रण करना व्यापक तम्बाकू नियंत्रण योजना का एक अहम भाग है’’।

प्रो0 डा0 रमा कान्त ने कहा कि ‘‘भारत में तम्बाकू से हर वर्ष 10 लाख से अधिक लोग मृत्यु को प्राप्त होते हैं। बच्चों और युवाओं को तम्बाकू कम्पनियों के प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष भ्रामक प्रचार से दूर रहना चाहिए और उससे प्रभावित नहीं होना चाहिए। उनको तम्बाकू सेवन की असली तस्वीर जो जानलेवा बीमारियों से जुड़ी है उससे परिचित होना चाहिए जिससे कि वें जिन्दगी चुनें, तम्बाकू नहीं’’।

प्रो0 डा0 रमा कान्त जिनको केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय का अनुशंसा पुरूस्कार भी 1997 में मिल चुका है उन्होंने कहा कि ‘‘लगभग आधी तम्बाकू जनित मृत्यु 35-69 वर्ष के दौरान होती है। धूम्रपान से अधिकांश मरने वाले लोग अत्याधिक धूमपान नहीं करते थे परन्तु अधिकांश ने तम्बाकू सेवन युवावस्था में आरम्भ किया था। 30-40 साल के लोग जो तम्बाकू सेवन करते हैं, उनको हृदय रोग होने का पांच गुणा अधिक खतरा रहता है। तम्बाकू जनित हृदय  रोग एवं कैंसर तम्बाकू व्यसनियों की मौत का सबसे बड़ा कारण है’’।

आज छात्रों के लिए एक वृत्तचित्र ‘तम्बाकू सेवन से होने वाले नुकसान’ भी प्रदर्शित किया गया जिसमें तम्बाकू के जानलेवा रोगों से ग्रसित लोगों का दास्तान है।

भारत-पाकिस्तान शांति कारवाँ २०१० - अमन के बढ़ते क़दम

२००५ में दिल्ली से मुल्तान तक पदयात्रा के बाद अब समय आ गया है कि शांति कारवाँ को पुन: कायम किया जाए. इस भारत-पाकिस्तान शांति कारवाँ का कार्यक्रम अभी तय नहीं हुआ है, और इस बात पर संवाद जारी है.  संभवत: यह  कारवाँ जुलाई २०१०  के अंतिम  सप्ताह से ले कर अगस्त २०१० के प्रथम सप्ताह तक आयोजित किया जा सकता है.

इस भारत-पाकिस्तान शांति कारवाँ के लिए संस्थानिक अनुमोदन आमंत्रित हैं.

जो लोग इस भारत पाकिस्तान शांति कारवाँ में हिस्सा लेना चाहें, कृपया कर के अपना  पासपोर्ट विवरण और अन्य आवश्यक जानकारी सईदा दीप, पाकिस्तान (saeedadiep@yahoo.com) और राजेश्वर ओझा, भारत (rajeshwar.ojha@gmail.com) को भेजें:


नाम (जैसा कि पासपोर्ट में है): 
पिता का नाम: 
पासपोर्ट नंबर: 
राष्ट्रीयता: 
जन्म-तिथि: 
पासपोर्ट किस जगह से जारी हुआ: 
पासपोर्ट जारी करने की तारीख: 
पासपोर्ट की समापन अवधि: 

 भारत एवं पाकिस्तान के अलावा अन्य देशों के नागरिक भी इस कारवाँ में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित है. अधिक जानकारी के लिए कृपया करके ई-ग्रुप के सदस्य बने. सदस्य बनने के लिए, ई -मेल भेजिए: indopakpeacecaravan-subscribe@yahoogroups.com or send email to: bobbyramakant@yahoo.com

डॉ संदीप पाण्डेय 
(समन्वयक: जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय)
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भारत-पाकिस्तान शांति कारवाँ - अमन के बढ़ते क़दम
शायद ऐसा दुनिया में कहीं भी नहीं होगा जैसा कि भारत एवं पाकिस्तान में है, कि लोग भावनात्मक रूप से इतनी घनिष्ठता से जुड़े हुए हैं. परन्तु उनपर भी दुश्मनी और वैमनस्य का जहर उडेला जा रहा है. इतिहास का वह एक क्रूर मोड़ था जब राजनीतिक बंटवारा हुआ, जिसकी वजह से खून-खराबा हुआ और असंख्य लोगों की जानें गयीं. इन हादसों ने गहरे घाव दिए हैं और दोनों देशों के चैतन्य में ये जख्म अभी भी हरे हैं.

बंटवारे के बाद भारत पाकिस्तान के अशांत इतिहास में चार युद्ध हुए और अनगिनत मासूमों की जानें गयीं. भारत-पाकिस्तान संबंधों में कश्मीर आज भी एक नाजुक रग़ बना हुआ है जो  दोनों देशों को स्व: विनाश की ओर ले जाने के खतरे का कारण भी  है. दक्षिण एशिया में जो कट्टरपंथी वर्ग हैं वो ये सुनिश्चित करते हैं कि नफरत और वैरभाव की आग धधकती रहे और दोनों ओर जान-माल का भारी नुक्सान होता रहे.

दोनों ओर के आम लोग, जो हिंसा और वैरभाव के शिकार होते हैं, वे वास्तव में अमन, चैन और शांति चाहते हैं - उनका मत है कि दोनों ओर मैत्री और सामान्य संबंधों का माहौल बने. परन्तु  दोनों देशों का जो कुलीन शासक वर्ग है वह एक दूसरे के प्रति शंका का भाव रखता है. परन्तु जब भी भारत पाकिस्तान के लोग आपस में मिलते हैं, तो ये सब दुर्भावनाएं विलिप्त हो जाती हैं और मुहब्बत, आपसी लगाव और सदभावना उमड़ती है - बिलकुल उसी तरह जैसे एक परिवार के लोग बरसों बिछड़ने के बाद आपस में मिल रहे हों. ऐतिहासिक कारणों की वजह से  भौगोलिक सरहदें हमपर अवश्य थोपी गयी हैं, परन्तु  दोनों देशों में लोगों के एक जैसे ही रीति-रिवाज़ और परम्पराएँ हैं, हमारी भाषा, संगीत, खान-पान, और जीवनशैली तक एक जैसी ही है - जिसके कारण नि:संदेह हो कर ये कहा जा सकता है कि दोनों ओर लोगों के मूल्य और चिंतन एक सा ही है. लोगों को सरहदों ने बांटा तो है, पर उनके दिल एक ही हैं.

हम लोगों का मानना है कि यदि दोनों देशों के मध्य सही अर्थों में शांति और दोस्ती कायम करनी है तो पहल लोगों को ही करनी होगी. अनेकों ऐसे प्रयास पिछले बरसों में हुए हैं जिनमें से भारत-पाकिस्तान (दिल्ली से मुल्तान तक) पदयात्रा २००५ एक है. सूफी संतों और कवियों ने प्रेम गीत गए थे जो आज भी दोनों देशों के लोगों के लिए प्रासंगिक हैं. इसी आपसी लगन और बंधुत्व के तारतम्य को मद्देनज़र रखते हुए २००५ दिल्ली-से-मुल्तान तक की पदयात्रा दिल्ली-स्थित सूफी संत हज़रत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह से आरंभ हुई और मुल्तान-स्थित संत बहाउद्दीन ज़कारिया की दरगाह पर समाप्त हुई थी. इस पदयात्रा ने दोनों देशों के शहरों, गाँव आदि से निकलते हुए प्रेम, शांति और बंधुत्व का सन्देश दिया. इसी के उपरांत अगस्त २००५ में दिल्ली में प्रथम परमाणु-रहित, वीसा-रहित दक्षिण एशिया सम्मलेन हुआ और दूसरा परमाणु-रहित, वीसा-रहित दक्षिण एशिया सम्मलेन २००७ में लाहोर  में संपन्न हुआ. इस सम्मलेन को वार्षिक  करने के प्रयासों को अनेकों अडचनों ने खंडित किया है, जिनमें से सबसे बड़ी चुनौती है दोनों देशों में व्याप्त वीसा प्रणाली.

