सुप्रीम कोर्ट केस PUCL vs भारत एवं अन्य [writ petition (civil) (196/2001)],

सुप्रीम कोर्ट केस PUCL vs भारत एवं अन्य

[writ petition (civil) (196/2001)],

में कमिश्नर या आयुक्त के सलाहकार की रिपोर्ट के अंश

परिचय

सुश्री अरुंधती धुरु जो सुप्रीम कोर्ट केस PUCL v. Union of India and others, writ petition (civil) (196/2001) में कमिश्नर या आयुक्त की सलाहकार हैं , ने एक टीम का नेत्रितिवा किया जिसके अन्य सदस्य थे आचार्य प्रदीप भार्गव , निदेशक , गोविन्द बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान , अलाहाबाद , सुश्री बिन्दु सिंह , सचिव , ग्राम्य संस्थान , वाराणसी , श्री उत्कर्ष कुमार सिन्हा, निदेशक, सेंटर फॉर कोन्तेम्पोरारी स्टडीज ऎंड रिसर्च, लुच्क्नो, और श्री संजय सिंह, आपदा निवारक मंच, बुंदेलखंड, उरई.

इस टीम ने ३-५ जनवरी २००८ के दौरान बुंदेलखंड के ललितपुर, महोबा, और बांदा जिलों का दौरा किया. सुश्री बिन्दु सिंह, श्री उत्कर्ष सिन्हा और श्री संजय सिंह, भोजन के अधिकार के लिए कार्यरत उत्तर प्रदेश की सलाहकार समिति के सदस्य भी है.

५ जनवरी २००८ को ग.बी.पन्त सामाजिक विज्ञान संस्थान से आचार्य जाओं द्रेज़, डॉ रीतिका खेर और श्री सिद्धार्थ जो राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय के स्नातक हैं, इस टीम से मिले.

सी ज्योति सेवा संस्थान के श्री अजय श्रीवास्तव, बुंदेलखंड सेवा संस्थान के श्री बसुदेओ, राष्ट्रीय युवा योजना के श्री सुधीर एवं श्री बृजेन्द्र सिंह, सहरिया जन अधिकार मंच ललितपुर से श्री नन्दलाल सहेइजा, किरीटी शाद संस्थान महोबा के श्री मनोज, आपदा निवारक मंच महोबा के श्री पृथ्वी सिंह यादव, क्रिश्नार्पित संस्थान अत्तार के डॉ ओ.प. सिंह, कर्जारे मुकते फन्दा आन्दोलन बांदा के श्री पुष्पेन्द्र भाई, द्य्नामिक एक्शन ग्रुप बांदा के श्री पंकज, एवं आपदा निवारक मंच के श्री राम किशोर शुक्ल ने इस टीम को सहयोग दिया.

चार साल से बार-बार खेती असफल होने की वजह से इस इलाके में बार-बार सूखा पद रह है, जिसकी वजह से यहाँ एक अकस्मक विपदा जैसी स्थिति कायम है, ऐसा इस टीम को देखने को मिल. इसकी वजह से यहाँ से भारी मात्र में लोगों ने या तो दुसरे इलाक़ों में पलायन किया, या बेरोजगारी, उधार, भुक्मारी एवं कु-पोषण, पानी की कमी, एवं खेती आदि के लिए जानवरों की कमी को झेला.

कुछ कैसों में आती हो जाने की वजह से किसानों ने आत्मा-हत्या कर ली और पिछले बारह महीनों की मीडिया रपट के आधार पर कई ऐसी मौत इस इलाके में हुईं जो सम्भावता: भुक्मारी या कु-पोषण की वजह से हुई थी.

इस टीम को लगता है कि बरसात से पहले इस इलाक़े के लोगों को एक भारी चुनौती ललकार रही है. इस टीम की रपट तीन मुद्दों को तीन भागों में उठा रही है:

१) सहरिया प्रभावित इलाक़ों में स्थिति का मुएना, एवं सरकार ने स्थिति से निबटने के लिए क्या किया और किन योजनाओं को लागूऊ किया

२) अनाज की कमी, उधार की हालत, एवं किसानों द्वारा आत्मा-हत्या की रपट पर सरकार ने क्या किया

३) न्रेग्स या राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गुअरंती योजना जैसी अन्य योजनाओं की स्थिति


जिन इलाक़ों में ये टीम गयी:

१. जिला ललितपुर: गावं धमना, लाद्वारी, राधापुर, ब्लॉक बार

२. जिला महोबा: गावं चंदौल, ब्लॉक सुपा, चरखारी, गावं श्रीनगर, ब्लॉक कबरी

३. जिला बांदा: गावं कल्यानपुर, ब्लॉक नारेनी, गावं माधोपुर, ब्लॉक महुवा, गावं पंदुरी, ब्लॉक बदोफार

ये टीम गावं के लोगों का, ग्राम प्रधानों का, प्रधान पतेईस का और गावं के अन्य अधिकारियों का उनके सहयोग के लिए सा-धन्यवाद व्यक्त करती है.

