चुनाव के बाद पंचायत

उत्तरप्रदेश में पंचायती राज का निर्वाचन चार चरणों में संपन्न हो गया, लेकिन रक्त रंजित पंचायत चुनाव अपनेपीछे लोकतंत्र के उस कुहासे को छोड़ गया है, जिसके छंटने या गहरा होने के तमाम आकलन पंचायती राजव्यवस्था के औचित्य पर भारी पड़ रहे हैं। चुनाव में इस्तेमाल हुए धनबल और बाहुबल ने स्थानीय स्तर परप्रत्यक्ष लोकतंत्र की दिक्कतों को उजागर कर दिया है।

पंचायतों चुनाव को लेकर पूरे प्रदेश में एक सा हाल दिखा। चुनाव जीतने के तरीके और भविष्य का संकट एकजैसा ही दिखाई दिया। मतदाताओं को अपने वादों और सक्रियता से पक्ष में करने के उदाहरण सीमित दिखाईदिये,जबकि साम-दाम-भेद-दंड की कूटनीति अपनाने वाले उम्मीदवारों ने विजय हासिल की। ऐसे में वे लोगहारते दिखाई दिये, जो धनबल से वोट नहीं खरीद सकते थे। पूर्व प्रधान हरीराम कहते हैं कि प्रधान बनने केलिए इतनी भीड़ जुटी है,लेकिन अगर किसी से पूछ लिया जाये कि प्रधान क्यों बनना चाहते हो तो शायद हीकोई जवाब हो। जबकि एक और पूर्व प्रधान बाबूराम तिवारी का कहना है कि क्या करें,शराब गोश्त का प्रचलनइतना ज्यादा बढ़ गया है कि अगर जीतना है तो लोगों को खिलाना पिलाना पड़ेगा। कहने का मतलब है कि इसबार पंचायत चुनाव में वह सब कुछ हुआ जो कहीं से इस प्रत्यक्ष लोकतंत्र के लिए जायज नहीं था।

हालांकि पूरी चुनावी प्रक्रिया में धनबल और बाहुबल के इस्तेमाल के पीछे कई कारण बहुत ही स्पष्ट हैं। पिछली पंचायतों के कामकाज में उत्तर प्रदेश में जबरदस्त भ्रष्टाचार देखा गया। लाखों और करोड़ों में घोटाले उजागर हुए। पदाधिकारियों ने नरेगा(मनरेगा) से लेकर कल्याणकारी योजनाओं के लिए लाभार्थी चुनने तक में पैसा बनाया। उत्तरप्रदेश के बहराइच जिले में करोड़ों का पेंशन घोटाला इसका सबूत है। जहां निर्वाचित प्रतिनिधियों और नौकरशाही के बीच तालमेल करके एक कल्याणकारी योजना का बंटाधार कर दिया। ध्यान रहे कि आर्थिक कदाचार की बनती जगह ने स्थानीय शासनतंत्र को धन निवेश करने और भ्रष्टाचार के जरिए पैसा उगाहने का उपक्रम बना दिया है। यही वजह है कि चुनाव पूर्व और चुनाव के दौरान खिलाने-पिलाने का एक लंबा दौर देखा गया। आलम यह रहा कि उत्तर प्रदेश में दूसरे राज्यों से भारी मात्रा में अवैध शराब की तस्करी भी की गई। हालांकि प्रशासन ने अपनी खाल बचाने के लिए सक्रियता दिखाते हुए लाखों रुपये की अवैध शराब जब्त की। पंचायत चुनावों में हुए खर्च का सटीक आकलन मुश्किल है,लेकिन लाखों रूपये खर्च करने वाले प्रत्याशी चर्चा में रहे हैं। चर्चा ऐसे प्रत्याशियों की भी रही,जो अपनी जमीनें बेंचकर मतदाताओं को लुभाने में खर्च कर रहे थे। जनता की राजनीतिक चेतना भी नकारात्मक रूप से प्रभावित हुई है। क्योंकि मतदाताओं के बीच से उम्मीदवारों के गुणों-अवगुणों और चरित्र को केंद्र में रखकर बात करने क्षमता में कमी देखी गई है। यही वजह है कि ज्यादा खिलाने पिलाने वाले उम्मीदवारों ने ही बाजी मारी है। जबकि विकसित राजनीतिक चेतना पर ऐसे उम्मीदवारों का खुला बहिष्कार होना चाहिए था,जो पूरे प्रदेश में देखने को नहीं मिला। पंचायत चुनावों को लंबे समय से देखने वाले पत्रकार संजीव श्रीवास्तव बताते हैं कि लोगों ने गन्नों के खेतों छिपा-छिपाकर शराब बांटी गई है। वे ताज्जुब करते हैं कि अचानक इतने पीने वाले लोग कहां से आ गये हैं ? गांव के स्तर पर चुनाव बाद यह चर्चा आम है कि जीतने वाले उम्मीदवार ने कितने लाख रुपये खर्च किये हैं। ऐसे हालात में इस नवनिर्वाचित त्रिस्तरीय पंचायतीराज व्यवस्था में होने वाले आर्थिक कदाचार का महज अंदाजा लगाया जा सकता है। क्योंकि ये जनप्रतिनिधियों ने लाखों का निवेश कर ब्याज सहित उगाही की मंशा से ही इस लोकतंत्र का हाथ थामा है।