जमीनी स्तर पर अनेकों ऐसी पहलों का होना अनिवार्य है जिससे कि दोनों देशों की सरकारों की सोच बदले. जो समस्याएँ दोनों देशों के लोग झेल रहे हैं वो सामान्य हैं - जैसे कि - गरीबी, बेरोज़गारी, वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण की नीतियों की मार, स्वास्थ्य एवं शिक्षा से जुड़े हुए संगीन मुद्दे, आदि.

दोनों देशों के बीच व्यापार और वाणिज्य के लिए रुकावटों को क्रमिक रूप से ढीला करना और अंतत: हटाना, आम लोगों का सरहद पार आने-जाने में बढ़ोतरी करना, आदि जैसे कदम नि:संदेह शांति प्रक्रिया को तेज़ी से आगे बढ़ाएंगे. आर्थिक रूप से मजबूत भारत एवं पाकिस्तान ही संपूर्ण दक्षिण एशिया के लिये शांति और समृद्धि का युग ला सकते हैं . लेन-देन एवं आपसी सहयोग से, कट्टर राष्ट्रवाद के बजाय दोस्ती एवं शांति के माहौल से ही दोनों देश विकास एवं उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होंगे.

बीते हुए दो सालों में दोनों सरकारों ने शान्ति की ओर कदम बढ़ाए हैं, परन्तु ये प्रयास शिथिल, धीमे, और रुक-रुक के हुए हैं. दोनों देश की सरकारों को आम शांति-प्रिय लोगों की आवाज़ को सुनाने के लिए ही हम सब एक और पहल  करने  के लिए प्रोत्साहित हुए हैं - "भारत-पाकिस्तान शांति कारवाँ - अमन के बढ़ते क़दम" - जो मुंबई से कराची तक आयोजित किया जायेगा. इस शांति कारवाँ के जरिये, दोनों देशों के आम लोगों को अपनी शांति एवं दोस्ती की बात रखने का अवसर मिलेगा और ऐसा माहौल बनाने में मदद मिलेगी जिसमें दोनों देशों की सरकारों को वाजिब आवाजों पर ध्यान देने के लिए प्रेरित किया जाए.

इस शांति कारवाँ के माध्यम से, हम लोगों से निम्नलिखत बिंदुओं पर सहयोग की अपेक्षा करते हैं:

१. सरहद के आर-पार लोगों के आने-जाने को आसान बनाया जाए. वर्तमान में सरहद के आर-पार आने-जाने पर अनेकों प्रकार के व्यवधान हैं - जिनमें से कुछ तो हास्यास्पद हैं. हम लोग चाहेंगे कि इन  व्यवधानों को हटाया जाए, क्योंकि सरहद के आर पार लोगों के बीच प्रगाढ़ लगाव है. लोगों के बीच भावनात्मक जुडाव है - जो दोनों देशों की सरकारों के बीच व्याप्त नफरत और शंका के ठीक विपरीत है!  दोनों देशों की सरकारों  को लोगों की इच्छाओं एवं अरमानों को अनसुना नहीं करना चाहिए, और लोगों को बिना रोकटोक के आने-जाने और मिलने-जुलने के लिए छूट मिलनी चाहिए. असल में तो वीसा-पासपोर्ट प्रणाली को हटाना चाहिए.

२. आम लोगों की भावना का आदर करते हुए भारत-पाकिस्तान को बिना-शर्त दोस्ती कायम करनी चाहिए और सभी मुद्दों को बात-चीत से सुलझाना चाहिए जिससे कि अमन का वातावरण कायम हो सके. भारत-पाकिस्तान के मध्य सारे संगीन मुद्दों को शांति वार्ता के जरिये ही सुलझाना चाहिए. इन मुद्दों में कश्मीर का मुद्दा भी शामिल है (जिसका हल हमारी राय में जम्मू एवं कश्मीर के लोगों को शामिल करके ही ढूँढा जा सकता है), और आतंक-सम्बंधित गतिविधियाँ भी जिसके शिकार दोनों देश के लोग होते रहे हैं.

३. भारत एवं पाकिस्तान को अपने-अपने परमाणु कारखानों को जल्दी-से-जल्दी दुष्क्रियाशील करना चाहिए. दोनों देशों को बारूदी सुरंगों को नष्ट करना चाहिए और फौजों को वापस बैरकों में भेज देना चाहिए. हमारा मानना है कि दोनों देशों को अपने बहुमूल्य संसाधनों को रक्षा-बजट के नाम पर व्यर्थ गंवाना बंद करना चाहिए और इन संसाधनों से गरीबी हटाने में व्यय करना चाहिए. जो लोग इस शांति कारवाँ का हिस्सा हैं उनका मानना है कि सच्ची सुरक्षा हथियारों के ढेर इकठ्ठे करने से नहीं आती बल्कि सच्ची सुरक्षा आपसी विश्वास और भरोसे पर स्थापित संबंधों से ही आती है. हकीकत यह है कि परमाणु बम एवं बारूदी सुरंगों से 'दुश्मन' को क्षति पहुँचने के बजाय अपने ही लोगों को कहीं अधिक नुक्सान पहुँच रहा है, इसलिए यह कहना अनुचित नहीं होगा की ये हथियार जन-विरोधी हैं.

४. दोनों देशों के बीच लुका-छुपी और लघु-तीव्रता वाला युद्ध समाप्त हो और दोनों देशों की गुप्तचर संस्थाएं पर रोक लगे, ताकि सरहद के पार अशांति उत्पन्न न हो.

शांति और विकास सिर्फ विश्वास और आपसी सद्भावना वाले वातावरण में  ही संभव है - इस शांति कारवाँ का यह स्पष्ट सन्देश है. हम भलीभांति जानते हैं कि हमारे लक्ष्य सिर्फ इस प्रयास से नहीं हासिल हो सकते. हम यह भी मानते हैं कि दोनों देशों के लोगों द्वारा किये जा रहे अनेकों शांति प्रयासों में यह शांति कारवाँ एक है. आइये हम सब एकजुट हो कर इस शांति प्रक्रिया को निरंतर बढ़ाते रहे जिससे कि न केवल भारत-पाकिस्तान के मध्य बल्कि संपूर्ण दक्षिण एशिया में भी आपसी विश्वास, सद्भावना और शांति का वातावरण बना रहे.

विश्व स्वास्थ्य दिवस

                                                               विश्व स्वास्थ्य दिवस

विश्व स्वास्थ्य दिवस सात अप्रैल को मनाया जाता है.  इसी दिन विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) की स्थापना हुई थी.    वर्ष २०१० का यह दिवस शहरीकरण एवं स्वास्थ्य को समर्पित है. इस वर्ष का अभियान '१००० शहर, १००० जीवन', मानव स्वास्थ्य पर शहरीकरण के प्रभावों को विशिष्ट रूप से दर्शाते हुए शहरों को एक बेहतर रहने लायक जगह बनाने पर जोर देता है.

आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने आसपास के वातावरण को साफ़ सुथरा रखते हुए स्वयं को स्वस्थ रखें. स्वस्थ शरीर, स्वस्थ विचार एवं स्वस्थ बुद्धि का मूर्त रूप ही आरोग्य है. आरोग्य वह अवस्था है जिसमें हम प्रकृति एवं वातावरण से सामंजस्य स्थापित करते हुए जीवन का आनंद लेते हैं. हम वास्तविक रूप से तभी स्वस्थ होते हैं जब हम स्वयं को मानसिक, भौतिक, भावात्मक, आध्यात्मिक एवं सामाजिक स्तर पर स्वस्थ अनुभव करते हैं.

