गरीबों से लेकर पत्थर तक दे रहे आशा परिवार का परिचय

ऐसी लगन, ऐसा जुडाव वह भी बिना किसी लालच के। क्या जरुरत थी कि अपना समय इसमें नष्ट करते. इससे न तो उन्हें मजदूरी मिलती न ही कोई भत्ता. अपनी लड़ाई को तो वो खुद लड़ेगें तभी उन्हें अपना हक़ मिलेगा. पर शायद हम लोगों की समझ से परे और गरीबों के दिलों की आवाज से काफी पास है. वो लोग जिन्हें चाहे जहाँ चाहें बिठा सकते हैं. लेकिन आज तक मैंने यह सुना था कि किसी भी संगठन या पार्टी के कार्यकर्ता बनना है तो उसके लिए मेम्बरशिप चार्ज देना पड़ता है वह भी मनुष्यों के लिए. पर यहाँ तो इसका उल्टा है पता ही नहीं चलता है कि इसका मुखिया कौन है. आदमी ही नहीं वह भी पत्थर भी इसके गवाह हैं। सबके सब मालिक हैं और सब कार्यकर्ता. वह भी बिना किसी चार्ज के बल्कि खुद अपने अधिकारों की लड़ाई लड़कर. वह संगठन है आशा परिवार.

बात उन दिनों की है जब मैं कुछ व्यक्तिगत काम के लिए जिला चंदौली गया था. अख़बारों, टी।वी. चैनलों, अधिकारियों और तमाम चर्चाओं से सुन रखा था कि चंदौली जिले का कुछ भाग नक्सल प्रभावित है. जहाँ पर जाना खतरे से ख़ाली नहीं है. इस जिले में ९ ब्लाक हैं. जिसमें नौगढ़, ब्लाक खासतौर से चर्चा का विषय बना है. नक्सालियों का भय मेरे मन में भी बना था. अधिकारी लोग भी इसकी चर्चा खूब करते थे. लोगों से कुछ ऐसा सुन रखा था. जिससे मेरी रुंह काँप जाती. पर मुझे क्या? मुझे तो वहां जाना नहीं है. मैं तो लखनऊ में रहूँगा. कुछ काम है तो उसे निपटा लूँगा. यही सोंचते-२ मेरा एक महीना बीत गया. जिले की लगभग ब्लाक में गया पर नौगढ़ और चकिया ब्लाक में नहीं गया. सोंच भी रखा था कि मुझे वहां नहीं जाना है. मैंने सुन रखा था कि चंदौली जिले में आशा परिवार के वरिष्ठ, कर्मठ, संघर्षशील, ईमानदार कार्यकर्ता श्री जयशंकर पाण्डेय जी काम करते हैं. उन्होंने सामाजिक चेतना को ऐसा जगाया है कि लोगों का एक बड़ा जत्था इनके साथ संघर्ष करने को हमेशा तैयार रहता है. पहले तो मुझे विश्वास नहीं हुआ. खैर एक दिन ऐसा आ ही गया कि इनसे मुलाकात हो गई. पता लगा था कि डी.एम. ने एक मीटिंग विशेश्वरपुर ब्लाक-नौगढ़ में रखी है. जहाँ सुप्रीम कोर्ट के आयुक्तों की सलाहकार श्रीमती अरुंधती धुरु जी भी आ रही हैं. मुझे उनसे मिलने का मौका मिला. मुझे बड़ी खुशी मिली।

दिनांक १६ नवम्बर २००९ को मै गाड़ी में सवार होकर नौगढ़ ब्लाक के उसी एरिया से गुजरा जिसका बड़ा खौफ था और देखने की इच्छा । जहाँ का नाम सुन रखा था। बड़े-२ पहाड़ों, काफी दूर तक फैले जंगल का नजर देखकर दिल काँप गया। तमाम विचार मेरे दिमाग में आने लगे । खैर ४-५ लोग गाड़ी में बैठे थे जिससे इतना डर नहीं लगा कि ह्रदय घात हो जाए। मन में बहुत से प्रश्न लिए और गाड़ी से ही बाहर का माहौल, डरावना जंगल देखते हुए जा रहा था कि अचानक मेरी आँखों के सामने पत्थरों पर लिखा जैसा कुछ चमका. मैंने अपनी निगाह ऊँचे-२ पहाड़ों को चीरती हुयी सडक, के किनारे ऊंचाई पर पड़े पत्थरों पर डाली. मुझे अचानक झटका लगा कि क्या ऐसा हो सकता है. ये कैसे हुआ. यह नाम किसने लिखा. यह नाम किसका है. गावं पहुंचते ही लोगों से मिला तो पता चला कि यहाँ के लोगों ने इन पत्थरों को भी आशा परिवार का कार्यकर्ता बनाया है. वह भी किसी के कहने से नहीं बल्कि आशा परिवार संगठन द्वारा गरीबों का साथ देने से, गरीबों ने ऐसा किया. क्योंकि इन लोगों की जिंदगी इन्ही पत्थरों के बीच गुजरती है.