खर्चें के बलपर जन समर्थन हासिल करने की मंशा दरअसल अवसरवादी राजनीति की परवरिश का असर है। पंचायतों को रातों रात जिस मात्रा में धनापूर्ति की गई है,वह भी अवसरवादी राजनीति के जरिए लाभ लेने की कोशिश भर है। चुनावी लाभ लेने के लिए रातोंरात नरेगा जैसी योजनाओं का विस्तार कर दिया जाता है,जबकि काम को करने वाली मशीनरी न केवल प्रशिक्षण की कमी से जूझ रही है,बल्कि स्थानीयता की समस्याओं का शिकार है। ग्राम स्तर पर धनप्रबंधन की कमजोर प्रणाली ने पूरे मामले को भ्रष्टाचार में तब्दील कर दिया है। आज परिणाम सबके सामने हैं,नरेगा का बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचारियों खाते में गया है। पैसे को तमाम गैर जरूरी मदों में खर्च करते हुए भ्रष्टाचार को अंजाम दिया गया है।उदाहरण के लिए ग्राम सभा के स्तर पर वानिकीकरण का काम या फिर मिट्टी पटाई जैसे कामों तरजीह दी गई है। क्योंकि पेड़ों की खरीद से लेकर उसकी बाड़ बनाने तक में पैसा चुराने के काफी विकल्प मौजूद है,तो मिट्टी पटाई के काम में मानकों की अनदेखी और एक बरसात के बाद दोबार उसी काम को कराने का अवसर भी बना रहता है। कुल मिलाकर पंचायतों ने अपने कामकाज से स्थानीय अपढ़ जनता को भी भ्रष्टाचार के जरिए पैसा कमाने की परवरिश दे डाली है। जिसका इस बार के पंचायत चुनाव में साफ रहा है। लोगों ने अपनी सारी पूंजी लगाकर चुनावों में शिरकत की है।

धन बल और बाहुबल के बोलबाले के बीच चुनावों सामंती मानसिकता भी पूरी तरह से हावी रही। चुनाव प्रचार के पोस्टर इस बात का सबूत हैं,कि महिला प्रत्याशियों का सहारा लेकर पति या पुरूष संबंधियों ने ही चुनाव लड़ा है। पोस्टर में पति या पुरूष सगे-संबंधी हाथ जोड़कर समर्थन और वोट मांग रहे थे। जबकि कई पोस्टर तो ऐसे जिसमें महिला प्रत्याशी की फोटो या तो छोटी रखी गई थी या फिर रखी ही नहीं गई थी। यही वजह है कि महिला आरक्षित सीटों पर चुनाव जीतने वाली महिलाएं घरों चूल्हा फूंक रही हैं,जबकि पति या पुरूष सदस्य आम सभा की बैठक में हिस्सा लड़ रहे हैं। चुनाव जीतने के बाद पति ही प्रधान के संबोधन से नवाजे जा रहे हैं। गांवों के हालात देखकर कह सकते हैं कि महिला सशक्तिकरण दूसरे दावों की तरह कागजी ही साबित हुआ है। लगभग यही हाल जातीय आरक्षण का हुआ है। थोड़े बहुत फेरबदल के साथ आरक्षण के सहारे सामाजिक परिवर्तन की पूरी योजना वर्गीय चेतना के अभाव में बेसहारा साबित हुई है। स्थानीय स्तर पर अस्मिता की लड़ाई को अवसरवादी और सामंती असर के लोगों ने अपहृत कर लिया है। चुनाव प्रचार को देखने के दौरान गुजरा एक वाकया हैरतंगेज था। बहराइच जिले में वार्ड नंबर 24 से जिला पंचायत सदस्य की उम्मीदवार का पति चुनाव प्रचार करते हुए दावा कर रहा था कि कि आप हमें वोट दीजिए,हम आपकी एक आवाज पर एक हाथ में माल और दूसरे हाथ में तलवार लेकर हाजिर रहेंगे। जबकि प्रचार करने वाला व्यक्ति कई संज्ञेय मामलों में न्यायिक प्रक्रिया से गुजर रहा है। माल और तलवार का दावा व्यक्तिवादी राजनीति की तरफ इशारा करती है, जो सीधे-सीधे राजनीति की सामूहिक भावना से कोसों दूर है।