अपनी वर्त्तमान जीवन शैली में उचित बदलाव लाकर हम अपनी दवाइयों का खर्चा कम कर सकते हैं. केवल उचित खान पान ही नहीं, वरन उचित विचार एवं उचित आचरण द्वारा ही हम  निरोग हो सकते हैं. माता पिता और अभिभावकों को बच्चों को सही आहार और साफ़ सफाई से रहने के साथ साथ एक अच्छा इंसान बनने की भी शिक्षा देनी चाहिए.

डायबिटीज़,उच्च रक्त चाप, एवं ह्रदय रोग जैसी बीमारियों के प्रमुख कारण हैं वसा युक्त एवं रेशा हीन आहार तथा शारीरिक श्रम का अभाव. पढ़े लिखे माता पिता भी अपने नन्हे मुन्नों को पिज्जा और बर्गर खिलाने तथा कोका कोला से कुल्ला कराने में अपनी शान समझते हैं. इस प्रकार उनका स्वाद फास्ट फ़ूड के लिए विकसित होकर, घर के पौष्टिक खाने को नकारने लगता है. अब तो गावों में भी कोकाकोला, चिप्स और डबलरोटी का खूब प्रचलन हो गया है. आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम जान बूझ   कर रोगों के जाल में फंसते चले जा रहे हैं.

'न्यू इंग्लैण्ड जर्नल ऑफ मेडिसिन' में छपे एक नवीन अध्ययन के अनुसार चीन में, नागरिकों में बढ़ती हुई सम्पन्नता के चलते, डायबिटीज़ एक महामारी के रूप में फैल रही है. भारत तथा अन्य एशियाई देशों में भी स्थिति खराब है. भारत में स्थूल बच्चों के साथ साथ कुपोषण के शिकार बच्चों की भी बहुतायत है. मोटापा हमें शारीरिक रूप से ही क्षतिग्रस्त नहीं करता, वरन मानसिक रूप से भी अस्वस्थ बनाता है.
रही सही कसर कम्प्यूटर और मोबाइल फोन ने पूरी कर दी है. बच्चे अपने खाली समय में इन्ही उपकरणों से चिपके रहते हैं. दौड़ने, खेलने कूदने जैसे बाह्य क्रिया कलापों में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं हैं. इंटरनेट और वीडियो गेम की लत, एक गंभीर समस्या का रूप ले चुकी है, जिसका सीधा असर बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है. ज़िम्मेदार नागरिकों की हैसियत से हमें अपने रहने के स्थानों में  'उपवन संस्कृति' को फिर से वापस लाना होगा, ताकि खुली हवा में साँस लेते हुए, हम शारीरिक व्यायाम के लाभ उठा सकें. स्कूल कॉलेजों में खेलकूद और योगाभ्यास को बढ़ावा दिया जाना चाहिए. मोटर बाइक और कार के स्थान पर युवक युवतियों में सायकिल चलाना एक आधुनिक फैशन के रूप में विकसित करना होगा.

जहाँ एक ओर हम फास्ट फ़ूड के मामले में पश्चिमी देशों की नक़ल करते हैं, वहीं साफ़ सफाई के मामले में अपनी आँखें मूँद लेते हैं. अपने घर का कूड़ा पड़ोसी के घर के आगे अथवा सड़क पर फ़ेंक कर हम अपनी स्वच्छता का परिचय देने में गर्व का अनुभव करते हैं. यदि इस दिशा में हम सभी थोड़ी सी भी सावधानी बरत लें तो अनेक संक्रामक रोगों  को नियंत्रित किया जा सकेगा. प्राय: उच्च वर्ग के बालक बालिकाएं भी सड़क पर चॉकलेट /आइसक्रीम के रैपर तथा संतरे/केले के छिलके फेंकते हुए देखे जा सकते हैं. झुग्गी झोपड़ी में रहने वालों की बात तो जाने ही दीजिये.
सडकों पर, या कहीं पर भी, थूकना तो भारतीय पुरुषों का जन्म सिद्ध अधिकार है. भवनों के गलियारों और दीवारों को पान की पीक से लाल करने में हमें तनिक भी शर्म महसूस नहीं होती. सुप्रीम कोर्ट ने बारहवीं कक्षा तक पर्यावरण शिक्षा विषय तो अनिवार्य बना दिया है , परन्तु हमारी कूड़े के  ढ़ेर लगाने की आदत पर अंकुश लगाना भी अनिवार्य है.

अनुचित लाड़ प्यार के चलते, कई माता पिता अपने कम उम्र के बच्चों का ड्राइविंग लाइसेंस बनवा देते हैं, और कई बार अपनी गन/रिवॉल्वर उनकी पहुँच के अन्दर रखते हैं. इस असावधानी के कारण आये दिन अनेक दुर्घटनाएं घटती हैं और हादसे के शिकार व्यक्तियों का स्वास्थ्य खतरे में पड़ जाता है.

जब हम स्वयं के साथ शान्ति अनुभव नहीं करते तो हम मानसिक एवम् भावात्मक व्याधियों से ग्रस्त हो जाते हैं. आक्रामक एवम् हिंसात्मक विचार हमारी सोच को नकारात्मक बना देते हैं, तथा हमारा ह्रदय क्रोध, द्वेष और ईर्ष्या से भर उठता है. टेलिविज़न तथा अन्य संस्थाओं द्वारा बच्चों /वयस्कों के लिए आयोजित  रियालिटी शोज़ एवम् अनेक प्रकार कि प्रतिस्पर्धाएं अधिकाँश प्रतियोगियों की मानसिकता को गलत तरीके से प्रभावित करती हैं. रुपयों की इस अंधी दौड़ में भाग कर हम अपने मानसिक एवम् शारीरिक स्वास्थ्य का सत्यानाश कर रहे हैं. अपनी प्रतिभा का विकास करना अच्छी बात है. परन्तु केवल पैसे कमाने के उद्देश्य से नहीं. हम केवल निर्मल आनंद के लिए अपनी नृत्य,गायन, खेलकूद की रुचियों को विकसित  क्यों नहीं करते? आधुनिक युग की 'चूहा दौड़' हमें एक स्वस्थ इंसान से एक बीमार जानवर बना रही है.

हाल ही में सिंगापुर में हुए एक स्वास्थ्य सेवा सम्मलेन में विशेषज्ञों ने माना कि एशिया की स्वास्थ्य सेवाएँ आधुनिक जीवन शैली की व्याधियों के बोझ तले दबी जा रही हैं. स्वाइन/बर्ड फ़्लू और तपेदिक जैसे संक्रामक रोगों के साथ साथ आर्थिक सम्पन्नता से जुड़ी हुई असंक्रामक बीमारियों का भार दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है. तम्बाकू एवम् धूम्रपान का व्यसन भी भारत समेत अन्य देशों में लाखों लोगों की सेहत पर सवालिया निशान लगा रहा है. सिगरेट एवम् गुटखा निर्माताओं की आक्रामक विज्ञापन तकनीक के आगे, सारे तम्बाकू विरोधी अभियान असफल सिद्ध होते प्रतीत हो रहे हैं. ये कम्पनियां मर्दानगी, आधुनिकता और तनाव-मुक्ति के नाम पर जनता को विष बेच रही हैं, और इनके विरुद्ध कोई भी कार्यवाही नहीं की जा रही है. तम्बाकू सेवन का सीधा सम्बन्ध श्वास एवम् फेफड़े की बीमारियों से है, जैसे कि अस्थमा, तपेदिक आदि. क्या ही अच्छा होता यदि हम तम्बाकू युक्त पान मसाला चबाने के स्थान पर लौंग, इलाइची या सौंफ जैसी गुणकारी वस्तुओं का सेवन करने की बुद्धि रखते.