पर हाँ, यह सच है कि वहां के ऊँचें-२ पहाड़ों के पत्थर भी आशा परिवार का नाम अपने ऊपर लिखवाकर यही सबूत दे रहे है कि मुझे भी मौका मिला आशा परिवार का कार्यकर्ता बनने का. इन सबका श्रेय जाता है मग्सय-सेसे पुरुस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. संदीप पाण्डेय जी के साथ काम करने वाले श्री जयशंकर पाण्डेय जी को. जिनका मुख्य काम गरीब, आदिवासी, दलित, और समाज से वंचित लोगों को उनका हक़ दिलाना व उनके अधिकारों के प्रति उन्हें जागरूक करना. मंरेगा मजदूरी से लेकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली, मध्यान्ह भोजन, शिक्षा का अधिकार, स्वास्थ्य का अधिकार, सूचना का अधिकार, भोजन का अधिकार, काम का अधिकार, तक का हक़ लोगों को दिलाना है. आज गरीब से गरीब व्यक्ति अपने ग्राम पंचायत प्रधान, सेक्रेटरी, बी.डी.ओ., कोटेदार, अध्यापक, डी.एम. को भले ही नहीं जानता हो, पर जयशंकर पाण्डेय और आशा परिवार को जरुर जानता है. जिनसे उन्हें जीने के स्वाभिमान पूर्वक जीने का अधिकार मिला. इन्होनें गरीबों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक ही नहीं किया बल्कि उनका हक़ दिलाया. चाहे वह नरेगा के तहत हड़प की गयी मजदूरों की मजदूरी हो, या फिर कोटेदारों द्वारा हड़प किया गया गरीबों का राशन हो, प्रधानों द्वारा ग्राम विकास के हड़प किये गए पैसे की जनता जाँच हो. वह भी पूरे चंदौली जिले के नौ ब्लाक में. इनके नाम, संगठन, काम, के चर्चे अधिकारियों से लेकर जनता तक हैं. प्रत्येक ब्लाक से इनके साथ जुझारू कार्यकर्ता जुड़े हैं जिनमे से : मुन्ना भैया, सतीश, जीतेन्द्र, संतोष, कमलेश, श्रवण, राम अवध, दीपक, हौसला, धीरज, लालबहादुर, अरबिंद कुमार, मनोज, बंदेमातरम, रमेश चन्द्र आदि हैं.

लेखक:चुन्नीलाल

थाईलैंड में मधुमेह नियंत्रण अभियान

थाईलैंड में मधुमेह नियंत्रण अभियान

(जित्तिमा जन्तानामालाका द्वारा लिखे गए लेख का हिन्दी अनुवाद)

थाईलैंड में ३० लाख व्यक्ति डायबिटीज़ से पीड़ित हैं। अत: इस रोग की रोकथाम के लिए उचित उपाय करना नितांत आवश्यक है। ऐसा मानना है इस देश के जन स्वास्थ्य मंत्री श्री वित्ताया कैवपरादै का.

अंतर्राष्ट्रीय डायबिटीज़ फेडेरेशन (आई.डी.ऍफ़.) के अनुसार, २००९-२०१३ के लिए विश्व डायबिटीज़ दिवस का विषय है ‘डायबिटीज़ के बारे में जानकारी और इसकी रोकथाम’। यह अभियान, इस रोग की देखभाल से जुड़े हुए सभी लोगों का आह्वान करता है कि वो इसे समझ कर, इस पर नियंत्रण करें।

