तम्बाकू किल्स समाचार बुलेटिन: १० मई २००८

शनिवार, १० मई २००८

तम्बाकू किल्स समाचार बुलेटिन
अंक ३७५
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डेएली न्यूज़ एक्टिविस्ट

लखनऊ, शुक्रवार, ९ मई २००८

२६ जानलेवा बीमारियों की संवाहक है तम्बाकू


" तम्बाकू २६ प्रकार से भी अधिक जानलेवा बिमारिओं का जनक है, तम्बाकू में मौजूद तत्व निकोटीन अधिक नशीला होता है, इसलिए इस नशे को त्यागने में लोग अक्सर असफल हो जातें हैं। यह बात 'इंडियन सोसिएटी अगेन्स्ट स्मोकिंग ' के कार्यक्रम समन्वय रितेश आर्य ने कहा।

वह कल विश्व स्वास्थ्य संगठन की नशा उन्मूलन क्लिनिक तथा सिटिज़न न्यूज़ सर्विस के तरफ़ से आयोजित
कार्यक्रम में बोल रहे थे। उन्होंने बताया की दृढ़ इच्छा शक्ति से ही नशे को छोडा जा सकता है। कार्यक्रम के दौरान अभिनव भारत फाउंडेशन के प्रवक्ता राहुल द्विवेदी ने बताया कि " तम्बाकू एक धीमा जहर है जिसे जड़ से मिटाना जरूरी है। यदि तम्बाकू का सेवन इसी तरह से बढ़ता रहा तो २०३० तक यह अनुपात करीब ८० लाख हो जाएगा। इस कार्यक्रम में स्कूल के करीब १०० बच्चों ने जो की इन मलिन बस्तियों में रहतें हैं के साथ-साथ उनके माता-पिता तथा आस - पास के और भी लोगों ने भाग लिया । कार्यक्रम के दौरान कई बच्चों नें यह स्वीकार किया की अक्सर हम लोग भी गुटका इत्यादी का सेवन कर लेतें है।
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स्वतंत्र भारत

लखनऊ, शुक्रवार, ९ मई २००८

तम्बाकू से हर साल होती है ५० लाख लोगों की मौत


विश्व स्वास्थ्य संगठन की नशा उन्मूलन क्लिनिक तथा
लखनऊ न्यूज़ सर्विस की के तरफ़ से आयोजित तम्बाकू से होने वाली जानलेवा बिमारिओं पर पोस्टर प्रदर्शनी और आन स्पॉट नशा छोड़ने के लिए परामर्श अभियान आयोजित किया गय। इस कार्यक्रम में स्कूल के करीब १०० बच्चों ने जो की इन मलिन बस्तियों में रहतें हैं के साथ-साथ उनके माता-पिता तथा आस - पास के और भी लोगों ने भाग लिया ।हर साल ५० लाख से अधिक लोग तम्बाकू जनित जान लेवा बिमारिओं की वजह से मौत के शिकार हो जातें हैं। यदि तम्बाकू का सेवन इसी तरह से बढ़ता रहा तो २०३० तक यह अनुपात करीब ८० लाख हो जाएगा। तम्बाकू विश्व का चौथा सबसे बड़ा कारन है लोगों की मौत का। जो कम्पनियाँ इन पदार्थों के जानलेवा स्वरूप से भलीभांति परिचित है उसके बाद भी तम्बाकू के भ्रामक विज्ञापन के जरिये लाखों बच्चों , युवाओं और महिलाओं को हकीकत छुपाते हुए ग्लेमौर और फैशन आदि के विज्ञापनों द्वारा नशा ग्रस्त कराती है वह न तो जिम्मेदार ठहरे जाती है और न जवाब देह। कार्यक्रम के दौरान अभिनव भारत फाउंडेशन के प्रवक्ता राहुल द्विवेदी ने बताया की " तम्बाकू एक धीमा जहर है जिसे जड़ से मिटाना जरूरी है। कार्यक्रम के दौरान बिभिन स्कूलों और विश्व विद्यालयों के छात्रों ने भाग लिया।
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जनसत्ता एक्सप्रेस
लखनऊ, शुक्रवार, ९ मई २००८

तम्बाकू में मौजूद तत्व निकोटीन बनता है नशे का आदि

तम्बाकू २६ प्रकार से भी अधिक जानलेवा बिमारिओं का जनक है, उनका कहना था की तम्बाकू में मौजूद तत्व निकोटीन अधिक नशीला होता है, इसलिए इस नशे को त्यागने में लोग अक्सर असफल हो जातें हैं। यह बात प्रो० डॉक्टर रमाकांत ने आशा सामाजिक विद्यालय में जो की सचिवालय कालोनी के पीछे, रिंग रोड के पास मलिन बस्ती में स्तिथ है तम्बाकू से होने वाली जानलेवा बिमारिओं पर पोस्टर प्रदर्शनी और आन स्पॉट नशा छोड़ने के लिए परामर्श अभियान विश्व स्वास्थ्य संगठन की नशा उन्मूलन क्लिनिक के तरफ़ से आयोजित कार्यक्रम में दी । उन्हों ने आगे कहा की जो कम्पनियाँ इन पदार्थों के जानलेवा स्वरूप से भलीभांति परिचित है उसके बाद भी तम्बाकू के भ्रामक विज्ञापन के जरिये लाखों बच्चों , युवाओं और महिलाओं को हकीकत छुपाते हुए ग्लेमौर और फैशन आदि के विज्ञापनों द्वारा नशा ग्रस्त कराती है वह न तो जिम्मेदार ठहरे जाती है और न जवाब देह।

हर साल ५० लाख से अधिक लोग तम्बाकू जनित जान लेवा बिमारिओं की वजह से मौत के शिकार हो जातें हैं। यदि तम्बाकू का सेवन इसी तरह से बढ़ता रहा तो २०३० तक यह अनुपात करीब ८० लाख हो जाएगा। तम्बाकू विश्व का चौथा सबसे बड़ा कारन है लोगों की मौत का। कार्यक्रम के दौरान बिभिन स्कूलों और विश्व विद्यालयों के छात्रों ने भाग लिया।
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आज
लखनऊ, शुक्रवार, ९ मई २००८

काश! कि मैंने तम्बाकू का सेवन न किया होता

"यदि हमें तम्बाकू के बुरे प्रभावों का पता होता तो शायद आज मैं अपने आप को फेफडे की बीमारी सा बचा सकता था " यह बात कहना था ४० वर्षीय राम कुमार का जो की आज आशा सामाजिक विद्यालय में जो की सचिवालय कालोनी के पीछे, रिंग रोड के पास मलिन बस्ती में स्तिथ है तम्बाकू से होने वाली जानलेवा बिमारिओं पर पोस्टर प्रदर्शनी और आन स्पॉट नशा छोड़ने के लिए परामर्श अभियान विश्व स्वास्थ्य संगठन की नशा उन्मूलन क्लिनिक के तरफ़ से आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने आए थे । हर साल ५० लाख से अधिक लोग तम्बाकू जनित जान लेवा बिमारिओं की वजह से मौत के शिकार हो जातें हैं। यदि तम्बाकू का सेवन इसी तरह से बढ़ता रहा तो २०३० तक यह अनुपात करीब ८० लाख हो जाएगा। तम्बाकू विश्व का चौथा सबसे बड़ा कारन है लोगों की मौत का। जो कम्पनियाँ इन पदार्थों के जानलेवा स्वरूप से भलीभांति परिचित है उसके बाद भी तम्बाकू के भ्रामक विज्ञापन के जरिये लाखों बच्चों , युवाओं और महिलाओं को हकीकत छुपाते हुए ग्लेमौर और फैशन आदि के विज्ञापनों द्वारा नशा ग्रस्त कराती है वह न तो जिम्मेदार ठहरे जाती है और न जवाब देह। इस अवसर पर 'इंडियन सोसिएटी अगेन्स्ट स्मोकिंग ' के कार्यक्रम समन्वय रितेश आर्य ने जो की दस साल पहले ख़ुद भी तम्बाकू का सेवन करते थे ने बताया की " तम्बाकू २६ प्रकार से भी अधिक जानलेवा बिमारिओं का जनक है, उनका कहना था की तम्बाकू में मौजूद तत्व निकोटीन अधिक नशीला होता है, इसलिए इस नशे को त्यागने में लोग अक्सर असफल हो जातें हैं। उन्होंने बताया की दृढ़ इच्छा शक्ति से ही नशे को छोडा जा सकता है। इस कार्यक्रम में स्कूल के करीब १०० बच्चों ने जो की इन मलिन बस्तियों में रहतें हैं के साथ-साथ उनके माता-पिता तथा आस - पास के और भी लोगों ने भाग लिया ।