किसी भी देश का स्वास्थ्य उसके बच्चों के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है. और केवल स्वस्थ माँ ही एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दे सकती है. परन्तु यह हमारा दुर्भाग्य है कि अधिकाँश भारतीय परिवारों में महिलाओं के स्वास्थ्य को वरीयता नहीं दी जाती. पत्नी एवम् माता की परम्परागत भूमिका में, स्त्री का कर्त्तव्य परिवार के अन्य सदस्यों की देखभाल करना है, न कि स्वयं अपनी. भारतीय समाज आज के युग में भी लिंग के आधार पर भूमिकाएं निर्धारित करने में विश्वास रखता है. लड़कों को अविचारी और उग्रवादी बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, तथा लड़कियों को शरमीला और सहनशील. आगे चल कर यह असामनता ढीठ/आडम्बरी पति तथा विचारों और मानसिक/शारीरिक रूप से कुपोषित पत्नी के रूप में प्रतिबिंबित होती है. महिलाओं को जीवन पर्यंत भिन्न प्रकार के तिरस्कारों का सामना करना पड़ता है, फिर चाहे वो लिंग आधारित भ्रूड हत्या हो,
दहेज़ न लाने के नाम पर जलाया जाना हो, अथवा बलात्कार का शिकार होना हो. जो देश महिलाओं का सम्मान करना नहीं जानता, वह वास्तव में एक रोगी देश है.

समाज में ऐसे सुधार लाने की आवश्यकता है जिनके द्वारा स्वास्थ्य सेवाएं न केवल टीकाकरण और स्वच्छता को बढ़ावा दें, वरन जन मानस को संतुलित आहार, स्वस्थ  जीवन शैली और नैतिक मूल्यों की भी शिक्षा भी प्रदान करें. यदि हमारे मन में शान्ति, प्रेम, अहिंसा के भाव होंगे, तथा हम अमीरी के भड़कीले दिखावे से दूर रहेंगे,तो वास्तव में हमारा जीवन रोगमुक्त हो सकेगा. स्वस्थ रहने के लिए प्रसन्न रहना आवश्यक है. और प्रसन्नता तभी मिलेगी जब हम द्वेष के स्थान पर आनंद बाँटे. तभी गाँव गाँव और शहर शहर में एक स्वस्थ और खुशहाल वातावरण बन पायेगा.

शोभा शुक्ला,
एडिटर
सिटिज़न न्यूज़ सर्विस


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महत्वाकांक्षा बन गयी है जानलेवा


बच्चों में दिनोंदिन तनाव बढ़ने से आत्महत्याओं की घटनाओं में निरन्तर वृद्धि हो रही है और इसके लिए बच्चों के साथ-साथ उनके अभिभावक और अध्यापकगण भी कम दोषी नहीं है। अभिभावकों और अध्यापकों को बच्चों की क्षमताओं का आंकलन करके उनकी रुचि के अनुसार प्रेरित करना चाहिए। बच्चों पर अपनी इच्छाओं को थोपना नहीं चाहिए क्योंकि बच्चों का मन थोपी हुई बातों को करने में नहीं लगता हैं लेकिन आज के समय में 'नम्बर वन' बनने की होड़ ने सभी बच्चों को तनावग्रस्त कर रखा है। हर माता-पिता चाहते है कि उनका बच्चा नामी-गिरामी स्कूल में शिक्षा ग्रहण करके डाक्टर, इंजीनियर और आई.ए.एस. बने और वे नम्बर वन की दौड़ में अपने बच्चे को दौड़ाकर 'डिप्रेशन' में डालने का काम करते है।

यूनीसेफ और मीडिया नेस्ट के संयुक्त तत्वावधान में आज यहां यू०पी० प्रेस क्लब में ‘चिल्ड्रन आर’ में "महत्वाकांक्षा बन गयी है जानलेवा"  विपय पर बोलते हुए 'आल इज वेल' फोरम से जुडे 'चाइल्ड लाइन' संस्था के निदेशक डा० अंशुमालि शर्मा ने कहा कि बच्चों का 'डिपरेशन में जाने का मुख्य कारण है "तनाव" और उनको यह तनाव देते है उनके माता-पिता, अभिभावक और अध्यापक। उन्होंने बताया कि डिप्रेशन ;अवसादद्ध के मुख्यत: चार लक्षण होते हे:- बच्चा नजर मिला कर आपसे बात न कर रहा हो, बच्चा अधिकतर अकेले बैठने की कोशिश में हो, छोटी-छोटी बातों में झुझला जाएं और कभी-कभी हिंसक हो जाएं। माता-पिता और अध्यापकों को बच्चों पर किसी तरह का दबाव नहीं डालना चाहिए। डिप्रेशन से बचने के लिए बच्चों को परीक्षा को हौव्वा नही समझना चाहिए, कम से कम छह घन्टे नींद ले, इम्तिहान के दिनों में हल्का-फुल्का भोजल करें, अभिभावक बच्चों पर दबाव न बनाकर उनकी समस्याओं को सुनकर उनका निदान करें और संवादहीनता न होने दें।

डा०  अंशुमालि शर्मा ने बताया कि 'आल इज वेल' फोरम ने सैकडों बच्चों को आत्महत्या से रोकने का काम किया है। उनका कहना है कि कोई भी बच्चा अपनी समस्याओं को फोरम के नि:शुल्क फोन नम्बर १०९८ अथवा ९४१५१८९२०० अथवा ९४१५४०८५९० पर चौबीसो घन्टे बातचीत करके सुलझा सकता है। 

डा० विनोद चन्द्रा ने बताया कि उनका फोरम बच्चों को स्वास्थ्य, आश्रय, परामार्श, परिवार वापसी आदि की सेवा प्रदान करता है। उनका मानना है कि अभिभावक, अध्यापक और छात्रों में संवादशून्यता  है और उसको दूर करने के लिए काउसिंलिंग की जरुरत है।

इस अवसर पर मीडिया नेस्ट की महामंत्री और वरिष्ठ पत्रकार कुलसुम तल्हा ने कहा कि "पहले हम भारतीय है बाद में पत्रकार"।  हम मीडिया के लोग बच्चों की समस्याओं को उजागर करके उसका समाधान निकालने में अहम भुमिका निभाते है। उन्होंने कहा कि ‘चिल्ड्रन आर’ अपनी तरह का एक निराला कार्यक्रम है जिसको यूनीसेफ के सहयोग से एक विख्यात पत्रकार संगठन मीडिया नेस्ट आयोजित करता है जिसमें बच्चों और महिलाओं के उत्थान के लिये काम किया जाता है। इस कार्यक्रम में बच्चों और महिलाओं की समस्याओं को उठाया जाता है और उसके समाधान के उपाय खोजे जाते है।

विश्व टी.बी दिवस (२४ मार्च) पर २४-घंटे की संगीत 'मैराथन'

हर वर्ष, २४ मार्च को विश्व तपेदिक (टी.बी) दिवस मनाया जाता है और इसके समर्थक टी.बी के बारे में जागरुकता बढ़ाने के लिये प्रयासरत रहते हैं. इस वर्ष, विश्व टी.बी दिवस २४ मार्च २०१० को टी.बी पर कार्यरत लोग एक अद्भुत आयोजन कर रहे हैं - "टू.बी.काँटीनुएड" नामक संगीत 'मैराथन' या संगीत की 'लम्बी दौड़' जो २४ घंटे तक चलेगी.