स्वास्थ्य मंत्री जी ने बताया कि थाई जनता को इस बारे में शिक्षित होना है कि वे अपने खान पान और जीवन शैली में बदलाव लाकर, इस रोग की रोकथाम कर सकते हैं। इसके लिए थाईलैंड के स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा नियुक्त ९८०,००० से अधिक स्वास्थ्य स्वयं सेवक, डायबिटीज़ संबंधी सर्वेक्षण करते हैं; तथा जनता को समुचित जानकारी देते हुए, उन्हें शक्कर आदि हानिकारक खाद्य पदार्थों का त्याग करने को प्रेरित करते हैं। इस रोग से पीड़ित व्यक्तियों के लिए विशेष सरकारी सुविधाएं उपलब्ध हैं। ऐसे व्यक्तियों की नियमित जांच की जाती है, विशेषकर उनकी जिन्हें 'डायबिटीज़ रेटिनोपैथी’ का खतरा है , ताकी समय रहते उन्हें अंधेपन से बचाया जा सके।

इस कार्य के लिए थाईलैंड को, नवम्बर २००८ से, डेनमार्क से वित्तीय सहायता मिल रही है – जब डेनमार्क के राजकुमार फ्रेडेरिक एवं राजकुमारी मेरी ने, थाई – डेनमार्क संबंधों के १५० वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में बैंकाक का दौरा किया था। इसके अलावा, ‘वर्ल्ड डायबिटीज़ फौन्डेशन ’ की वित्तीय सहायता से दो मोबाइल कार यूनिट चलाई जा रही हैं। इनके द्वारा ‘डायबिटीज़ स्कैनिंग’ एवं ‘डायबिटीज़ रेटिनोपैथी’ का इलाज जनता को उपलब्ध हो रहा है।

मधुमेह के कारण प्रति वर्ष ४० लाख मौतें होती हैं। यह रोग, अंधेपन, दिल का दौरा, अंगछेदन, स्ट्रोक, एवं गुर्दे की बीमारी का भी प्रमुख कारण है। अंतर्राष्ट्रीय डायबिटीज़ फेडेरेशन (आई.डी.ऍफ़.) के अनुसार, यदि इस रोग की रोकथाम समय रहते नहीं करी गयी, तो अगले २० वर्षों में इसके रोगियों की संख्या ४३५ मिलियन तक पहुँच जायेगी।

आई.डी.ऍफ़. के नव निर्वाचित अध्यक्ष, श्री म्बन्या के शब्दों में, “विश्व को ऎसी एकीकृत स्वास्थ्य प्रणालियों में निवेश करने होगा, जिनके द्वारा डायबिटीज़ का निदान, उपचार, प्रबंधन और निराकरण सम्भव हो। सरकारों को औपचारिक स्वास्थ्य क्षेत्र से हट कर भी ऐसे कदम उठाने होंगे, जो स्वास्थ्यवर्धक आहार एवं शारीरिक क्रिया कलापों को बढ़ावा दे कर, मोटापे और टाइप 2 डायबिटीज़ के खतरे को कम कर सकें। यदी इस रोग की प्रभावी रोक थाम नहीं की गयी तो इसका सीधा असर विश्व के आर्थिक विकास पर पड़ेगा.”

थाईलैंड की पब्लिक हेल्थ मिनिस्ट्री की डा.श्रीवान्ना के अनुसार, “थाईलैंड में मधुमेह से पीड़ित ५०,०००-६०,००० व्यक्तियों का दृष्टि बाधित अथवा दृष्टिहीन होना संभावित है। उनकी समय से अस्पताल आने की प्रतीक्षा करने से बेहतर है कि हम ही उन तक शीघ्रता से पहुँच कर उनका उचित उपचार करें। हमारे पास सभी आधुनिक चिकित्सीय सुविधाओं से लैस ऐसे विशेषज्ञ हैं, जो दूर दराज़ के गाँवों में जाकर रोगियों को नि:शुल्क उपचार प्रदान कर सकें। हमें आशा है कि २०१० के डायबिटीज़ दिवस तक, हम ४००० ऐसे रोगियों को दृष्टिहीन होने से बचा लेंगें।”