स्थानीय स्तर पर पैदा हुए इस माहौल के लिए राजनीति की अनिवार्य शर्त का उल्लंघन जिम्मेदार है। पंचायत चुनावों में राजनीति दलों को सीधी भागीदारी नहीं दी गई है। जिसकी वजह से न केवल राजनीतिक माहौल से व्यक्तिवादी असर कम हो पाता है और न ही राजनीतिक विपक्ष ही खड़ा हो पाता है। जिसकी वजह से पूरा चुनाव व्यक्तिगत क्षमताओं और प्रतिबद्धताओं के बल पर लड़ा जाता है और विपक्षी स्वर को व्यक्तिगत विरोध मानते हुए उससे निपटा जाता है। पंचायत चुनावों में हिंसा और मार-काट के पीछे वर्तमान में यही सबसे बड़ा कारण बनकर उभरा है। दलीय भागीदारी न होने की वजह से आज स्थानीय निकाय अपनी सफलता को लेकर चौतरफा दबाव में हैं। सवाल है कि जब तमाम चीजों को अनिवार्य बनाया गया तो राजनीतिक दलों की भागीदारी को क्यों वैकल्पिक बना दिया गया ? इसकी वजह से स्थानीय निकाय गैर-राजनीतिक निर्वाचन क्षेत्र के रूप में बदल जाता है,जहां त्वरित व सीमित लाभ के लिए तर्क बनाये और बिगाड़े जाते हैं। जिसके चलते वे बातें सहज स्वीकार्य हो जाती हैं,जिन्हें बड़े स्तर पर राजनीतिक गलत माना जाता है। हालांकि इसे स्थानीय शासन व्यवस्था की रूपरेखा तय करने में चूक और मंशा दोनों कह सकते हैं। क्योंकि भारतीय संविधान में 73वें व 74वें संविधान संशोधन के समय राजनीतिक दलों की भागीदारी का निर्णय राज्य सरकारों को दे दिया गया। जिसे परिस्थितियों का आकलन करने में चूक भी कह सकते हैं और राज्य सरकारों को कटघरे में खड़ा करने की मंशा भी,क्योंकि इसी विकल्प के सहारे राज्य सरकारें राजनीतिक दलों की भागीदारी को खारिज कर रही हैं। जिसका सीधा मकसद जनता से उचित और कम से कम दूरी बनाये रखने की मंशा है। राज्य सरकारें जानती हैं कि अगर राजनीति दलों की भागीदारी आयी,तो उन्हें अपनी नीतियों को लेकर राजनीतिक दल के रूप में जनता के बीच जाना पड़ेगा। जहां उसकी नीतियों को मिलने वाला जनादेश ही अगले राजनीति कार्यकाल का फैसला करेगा, यानी जनादेश की कसौटी पर किसी भी रूप में जाने से बचने की कोशिश में राज्य सरकारें राजनीतिक दलों की भागीदारी को तवज्जो नहीं दे रही हैं।

उत्तर प्रदेश के स्थानीय निकाय चुनावों को देखते हुए कह सकते हैं कि माहौल ईमानदार और ईमानदारी दोनों के खिलाफ बन चुका है। क्योंकि अब लाखों के निवेश का उपक्रम साबित हुए चुनाव और उसकी उगाही के बीच में आने वाले सीधे तौर पर निशान बनाये जायेंगे। इसके लिए राजनीतिक अवसरवाद सीधे तौर पर जिम्मेदार है। जिसने प्रतिबद्धताओं की राजनीति को पटरी से उतारकर सत्ता की राजनीति बना दिया है। जहां राजनीति का उद्देश्य जनकल्याण की जगह उगाही का औजार बना दिया गया है। केंद्र और राज्य स्तर पर भ्रष्टाचार के मामले उदाहरण हैं,तो स्थानीय निकाय इस असर से अपने को कब तक बचाये रख पाते,यह सिर्फ एक सवाल है ?

-ऋषि कुमार सिंह

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