हॉर्न ध्वनि-तीव्रता कम करना ठीक है पर सोचने की बात है कि हमें हॉर्न बजाने की जरुरत क्यों है?

हिंदुस्तान टाइम्स (अंग्रेजी दैनिक)
हाल ही में केंद्रीय सरकार के सड़क-परिवहन मंत्रालय की संभावित नीति समाचार में थी कि दो-चार पहिया और अन्य मोटर-गाड़ियों के 'हॉर्न' की ध्वनि-तीव्रता कम होनी चाहिए और ध्वनि-तीव्रता पर अधिकतम उपरी सीमा को कम किया जाए. यह प्रयास ध्वनि-प्रदूषण और सड़क सुरक्षा दोनों की दृष्टि से नि:संदेह जरुरी कदम है पर अधिक जरुरी यह है कि क्या यह पर्याप्त है? अधिक गंभीर प्रश्न यह है कि हमें हॉर्न बजाने की जरुरत क्यों पड़ती है जबकि अधिकाँश विकसित देशों में बिना हॉर्न बजाये सड़क सुरक्षा बेहतर है और परिवहन व्यवस्था भी. विकसित देशों में हॉर्न सम्बंधित नीति सही है कि हॉर्न का उपयोग सिर्फ आकास्मक कारणों में ही हो (जैसे कि ट्रेन की चैन) और आम आवागमन के लिए प्रतिबंधित हो.

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यदि हम अधिक आबादी के आवागमन को सुरक्षित और आरामदायक बनाने के लिए सड़क-परिवहन नीति बनायेंगे तो फिर पैदल, साइकिल और सार्वजनिक यातायात साधन इस्तेमाल करने वालों की जरूरतों को केंद्र में रखना होगा. पर हकीकत में हो ठीक उल्टा रहा है: हमारी सड़क और परिवहन नीतियाँ मोटर-गाड़ियाँ चालने वाले आबादी के छोटे वर्ग का ध्यान रखती हैं और आबादी के बड़े वर्ग जिनमें पैदल, साइकिल और सार्वजनिक यातायात साधन इस्तेमाल करने वाले शामिल हैं उनकी जरूरतें नज़रंदाज़ हो रही हैं और उनके लिए विशेष रूप से सड़क भी असुरक्षित हो रही है. यहाँ तक कि कुछ ऐसी विशिष्ठ सड़कें भी बनी हैं जिनपर साइकिल, दो-तीन पहिया या भैंसा-गाड़ी चलाना भी माना है - सोचने की बात है कि जनता के पैसे से चंद मोटर-गाड़ी वालों के लिए क्यों इतनी महंगी सड़क बने?

भारत सरकार समेत दुनिया के अन्य 192 देशों की सरकारों ने संयुक्त राष्ट्र महासभा 2015 में सतत विकास लक्ष्य (Sustainable Development Goals या SDGs) को 2030 तक पूरा करने का वादा किया है. इन सतत विकास लक्ष्यों में से एक है (SDG 3.6) कि 2020 तक, सड़क दुर्घटनाओं और मृत्युदर को आधा करना. पर आंकड़ों को देखें तो ये चिंता की बात है कि सड़क दुर्घटनाओं और मृत्युदर में गिरावट नहीं बढ़ोतरी हो रही है.

सिर्फ भारत ही नहीं, थाईलैंड से भी ऐसी रिपोर्ट आई है कि नए साल के जश्न के दौरान सड़क दुर्घटनाएं और मृत्युदर पिछले वर्ष की तुलना में बढ़ गया है. यदि सड़क दुर्घटनाएं और मृत्युदर बढ़ेगा तो सरकारें सतत विकास लक्ष्य पर कैसे खरी उतरेंगी?

सतत विकास लक्ष्य सभी लोगों के विकास की व्यापक बात करता है. इसीलिए ये जरुरी है कि हमारी नीतियाँ भी इस बात को संशय में लें कि सड़क पर सबका बराबर का अधिकार है - न कि, सिर्फ बड़ी बड़ी गाड़ियों का. सबसे बड़ी प्राथमिकता ये होनी चाहिए कि समाज में सभी के लिए पैदल चलने और साइकिल चलाने तथा जन-परिवहन का सुरक्षित, आरामदायक और पर्याप्त इंतज़ाम है. यदि सभी के लिए जन-परिवहन का सुरक्षित, आरामदायक और पर्याप्त इंतज़ाम होगा तो फिर किसी को निजी दो-चार पहिया गाड़ी से चलने की आवश्यकता ही क्या है?