डायबिटीज़ के भारी बोझ से दबे हुए भारत, चीन, अमेरिका जैसे अनेक देशों में इस बात के सतत प्रयत्न किए जा रहे हैं कि लोग जंक फ़ूड खाना कम कर दें। भ्रामक विज्ञापनों पर रोक लगाने के भी क़ानून बने हैं। श्री वित्ताया ने बताया की अभी तक थाईलैंड में ऐसा कोई क़ानून नहीं बना है जिसके तहत टेलीविजन के भ्रामक विज्ञापनों और बाज़ार में बिकने वाले अल्पाहार में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित किया जा सके। परन्तु कंपनियों एवं उद्योगपतियों से निवेदन किया जा रहा है कि वे निर्मित खाद्य पदार्थों में शर्करा की मात्रा कम करके उन्हें स्वास्थ्यवर्धक बनाएं। जनमानस को भी स्वास्थ्यप्रद एवं हानिकारक खाने-पीने वाली वस्तुओं के बारे में समुचित जानकारी उपलब्ध कराई जा रही है। जो स्कूल अपनी कैंटीन मेन जंक-ई फ़ूड नहीं बेचते, उन्हें पुरस्कार दे कर प्रोत्साहित भी किया जा रहा है।

श्री वित्ताया ने बताया कि वज़न कम करने और शारीरिक कार्य शीलता बढ़ाने के लिए, थाई जनता के बीच अनेक जागरूकता अभियान चलाये जा रहे हैं, जिनका उत्साहवर्धक परिणाम मिल रहा है। मध्य आय वर्ग के बहुत से लोग अब गुणकारी खाद्य पदार्थ, कीटनाशक रहित सब्जियां, ब्राउन राईस, इत्यादि खरीद रहे हैं। ‘ फ़ूड & ड्रग ऐड्मिनिसट्रेटर’ के सहयोग से कीटनाशक रहित सामान बेचने वाले मार्केट खोले जा रहे हैं, जैसे ‘सेम यान मार्केट’। इसके अलावा, इस वर्ष, देश भर में लगभग २,१०० ऐसे चिकित्सा केन्द्रों की स्थापना की गयी है, जहाँ मधुमेह के उपचार के अलावा, स्वास्थ्य वर्धन सेवाएँ भी प्रदान की जा रही हैं।

थाईलैंड का डायबिटीज़ असोसिअशन, वहाँ की राजकुमारी महा चक्री सिरिन्धोम के संरक्षण में कार्य करता है। इस संस्था के वाइस प्रेसिदेन्त, प्रोफ़ेसर नितियानंत के अनुसार, अब सभी इस बात को मानने लगे हैं कि डायबिटीज़, इस देश में एक जन स्वास्थ्य चुनौती के रूप मेन पनप रही है. अत: इस समस्या के निवारण हेतु, मधुमेह के निदान, रोकथाम एवं इससे जुड़ी हुई अन्य समस्याओं के निवारण हेतु नि:शुल्क कैम्प लगाए जायेंगे।

आई.डी.ऍफ़. के अनुसार, डायबिटीज़ जागरूकता अभियान के मुख्य संदेश हैं:
*डायबिटीज़ के लक्षणों और खतरों को पहचानिए
*डायबिटीज़ का सामना करने के लिए तैयार रहिये
*डायबिटीज़ पर नियंत्रण करके इसकी उचित व्यवस्था के उपाय जानिये

थाईलैंड में इस रोग को गंभीरता से लिया जा रहा है। जहाँ एक ओर इस रोग, एवं इससे उत्पन्न समस्याओं के निवारण हेतु प्रभावी कदम उठाये जा रहे हैं, वहीं डायबिटीज़ से पीड़ित व्यक्तियों की देखभाल के लिए उत्तम सुविधाएं प्रदान करने की चेष्टा भी करी जा रही है।



जित्तिमा जन्तानामालाका

भरावन, हरदोई में डी.ए.पी. खाद की कमी पर 25 नवम्बर को धरना प्रदर्शन

भरावन, हरदोई में डी.ए.पी. खाद की कमी पर 25 नवम्बर को धरना प्रदर्शन

हाल ही में हमने देखा कि किस तरह गन्ना किसानों ने नई दिल्ली में शक्ति प्रदर्शन किया। इसनें कोई दो राय नहीं कि उनका मुद्दा एकदम जायज है। नई आर्थिक नीति के दौर में जबकि प्रकृति से मुफ्त में मिलने वाले पानी को बोतल में बंद कर कम्पनियां मनमाने दाम पर बेचती हैं तो किसानों को तो अपनी मेहनत कर मूल्य तय करने का अधिकार होना ही चाहिए।


