'ओज़ोन' और हमारी प्रतिबधतायें

विश्व 'ओज़ोन' दिवस पर विशेष
(१६
सितम्बर
)

'ओज़ोन' और हमारी प्रतिबधतायें

वसु शेन मिश्रा

प्रत्येक वर्ष की ही भांति इस वर्ष भी समस्त संसार १६ सितम्बर को विश्व ओज़ोन दिवस के रूप में समस्त संसार मना रहा है. यह दिवस वास्तव में प्रथ्वी पर सूर्य की हानिकारक पैराबैगनी किरणों के प्रकाश से धरती की रक्षाकरने वाली ओज़ोन परत को बचानें हेतु अपनी प्रतिबधता को दोहराने के प्रयास के रूप में प्रतिवर्ष जाता हैं। आईये प्रथ्वी पर पैराबैगनी किरणों के कुप्रभाव तथा 'ओज़ोन' परत की जीवनदायनी शक्ति को नज़दीक से समझते हैं, तभी हम इस दिन की महत्ता को समझ सकेंगे।

हमारी प्रथ्वी पर जीवन सूर्य द्वारा उपलब्ध करायी ऊर्जा पर ही निर्भर है। यदि सूर्य द्वारा प्रथ्वी को उपलब्ध ऊर्जा को १०० प्रतिशत मान लें तो सौर्य ऊर्जा का अव्शूशन तथा परावर्तन का समीकरण कुछ इस प्रकार होगा:-

प्रथ्वी पर सूर्य द्वारा प्राप्त कुल उर्जा = १००%

प्रथ्वी के वायुमंडल में उपस्थित बादलों, तथा धूल के kadon
द्वारा परावर्तित भाग = ३५%
बचा भाग = ६५% (१००%-35%)
इसमें से १४% का अवशोषण 'ओज़ोन' परत द्वारा किया जाता हैं।

यह अवशोषण 'ओज़ोन' परत द्वारा किया जाता हैं।यह अवशोषण कम भेदन क्षमता
वाली हानिकारक पैराबैगनीकिरणों का होता है, जो यदि पृथ्वी पर पहुँच जायें तो 'कैंसर' जैसी घातक बीमारियाँ बन सकती हैं।

बचा भाग :-६५%-१४%=५१%
सूर्य द्वारा
प्रदान की गयी कुल ऊर्जा का यह ५१ % भाग ही वास्तव में प्रभावी रूप से प्रथ्वी को प्राप्त होता हैं।

इस ५१% में से ३४% भाग प्रत्यक्ष सौर्य विकीरण के रूप में तथा १७% भाग पार्थिव विकीरण के रूप में प्रथ्वी से बाहर चला जाता हैं।


'ओज़ोन' छिद्र की मोटाई में कमी (जो १९५६ की ३२५ 'डोकसन' की सीमा से १९९४ में मात्रा ९४ 'डोकसन' ९४ डोकसन ही रह गयी तथा और ह्रास जारी है।) अथवा वायुमंडल में उपस्थित ऐसी गैसों की अत्याधिक उपस्थिति, जो वायुमंडल में अप्राकृतिक तथा घनत्व में अधिक, बादलों का निर्माण करती है;
पैराबैगनी किरणों के ज़्यादा प्रवेश तथा ज़्यादा समय तक उपस्थिति का कारण बनती हैं. इसी के कारण अप्रत्यक्ष रूप से प्रथ्वी के तापमान में वृद्धि होती है; जो प्रथ्वी पर विभिन्न प्रकार की आपदाओं का कारण बनती हैं।(उदाहरणस्वरुप:-असमय वर्षा, बाढ़, सूखा,'कैंसर' जनित रोग आदि।)

जो गैस प्रभावी रूप से पृथ्वी के तापमान को अप्रत्यक्ष रूप से तापमान को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाने में ठाठ ओज़ोन की जीवनदायनी परत को हानि पहुचने में सहायक होती है। उन्हें 'ग्रीनहाउस' गैसें कहा जाता है। ६ गैसों को मुख्यतय: 'ग्रीनहाउस' गैस कहा जाता है , मीथेन, सल्फरहेक्साफ्लोराइड,परफ्लोरोकार्बन, आदि।
इनका नाम ग्रीनहाउस गैसेस इसलिए पड़ा क्यूँकि वैज्ञानिकों ने प्रयोग कर कांच से घिरी, एक कृत्रिम बाग़ का निर्माण कर उसमें अन्दर आती हुई सूर्य की किरणों को बाहर जाने से रोका, जो इन गैसों के निर्माण में सहायक हुआ तथा इसने ठंडी स्थानों पर गर्म छेत्र (कृत्रिम रूप से) की स्थिति पैदा कर गर्म स्थलों के पौधे यहां उपजयाने की स्थिति पैदा की। अतः छोटे पैमाने पर जहाँ मानव का यह कृत्रिम निर्माण उसके लिए सहायक लगता है, परन्तु यह ही स्थिति जब संपूर्ण पृथ्वी पर पड़ती है, तो अभूतपूर्व गरमी तथा इसके चलती असीमित विपदाएं आती
हैं।