निमंतरण: बदलते परिवेश में स्थानीय समाचार पत्रों की भूमिका

निमंतरण
बदलते परिवेश में स्थानीय समाचार पत्रों की भूमिका
लखनऊ लीड
टीम


'बदलते परिवेश में स्थानीय समाचार पत्रों की भूमिका' विषय पर एक गोष्ठी आयोजित की गयी है जिसमें प्रमुख वक्ताओं के रूप में भाग लेंगे:

- श्री शीतला सिंह, संपादक, जन मोर्चा, फैजाबाद
- श्री प्रताप सोमवंशी, संपादक, अमर उजाला, कानपुर
- श्री नवीन जोशी, संपादक, हिंदुस्तान,
लखनऊ
- श्री अतुल चंद्रा, संपादक, टाइमऑफ़ इंडिया, लखनऊ
- डॉ संदीप पाण्डेय, मग्सय्सय पुरुस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता
- श्री शरद प्रधान, रॉयटर्स

स्थान: प्रेस क्लब,
लखनऊ
तिथि: रविवार, ११ मैं २००८
समय: :३० बजे दोपहर

इस अवसर पर
लखनऊ लीड नामक साप्ताहिक समाचार पत्र का विमोचन भी होगा.

आपकी उपस्थिति प्रार्थनीय है.

इरफान अहमद
उपाध्यक्ष: पीपुल' यूनियन फॉर सिविल लिबेर्टीस (PUCL, उप)

फरीद अब्बासी
लखनऊ लीड टीम

मशीनीकरण की तरफ़ बढ़ता फसल कटाई का काम

मशीनीकरण की तरफ़ बढ़ता फसल कटाई का काम

अमित द्विवेदी

[गोरखपुर एनवायरनमेंट एक्शन ग्रुप (GEAG) द्वारा प्रकाशित पूरी रपट (कम्बाई मशीन द्वारा कटाई से किसानों का आर्थिक और पर्यवारानीय नुकसान हो रहा है) पढने या 'डाउनलोड' करने के लिए यहाँ क्लिक्क कीजिये ]


कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है और भारतीय अर्थव्यवस्था में, विशेषकर गंगा यमुना के मैदानी कृषिव्यवस्था में गेहूं और चावल की फसलें और उनका उत्पादन प्रमुख है। धान और गेंहूँ के उत्पादन की प्रक्रिया पूर्वीउत्तर प्रदेश के फसल चक्र की प्रमुख विशेषता
है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में फसलों का यह चक्र हजारों परिवारों को केवल आजीविका का साधन उपलब्ध करवाता है बल्कि साथ ही इस छेत्र की खाद्य सुरक्षा का भी प्रमुख श्रोत है।

पिछले कुछ वर्षों से इस फसल चक्र की सम्पूर्ण प्रक्रिया में एक तरह की स्थिरता आई है जो धानऔर गेहूं केउत्पादन में गिरावट का गंभीर संकेत देती है। इस गिरावट के कई कारन हैं जिसमे जल संसाधन में गिरावट, पोषकतत्वों की कमी अत्यधिक उर्जा की खपत, मिटटी के स्वास्थ्य में गिरावट तथा अन्यं पर्यवार्नियें समस्याएँ रही हैं।अभी हाल ही में इस सम्बन्ध में फसल अवशेषों का खेत के भीतर जलाया जन तथा कटाई की मशीनीकरण कीपधती मूल रूप से चर्चा में रही हैं। क्योंकि खेती में बढ़ता मशीनीकरण तथा उससे जुड़ी प्रक्रियाएं परोक्ष तथाअपरोक्ष रूप से जहाँ जलवायु परिवर्तन के कारकों को मदद दे रही है। वहीं वह आर्थिक रूप से किसानों के लिए भीलाभप्रद साबित नही हो रही है। किसान रासायनिक खेती तथा जलवायु परिवर्तन के कारणों से त्रस्त हैं इससम्बन्ध में हाल ही में गोरखपुर एन्विओरेन्मेन्तल् एक्शन ग्रुप द्वारा किसानों के बीच कराये गए एक सर्वेक्षण कीखेती में फसलों की कटाई से संबंधित मशीनीकरण से कितना लाभ और हानि है। क्या फसलों की कटाई मैं मशीनोंका अपनायाजना लाभप्रद है।

इस सर्वेक्षण से पता चलता है की मशीन द्वारा धन की कटाई मानव द्वारा की जाने वाली कटाई से ४७५ रूपये प्रतिएकड़ महंगी है। मशीन द्वारा धन की कटाई का एक नकारात्मक पक्ष यह भी है की इसमें प्रति हेक्टेयर लगभग कुंतल चारे का नुकसान होता है। मशीन द्वारा कटाई से विशिस्थ रूप से कार्बन, नत्रजन, फास्फोरस, पोटाश, सल्फरतथा मिटटी के अन्दर बक्तेरिया की मात्र घटती है तथा मिटटी के स्वास्थ्य में गिरावट आती है।

इस अध्ययन के दौरान यह देखा गया की गेहूं और धान की बुवाई का कुल परीछेत्र जो क्रमश: १८०७४२ तथा १३९२६० हेक्टेयर था में कम्बाइन मशीन के द्वारे गेहूं और धान की कटाई का कुल छेत्र क्रमश:३१ तथा ३७ प्रतिशत का रहा। फसलों के अवशेस जलने से गेहूं तथा धान के खेतों की नमी में ५० प्रतिशत की गिरावट आई है। धान की मशीन द्वारा की जाने वाली कटाई मानव द्वारा की जाने वाली कटाई से काफी महंगा है। सर्वेक्षण बताता है की प्रति एकड़ में मशीन द्वारा की जाने वाली कटाई से १७२५ रूपये की लगत आती है वही मानव द्वारा की जाने वाली कटाई से मात्र १२५० रूपये लगत आती है। अर्थात मशीन द्वारा की जाने वाली कटाई से ४७५ रूपये महंगी है। मशीन द्वारा धान की कटाई का एक नकारात्मक पक्ष यह भी है की इसमें प्रति हेक्टेयर लगभग ९ कुंतल चारे का नुकसान होता है। लेकिन सवाल यह है की आख़िर यह जानते हुए की मशीन द्वारा कटाई मानव द्वारा की जाने वाली कटाई से महंगी होते हुए भी किसान मशीनीकरणकी तरफ़ कयूं बढ़ रहें हैं। इस सम्बन्ध में पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक बड़े किसान का कहना है की " मशीनों द्वारा की वाली जाने वाली कटाई अधिक सुविधा जनक तथा सरल है। इसमे समय भी कम लगता है, अक्सर मजदूर कटाई के वक्त मिलते नही और ज्यादा देर करने पर फसलों के बारिश या फिर पत्थर गिरने पर पुरी तरह से नष्ट होने की सम्भावना बनी रहती है। इन
सभी समस्यों का चलते किसान यहाँ तक की छोटे किसान मशीनी कटाई की तरफ़ बढ़ रहे हैं। ऐसा भी नही है की किसान अपनी साडी फसल मशीन द्वारा जी कटवाता है। वह कुछ फसलों को भूसे इत्यादी के रूप में बचा कर रखता है। अंततः सरकार और किसान दोनों को मानव कटाई की तरफ ज्यादा ध्यान देने की जरुरत है।