किन्तु कोई भी इस बात को मानेगा कि गन्ना से महत्वपूर्ण गेहुं है। गन्ना तो बड़े किसान बोते हैं जबकि गेहुं तो हर कोई बोता है जिसमें बड़ी संख्या में गरीब शामिल हैं। इस समय गेहुं की बुवाई के समय प्रयुक्त की जाने वाली डी.ए.पी. खाद की भारी कमी चल रही है। किसान के यहां त्राहि-त्राहि मची है। जैसा किसी भी सीमित मात्रा में उपलब्ध चीज के साथ होता है बड़े व प्रभावशाली लोग जो डी.ए.पी. खाद आई थी उसे ले गए। गरीब किसानों को एक बोरी भी न मिली। यह खाद आयात की जाती है। काण्डला बंदरगाह पर उतार कर रेलगाड़ी के माध्यम से लाई जाती है। खाद की कमी, माल रेल गाड़ियों का समय से उपलब्ध न हो पाना किसानों के लिए परेशानी का कारण बना है। खाद वितरण में अनियमितताओं के अलावा बड़े पैमाने पर कालाबाजारी भी होती है। कुछ खाद तो नेपाल पहुंच जाती है। सब्सिडी के बाद हमारे यहां यह खाद रू. 472 प्रति पचास किलो की बोरी मिलने का प्रावधान है। नेपाल में सब्सिडी न होने के कारण यही बोरी वहां रू. 200-300 अधिक में बिकती है। भारत के अंदर भी काले बाजार में यह बोरी रू. 700 में मिलती है।


25 नवम्बर, 2009, को हरदोई जिले स्थित भरावन विकास खण्ड के खाद वितरण केन्द्र पर किसानों का भारी प्रदर्शन होगा। किसान खाद के अलावा बीज की कमी भी झेल रहे हैं। नहरों में बिना पानी दिए राजस्व विभा्रग के कर्मचारी सिंचाई की जबरदस्ती वसूली करते हैं। इन सभी मुद्दों को लेकर किसान जुटेंगे।


जन आंदोंलनों का राष्ट्रीय समन्वय

लोक राजनीति मंच
सम्पर्कः संदीप पाण्डेय, फोन-0522 2347365. एस.आर. दारापुरी. मो.-9415164845. रामबाबू. मो.-9452144454

संत फ्रांसिस कॉलेज, लखनऊ, के १२५वीं वर्षगाँठ से पहले भूतपूर्व छात्रों के संघ की दिल्ली इकाई स्थापित

संत फ्रांसिस कॉलेज, लखनऊ, के १२५वीं वर्षगाँठ से पहले भूतपूर्व छात्रों के संघ की दिल्ली इकाई स्थापित

संत फ्रांसिस कॉलेज, लखनऊ, के १२५ वीं वर्षगाँठ से पहले भूतपूर्व छात्रों के संघ की दिल्ली इकाई, रविवार, १५ नवम्बर 2009 को दिल्ली में हुई बैठक में, स्थापित की गयी. संत फ्रांसिस कॉलेज के प्रधानाचार्य फादर पिंटो और वरिष्ठ अध्यापक श्री नरेश विग भी इस बैठक में उपस्थित थे. लगभग १०० से अधिक भूतपूर्व छात्रों ने इस दिल्ली इकाई की बैठक में भाग लिया.

संत फ्रांसिस कॉलेज लखनऊ, विश्व-विख्यात शैक्षिक प्रतिष्ठान है, जिसमें ३००० से अधिक छात्र वर्त्तमान में हर वर्ष पढ़ते हैं. भारतीय स्कूल सर्टीफिकेट परीक्षा सांसद से संत फ्रांसिस कॉलेज सम्बंधित है.

१९६२ में संत फ्रांसिस कॉलेज से पढ़े हुए और अब दिल्ली में स्थापित उद्योगपति श्री बिमल चड्ढा ने कहा "संत फ्रांसिस कॉलेज भूतपूर्व छात्रों के संघ की दिल्ली इकाई की स्थापना बैठक, विद्यालय के १२५ वें साल के समारोह की एक प्रारंभिक कड़ी है. हमें बहुत संतुष्टि है कि इतने सारे भूतपूर्व छात्र आज दिल्ली में एकत्रित हुए और हमें उम्मीद है कि अगले साल लखनऊ में १२५वीं सालगिरह में भूतपूर्व छात्र भारी मात्रा में शामिल होंगे"।

संत फ्रांसिस कॉलेज के प्रधानाचार्य फादर पिंटो ने कहा "मैं संत फ्रांसिस कॉलेज के भूतपूर्व छात्रों के संघ की दिल्ली इकाई की बैठक में शामिल हो कर अत्यन्त गौरवान्वित हुआ हूँ"। फादर पिंटो ने कहा "मुझे आशा है कि दुनिया में अन्य शहरों में भी संत फ्रांसिस कॉलेज के भूतपूर्व छात्रों के संघ की इकाई मजबूती से बनेगी"।

हाल ही में संत फ्रांसिस कॉलेज के ही प्रांगड़ में १ नवम्बर 2009 को सफल बैठक हुई थी जिसमें भारी मात्रा में भूतपूर्व छात्रों ने भाग लिए था.