क्लोरो-फ्लोरो कार्बन (सी.अफ.सी) आदि इन गैसों का उपयोग 'फ्रिजों' में ,ओप्टिकल फाइबर आदि में होता है । आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि 'ओजोन परत' में कमी अथवा ओजोन छिद्र ,जो आज फुटबॉल के स्टेडियम जितना बड़ा है , का निर्माण हमारी ध्रुवों पर हुआ है जहाँ औद्योगिक गतिविधियाँ न्यूनतम हैं.इसका कारण है -ध्रुवी संताप मंडल बादल कम तापमान पर(जो ध्रुवों पर होता है) क्लोरीन को सुअतंत्र क्रिया करने के लिए सतह प्रदान करती है तथा सूर्य की रौशनी की उपस्थिति में 'अंतर्तिका'में बसंत के आगमान पर बर्फ जमने के समय क्लोरीन (जो सी.अफ.सी. में उपस्थित है) ओजोन आडुओं पर आक्रमण कर उन्हें नष्ट कर देते है.अतः हमारे 'ग्लेशियर' क्यों तीव्रता से पिघल रही हैं,समझ में आया होगा।

आई.पी.सी.सी (या इंटर गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेन्ज') की वर्त्तमान रिपोर्ट के अनुसार पृथ्वी का तापमान पिछले १०० वर्षों में ०.७४% तक बढ़ा है.इसके प्रभाव विनाशक होंगे,:-

* समुद्र स्तर में अप्रत्याशित बढोतिरी।(अतः इंग्लैंड जैसी तटीय देश जलमग्न हो सकते हैं)

* भारत जैसे देश में 'ग्लेशियर' (हिमाद्री आदि) पिघलने पर पहले बाढ़ का खतरा फिर सूखे की विभीषिका से सामना हो सकता है.

तो समझे, उत्तर भारत में वर्ष २००८ में जल्द मानसून आना कोई हर्ष का विषय नहीं था अपितु चेतावनी थी.


अब हमारी प्रतिबधता की भी बात कर लें। अमेरिका जो विश्व के नेता होने का दंभ भरता है,वास्तव में इन विनाशकारी गैसों का सबसे बड़ा उत्सर्जनकर्ता है। और तो और 'क्योटो प्रोटोकॉल' जो एक बाध्यकारी संधि है (ग्रीनहाउस गैसों को कम करने के सम्बन्ध में) अमेरिका ने उस पर अभी तक हस्ताक्षर नहीं किए हैं। यह सन्दर्भ हमारी मानसिकता को झंझोर देने हेतु पर्याप्त होने चाहिए कि "सतत विकास" का विरोधी विश्व नेता कदापि नहीं हो सकता.


विकट समस्या से निपटने हेतु अभी!! और अभी!!कदम उठाने की आवश्यकता है। कुछ उपयोगी कदम इस प्रकार है:-

१)वृक्षों को बचाना होगा जो कार्बन-डी-ऑक्साइड जैसे गैसों को नियंत्रित करते है.
२) जीवन शैली में परिवर्तन लाना होगा.(जैसे:-कम ऊर्जा के दोहन का सतत प्रयास)
३) प्रकृति से धनात्मक सम्बन्ध रखने वाली तकनीकों का उपयोग. जैसे:- जैविक खाद का प्रयोग, कृत्रिम खाद के स्थान पर.
४) कार्बन ट्रेडिंग को विभिन्न देशों द्वारा अपनाए जाने की प्रक्रिया में तेज़ी लाना.
५) जलवायु को बेहतर बनने की तकनीकों का वैश्वीकरण.

सही वक्त है चिपको आन्दोलन जैसे आंदोलनों को पुनर्जीवित करने का,अन्यथा,हमारा अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा.

अतः विश्व 'ओज़ोन' दिवस के दिन हमारी प्रतिबधता मात्रा इस दिन तक की संवेदनशीलता तक ही सीमित नहीं रह जानी चाहिए आपितु प्रत्येक साँस के साथ हमें पृथ्वी को बचाने हेतु कार्य करना होगा। नहीं तो यह आने वाला विध्वंस मानव-जनित होगा ,प्राकृतिक नहीं।


वसु शेन मिश्रा

लेखक, लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त, स्थायी विकास के लिए समर्पित युवा कार्यकर्ता हैं, और सिटिज़न न्यूज़ सर्विस के संवाददाता भीसंपर्क
ईमेल: vasusmisra@yahoo.co.in