सड़क को सबके साथ साझा करें

सड़क हम सबकी है और उसको जिम्मेदारी से सबके साथ साझा करना अतिआवश्यक है. सड़क अधिकार पहले उसका है जो पैदल चल रहा हो (इनमें भी बच्चों, गर्भवती महिलाओं, महिलाओं - बच्चों, बुजुर्गों, विकलांग लोगों आदि को प्राथमिकता मिलनी चाहिए) या गैर-मोटर वाहन चला रहा हो. इसके बाद ही मोटर वाले दो पहिया और चार पहिया वाहनों को सड़क अधिकार मिलना चाहिए. सिर्फ आकास्मक स्थितियों में, जैसे कि, एम्बुलेंस आदि को सबसे पहले प्राथमिकता मिले. अति-विशिष्ठ व्यक्ति आदि और लाल-नीली बत्ती का इस्तेमाल पूरी तरह से बंद होना चाहिए.

दो-पहिया वाहन पर सवार सभी लोगों को हेलमेट पहनना चाहिए, इसमें पीछे बैठे लोग और बच्चे भी शामिल हैं. हम सबको वाहन चलाने की गति सीमा का कड़ाई से अनुपालन करना चाहिए, एक कतार में ही चलना चाहिए और हॉर्न आदि सिर्फ आकास्मक स्थिति में ही बजाना चाहिए. प्रेशर-हॉर्न प्रतिबंधित होने के बावजूद इस्तेमाल हो रहे हैं - सरकार उन लोगों पर सख्त करवाई करे जो प्रतिबन्ध को दरकिनार कर प्रेशर हॉर्न का उपयोग कर रहे हैं.

अधिकांश सड़क दुर्घटनाएं शराब पीने की वजह से होती है. इसलिए यह और भी जरुरी है कि शराब पी कर गाड़ी चलाने पर प्रतिबन्ध को सख्ती से लागू किया जाए.

नैदानिक स्थापन अधिनियम २०१० (Clinical Establishment Act 2010) के अनुसार, निजी चिकित्सकों के दुर्घटनाग्रस्त रोगियों को नि:शुल्क इलाज कर स्थिर करने के बाद ही किसी और अस्पताल में भेजना चाहिए. सरकार से अपील है कि वो नैदानिक स्थापन अधिनियम २०१० को जन स्वास्थ्य की रक्षा के लिए सख्ती से बिना विलम्ब लागू करे.

स्मार्ट सिटी वो नहीं जिसमें हर इंसान बड़ी-लम्बी कार में चले, स्मार्ट सिटी वो है जिसमें सब लोग - अमीर और गरीब - सार्वजनिक यातायात साधन का उपयोग करे. निजी कार का उपयोग बंद होना चाहिए और जिन्हें निजी कार की जरुरत है वो टैक्सी का इस्तेमाल करें. कार को अन्य यात्रियों के साथ साझा करना भी जरुरी है.

डॉ संदीप पाण्डेय, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया)
डॉ संदीप पाण्डेय जो मेगसेसे पुरुस्कार से सम्मानित कार्यकर्ता हैं, उन्होंने कहा कि सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) का मानना है कि सार्वजनिक यातायात साधन, नि:शुल्क एम्बुलेंस, स्कूल बस, आकास्मक सेवा वाहन, जिन सरकारी विभाग के लिए सरकारी वाहन जरुरी है वो ही इस्तेमाल करें (जैसे कि पुलिस, नगर निगम आदि), अधिक संख्या में महिला चालक सार्वजनिक यातायात साधन चलायें, महिलाओं को भी वरिष्ठ नागरिकों की तरह यातायात में छूट मिले, लाल-नीली बत्ती के इस्तमाल पूरी तरह से बंद हो, और हर सड़क कर एक कतार सिर्फ साइकिल और पैदल चलने वालों के लिए आरक्षित हो.

बाबी रमाकांत, सीएनएस (सिटीजन न्यूज़ सर्विस)
१५ जनवरी २०१७

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