संत फ्रांसिस कॉलेज, अपने १२५ साल २०१० में पूरा कर रहा है. ऐसी सम्भावना है कि दुनियाभर से संत फ्रांसिस कॉलेज के भूतपूर्व छात्र इस अवसर पर लखनऊ में आयोजित कार्यक्रम में शामिल होंगे.

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री बिमल चड्ढा (दिल्ली)
फ़ोन: ९९९९ ०० ७७७ १

भारतीय शल्य-चिकित्सकों के संगठन के प्रोफ़ेसर डॉ रमा कान्त अब राज्य अध्यक्ष

भारतीय शल्य-चिकित्सकों के संगठन के प्रोफ़ेसर डॉ रमा कान्त अब राज्य अध्यक्ष

लखनऊ के प्रतिष्ठित शल्य-चिकित्सक एवं छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के सर्जरी विभाग के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर डॉ रमा कान्त ने अब भारतीय शल्य-चिकित्सकों के संगठन के राज्य अध्यक्ष का कार्य भार संभाल लिया हैअसोसिएशन ऑफ़ सर्जन्स ऑफ़ इंडिया की उ०प्र० इकाई के भूतपूर्व अध्यक्ष डॉ राजीव सिन्हा ने प्रोफ़ेसर डॉ रमा कान्त को अध्यक्ष पद का कार्यभार सौंपा

प्रो० डॉ रमा कान्त कई सालों से लखनऊ कॉलेज ऑफ़ सर्जन्स के अध्यक्ष रहे हैं और अब प्रदेश के सर्जनों का भी नेतृत्व करेंगेप्रो डॉ रमा कान्त से पहले लखनऊ से कई अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सर्जन इस पद को सम्मानित कर चुके हैं जिनमें विश्व-विख्यात प्रो० पी०सी दुबे, प्रो० एन०सी० मिश्रा प्रमुख हैंप्रो रमा कान्त १९९० के दशक में भारतीय सर्जनों के संगठन की एंडोकराइन सर्जनों के समूह के राष्ट्रीय सह-सचिव रह चुके हैं

प्रो० रमा कान्त को अध्यक्ष पद, ३५वें भारतीय सर्जनों के संगठन की उ०प्र० इकाई के वार्षिक अधिवेशन के समापन समारोह में सौंपा गया.

"मेरे अध्यक्ष काल में उ०प्र० के सर्जनों को जन-स्वास्थ्य के लाभ के लिए संघठित करने का पूरा प्रयास रहेगा जिसमें प्रदेश भर में सर्जनों के लिए शैक्षिक कार्यक्रमों आदि के जरिये आधुनिक, सरल एवं प्रभावकारी शल्य-क्रिया को बढ़ावा मिलेगाअलग-अलग विशेषताओं के सर्जनों द्वारा यह प्रशिक्षण प्रदान किए जायेंगे" कहना है प्रो० रमा कान्त का

प्रो० रमा कान्त ने भारतीय सर्जनों के संगठन के राज्य सचिव डॉ एस.के मिश्रा में विश्वास व्यक्त करते हुए कहा कि "सबके भरसक प्रयासों एवं सहयोग की वजह से ही भारतीय सर्जनों के संगठन की उ०प्र० इकाई को सर्वश्रेष्ठ इकाई का पुरुस्कार इस वर्षा मिला है"।

प्रो० रमा कान्त, विश्व स्वास्थ्य संगठन के महा-निदेशक द्वारा पुरुस्कृत (२००५) हैं और हाल ही में लखनऊ में संपन्न हुई ३५वें भारतीय सर्जनों के संगठन की उ०प्र० इकाई के वार्षिक अधिवेशन के वें अध्यक्ष भी थे