अमित द्विवेदी

[गोरखपुर एनवायरनमेंट एक्शन ग्रुप (GEAG) dwara prakashit poori rpt (कम्बाई मशीन द्वारा कटाई से किसानों का आर्थिक और पर्यवारानीय नुकसान हो रहा है) पढने या 'डाउनलोड' करने के लिए यहाँ क्लिक्क कीजिये ]

तम्बाकू किल्स समाचार बुलेटिन: ९ मई २००८

तम्बाकू किल्स समाचार बुलेटिन: मई २००८
अंक: ३७४


जयपुर में ६० प्रतिशत सिगरेट पीने वाले घर पर धूम्रपान नही करते: सर्वे

जयपुर में हुए सर्वे के अनुसार ८०% लोगों ने कहा कि वो धूम्रपान नही करते। ८२% २० वर्षीय लोगों ने कहा कि वो धूम्रपान नही करते, ७७% ३० वर्षीय लोगों ने कहा कि वो धूम्रपान नही करते। जिन लोगों ने यह कहा कि वह धूम्रपान करते हैं, उनमें से ६०% लोगों ने यह भी कहा कि वह घर पर धूम्रपान नही करते हैं।

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इंडियन प्रेमिएर लीग क्रिकेट के तम्बाकू और शराब कंपनियों द्वारा प्रयोजन पर आपत्ति

पाकिस्तान के क्रिकेट बोर्ड ने कहा है कि पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ियों को शराब और सिगरेट या तम्बाकू कंपनियों के ब्रांड के 'लोगो' तक लगाने की अनुमति नही है। भारत में हो रहे इंडियन प्रेमिएर लीग जिसको विजय मलाया जो भारत के उनितेद ब्रेवेरिएस के अध्यक्ष हैं, उनके द्वारा सह-प्रायोजित है। इसका नाम भी रोयल चैलेंजर है।

पाकिस्तान में टीवी में और खेल मैदानों में तम्बाकू के विज्ञापनों पर बंदी लगी हुई है।

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होटल में तम्बाकू सेवन पर बंदी लगने से युवा तम्बाकू सेवन करने के लिए कम प्रेरित होते हैं

अमरीका में हुए शोध के अनुसार होटल में जब तम्बाकू सेवन पर बंदी लगाई जाती है तो युवाओं में तम्बाकू सेवन का दर कम होता है। जो युवा ऐसे शहरों में रहते हैं जहाँ होटल में तम्बाकू सेवन प्रतिबंधित है, उनकी तम्बाकू सेवन आरंभ करने की सम्भावना ४०% कम होती है उन युवाओ की तुलना में जो ऐसे शहरों में रहते हैं जहा होटल में तम्बाकू सेवन प्रतिबंधित नही है।

"ऐसा कोई भी तम्बाकू नियंत्रण कार्यक्रम नही है जो युवाओं में तम्बाकू सेवन के दर को लगभग आधा कर देता है" कहना है डॉ मिचेअल सिएगेल का जो बोस्टन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ़ पब्लिक हैल्थ के प्रोफेसर हैं और इस शोध के प्रमुख शोधकर्ता भी।

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यह तम्बाकू किल्स समाचार बुलेटिन तम्बाकू किल्स युवा टीम द्वारा आपको प्राप्त हो रही है। इस टीम जो भारतीय तम्बाकू नियंत्रण संगठन (इंडियन सोसिएटी अगेन्स्ट स्मोकिंग), आशा परिवार, अभिनव भारत फाउंडेशन, सिटिज़न न्यूज़ सर्विस और छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय की तम्बाकू नशा उन्मूलन क्लीनिक का सहयोग प्राप्त है।

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तपेदिक या टीबी समाचार सारांश

तपेदिक या टीबी समाचार सारांश
९ मई २००८

कनाडा अभी तक इस संशय में था कि गाय-भैंस में होने वाली बोविन टीबी या तपेदिक कनाडा से ख़त्म हो चुकी है, और कनाडा की सरहद के बाहर के देशों में ही यह बोविन टीबी पायी जाती है।

परन्तु कल कनाडा में भी एक वर्षीया गाय के बोविन टीबी निकल आई है। जिस तरह से टीबी या तपेदिक का संक्रमण फैलता है, यह कहना कि टीबी या तपेदिक किसी भी एक घर, शहर, देश या छेत्र से ख़त्म हो सकती है, यह समझदारी की बात नही है। टीबी या तपेदिक विश्व स्तर पर ही नियंत्रित की जा सकती है, और ख़त्म भी।

कनाडा के पड़ोसी राष्ट्र अमरीका में तो बोविन टीबी ने हलचल मचा रखी है। अमरीका के कई प्रदेशों में बोविन टीबी एक चुनौती प्रस्तुत कर रहा है, और मिन्नेसोता में पिछले हफ्ते ही एक अधिनियम पारित किया गया है जिसके फल्सरूप आशा है कि प्रदेश में बोविन टीबी या तपेदिक नियंत्रण मजबूत हो सकेगा।

दक्षिणी अफ्रीका के राष्ट्र बोत्स्वाना में पर्यटन मंत्रालय का कहना है कि बोत्स्वाना में टीबी या तपेदिक का कोई खतरा नही है, विशेषकर कि ड्रग-रेसिस्तंत टीबी या तपेदिक। जब कि आकडे अलग तस्वीर पेश करते हैं: बोत्स्वाना में मालती-ड्रग रेसिस्तंत टीबी (MDR-TB) या तपेदिक और एक्स्तेंसिवेली ड्रग-रेसिस्तंत टीबी (XDR-TB) या तपेदिक, दोनों ही मौजूद हैं, और कुछ माह पहले ही वहाँ के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने कहा था कि बोत्स्वाना से टीबी या तपेदिक जाने वाला नही है बोत्स्वाना में २००७ के एक शोध में ये भी प्रमाणित हुआ था कि जो लोग इसोनिअजिद थेरपी ले रहे थे, उनके दवा नियमित रूप से लेने का दर बहुत कम था. इसोनिअजिद थेरपी लोगों को टीबी से बचने के लिये दी जाती है (जिन लोगों में टीबी या तपेदिक सक्रिय नही होती है और इसोनिअजिद थेरपी लेने से टीबी सक्रिय होने की सम्भावना नगण्य हो जाती है)

निकारागुआ में हुए शोध के आधार पर यह कहा जा सकता है कि यदि टीबी या तपेदिक नियंत्रण कार्यक्रम चिकत्सा के बजाय लोगों को केन्द्र में रख के मानवीय बनाये जाए, तो अधिक प्रभावकारी होते है, और समाज में व्याप्त टीबी या तपेदिक से जुड़े हुए शोषण और बहिश्कार को भी कम करते हैं। इस शोध में चिक्त्सिक और स्वास्थ्य कार्यकर्ता रोगी के घर जा कर केवल चिक्त्सकीय मदद करते थे बल्कि परिवार और मुहल्ले वालों के साथ परिचर्चा के दौरान टीबी या तपेदिक से संबंधित ज्ञानवर्धन भी करते थे और मिथियाओं का पतन भी। इससे टीबी या तपेदिक से ग्रसित लोगों को बहुत कम शोषण और बहिष्कार झेलना पड़ता था और टीबी या तपेदिक के संक्रमण की सही रोकधाम भी मुमकिन हो पाती थी।