इस २४ घंटे तक निरंतर चलने वाले संगीत आयोजन के समन्वयक हैं इटली के स्ताज़ों दी तोपोलो. इसका नाम टू.बी.काँटीनुएड... इस लिये है क्योंकि अंग्रेजी में इसको टी.बी.सी. अक्षरों से कहा जाता है, जिसका इटली में अर्थ होता है टी.बी या तपेदिक रोग.

इस संगीत समारोह में दुनिया भर से अनेकों मशहूर संगीतकारों को आमंत्रित किया गया है जो बिना रुके २४ घंटे तक प्रस्तुति करते रहेंगे. इस संगीत 'मैराथन' को वेबसाइट द्वारा भी प्रसारित किया जायेगा - www.stazioneditopolo.it .

टी.बी से भारत में १९ लाख लोग प्रति वर्ष ग्रसित होते हैं,और लगभग लाख लोगों की टी.बी की वजह से मृत्यु हो जाती है. भारत में विश्व स्तर पर सबसे अधिक दवा प्रतिरोधक टी.बी के रोगी हैं जिनमें से एक-तिहाई मृत हो जाते हैं.

२००८ में ४४०,००० लोगों को दवा-प्रतिरोधक टी.बी, उनमें से एक तिहाई मृत

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रपट के अनुसार, विश्व में कुछ ऐसे स्थान हैं जहां चार में से एक ऐसे व्यक्ति जो टी.बी रोग से ग्रसित होते हैं, वो ऐसे टी.बी से रोग-ग्रस्त हैं, जिनका उपचार संभव ही नहीं है


उदाहरण के लिये २००८ रपट के अनुसार उत्तर-पश्चिम रूस में, २८ प्रतिशत जिन नए लोगों में टी.बी रोग होता है, उनको दवा-प्रतिरोधक टी.बी होती है. ये विश्व में सबसे अधिक अब तक का रपट किया हुआ दवा-प्रतिरोधक टी.बी का स्तर है. इससे पहले सबसे अधिक दवा-प्रतिरोधक टी.बी अज़रबाईजान के बाकू शहर में पायी गयी थी (२००७ में) जिसका दर २२ प्रतिशत था.

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी की हुई नयी रपट, WHO's Multidrug andExtensively Drug-Resistant Tuberculosis: 2010 Global Report onSurveillance and Response key अनुसार २००८ में ४४०००० को दवा-प्रतिरोधक टी.बी हुई थी जिनमें से एक-तिहाई लोग मृत हुए. यदि आंकड़ों को देखें, तो एशिया पर सबसे अधिक कु-प्रभाव पड़ा. भारत और चाइना में लगभग ५० प्रतिशत दवा-प्रतिरोधक टी.बी पाई गयी. अफ्रीका में ६९००० दवा-प्रतिरोधक टी.बी के नए रोगी थे जिनमें से अधिकाँश की जांच तक नहीं हो पायी.

दवा-प्रतिरोधक टी.बी के दर को कम करने में टी.बी रोकधाम एवं उपचार कार्यक्रमों का बहुमूल्य योगदान है.

विश्व स्तर पर जिन लोगों को टी.बी का उपचार प्राप्त हो रहा है उनमें से ६० प्रतिशत टी.बी से सफलतापूर्वक ठीक हो जाते हैं. हालाँकि सिर्फ प्रतिशत दवा-प्रतिरोधक टी.बी के रोगियों को ही जांच तक नसीब होती है, उपचार तो बाद की बात है. साफ़ ज़ाहिर है कि दवा-प्रतिरोधक टी.बी की जांच करने की व्यवस्था को अति-शीघ्र सुधरने की जरुरत है.  

न रक्त बहे न पानी ......... क्योंकि ...



                                      विश्व जल दिवस पर विशेष
                                        न रक्त बहे न पानी ......... क्योंकि ....

    एक जीवन प्रदान करता है ओर दूसरा उस जीवन का पोषण करता है. एक हमारी रगों में बहता है, तो दूसरा हमारी पृथ्वी पर बह कर उसे रहने योग्य बनाता है. परन्तु हाय रे दुर्भाग्य! हम दोनों में से एक को भी संभाल कर नहीं रख पा रहे हैं. हमारे नेताओं ने देशभक्ति के ऐसे नारों को देने में कोई कमी नहीं की है जैसे, "तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे आजादी दूंगा" ; या फिर "खून का बदला खून". एक शांतप्रिय एवम् अहिंसक व्यक्ति के लिए हम बड़ी आसानी से यह मान लेते हैं कि उसकी रगों में खून की जगह पानी बहता है. प्रसिद्ध साहित्यकार बर्नार्ड शा ने सत्य ही कहा है कि " यदि चाहते हो तो अवश्य युद्ध लड़ो, पर युद्ध का गुणगान मत करो".
    परन्तु संभावना तो यह है कि यदि तीसरा विश्व युद्ध लड़ा गया तो यह लड़ाई पानी के मुद्दे को लेकर ही होगी. अर्थात, पानी अथवा उसके अभाव के कारण ही खून की नदियाँ बहेंगी.

    हाल ही में, थाईलेंड की राजधानी बैंकॉक में, बौध भिक्षुओं समेत हज़ारों प्रदर्शनकारियों ने सरकार के विरुद्ध अपना आक्रोश प्रदर्शित करने का एक नया तरीका निकाला. उनके नेताओं ने प्रत्येक स्वयंसेवी के शरीर से थोड़ा थोड़ा खून निकाल कर लगभग १००० लीटर रक्त एकत्र कर के सरकारी सचिवालय के मुख्य द्वार पर बहा दिया. उनका कहना था कि इस प्रकार सारे देश वासियों का खून एक साथ मिल कर प्रजातंत्र की लड़ाई में शामिल होगा. ये प्रदर्शनकारी, थाईलेंड में शीघ्र ही चुनाव कराने की मांग कर रहे हैं.

    थाईलेंड के बारे में तो मुझे पता नहीं, पर हमारे भारत में तो रोगियों के लिए सदैव ही अस्पतालों में स्वस्थ खून की कमी बनी रहती है. लोग रक्त दान करने से कतराते है. ओर बैंकॉक में इतना सारा रक्त सड़कों पर यूँ ही बहा दिया गया. यदि वो किसी का जीवन बचाने के काम आता तो प्रजातंत्र की वास्तविक सेवा हो सकती थी. मेरे विचार से तो, सड़कों पर खून बहाने के बजाय, हम सभी को अपने जन्मदिन, तथा अन्य शुभ अवसरों पर रक्त दान करके मानवीय संबंधों को सुद्रिड करना चाहिए.

    इसी प्रकार पानी बहाकर उसका अपव्यय करना भी अक्षम्य है. यह हमारे ही दुष्कर्मों का फल है कि पानी आज एक बहुमूल्य वास्तु बन गया है, तथा दिन प्रतिदिन वह दुष्प्राप्य होता जा रहा है. मुझे याद है कि मेरे बचपन में नलों २४ घंटे पानी आता था. अब दिन भर में दो या तीन घंटे की पतली धार भी एक अजूबे से कम नहीं मानी जाती. भारत के कई शहरों में गरमी के दिनों में तो कभी कभी स्थिति इतनी भयंकर हो जाती है कि सरकारी टैंकरों के द्वारा सप्ताह में एक या दो बार ही जल आपूर्ति की जाती है. लोग पीने के लिए  ही नहीं वरन अन्य दैनिक ज़रूरतों के लिए भी पानी खरीदने के लिए विवश हो जाते हैं. सार्वजनिक जल व्यवस्था तो अब मृत प्राय हो चुकी है, और निजी हाथों में स्थानांतरित हो रही है. जन साधारण को निजी पानी के पम्प, ट्यूबवेल एवम् हैण्ड पम्प लगवाने पद रहे हैं, और वे इसका भरपूर दुरुपयोग भी कर रहे हैं.