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें: ९४१५००७२९९

यू.पी.ऐसिकोन २००९: शल्य-चिकित्सकों ने बड़े ऑपरेशन छोटे या बिना चीरा लगा कर किए

यू.पी.ऐसिकोन २००९: शल्य-चिकित्सकों ने बड़े ऑपरेशन छोटे या बिना चीरा लगा कर किए

.एस.आई. की यू.पी. इकाई की तीन दिवसीय ३५ वीं वार्षिक संगोष्टी, (यू.पी.ऐसिकोन २००९) आज लखनऊ में आरम्भ हुई इस वर्ष इस संगोष्टी का आयोजन, लखनऊ के छत्रपति शाहूजी महराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के शल्य चिकित्सा विभाग, और सेल्सी, यू.पी.इकाई के संयुक्त तत्वाधान में, डा. रमा कान्त की अध्यक्षता में और डा पाहवा तथा डॉ. सुरेश कुमार के प्रबंधन में किया जा रहा है

कांफ्रेंस के प्रथम दिन शल्यक्रिया कार्यशाला का आयोजन किया गया जिसमें सिंगल पोर्ट सर्जरी (एक चीरे से की जाने वाली शल्य क्रिया), एवं नोट्स ( मुख, मूत्र मार्ग अथवा गुदा के मार्ग से की जाने वाली शल्य क्रिया) के माध्यम से गर्भाशय, पित्त- थैली एवं हर्निया के ऑपरेशन किए गए.

इस अधिवेशन में भाग लेने के लिए आए लगभग ५०० चिकित्सकों को मिनिमल एक्सेस सर्जरी ( सूक्ष चीरे के द्वारा होने वाली शल्यक्रिया) की नवीनतम विधाओं से परिचित होने का सुअवसर मिला इस कार्यशाला का लाभ उन मध्यम वर्गीय मरीजों को भी मिला जिनका ऑपरेशन, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त दिग्गजों ने किया

इस कार्यशाला में प्रसिद्ध शल्य चिकित्सकों का हस्त कौशल देखने को मिला, जिन्होनेंबड़े ऑपरेशन छोटे या बिना चीरा लगा कर किए

मुंबई
से आए डा. प्रकाश राव, (जिन्हें भारत में सिंगल पोर्ट सर्जरी का जनक कहा जाता है) ने बिना चीरा लगाए, पित्त की थैली का ऑपरेशन किया

पुणे
के डा शैलेश ने सिंगल पोर्ट के द्वारा एक ३५ वर्षीय महिला के गर्भाशय की शल्यक्रिया करी

उत्तर
प्रदेश के सुप्रसिद्ध लेप्रोस्कोपिक सर्जन डा मौर्या ने एक नयी विधाएन.डी.वी.एच.’ के द्वारा गर्भाशय का ऑपरेशन किया
दूरबीन विधि से हर्निया के ऑपरेशन दिल्ली के आयुर्विज्ञान संस्थान से आए डा मिश्रा ने किए

बगैर चीरा लगाए, एक अत्याधुनिक विधि के द्वारा बवासीर का इलाज करने में सिद्धहस्त, डा रमा कान्त ने भी अपने कौशल का परिचय इस कार्यशाला में दिया इस विधि में रोगी कुछ ही घंटे अस्पताल में रह कर, दूसरे दिन से ही सामान्य रूप से कार्य कर सकता है

इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य है कि शल्यक्रिया की ये असाधारण विधाएं, सादारण जनता तक पहुँच सकें जब अधिक से अधिक संख्या में शल्य चिकित्सक, इन नयी विधाओं को अपना कर जन साधारण को इनसे होने वाले लाभ के बारे अवगत करायेंगे, तब शल्य चिकित्सा की ये नवीनतम उपलब्धियों का लाभ गरीब रोगियों तक पहुँच पायेगा

हालांकि, सूक्ष्म चीरे वाली शल्यक्रिया, परम्परागत शल्यक्रिया के मुकाबले महंगी मानी जाती है, परन्तु इसके अनेक लाभ हैं डा पाहवा के अनुसार, लेप्रोस्कोपिक सर्जरी से की गयी शल्यक्रिया में ऊतकों का क्षय कम होता है , ऑपरेशन के उपरांत पीड़ा भी कम होती है, अस्पताल में रोगी को कम समय के लिए रहना पड़ता है और वो अपनी दिनचर्या पर जल्द से जल्द वापस लौट सकता है इस प्रकार यह प्रक्रिया वास्तव में, रोगी के लिए अधिक आराम देह और कम खर्चीली साबित होती है