जागरूकता से ही सम्भव है तम्बाकू नियंत्रण

जागरूकता से ही सम्भव है तम्बाकू नियंत्रण

आज आशा सामाजिक विद्यालय में जो कि सचिवालय कालोनी के पीछे, रिंग रोड के पास मलिन बस्ती में स्थित है, तम्बाकू से होने वाली जानलेवा बिमारिओं पर पोस्टर प्रदर्शनी और आन स्पॉट नशा छोड़ने के लिए परामर्श अभियान विश्व स्वास्थ्य संगठन की नशा उन्मूलन क्लीनिक के समर्थन से आयोजित किया गया था।

"यदि हमें तम्बाकू के बुरे प्रभावों का पता होता तो शायद आज मैं अपने आप को फेफडे की बीमारी से बचा सकता था " इस मलिन बस्ती में रहने वाले ४० वर्षीय राम कुमार ने इस संवाददाता से कहा. राम कुमार अपने १० वर्षीय पोलियो से ग्रसित बच्चे के साथ रहते हैं।

हर
साल ५४ लाख से अधिक लोग तम्बाकू जनित जान लेवा बिमारिओं की वजह से मौत के शिकार हो जातें हैं। यदि तम्बाकू का सेवन इसी तरह से बढ़ता रहा तो २०३० तक यह अनुपात करीब ८० लाख हो जाएगा।

तम्बाकू
विश्व का चौथा मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है। जो कम्पनियाँ इन पदार्थों के जानलेवा स्वरूप से भलीभांति परिचित है उसके बाद भी तम्बाकू के भ्रामक विज्ञापन के जरिये लाखों बच्चों , युवाओं और महिलाओं को हकीकत छुपाते हुए ग्लेमौर और फैशन आदि के विज्ञापनों द्वारा नशा ग्रस्त कराती है वह न तो जिम्मेदार ठहराई जाती हैं और न ही जवाब देह।

इस
अवसर पर 'इंडियन सोसिएटी अगेन्स्ट स्मोकिंग' (ISAS) के कार्यक्रम समन्वयक रितेश आर्या ने जो कि दस साल तक ख़ुद भी तम्बाकू का सेवन कर चुके हैं, ने बताया कि "तम्बाकू २६ प्रकार से भी अधिक जानलेवा बिमारिओं का जनक है"। उनका कहना था कि तम्बाकू में मौजूद तत्व निकोटीन अधिक नशीला होता है, इसलिए इस नशे को त्यागने में लोग अक्सर असफल हो जातें हैं। उन्होंने बताया की दृढ़ इच्छा शक्ति से ही नशे को छोडा जा सकता है।

इस
कार्यक्रम में स्कूल के करीब १०० बच्चों ने जो कि इन मलिन बस्तियों में रहतें हैं, के साथ-साथ
उनके माता-पिता तथा आस - पास के और भी लोगों ने भाग लिया । कार्यक्रम के दौरान कई बच्चों नें यह स्वीकार किया कि अक्सर हम लोग भी गुटका इत्यादि का सेवन कर लेते है क्योंकि वह अपने माता - पिता तथा आस - पास के और लोगों को ऐसा करते हुए देखते हैं।

कार्यक्रम
के दौरान अभिनव भारत फाउंडेशन के प्रवक्ता राहुल द्विवेदी ने बताया कि "तम्बाकू एक धीमा जहर है जिसे जड़ से मिटाना जरूरी है।"

कार्यक्रम
के दौरान बिभिन स्कूलों और विश्व विद्यालयों के छात्रों ने भाग लिया।

यह कार्यक्रम, इंडियन सोसिएटी अगेन्स्ट स्मोकिंग या भारतीय तम्बाकू नियंत्रण संगठन, अभिनव भारत फाउंडेशन, समाधान, आशा परिवार, लखनऊ के चिकित्सा विश्वविद्यालय की तम्बाकू नशा उन्मूलन क्लीनिक, सिटिज़न न्यूज़ सर्विस आदि के संयुक्त प्रयास से आयोजित हुआ था।
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तपेदिक या टीबी समाचार सारांश: ८ मई २००८

तपेदिक या टीबी समाचार सारांश
८ मई २००८

एशियन मानवाधिकार आयोग ने उत्तर प्रदेश सरकार को तपेदिक या टीबी नियंत्रण को बेहतर करने के लिये हाल ही में लिखा था क्योकि ड्रग रेसिस्तात टीबी या तपेदिक से बनारस में साड़ी बुनकर गंभीर रूप से प्रभावित थे और मृत्यु दर भी बढ़ रहा था, परन्तु भारत सरकार ने उत्तर प्रदेश सरकार की भूरी भूरीप्रशंसा की है कि 'उत्तर प्रदेश ने टीबी नियंत्रण के लक्ष्य पूरे कर लिये हैं चूँकि इस वर्ष उसने ६०% टीबी के मरीजों को चिन्हित किया है। पिछले वर्ष ४८% टीबी या तपेदिक के मरीज ही चिन्हित हो पाए थे'।

असलियत यह है कि विश्व में सभी देशों ने २००० में यह वादा किया था कि २००५ तक कम-से-कम ७०% टीबी के मरीजों की जांच की जायेगी और इनमें से कम-से-कम ८५% का सफलतापूर्वक इलाज किया जाएगा।

२००८ आधा खत्म होने को आया है पर उत्तर प्रदेश अभी ६०% पर ही है, और भारत सरकार उसको प्रसंशा का पात्र भी मान रही है।

जो हालात उत्तर प्रदेश में हैं, उनको ध्यान में रखते हुए यह कहना अतिशयोक्ति नही होगी कि ड्रग रेसिस्तंत टीबी या तपेदिक के दर अपेक्षा से कही अधिक निकल के आएगा।

भारतीय हैदराबाद के वैज्ञानिकों ने टीबी या तपेदिक के बक्टेरिया में लोहे को सोखने की प्रक्रिया समझ ली है। यह इसलिए महत्वपूर्ण उपलब्धि हो सकती है क्योकि नई टीबी या तपेदिक की दवाओं की खोज अब इस प्रकार से हो सकती है कि बक्टेरिया लोहा सोख ही न सके, जो उसके सक्रिए रहने के लिये जरुरी था। यदि ऐसा मुमकिन हो जाए तो टीबी या तपेदिक के बक्टेरिया को निष्क्रिय किया जा सकता है।

मोजाम्बिक के जेल में ९१% मृत्यु टीबी, एड्स या मलेरिया से होती है! बाकि की ९% मृत्यु आत्महत्या से होती है! यह बेहद चिंता का विषय है क्योकि विश्वस्तर पर नीतियाँ बन रही है और कुछ तो पहले से भी बनी हुई है कि जेल के भीतर कैदियों और जेल के कर्मचारियों के लिये सुविधाएँ बेहतर हों और मानवीय बनें, विशेषकर कि स्वास्थ्य सेवाएं। यह भी माना जाता है कि जेल के भीतर एड्स, टीबी, हेपेटाइटिस सी आदि की सेवाओं में तालमेल हो क्योकि अक्सर एक ही व्यक्ति इनसे संबंधित रोगों से ग्रस्त होता है। जेल के भीतर रहने का स्वच्छ मौहौल होना चाहिए जिससे संक्रामक रोगों पर नियंत्रण पाया जा सके।

अमरीका और यूरोप में ओर्गन ट्रांसप्लांट के दौरान लगभग ७ प्रतिशत टीबी संक्रमित होती है। जरा कल्पना कीजिये कि भारत जैसे देशों में ओर्गन ट्रांसप्लांट के दौरान टीबी और अन्य संक्रामक रोगों का दर क्या हो सकता है?