    भले ही हम दिन प्रतिदिन बढ़ती अपनी पानी की आवश्यकता को कम करने में असमर्थ हों, परन्तु उसका दुरुपयोग तो रोक ही सकते हैं. घरों में जब पानी के टुल्लू पम्प देर तक चलते हैं तो छतों पर रखी हुई पानी की टंकियों के अधिप्रवाह से जलधारा नालियों में ही समाहित होती है, और मेरा दिल दर्द से भर उठता है. क्या कभी हमने यह सोचा है कि सिर्फ हमारी लापरवाही के कारण सैकड़ों लीटर पानी बर्बाद हो जाता है. एक और पीने के लिए भी पानी दुर्लभ है, तो दूसरी ओर वह सड़कों पर बह कर बर्बाद हो रहा है. यदि टंकी भरने पर पम्प को तुरंत बंद कर दिया जाय तो पानी का यह आपराधिक अपव्यय रोका जा सकता है.
      विश्व भर में प्रति वर्ष १,५०० क्यूबिक किलोमीटर पानी बर्बाद होता है. इस पानी का सदुपयोग करके इसे खेती करने एवम् ऊर्जा उत्पन्न करने के काम में लाया जा सकता है, परन्तु प्राय: ऐसा होता नहीं. विशेषकर विकासशील देशों में अस्सी प्रतिशत गंदगी पानी में मिल कर उसे पीने के योग्य बना देती है. इन सबके चलते पीने एवम् खेती के पानी की आपूर्ति दांव पर लगी है, तथा पर्यावरण एवम् मानव स्वास्थ्य भी खतरे में है. इतना सब होते हुए भी जल-प्रदूषण अभी भी कोई आवश्यक मुद्दा नहीं है. विश्व के लगभग १.१ अरब व्यक्तियों को पीने के लिए स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है, और वे असुरक्षित पेयजल साधनों पर निर्भर हैं.

    इस निराशाजनक परिदृश्य को ध्यान में रखता हुए यू.एन. वाटर ने विश्व जल दिवस २०१० की विषय वस्तु रक्खी है " स्वस्थ विश्व के लिए स्वच्छ जल". प्रति वर्ष २२ मार्च को मनाये जाने वाले इस दिवस का इस बार का मुख्य उद्देश्य है स्वच्छ पानी की गुणवत्ता के बारे में राजनैतिक स्तर पर जागरूकता पैदा करना, ताकि जल की मात्र के साथ साथ उसकी स्वच्छता पर भी ध्यान दिया जाय.

    शुद्ध वायु के समान, शुद्ध पेयजल भी हमारी मांग या आवश्यकता नहीं वरन मौलिक अधिकार होना चाहिए. परन्तु यह खेद का विषय है कि जल भी एक व्यापारिक पदार्थ बन कर रह गया है. इसका कारण है राजनैतिक इच्छा का अभाव और नागरिक उदासीनता का बाहुल्य. बहु राष्ट्रीय कंपनियों के अनवरत विज्ञापनी प्रचार के चलते, हम बोतलबंद पानी खरीद कर पीने में अपनी शान समझते हैं. मिनरल वाटर (आखिर यह वास्तव में होता क्या है?) का नाम आज बच्चे बच्चे की जुबां पर है.

    यूनाईटेड नेशंस एवम् अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं जहां सरकारी स्तर पर पेयजल समस्या का हल ढूँढने में लगी हुयी हैं, वहां आप और हम अपने दैनिक जीवन में कुछ और संवेदनशील और समझदार तो हो ही सकते हैं. हम इतना तो कर ही सकते हैं कि ब्रश करते समय नल बंद कर दें; घर के टपकते हुए नलों की मरम्मत करवा लें; पानी की टंकी भर जाने पर पम्प बंद कर दें; बाथरूम में शावर का इस्तेमाल कम से कम करें; बगीचे में रात भर पानी देने का पाइप खुला न छोड़ दें; और घर के कूड़े को नदी अथवा तालाब में न प्रवाहित करें. ऐसा करने भर से पानी के अपव्यय को काफी हद तक रोका जा सकता है.

    आज विश्व जल दिवस के अवसर पर आइये हम यह प्रण करें कि पानी के कारन खून की नदियाँ नहीं बहने देंगे, और खून को सड़कों पर नहीं बहने देंगे.
    जय हिंद.

शोभा शुक्ला
एडिटर
सिटिज़न न्यूज़ सर्विस








  

२४ मार्च को है विश्व तपेदिक (टी.बी) दिवस

२४ मार्च को विश्व तपेदिक (टी.बी) दिवस है. भारत में सर्वाधिक तपेदिक (टी.बी) से ग्रसित लोग हैं और आंकड़ों के अनुसार भारत की एक-तिहाई जनता को लेटेंट टी.बी हो सकती है. भारत में लगभग २५ प्रतिशत ड्रग-रेसिस्तंत टी.बी के भी रोगी हैं.

स्टॉप टीबी पार्टनरशिप ने इस साल विश्व टी.बी दिवस पर मुख्य-रूप से वेबसाइट बनायीं है जिसका लिंक यह है:
http://www.stoptb.org/events/world_tb_day/2010/

स्टॉप टीबी पार्टनरशिप का 'टी.बी को रोकने के लिये तस्वीरें' पुरुस्कार २००९ से सम्मानित छायाकार दविड़ रोच्किंद इस समय भारत में हैं और टी.बी से सम्बंधित तस्वीरों को वो इस वेबसाइट पर प्रकाशित करते रहेंगे.

लखनऊ के छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा vishwavidyalaya के सर्जरी विभाग के प्रमुख प्रोफेस्सर डॉ रमा कान्त का कहना है कि "टी.बी की रोकधाम सिर्फ चिकित्सा से संभव नहीं है. इसके लिये टी.बी का उपचार सफलता पूर्वक समाप्त किया हुए लोगों को टी.बी रोकधाम कार्यक्रम में शामिल करना चाहिए और उन कारणों को संबोधित करना चाहिए जिनकी वजह से टी.बी से ग्रसित लोगों तक टी.बी से बचाव एवं उपचार की सेवाएँ समय रहते नहीं पहुच पाती." प्रोफ रमा कान्त द्वारा लिखित पुस्तक 'मानवता का अभिशाप - तपेदिक' को उत्तर प्रदेश के हिंदी संसथान द्वारा 'बीरबल सहनी पुरुस्कार २०००' से सम्मानित किया गया था.

टी.बी एक संक्रामक रोग है, जो mycobacterium tuberculosis namak बक्टेरिया से होता है. इससे बचाव मुमकिन है, और टी.बी से सफलतापूर्वक उपचार भी मुमकिन है यदि दवा समय पर पूर्वी उपचार अवधि में ली जाये.