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भाग-१

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१) सहरिया प्रभावित इलाक़ों में स्थिति का मुएना, एवं सरकार ने स्थिति से निबटने के लिए क्या किया और किन योजनाओं को लागूऊ किया

इस टीम की पहली मुलाकात हुई ललितपुर जिले के गावं धमना में एक बंद घर के बाहर बैठी हुई एक वृद्ध सहरिया महिला से. इस महिला को इसके परिवार वालों ने अकेला चोद्द कर काम की तलाश में मध्य प्रदेश का रास्ता अपना लिया. वो बड़ी मुश्किल से हिल-दुल पा रही थी और अन्य लोगों से माँग माँग के किसी तरह जीवित थी. उसके पास सम्मान के साथ भोजान प्राप्त करने का कोई विकल्प नही था.

पता करने पर ज्ञात हुआ कि ४५० व्यसक सहरिया वासिओयों में से २५० लोग रोज़गार की खोज में इंदौर, भोपाल, दिल्ली और ग्वालियर पलायन कर चुके थे. जो लोग पलायन नही कर सके, वो या तो वृद्ध थे, अकेली महिलाएं थीं या बच्चे थे. बहुत कम ऐसे लोग बच्चे थे जो काम करने की शारीरिक अवस्था में थे और वह मौजूद थे.

१. जीवन-यापन और पोषण की स्थिति

कुछ घर ऐसे थे जो तेज़ी से कम होते हुए जंगल के उत्पाद या लकडी बेच कर मात्र रुपया १५-४० प्रति दिन से जीवन-यापन कर रहे थे.

चूँकि वो किसान परिवार से नही है, ये लोग यदि इनके पास जमीन है तो, उसको किराये पर उठा देते हैं. जमीन का किराया होता है लगभग रुपया २००० प्रति साल या जितनी मात्र में बीज उस खेत पर लगा हो.

ये पूछने पर कि व्हो खाते क्या है, मोटा-मोटा यही उत्तर मिलता रह कि: नमक या मिर्ची के साथ रोटी. जिन लोगों की हालत बेहतर थी वो रोटी के साथ गुर खा लेते थे.

इस प्रकार के कम पोषण के भोजन की वजह से इन लोगों एवं बच्चों में हेमो-ग्लोबिं या खून में इरों की मात्र से आँका जा सकता है.

टेबल १:

हेमो-ग्लोबिं की मात्र के आधार पर बच्चों एवं लोगों की संख्या

हेमो-ग्लोबिं बच्चें व्यसक

ग्रेड इई (६.५-८ ग/दल)

ग्रेड ई (८-१० ग/दल)

ग्रेड इ (१०-१२ ग/दल)

नोर्मल (१२-१४ ग/दल)

कुल संख्या


2. अपने अधिकारों के लिए अधिक कीमत दे रहे हैं लोग

धमना के ११० सहरिया परिवारों में सिर्फ ५० प्रतिशत लोगो के पास ब्प्ल या अन्त्योदय कार्ड है. गनीमत ये है कि जिनके पास ब्प्ल या अन्त्योदय कार्ड है वी लोग अपने कोटा का राशन पा रहे हैं. परन्तु ऐसी भीषण इस्थिति में भी, कोतेदार लगभग ३० प्रतिशत अधिक लेटा है.

३. काम करने का या रोज़गार का अधिकार नही दिया गया

शायद ये एक अकस्मक इस्थिति है जहाँ सहरिया लोगों को सहयोग की सबसे अधिक आवश्यकता है. परन्तु धमना में एक भी सहरिया को न्रेग्स या राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गुअरंती योजना के तहत ८ दिन से अधिक का काम पूरे साल में नही मिल है. लगभग ५० प्रतिशत जिन लोगों से ये टीम मिली, उनके पास जॉब कार्ड था, परन्तु ५० प्रतिशत के जॉब कार्ड प्रधान के पास थे. जब प्रधान से पूछा गया तो प्रधान बोले कि जॉब कार्ड पंचायत सचिव के पास है. ये गौर हो कि न्रेग्स योजना के तहत जॉब कार्ड हमेशा मजदूर के पास होने चाहिऐ. ये पारदर्शिता के लिए आवश्यक समझा गया है, और इस बात को नज़रंदाज़ नही करना चाहिऐ.

४. अकेली महिलाओं के भोजन और रोजगार के अधिकार

ये टीम ६ अकेली महिलाओं से मिली जो जीवन-यापन के लिए काफी संघर्ष कर रही थीं. इनमें से एक के पास भी ब्प्ल या अन्त्योदय कार्ड नही था. इन लोगों को जॉब कार्ड तो मिल गए थे परन्तु तमाम मौखिक विन्तियों के बावजूद भी इनको काम नही मिल सका. इन महिलाओं के अनुसार पंचायत ने ये कह के काम देने से मन कर दिया कि ये लोग १२' क्ष १२' क्ष १' की जमीन खोदने का काम कर ही नही पाएंगे.