व्यापक प्रबंधन और उचित देखभाल से सम्भव है अस्थमा या दमा नियंत्रण

व्यापक प्रबंधन और उचित देखभाल से सम्भव है अस्थमा या दमा नियंत्रण

यूनियन अस्थमा विभाग के प्रमुख, प्रो० नाडिया-अल- खालिद ने अस्थमा या दमा नियंत्रण कार्यक्रम की गुणवत्ता और इसके व्यापक प्रभाव के उपर विश्व के कई सारे मध्यम आय वर्ग के देशों में कई शोध करायें हैं।

करीब एक साल के व्यापक अस्थमा नियंत्रण कार्यक्रम और प्रबंधन के बाद डॉक्टर खालिद ने देखा कि अस्थमा या दमा के होने का खतरा अचानक लोंगों में कम हुआ है और अस्थमा या दमा के मरीजों की अस्पताल में जाने और भरती होने की संख्या में करीब ७० प्रतिशत की गिरावट आई है।

डॉक्टर निल्स बिल्लो, जो टी०बी० तथा फेफडे के विरुद्ध इंटरनेशनल संगठन (इस संगठन की स्थापना १९२० में टीबी के विरुद्ध लड़ने के लिए हुई थी) के महानिदेशक हैं, उनका कहना है कि "यदि हम अस्थमा या दमा नियंत्रण कार्यक्रम और इसके व्यापक प्रबंधन पर जोर दें तो अस्थमा की गंभीरता को कम किया जा सकता
है। डॉक्टर बिल्लो का यह भी कहना है कि कई सारी शोधों से यह पता चलता है कि अस्थमा पूरे विश्व में तेजी से फैल रहा है।

कम और मध्यम आय वाले देशों में अस्थमा
या दमा का प्रकोप बढ़ रहा है जहाँ पर लोगों को इसके आवश्यक उपचार मिलने की सम्भावना कम है और उपलब्ध दवाएं भी बहुत महंगी हैं।

विश्व में करीब ३० करोड़ लोग अस्थमा से पीड़ित हैं जिसमें से करीब 2५०,००० की मौत हर साल दमा या अस्थमा से हो जाती है। यद्यपि अस्थमा एक जानलेवा और पुराना रोग है, यदि हम व्यापक ध्यान दें तो इस पर आसानी से नियंत्रण पाया जा सकता है।

'यूनियन'
के फेफडे के विभाग के निदेशक डॉक्टर शियंग चेन- युवान का कहना है कि यदि हम अस्थमा या दमा के रोकने के उचित प्रबंधन और पर्याप्त उपचार पर ध्यान दे और समय से पहचान कर ले, तो अस्थमा या दमा से होने वाली मृत्यु दर को सफलतापूर्वक रोका जा सकता है।

यह संघ 'यूनियन' विश्व में अस्थमा के उपचार के लिए जागरूकता फैलाने और कार्यक्रम को सशक्त करने के लिए समर्पित है।

संघ अस्थमा नियंत्रण के लिए तकनीकि सहायता के साथ-साथ प्रशिक्षण कार्यक्रमों को भी आयोजित करता है। संघ कम तथा मध्यम आय वर्ग वाले देशों में शोध का काम भी करता है।

अनुवाद: अमित द्विवेदी

पाकिस्तान में भी 'दीदी' के लिए शोक सभा

पाकिस्तान में भी 'दीदी' के लिए शोक सभा


प्रिया मित्रों,

स्वर्गीय निर्मला देशपांडे जी ‘दीदी’ के निधन पर शोक सभा का आयोजन किया जा रहा है.

स्थान: दोराब पटेल सभागार, मानवाधिकार आयोग, पाकिस्तान

पता: १०७ – टीपू ब्लाक, लाहोर, पाकिस्तान

तिथि: ७ मई २००८

समय: ५:१५ शाम

सभी लोग सादर आमंतरित हैं.

सईदा दीप

इन्स्तितुते फॉर पास एंड सेकुलर स्टडीज

शान्ति और धर्म-निरपेक्ष अध्यन के लिए संस्थान

९१-ग

जोहर तोवं

लाहौर, पुन्जब, पाकिस्तान

फ़ोन ०४२-५२१९८६२/ ०४२-५२१९८६३

मोबाइल ०३००-८४४-५०७२

तपेदिक या टीबी समाचार सारांश: ७ मई २००८

तपेदिक या टीबी समाचार सारांश
७ मई २००८

पिछले महीनों में युगांडा में ग्लोबल फंड के पैसे को, जो एड्स, टीबी या तपेदिक और मलेरिया नियंत्रण के लिये आया था, कुछ संस्थाओं ने और व्यक्तियों की मिलीभगत से हजम कर लिया गया था। मई २००८ के प्रारम्भ में युगांडा सरकार ने यह कहा कि इन लोगों के ख़िलाफ़ कानूनी करवाई करने के लिये उसके पास धन राशी नही है। परन्तु कल ६ मई २००८ को युगांडा के एकजिले के मजिस्ट्रेट ने कहा कि वह इन लोगों के ख़िलाफ़ कानूनी करवाई करेगा और इनको गिरफ्तार भी। ऐसा शायद इसलिए भी हुआ हो क्योकि युगांडा को पुन: ग्लोबल फंड का पैसा मिल गया है।

वहीं कैलिफोर्निया में गाय-भैंस में होने वाली टीबी या तपेदिक का दर बढ़ता जा रहा है। यह भी देखने में आया है कि मनुष्यों को भी यही टीबी या तपेदिक ग्रसित कर रही है, खासकर कि हिस्पनिक लोगों को मेक्सिको से आए हैं। यह लोग इन टीबी या तपेदिक ग्रसित गाय-भैंस का कच्चा या बिना पस्तयूरिज़े किया हुआ दूध पीते हैं।

गाय-भैंस में होने वाली टीबी या तपेदिक मनुष्य को या तो पशु से सम्पर्क से या कच्चा दूध पीने से ही फैलती है। पस्तयूरिज़े दूध पीने से मनुष्य को यह टीबी या तपेदिक होने का खतरा नही होता है।

नैजेरिया में जिन लोगों को टीबी या तपेदिक है और वो एच.आई.वी से भी ग्रसित हैं, उनका दर बढ़ता जा रहा है। २५ प्रतिशत ऐसे लोगो हैं जिनको टीबी और एच.आई.वी दोनों है. यह इसलिए भी हो रहा है क्योकि अब जो लोगो एच-आई.वी की चिकित्सकिये देखभाल के लिये अस्पताल आते हैं, उनको टीबी या तपेदिक की जांच कराने के लिये प्रेरित किया जाता है। यदि उनमें सक्रिय टीबी या तपेदिक न निकले तो उनको इसोनिअजिद (INH ) ठेराप्य पर रखा जाता है, जिसके ६ माह उपरांत इनको टीबी या तपेदिक होने का खतरा नगण्य हो जाता है।

एक प्रारंभिक शोध में यह भी स्थापित हुआ है कि एयर फिल्टर इस्तेमाल करने से टीबी या तपेदिक जैसे रोगों के फैलने पर अंकुश लग सकता है। यह लाभकारी उपलब्धि होगी क्योकि इन्फेक्शन कंट्रोल या संक्रमण के नियंत्रण के लिये अस्पतालों में, और अन्य स्थानों पर जहाँ रोगी इक्काठ्ठे होते हैं, वहाँ संक्रमण को नियंत्रित करने की बहुत आवश्यकता है जिससे रोग आपस में न फैले।

अमरीका के मिन्नेसोता में गाय-भैंस में टीबी या तपेदिक नियंत्रण के लिये जो निति बनी थी, उसको कानूनी अधिनियम में परिवर्तित कर दिया गया है। अब कानूनन १५ जुलाई तक किसानों को दीद पर हस्ताक्षर करने होंगे कि यदि उनके गाय-भैंस को टीबी या तपेदिक निकली तो उन पशुओं को मार दिया जाएगा, और किसान को अमरीकी डालर ५०० हर्जाना दिया जाएगा।