बवासीर के ईलाज पर पुस्तक ‘पाइल्स टू स्माइल्स’ का विमोचन

[अधिक जानकारी के लिए प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त से संपर्क करें: ०५२२-२३५८२३०, ९८३-९९९-०९६६, ९८३९०-७३३५५ - 'पाइल्स टू स्माइल्स' क्लीनिक, सी-२२११, सी-ब्लाक चौराहा, इंदिरा नगर, लखनऊ-२२६०१६. वेबसाइट: www.ramakant.org, ईमेल: ramakantkgmc@rediffmail.com ]
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लखनऊ कालेज आफ सर्जन्स के दीक्षान्त समारोह में बवासीर के ईलाज पर प्रोफेसर डा0 रमा कान्त की लिखित पुस्तक ‘पाइल्स टू स्माइल्स’ का विमोचन आज छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर डा0 सरोज चूरामणि गोपाल ने किया। लखनऊ के महापौर डा0 दिनेश शर्मा इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे।

बवासीर के उपचार पर आधारित इस पुस्तक के लेखक मण्डल में छ0शा0म0 चिकित्सा विश्वविद्यालय के सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डा0 रमा कान्त, और डा0 सुरेश कुमार एवं डा0 अरशद अहमद हैं। प्रो0 रमा कान्त को हाल ही में 2010 का अमृतलाल नागर सम्मान भी दिया गया था।

बगैर चीरा लगाए, एक अत्याधुनिक विधि के द्वारा बवासीर का इलाज करने में सिद्धहस्त, डा रमा कान्त ने कहा कि ‘इस पुस्तक में बवासीर के उपचार हेतु एक ऐसी विधि का विवरण हैं जिसमें रोगी कुछ ही घंटे अस्पताल में रह कर, दूसरे दिन से ही सामान्य रूप से कार्य कर सकता है।‘

प्रोफेसर डा0 रमा कान्त कई सालों से नवीन विधियों ‘डी0जी0एच0ए0एल0 और आर0ए0आर0 से बवासीर या पाइल्स का उपचार कर रहे हैं। वें आस्ट्रिया के विश्व-विख्यात बवासीर उपचार एवं शोध केंद्र में प्रशिक्षित भी हैं।

प्रोफेसर डा0 रमा कान्त ने बताया कि ‘कई ज्ञात जीवनशैली और पोषण से जुड़े हुए कारण हैं जिनसे बवासीर होने का खतरा बढ़ जाता है।’

प्रोफेसर डा0 रमा कान्त ने कहा कि इस पुस्तक का हिन्दी संस्करण भी जारी किया जाएगा।
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[अधिक जानकारी के लिए प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त से संपर्क करें: ०५२२-२३५८२३०, ९८३-९९९-०९६६, ९८३९०-७३३५५ - 'पाइल्स टू स्माइल्स' क्लीनिक, सी-२२११, सी-ब्लाक चौराहा, इंदिरा नगर, लखनऊ-२२६०१६. वेबसाइट: www.ramakant.org, ईमेल: ramakantkgmc@rediffmail.com ]

टी.बी. या तपेदिक की वजह से महिलाएं बे-घर हो जाती हैं

२ साल पहले की बात है (सन २००८) कि अंतर-राष्ट्रीय महिला दिवस (८ मार्च) के उपलक्ष्य में भारत के उस समय के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ अंबुमणि रामादोस ने महिलाओं में छय रोग या तपेदिक या टी.बी. (तुबेर्कुलोसिस) के नियंत्रण एवं उपयुक्त इलाज के लिए जोर डाला था.

१०० साल पहले १९०८ में १५००० महिलाओं ने न्यू यार्क में कार्यस्थल पर पुरुषों की तुलना में समान कीमत या देहाड़ी एवं वोट डालने के अधिकार के लिए एक जुलूस निकाला था. ये अपने आप में एक ऐतिहासिक कदम था जब इतनी भारी संख्या में महिलाएं एकजुट हो कर अपने मूल अधिकारों के प्रति न केवल जागरूक हुई बल्कि संघर्षरत भी रही.

भले ही हमें ये लगे कि समाज में एड्स और टी.बी. या तपेदिक की वजह से शोषण-युक्त व्यवहार और रवैया खत्म हुए जमाना बीत गया है पर ये सच नही है. भारत के तुबेर्कुलोसिस रिसर्च सेंटर या तपेदिक शोध केन्द्र जो चेन्नई या मद्रास में स्थित है, की रिपोर्ट के अनुसार टी.बी. या तपेदिक की वजह से एक भारी संख्या में महिलाएं बे-घर हो जाती हैं.

डॉ रामादोस ने २००८ में इस नागरिक संवाददाता से कहा की “लगभग हर १००० महिलाओं में से १ को टी.बी. या तपेदिक की वजह से घर से बाहर निकल दिया जाता है. जो लोग एड्स के साथ जीवित हैं, उनमे टी.बी. या तपेदिक सबसे बड़ा अवसरवादी संक्रामक रोग है, और मृत्यु का कारण भी”.

फरवरी २००८ में भारत में एक महिला जिसकी मृत्यु टी.बी. या तपेदिक से हुई थी, उसके पार्थिव शरीर को दाह करने की बजाय शोषण के कारण ५ दिन तक रिश्तेदारों या तीमारदारों के हवाले नही किया गया था.

Millennium development goals जिनको हासिल करने के लिए भारत भी समर्पित है, उनमे महिलाओं का सशक्तिकरण, पुरुषों और महिलाओं में समानता, और जच्चा-बच्चा स्वास्थ्य और कल्याण व्यवस्था को बेहतर करना शामिल है. एड्स, टी.बी. या तपेदिक के कार्यक्रम इनके बैगैर बेहतर नही किए जा सकते, कहा था डॉ रामादोस ने.

जो डॉ रामादोस ने २००८ फरवरी में कहा था, WHO या विश्व स्वास्थ्य संगठन ने १९९८ में ही चेतावनी दे दी थी की “नवयुवतियों में टी.बी. या तपेदिक सबसे बड़ा मृत्यु का कारण है”.

“टी.बी. या तपेदिक की वजह से महिलाएं और पुरूष अपने उम्र के चरम में रोग-ग्रस्त हो जाते हैं और अक्सर मृत्यु के शिकार भी, मगर दुनिया का ध्यान इस पर नही है” कहा डॉ पाल दोलिन ने जो १९९८ में WHO या विश्व स्वास्थ्य संगठन के टी.बी. या तपेदिक कार्यक्रम के प्रमुख थे. “एक महिला की मृत्यु का ‘ripple effect’ या लंबे समय तक रहने वाला प्रभाव, उनके परिवार को, समुदाय को और अर्थव्यवस्था को झेलना पड़ेगा”.

शारीरिक एवं सामाजिक रूप से महिलाओं में एड्स संक्रमण होने की सम्भावना पुरुषों की तुलना में कही अधिक होती है. “एड्स भारत में मात्र स्वास्थ्य का मुद्दा नही है, परन्तु एक सामाजिक और आर्थिक मुद्दा भी है” कहा डॉ रामादोस ने.

जो लोग एड्स के साथ जीवित हैं उनमे टी.बी. या तपेदिक सबसे बड़ा अवसरवादी संक्रमण है. ये आवश्यक है की टीबी कार्यक्रम महिलाओं तक पहुचे विशेषकर कि उन महिलाओं तक जो सामाजिक और आर्थिक रूप से समाज के हाशिये पर हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO ) द्वारा मान्यता प्राप्त टी.बी. या तपेदिक उपचार के लिए कार्यक्रम जिसे DOTS ya Directly Observed Treatment Short-course कहते हैं, वो इस प्रकार से लागू किया जाना चाहिए कि पुरुषों और महिलाओं मे जो असमान्यतायें हैं वो कम हो और जिन महिलाओं को टी.बी. या तपेदिक की जांच या इलाज की जरुरत है, वो उपयुक्त सेवाओं का लाभ उठा सकें और इन असमानताओं की वजह से सेवाओं से वंचित न रहें.

एक परिवार में अक्सर महिला का स्वास्थ्य अन्य सदस्यों के मुकाबले आखरी प्राथमिकता होती है. ये कोई आश्चर्य की बात नही है की अक्सर महिलाओं मी टी.बी. या तपेदिक की जांच विलम्ब से हो पाती है और इलाज भी. खान-पान की दृष्टि से भी महिलाओं को अक्सर न केवल कम पौष्टिक अहार मिलता है बल्कि कम मात्र में भी भोजन प्राप्त होता है.