सी.एस.एम.एम.यू. जैसे अस्पतालों में आने वाले ६० से ७०% मरीज़, गरीब होते हैं अत: इस प्रकार की कार्यशाला से शल्य क्रिया की नयी विधाओं को सभी के लिए उपलब्ध कराया जा सकता है डा रमा कान्त के शब्दों मेंकुछ बड़ा हासिल करने के लिए, बड़ा सोचना भी पड़ता है यह संगोष्ठी, हम सभी की सोच को एक नयी दिशा देने में सक्षम होगी'

प्रथम विश्व निमोनिया दिवस, २ नवम्बर २००९: निमोनिया जनित मृत्यु दर को घटाने के लिए प्रतिबद्धता जरूरी

प्रथम विश्व निमोनिया दिवस, नवम्बर २००९
निमोनिया जनित मृत्यु दर को घटाने के लिए प्रतिबद्धता जरूरी

निमोनिया से २० लाख बच्चों (५ साल से कम उम्र) की मौत प्रति वर्ष होती है। जबकि निमोनिया का इलाज सस्ता एवं हर जगह उपलब्ध है - न तो निमोनिया के लिए वैक्सीन शोध चाहिए, न नई दवाएं, न नई जांचे, क्योंकि प्रभावकारी इलाज सस्ता है और उपलब्ध भी। इसके बावजूद भी २० लाख बच्चों की मौत प्रति वर्ष निमोनिया से होती है।


"निमोनिया होने पर फेफड़ों में हवा की थैलियों में संक्रमण या बलगम भर जाता है। गम्भीर निमोनिया घातक भी हो सकती है" कहना है
प्रोफ़ेसर (डॉ) रमा कान्त का, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लू.एच.ओ.) के अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार (२००५) प्राप्त चिकित्सक हैं और लखनऊ के छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय में सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष हैं।
"निमोनिया के लक्षण हैं: सामान्य से अधिक तेज़ सांस या सांस लेने में परेशानी, सांस लेते या खांसते समय छाती में दर्द, खांसी के साथ पीले, हरे या जंग के रंग का बलगम, बुखार, कंपकंपी या ठंड लगना, पसीना आना, होंठ या नाखून नीले होना आदि" कहना है डॉ रमा कान्त का।
निमोनिया की जांच - "स्पूटम कल्चर" - अधिकांश स्वास्थ्य केन्द्रों पर उपलब्ध होती है। "इसके बावजूद भी निमोनिया से हर १५ सेकंड में एक बच्चा मर जाता है, जो बेहद खेद की बात है" कहना है प्रोफ़ेसर डॉ० रमा कान्त का।

"आख़िर निमोनिया से बच्चे क्यों मर रहे हैं" यही सवाल जन-स्वास्थ्य पर कार्यरत संस्थाओं को आतंकित करता रहा है जिसके कारणवश इस वर्ष २ नवम्बर २००९ को सर्वप्रथम विश्व निमोनिया दिवस मनाया जा रहा है। तपेदिक (टी.बी.) एवं अन्य फेफड़े के उन्मूलन के लिए समर्पित अंतर्राष्ट्रीय संस्था (इंटरनेशनल यूनियन अगेंस्टटुबेर्कुलोसिस एंड लंग डिसीस - "द यूनियन") भी निमोनिया की रोकधाम एवं उन्मूलन के लिए समर्पित है।

यूनियन के एक शोध में पाया गया कि ६८ ऐसे देशों में हुआ जहाँ निमोनिया का मृत्यु दर अधिक है, सिर्फ़ ३२ प्रतिशत ऐसे बच्चों को ही उचित दवा मिल पाती है जिनको निमोनिया होने की सम्भावना होती है। ६८ प्रतिशत बच्चे जिन्हें निमोनिया होनी की शंका होती है, निमोनिया के उपचार की दवा से वंचित रहते हैं। यह अत्यन्त दुःखदाई बात है क्योंकि निमोनिया का उपचार सस्ता है और स्वास्थ्य केन्द्रों में उपलब्ध भी।

यदि विश्व को सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य (मिलिनिम डेवेलपमेंट गोल) हासिल करना है कि २०१५ तक बच्चों में मृत्यु दर ५० प्रतिशत कम हो सके, तो निमोनिया नियंत्रण एवं उन्मूलन के लिए कार्यक्रमों को प्रभावकारी ढंग से लागू करना अनिवार्य है।