विश्व दमा दिवस पर विशेष: अस्थमा या दमा नियंत्रण ज्यादातर देशों में असफल

विश्व अस्थमा या दमा दिवस

मई २००८ पर विशेष

अस्थमा या दमा नियंत्रण ज्यादातर देशों में असफल

अस्थमा या दमा नियंत्रण ज्यादातर देशों में असफल है

विश्व के लगभग ३० करोड़ लोग अस्थमा या दमा की समस्या से ग्रसित हैं! अस्थमा या दमा की बीमारी व्यक्तिगत, पारिवारिक, तथा सामुदायिक तीनो स्तरों पर लोगों को प्रभावित करती है।

विश्व स्तर पर अस्थमा या दमा की समस्या पर प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक तमाम बाधाओं और चुनौतियों के बावजूद, अस्थमा या दमा नियंत्रण के विभिन्न कार्यक्रम तेज़ी से फ़ैल रहें हैं।

अस्थमा या दमा को यदि काबू में रखा जाए, और चांद बातों पर विशेष ध्यान दिया जाए, तो नि: संदेह इसका नियंत्रण सम्भव है।

अपर्याप्त और अध-कचरे अस्थमा या दमा नियंत्रण कार्यक्रमों की वजह से लोगों की जीवन शैली भी कुंठित होती दिखाई देती है।

उदाहरण के लिए विश्व में कई छेत्रों में हर चार में से एक अस्थमा या दमा से ग्रसित बच्चा स्कूल नही जा पाता है।

इस बार के विश्व अस्थमा या दमा दिवस का विषय है "आप अस्थमा या दमा पर नियंत्रण पा सकते हैं"।

इस विचार द्वारा यह बात साफ तौर पर जाहिर होती है कि अस्थमा या दमा की सही जांच, इलाज, और नियंत्रण की विधियाँ मौजूद हैं, परन्तु आवश्यकता है कि जागरूकता बढे जिससे कि प्रभावकारी अस्थमा या दमा नियंत्रण के कार्यक्रम सफल हो सके।

अस्थमा नियंत्रण और प्रबंधन की विश्व स्तर पर निति २००७ के मुताबिक अस्थमा या दमा नियंत्रण का मतलब है कि:

- अस्थमा या दमा का कोई लक्षण हो और व्यक्ति को अस्थमा या दमा के कारण रात में टहलना पड़े

- अस्थमा राहत दवा या 'इन्हैलर' का उपयोग न करना पड़े (या न्यूनतम आवश्यकता हो)

- व्यक्ति सामान्य शारीरिक काम कर सकता हो।


- व्यक्ति को अस्थमा या दमा के दौरे बिल्कुल पड़े या बहुत ही कम पड़े

कुछ लोग जो की अस्थमा से ग्रसित हैं उन लोगों ने कभी भी पर्याप्त अस्थमा की जांच नही करवाई है, इस वजह से उनमें अस्थमा के उपचार और उचित नियंत्रण होने की सम्भावना कम हो जाती है। अस्थमा या दमा के पर्याप्त और सही समय पर जांच न हो पाने की कई सारी वजह हैं। जैसे कि मरीजों में इसके बारे में पर्याप्त जानकारी न होना, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं द्वारा सही समय पर इसकी पहचान न कर पाना और चिकित्सा व्यवस्था तक लोगों की व्यापक पहुँच न हो पाना इत्यादि

विश्व के कई सारे देशों जैसे कि मध्य पूर्वी एशिया (गल्फ देशों में), मध्य अमरीका, दक्षिण एशिया, उत्तर पश्चिम और पूर्वी अफ्रीका इत्यादि में दमा के लिए आवश्यक दवाओं की उपलब्धता न होने के कारण स्थिति और भी अधिक गंभीर बन जाती है।

विश्व के कई देशों में जो लोग अस्थमा या दमा से ग्रसित है, उनमें वातावरण में व्याप्त प्रदुषण के कारण अस्थमा या दमा अधिक बिगड़ सकता है।

यदि हम अस्थमा नियंत्रण को प्रभावी बनाना चाहतें हैं तो हम सभी को इसकी प्रभावकारी नियंत्रण के लिए व्यापक नीतियाँ बनानी होगी और उस पर अमल भी करना होगा।

(अनुवाद: अमित द्विवेदी)

भोपाल में यूनियन कार्बाइड कांड से प्रभावित ४० लोग दिल्ली में गिरफ्तार

प्रिये मित्रों,
लगभग ७० भोपाली लोगों को जिनमें बच्चे शामिल हैं, प्रधान मंत्री के घर के सामने से शांतिप्रिय ढंग से प्रदर्शन करने पर गिरफ्तार कर लिया गया है। आशा है कि उनको शीघ्र ही छोड़ दिया जाएगा, परन्तु बेहतर होगा यदि आप लोग पोलिस स्टेशन फ़ोन कर के शंतिप्रिये प्रदर्शनकारियों को रिहा करने का दबाव बनाने में मदद करें:-

इन लोगों को चाणक्यपुरी पोलिस स्टेशन में रखा गया है

वहाँ के अस.एच.ओ का नाम जगत सिंह है, जिसका मोबाइल फ़ोन नम्बर है: +९१ ९८१०५ ६८६२४ और पोलिस स्टेशन का नम्बर है +९१ (०११) २३०१११०० या २३०१२००३
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भोपाल
गैस पीड़ित महिला स्ताशनेरी कर्मचारी संघ

भोपाल गैस पीड़ित महिला पुरूष संघर्ष मोर्चा

से अधिक भोपाली बच्चों को जो यूनियन कार्बाइड कांड से प्रभावित लोगों की अगली पीढ़ी हैं, उनके परिवार वालों के साथ प्रधान मंत्री के घर के सामने से गिरफ्तार कर लिया गया है। गिरफ्तारी से पहले इन लोगों ने प्रधान मंत्री के निवास के बाहर प्रेस वार्ता भी संबोधित की।

इन लोगों का कहना है कि सरकार को शरम आनी चाहिए कि भोपाल के यूनियन कार्बाइड कांड से पीड़ित लोगों को न्याय के लिए प्रधान मंत्री के दिल्ली के निवास तक चल के आना पड़ता है। न तो इन लोगों को पर्याप्त स्वास्थ्य सेवा का लाभ मिला है, न भोजन का अधिकार, न रोज़गार का अधिकार और न ही स्वच्छ वातावरण जिसमे वह स्वास्थ्य रूप से पल-फूल सके।

अधिक जानकारी के लिए सम्पर्क करें:

नित्यानंद जयरमन - ९७१७५ १६००३
रचना धिन्ग्र - ९७१७५ १६००५

वेबसाइट: www.bhopal.net

तपेदिक या टीबी समाचार: ५ मई २००८

तपेदिक या टीबी समाचार
मई २००८

अमरीका के फ्लोरिडा प्रदेश में जो टीबी या तपेदिक का अस्पताल बंद होने के कगार पर था, उसको पिछले हफ्ते प्रदेश बजट में से साल भर सक्रिए रहने के लिये पैसा मिल गया था। यह अमरीका का एकमात्र टीबी अस्पताल है।

परन्तु यह ख़बर अधूरी थी - इस अस्पताल को निजी हाथों के सुपुर्द किया जा रहा है और इस टीबी या तपेदिक अस्पताल को तोड़ कर नया अस्पताल बनाने में वर्ष लगेगा, जिसके लिये धनराशी बजट में से दी जा रही है।

इसको तोड़ कर यहाँ बहु-खंदिया इमारत बनेगी जिसमे हर प्रकार के चिकित्सकिये विशेषज्ञ उपलब्ध होंगे।

अमरीका में टीबी या तपेदिक फिर से चुनौती दे रहा है, और ऐसी हालत में देश के एकमात्र टीबी अस्पताल को बंद कर देना कहाँ तक समझदारी है, पता नही!