जो लोग महिलाओं एवं पुरुषों मी असमानताओं को कम करने के लिए प्रयासरत हैं और जो लोग रोगों के नियंतरण में कार्यरत हैं, उनको मिलजुल कर कार्य करना चाहिए. टी.बी. या तपेदिक और एड्स के सब कार्यक्रमों को महिला सशक्तिकरण कार्यक्रमों के साथ मिल कर ही कार्य करना चाहिए.

आज अंतर-राष्ट्रीय महिला दिवस (८ मार्च) के उपलक्ष्य में, आने वाले विश्व टी.बी. या तपेदिक दिवस (२४ मार्च) को अधिक सार्थक बनने के लिए, विभिन्न कार्यक्रमों को मिलजुल कर कार्य करना चाहिए जिससे हर महिला ये कह सके कि ‘मैं भी टी.बी. या तपेदिक को रोक सकती हूँ’.
बाबी रमाकांत - सिटिज़न न्यूज़ सर्विस - सी.एन.एस

प्रो० डॉ० रमा कान्त को अमृतलाल नागर सम्मान २०१०


२०१० का उत्कृष्ट चिकित्सा सेवाओं के लिए अमृतलाल नागर सम्मान लखनÅ के छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो० डॉ० रमा कान्त को दिया जा रहा है। भारतीय शल्य-चिकित्सकों के संगठन के प्रो० रमा कान्त राष्ट्रीय संचालन परिषद के सदस्य हैं और राज्य अध्यक्ष भी हैं।

प्रख्यात हिन्दी साहित्यकार पदमभूषण अमृतलाल नागर की स्मृति में अमृतलाल नागर सम्मान, होलिकात्सव समिति चौक लखनÅ द्वारा दिया जाता है, जिसके मुख्य संरक्षक लखनÅ लोकसभा क्षेत्र के सांसद लालजी टण्डन हैं।

२००५ में प्रो० रमा कान्त को जन-स्वास्थ्य सेवाओं के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक का विशेष अंतर्राष्ट्रीय पुरूस्कार भी प्रदान किया गया था। २०१० के गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर प्रो० रमा कान्त को सारस्वत सम्मान से नवाजा गया। प्रो० डॉ० रमा कान्त छ०शा०म० चिकित्सा विश्वविद्यालय एवं गॉंधी स्मारक एवं सम्बन्धित चिकित्सालय के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक भी रह चुके हैं।

भारतीय शल्य-चिकित्सकों के संगठन द्वारा प्रो० डॉ० रमा कान्त को सर्वश्रेष्ठ शल्य-चिकित्सा शिक्षक पुरूस्कार भी मिल चुका है। १९९५ में बेगम हज+रत महल कौंमी एक्ता पुरूस्कार, १९९६ में ओल्मपियन सर्जन अवार्ड, १९९७ में राष्ट्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय का स्वास्थ्य क्षेत्र में हिन्दी लेखन एवं पुस्तकों के लिए अनुशंसा पुरूस्कार, उ०प्र० हिन्दी संस्थान का बीरबल साहनी पुरूस्कार से भी प्रो० डॉ० रमा कान्त सम्मानित हो चुके हैं।

गाँधी से शर्मीला अभियान:

२४-२६ फरवरी २०१० के दौरान तीन दिवसीय गाँधी से शर्मीला अभियान से सैंकड़ों लोग जगह-जगह जुड़े हुए हैं. इम्फाल, मणिपुर में देश भर से विभिन्न सामाजिक आंदोलनों से जुड़े हुए सामाजिक कार्यकर्ता इकठ्ठे हुए हैं और तीन दिवसीय उपवास के माध्यम से (२४-२६ फरवरी २०१०) इस अभियान को सशक्त कर रहे हैं. इस "गाँधी से शर्मीला अभियान" को संयुक्त रूप से आयोजित किया है: अपुन्बा शर्मीला कांबा लूप, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (एन.ए.पी.एम्), आशा परिवार, इंसाफ, जस्ट पीस फाउनडेशन, ह्यूमन राईटस अलर्ट और रीचआउट ने.

नवम्बर २००९ में कवयित्री एवं सामाजिक कार्यकर्ता इरोम शर्मीला ने अपने उपवास के दस साल पूरे कर लिए हैं. इरोम की मांग है कि आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पॉवर एक्ट (ए.ऍफ़.एस.पी.ए) को हटाया जाए. इरोम ने अपना उपवास दस साल पहले शुरू किया जब मणिपुर के मालोम में भारतीय सेना ने दस निर्दोष लोगों को मार दिया था. पुलिस ने इरोम को ६ नवम्बर २००० को गिरफ्तार कर लिया और भारतीय पेनल कोड सेक्शन ३०९ के तहत आत्महत्या करना का आरोप लगाया. इरोम का स्वास्थ्य दस साल से अधिक के उपवास से निरंतर गिरता गया है. इन दस सालों से अधिक समय में, इरोम ने एक बूँद पानी भी नहीं ग्रहण की है, और जबरदस्ती नाक के रास्ते से उनको ट्यूब द्वारा पोषण दिया जाता है.

ये कानून जम्मू एवं कश्मीर में रहने वाले कुछ वर्ग के मुस्लमान और उत्तर-पूर्वी राज्यों में रहने वाले लोगों के लिए विशेष बनाया गया लगता है. संयुक्त राष्ट्र की जात-पात भेदभाव मिटने के लिए कमिटी (UN Committee on Elimination of Racial Discrimination) ने ६ मार्च २००७ को इस कानून को हटाने की बात की है. यह विरोधाभास ही तो है कि भारत जो सबसे बड़ा लोकतंत्र राष्ट्र होने का दावा करता है, और जिसने एक ओर सैन्य शक्ति की बढ़ोतरी के लिए निरंतर प्रयास किये हैं जिससे कि देश के नागरिकों की रक्षा हो सके, वहीँ दूसरी ओर राज्य-प्रायोजित हिंसा और मानवाधिकार का उलंघन इस कानून की आड़ में हो रहा है,  जिसकी सुनवाई किसी भी कोर्ट में नहीं हो सकती है. इस मुद्दे पर सरकार की चुप्पी नी:संदेह निंदा की पात्र है.

इस बिंदु पर, हम सब इरोम शर्मीला के प्रति अपना सहयोग व्यक्त करते हैं और हमारी मांग है कि:
- ए.ऍफ़.एस.पी.ए. को बिना विलम्ब हटाया जाए
- स्कूल, विश्वविद्यालय और अवासिक छेत्रों से सेना को हटाया जाए
- सेना के जिन लोगों ने बलात्कार, हत्या और अन्य अपराध किये हैं, उनके खिलाफ करवाई हो

हमारी विनती है कि आप सब इम्फाल में या जहां भी आप हों, वहीँ लोगों को इकठ्ठा कर के गाँधी से शर्मीला अभियान में शामिल हों, और २४-२६ फरवरी २०१० तक उपवास रखें.


अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें: 
फैसल खान (आशा परिवार और जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय)  09313106745, 09868619699
संदीप पाण्डेय (आशा परिवार और जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय) ०५२२ २३४७३६५
निन्ग्लूं हंगल (जस्ट पीस फ़ोउनडेशन) 9868592768, insafdelhi@gmail.com
इरोम सिंहजित (जस्ट पीस फाउनडेशन) 9862696184, iromsinghajit@gmail.com
अरविन्द मूर्ति (जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, उत्तर प्रदेश)
एम्.एच. गाँधी (आशा परिवार), गुजरात
सज्जाद हुसैन (जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, जम्मू एवं कश्मीर
बसंता वारेप्पम (ह्यूमन राईटस अलर्ट),  wareppa@gmail.com
क्षेत्रिमयुम ओनील (रीचआउट), onilrights@gmail.com