५. न्रेग्स में बच्चों को काम दिया गया है

इस टीम ने गावं धमना का दौरा किया जहाँ न्रेग्स या राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गुअरंती योजना के अंतर्गत, १८० लोग फार्म बुन्डिंग का काम कर रहे थे. टीम को ये देख कर बेहद खेद हुआ कि इनमें से ४ काम पाने वाले बच्चे थे जिनके नाम और उमर इस प्रकार हैं: दशरथ बारे कि ६ वर्षीय पुत्री निधि, शर्मन अहिर्वाई कि ६ वर्षीय पुत्री बेत्चाई, १३ साल की भाग्गो और १४ साल की ममता.

जब ये टीम 'मेट' से मिली, तो उनके अनुसार चूँकि ये काम 'पीस' राते के आधार पर है, इसलिए मजदूर के देतैल्स की जरुरत नही है. एक तरह से 'मेट' ने 'पीस' राते के नाम पर, बच्चों की उपस्थिति को रजामंदी दे दी. मोटे आधार पर वह पूरी तरह से न्रेग्स के उलंघन से अनभिज्ञ था. मुस्टर रोल, डिस्पले बोर्ड या बच्चों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था कार्यस्थल पर नही उपलब्ध थी.


६. बुंदेलखंड में सहरिया की स्तिथि

ये बेहद चिंता का विषय है कि बुंदेलखंड में सहरिया लोगों को जबरदस्त अभाव झेलना पड़ता है. सहरिया जनजाति की औसतन जनसंख्या लगभग ९४,००० है (या १७००० परिवार). अधिकांश सहरिया परिवारों ने अभीतक खेती-बादी को अपना जीवन यापन का जरिया नही बनाया है. अधिकांश सहरिया परिवारों के पास खेतों में पानी आदि देने की सुविधा नही है, और उनको अपनी जमीन, यदि कोई जमीन है तो, चोटी रकम के लिए किराये पर उठानी पड़ती है.

यदि जो सहरिया परिवारों के पास पहले से है, उस मध्याम को सशक्त करने में निवेश किया जाये, तो एक स्थाई रोजगार का विकल्प उत्पन हो सकता है. फिलहाल इन लोगों का जीवन यापन मौसमी बरसात और देहादी मजदूरी पर निर्भर है - जिसका सीधा तात्पर्य ये है कि कभी-कभार ही काम मिल पता है. न्रेग्स से लाभ बहुत सीमित हैं जैसा कि अन्य प्रदेशों में भी देखने को मिल.

मौजूदा स्थिति के आधार पर, आवश्यक है कि तुरंत रहत सामग्री पहुचाई जाये और लंबे अंतराल में परिवर्तन के लिए जिससे कि जिन हालत में सहरिया परिवार जीवित हैं, सुधर सकें, ऐसे कदम उठाए जाएँ.

इन दिनों जो जंगल-जमीन पर आधारित जीवन यापन करने के पारंपरिक तरीके हैं, वो तेज़ी से खतम होते जा राहे हैं और अव्यवहारिक भी, क्योकि जंगल कट रहे हैं और सरकार भी सख्त हो रही है जंगल से लकडी आदि बटोरने पर. चूँकि पुराने जीवन यापन के माध्यम अब खतम हो रहे है, सहरिया, जो पुरातन जनजाति समूह मानी जाती है (primitive tribe group (PTG)), उनके हित के लिए बिना विलम्ब गंभीर योजनागत तरीके के विकल्प तैयार किये जाने चाहिऐ जिससे कि जीवन यापन की बुनियादी जरूरतों को वो पूरी कर सके.


७. सुझाव: सहरिया के उत्थान के लिए

२००३ में उत्तर प्रदेश सरकार ने सहरिया लोगों को स्चेदुलेद कसते से स्चेदुलेद त्रिबे में शामिल किया. सरकार को इस बात को नज़रंदाज़ नही करना चाहिऐ कि अन्य प्रदेशों में सहरिया को पतग का दर्जा प्राप्त है. जब कि उत्तर प्रदेश में सहरिया एक अरसे से रह रहे हैं और जब अन्य प्रदेशों में जैसे कि छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में उनको पतग का दर्जा प्राप्त है, कोई कारन नही है कि उप में उनको ये दर्जा न प्राप्त हो.

जब इनको पतग का दर्जा मिल जाएगा तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आधार पर इनको अन्त्योदय अन्न योजना के रुप में बुनियादी सुरक्षा मिल सकेगी. इससे इस समुदाये को बहुत लाभ मिलेगा और प्रदेश सरकार को इस समुदाये के दर्जे के ऊपर विचार करना चाहिऐ. यदि प्रदेश सरकार इस समुदाये को पतग का दर्जा दे दे, तो प्रदेश को कोई भी आर्थिक कीमत नही चुकानी पड़ेगी.

इस छेत्र में एक संयुक्त जंगल व्यवस्थापन कार्यक्रम की काफी जरुरत है. इससे एक फायदा ये होगा कि प्रदेश में प्राकृतिक संसाधन मजबूत होंगे. जंगल-जमीन पर सहरिया लोगों के अधिकारों को पुनः स्थापित करने से इनको एक पुनर्जीवन मिलेगा. इस्सी तरह छोटे स्तर पर सिचाई के काम भी इस छेत्र में स्थाई रोजगार के विकल्प खडे करने के लिए शुरू किये जाने चाहिऐ.

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