पोष्टिक भोजन से टीबी या तपेदिक पुन: होने का खतरा कम हो जाता है, और यदि पोषण पर ध्यान दिया जाए, तो टीबी या तपेदिक के इलाज के बाद भी पुन: संक्रमण होने का खतरा बढ़ा रहता है। ऐसा एक और शोध ने स्थापित किया है। टीबी या तपेदिक में शरीर की प्रतिरोधक छमता पहले से ही कम होती है, उस पर पोषण पर ध्यान देने से शरीर की प्रतिरोधक छमता और भी शीन हो जाती है। लाज़मी है कि बीमारी में, विशेषकर कि टीबी या तपेदिक के इलाज के वक्त पोषण पर विशेष ध्यान देना चाहिए।यदि पैसे के आभाव में ये सम्भव हो तो सरकार को टीबी या तपेदिक नियंत्रण को सफल करने के लिये भोजन उपलब्ध कराना चाहिए।

फरवरी २००८ में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एंटी-तुबेर्चुलोसिस ड्रग रेसिस्तंस इन द वर्ल्ड रपट में यह स्थापित किया था कि दुनिया में सबसे अधिक ड्रग रेसिस्तंत तपेदिक या टीबी पश्चिम एशिया के देश अज़रबैजान में पायी जाती है। अज़रबैजान की सरकार ने इसका खंडन किया है। अज़रबैजान सरकार ने नए आक्डें विश्व स्वास्थ्य संगठन को पेश किए हैं और विश्व स्वास्थ्य संगठन के सहायक महा-निदेशक ने आश्वासन दिया है कि चौथी रपट में इन आकड़ों को ध्यान में रखा जाएगा।

छठे क्लास के बच्चों को तम्बाकू सेवन क्यो ‘कूल’ लगता है?

छठे क्लास के बच्चों को तम्बाकू सेवन क्यो ‘कूल’ लगता है?

तम्बाकू के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष विज्ञापनों के वजह से ही आज यह हालत है कि भारत में ११ साल के बच्चे तक तम्बाकू का सेवन कर रहे हैं! टैक्सस विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ़ पब्लिक हैल्थ के द्वारा भारत में किए शोध में ऐसे चौकाने वाले आकडे निकल के आए हैं.

यह शोध ‘Associations Between Tobacco Marketing and Use Among Urban Youth In India', अमेरिकन जर्नल ऑफ़ हैल्थ बेहविऔर् के मई/ जून २००८ के अंक में प्रकाशित हुआ है.

तम्बाकू के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष विज्ञापनों की वजह से ही शहरों में रहने वाले युवाओं में तम्बाकू सेवन बढ़ रहा है, यह इस शोध से प्रमाणित होता है.

इस शोध के अनुसार भारत में छठी क्लास में पढने वाले छात्रों में तम्बाकू सेवन सबसे अधिक पाया गया था. आठवीं क्लास के छात्रों की तुलना में छठी क्लास के छात्रों में तम्बाकू सेवन तीन गुणा अधिक पाया गया!

‘जैसे जैसे भारत अधिक विकसित होता जाएगा, युवाओं में तम्बाकू सेवन भी बढ़ता जाएगा” इस शोध के प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेस्सर चेरय्ल पेरी का कहना है.

“छठी क्लास के छात्रों को तम्बाकू सेवन ‘कूल’ या बढ़िया लगता है, और आठवीं क्लास के छात्रों को छठी क्लास के छात्रों की तुलना में उतना ‘कूल’ इसलिए नही लगता क्योकि छठी क्लास के छात्र भारत में तेज़ी से होते हुए विकास के साथ जो नए विज्ञापन आदि के तरीके आ रहे हैं, उनसे अधिक रूबरू हैं”.

उदाहरण के तौर पर जो लोग १० साल पहले छठी क्लास में थे, उनको आज के छठी क्लास के छात्रों की तुलना में तम्बाकू सेवन बहुत कम ‘कूल’ लगेगा क्योकि १० साल पहले जो विज्ञापन आदि थे और आज जो हैं, उनमें बहुत अन्तर है.

“भारत में यह पहली study है जो तम्बाकू विज्ञापनों और युवाओं में तम्बाकू सेवन के बीच डोस-रेस्पोंस या सीधा स्पष्ट सम्बन्ध स्थापित करती है. इससे यह साफ जाहिर है कि उचित नीतियों की और युवाओं में तम्बाकू सेवन को कम करने के लिए प्रभावकारी कार्यक्रमों की आवश्यकता है” कहना है डॉ मेलिसा स्तिग्लेर का, जो इस शोध में प्रोफेस्सर चेरय्ल के साथ सह-लेखिका भी हैं.

३१ मई २००८ को विश्व तम्बाकू निषेध दिवस 'तम्बाकू-मुक्त युवा' के विचार पर ही केंद्रित है।

तपेदिक या टीबी समाचार: ३ मई २००८

तपेदिक या टीबी समाचार
३ मई २००८

इंग्लैंड में गनीमत है कि शोधकर्ताओं ने यह कबूला है कि यदि इंग्लैंड देश में प्रभावकारी टीबी नियंत्रण करना है तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर टीबी नियंत्रण को प्रभावकारी करना होगा।

क्योकि टीबी ऐसा संक्रमण है जो एक देश, शहर या कसबे या घर में नियंत्रित नही किया जा सकता। यदि प्रभावकारी टीबी नियंत्रण करना है तो सबको एकजुट हो कर टीबी नियंत्रित करने में शामिल होनाचाहिए।

इंग्लैंड में केवल मालती-ड्रग रेसिस्तंत टीबी बढ़ रही है बल्कि एक्स्तेंसिवली ड्रग रेसिस्तंत टीबी भीबढोतरी की ओर है। नए शोध के आधार पर यह तथ्य सामने आया है कि इंग्लैंड के नए टीबी रोगियों में से लगभग प्रतिशत पहले से ही कम-से-कम एक टीबी की दवा से रेसिस्तंत होते हैं।

वहीं अमरीका के फ्लोरिडा प्रदेश में कुछ दिन पहले यह विवाद चल रहा था कि वहाँ का एकमात्र टीबीअस्पताल बंद होने को था, अब अगले सप्ताह पेश होने वाला बजट फ्लोरिडा प्रदेश के लिये खट्टी-मीठी ख़बर ले के आया है - इस बजट में अमरीकी डालर ११ मिलियुन इस अस्पताल को प्रदान करने का प्रस्ताव है।

अफ्रीका के युगांडा देश में ग्लोबल फंड के पैसे को भ्रष्टाचार के कारण एड्स, टीबी या मलेरिया के कार्यक्रमों पर खर्च करने के बजाय कुछ सामाजिक संगठनों और व्यक्तियों ने धांधली से पैसा हड़प लिया था। अबयुगांडा का कहना है कि युगांडा सरकार के पास इतना पैसा है ही नही कि वह एन सामाजिक संगठनोंऔर व्यक्तियों के विरोध में कानूनी करवाई कर सके! यानि कि धांधली से जो ग्लोबल फंड का पैसा हड़पा है वह हजम?

मई माह के पहले मंगलवार को हर वर्ष विश्व दमा दिवस (World Asthma Day) मानते हैं। इस वर्ष विश्व दमा दिवस मई को पड़ रहा है। विश्व दमा दिवस Global Initiative for Asthma के संयोजन से मनाया जाता है।

भारत के चार शहरों में निकोटिन स्तर मापने के लिए यंत्र लगेंगे

भारत के चार शहरों में निकोटिन स्तर मापने के लिए यंत्र लगेंगे

सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर रोक लगाने के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने सार्वजनिक स्थानों पर निकोटिन मापने के लिए यंत्रों को लगाने का निर्णय लिया है.

तम्बाकू उत्पादनों में निकोटिन पदार्थ पाया जाता है जिसके कारणवश लोगों को तम्बाकू का नशा हो जाता है.

जिन जगहों पर, विशेषकर कि भवनों में, जहाँ निकोटिन की मात्रा अधिक पायी जायेगी, उन पर भारत के सिगरेट एवं अन्य तम्बाकू उत्पादन अधिनियम (२००३) (The Cigarettes and Other Tobaccoproducts Act २००३) के उलंघन के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा और उचित कानूनी करवाई होगी.

विश्व-प्रसिद्ध जॉन होप्किंस विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ भारत के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मत्रालय को इन निकोटिन-मापक यंत्रों को स्थापित करने में मदद कर रहे हैं.

भारत के चार शहरों में, जिनमें दिल्ली, अहमदाबाद, चंडीगढ़ और चेन्नई शामिल हैं, ये यन्त्र लगाये जा रहे हैं. इन शहरों के अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है कि कैसे निकोटिन की मात्र मापी जायेगी और रपट की जायेगी.

इन चारों शहरों में से हर शहर को १६० ऐसे निकोटिन मापने के यंत्र मिले हैं.

जो आक्डें इन यंत्रों द्वारा प्राप्त होंगे, उनको जॉन होप्किंस विश्वविद्यालय भी भेजा जाएगा. इन चारों शहरों में प्रति शहर ऐसी प्रयोगशालाओं को प्रशिक्षित किया जाएगा जहाँ इन आक्डों का विश्लेषण हो सके.

ऐसा भारत में पहली बार हो रहा है कि शहरों को धूम्रपान रहित बनाने के लिए, निकोटिन यंत्रों का इस्तिमाल किया जा रहा है.

यह ब्लूमबर्ग के आर्थिक सहयोग से सम्भव हो पाया है.

तपेदिक या टीबी समाचार: २ मई २००८

तपेदिक या टीबी समाचार
मई २००८

कैरिबियन द्वीपों में त्रिनिदाद और टोबागो नमक देश के विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसा नही है कि शोषण और बीमारियाँ एच.आई.वी के बाद दुनिया में आए हैं और लोगों को अब चेतने की आवश्यकता है। एच.आई.वी के पहले भी, सदियों पहले भी, रोगों से संबंधित शोषण होता रहा है और बीमारियों को नियंत्रित करने के लिए समाज ने चुनौती का सामना किया है।

विशेषज्ञों
ने कहा कि सदियों पहले सिफिलिस (syphilis) या गोनोरेया (gonorrhea) से अत्यधिक शोषण और बहिष्कार जुडा हुआ था। जिसको यह यौन रोग हो जाए उसको अति बहिष्कार और शरम से जूझना पड़ता था। लोगों को आत्म-ग्लानी से आत्महत्या तक करनी पड़ती थी। परन्तु फ्रांस में यह कहा जाता था कि यदि राज-घराने के लोगों को syphilis या गोनोरेया न हो तो वह "'राज' घराने में पैदा नही हुए हैं" क्योकि इन यौन रोगों को पुरूष की यौन शक्ति और अनेकों लोगों से यौन सम्बन्ध कायम करने का हस्ताक्षर माना जाता था। परन्तु फ्रांस के बाहर लगभग हर देश में यौन रोगों से शोषण, बहिष्कार और शरम जुड़ी रही है, और काफी हद तक आज भी जुड़ी हुई है।

टीबी या तपेदिक से भी शोषण और बहिष्कार जुडा रहा है। कुष्ठ रोग से भी शोषण और बहिष्कार जुडा रहा है। जिन लोग एच.आई.वी के साथ जीवित हैं उनमें तपेदिक या टीबी की जांच करना भी समस्या है क्योकि इनमें अधिकांश सीने से बाहर वाली टीबी या तपेदिक होती है (एक्स्ट्रा-पुल्मोनारी टीबी)। त्रिनिदाद और टोबागो के एक विशेषज्ञ बताते है कि एक एच.आई.वी से संक्रमित व्यक्ति जिसको सिर्फ़ बुखार था, उसमे टीबी या तपेदिक की जांच करने पर भी टीबी का पता नही चल पा रहा था। एक्स-रे करने पर भी टीबी या तपेदिक का कोई पता नही था। जब इस व्यक्ति की हड्डी के 'मैरो' की बैओपसी द्वारा जांच की गई तब जा के टीबी या तपेदिक का ज्ञान हुआ। जिन लोग एच.आई.वी के साथ संक्रमित हैं, उनमें टीबी या तपेदिक की जांच के लिए नए वैकल्पिक जांच के यंत्रों की आवश्यकता है, कहना है विशेषज्ञों का।

कुवैत में कच्चा दूध प्रतिबंधित कर दिया गया है क्योकि गाय-भैसों में होने वाली टीबी या तपेदिक से लोगों में टीबी या तपेदिक फ़ैल रही थी। यदि गाय-भैसों को टीबी या तपेदिक हो तो कच्चा दूध पीने से या जानवर के सम्पर्क में आने से मनुष्य को टीबी या तपेदिक फ़ैल सकती है। यदि इस दूध को पस्तयूरैज़ कर दिया जाए तो टीबी या तपेदिक फैलने का खतरा नगण्य हो जाता है।
कुवैत में जिस भी गाय भैस को टीबी या तपेदिक निकल रही है उसको मार दिया जा रहा है जिससे कि टीबी या तपेदिक नियंत्रण प्रभावकारी हो सके।

'मेरा आखरी गीत'

'मेरा आखरी गीत'

'मेरा आखरी गीत' वित्रचित्र हेमंत गोस्वामी और बर्निंग ब्रेन सोसिएटी के संयुक्त प्रयासों द्वारा बनाया गया है जो बाबुलाल के आखरी गीत से प्रेरित है - इस गीत के बाद बाबु लाल के गले में जो ध्वनि यंत्र है उसको कैंसर की वजह से आपरेशन करके निकाल दिया गया था. इसके फलस्वरूप, बाबु लाल अब कभी अपनी प्राकृतिक आवाज़ में नही गा सकता.

जब बाबु लाल जवान था, तो अन्य नौजवानों को तम्बाकू सेवन करते हुए देख के बाबु लाल ने भी तम्बाकू का सेवन आरंभ कर दिया. बाबु लाल बीडी पीता था.

लगभग २० साल तक बीडी पीने के पश्चात् बाबु लाल के गले में ध्वनि यन्त्र का कैंसर हो गया, जिसको आपरेशन कर के निकलना पड़ा.

इस वित्रचित्र को देखने के लिए यहाँ क्लिक्क करें:



निर्मला देशपांडे जी नहीं रहीं

निर्मला देशपांडे जी नहीं रहीं

वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता, राज्य सभा की सदस्य, और गाँधीवादी विचारों की धारक निर्मला देशपांडे अब इस दुनिया में नही रहीं।

७९ साल के उम्र में १ मई २००८ को सुबह उनका देहांत हो गया। निर्मला जी जिनको लोग प्रेम और सम्मान से दीदी कहते थे, पिछले कुछ दिनों से बीमार थी परन्तु संसद नियम से जा रही थी और मंगलवार २९ अप्रैल २००८ को धनबाद से लौटी थीं।

राजश्री, जो दीदी के काफी करीब थीं, उनका कहना है कि दीदी की मृत्यु नींद में ही हो गई। मंगलवार को उन्होंने पेट की कुछ समस्याओं का जिक्र किया था और शाम से उनको बुखार भी था।

दीदी को २००६ में पदमभूषण से नवाजा गया था।

१७ अक्टूबर १९२९ को नागपुर में उनका जनम हुआ था, और वो १९५२ में विनोबा भावे के भूदान आन्दोलन से जुड़ी हुई थी। भूदान आन्दोलन में दीदी ने ४०,००० किलो मीटर की पदयात्रा पूरी की थी।

दीदी ने कई प्रमुख किताबें लिखी थी जिनमें विनोबा के साथ, क्रांति की राह पर, चिन्ग्लिंग, सीमांत, और विनोबा शामिल हैं।

दीदी के पार्थिव शरीर का क्रियाक्रम शुक्रवार को सुबह किया जाएगा (२ मई २००८).