तम्बाकू नियंत्रण एक गंभीर चुनौती


तम्बाकू नियंत्रण एक गंभीर चुनौती

इसमें कोई दो राए नहीं है की सरकार ने तम्बाकू नियंत्रण को प्रभावकारी बनाने में विभिन्न प्रकार के प्रयास किए हैं। जिसके तहत सरकार ने न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि वैश्विक स्तर पर बनी तम्बाकू नियंत्रण संधि को प्रभावकारी बनाने की दिशा में भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। किंतु वैश्विक स्तर पर इतने प्रयासों के बावजूद भी तम्बाकू उत्पादों के प्रयोग में पिछले ५ सालों में वृद्धि देखि गई है। आख़िर इतने सारे प्रयासों के बावजूद तम्बाकू का प्रयोग इतना क्यो बढ़ता जा रहा है? इस सम्बन्ध में जिला तम्बाकू नियंत्रण सेल, लखनऊ के नोडल अधिकारी तथा बलरामपुर चिकित्सालय के मुख्य चिकित्सा अधिकारी श्री आर0 बी० अगरवाल का कहना है की "जबरदस्ती किसी को भी तम्बाकू का प्रयोग करने से नहीं रोका जा सकता, इसके लिए व्यक्ति को तम्बाकू के कुप्रभावों के बारे में संवेदनशील करना जरूरी है। उनका आगे कहना है की यद्यपी की सरकार ने प्रदेश और जिले स्तर पर तम्बाकू नियंत्रण सेल का गठन कर दिया है किंतु इस सेल को जिम्मेदारी और जबाबदेही के साथ काम करने की जरूरत है"।

तम्बाकू नियंत्रण सेल से हो सकता है की तम्बाकू उत्पाद अधिनियम को प्रभावी बनाने में मदद मिले किंतु वह लोग जो तम्बाकू से छुटकारा पाना चाहते हैं क्या उनके पहुँच में आसानी से कोई तम्बाकू नशा उन्मूलन केन्द्र की सुविधा उपलब्ध है। इस सम्बन्ध में पूछने पर तम्बाकू नशा उन्मूलन केन्द्र के प्रमुख प्रोफ़ेसर, डाक्टर रमाकांत का कहना है की "तम्बाकू नशा उन्मूलन केन्द्र ऐसे लोगों के लिए जो तम्बाकू प्रयोग से निजात पाना चाहतें हैं काफी लाभकारी होगी इसके लिए सरकार को प्रत्येक जिले के जिला चिकित्सालय और प्राथमिक स्वास्थय केन्द्रों पर कार्यरत चिकित्सकों को प्रशिक्षण दिए जाने की जरूरत है, जिसको बिना किसी अधिक अतिरिक्त आर्थिक सहायता से भी प्रभावकारी बनाया जा सकता है"। भारत में तम्बाकू उपभोग को रोकना एक गंभीर चुनौती है।

भारत के स्वास्थय और परिवार कल्याण मंत्री अंबुमणि रामदोस का कहना है २ अक्टूबर से भारत के समस्त सार्वजानिक स्थानों पर धुम्रपान प्रतिबंधित हो जायेंगे। क्या वास्तव में ऐसा हो पायेगा यह कहना शायद थोड़ा मुश्किल है। इस सम्बन्ध में उत्तर प्रदेश के चिकित्सा सेवा निदेशक, श्री प्यारे मोहन का कहना है की " सिर्फ़ अधिनियमों मात्र से ही सार्वजानिक स्थानों पर धुम्रपान को प्रतिबंधित नही किया जा सकता है इसके लिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति को जिम्मेदारी लेनी होगी और ऐसे लोगों को स्वस्थ्य समाज के प्रति जिम्मेदार करना होगा जो सार्वजानिक स्थानों पर धुम्रपान करते हैं और न केवल अपने स्वाय्थ्य को बल्कि दुसरे के स्वास्थय को भी नुक्सान पहुंचाते हैं। उत्तर प्रदेश देश का सबसे ज्यादा जनसँख्या वाला प्रदेश होने के वजह से यहाँ तम्बाकू द्वारा प्रभावित लोगों की संख्या काफी अधिक हो सकती हैं"। वैश्विक स्तर पर धुम्रपान को रोकने की लिए हमें न केवल तम्बाकू कंपनियों पर प्रतिबन्ध लगाने की जरूरत है बल्कि तम्बाकू नियंत्रण के लिए बनी वश्विक संधि और रास्ट्रीय स्तर पर बने अधिनियमों को भी प्रभावकारी करने की जरूरत है।

कई सारे शोधों के मुताबिक तम्बाकू उत्पादों पर लिखी वैधानिक चेतावनियाँ लोगों में तम्बाकू प्रयोग के अनुपात को कम कर सकती हैं। इसलिए तम्बाकू कम्पनियाँ ख़ुद तम्बाकू नियंत्रण की एक प्रभावकारी माध्यम हैं यदि वह अपने तम्बाकू उत्पाद के पैकेटों पर फोटो वाली चेतावनी और वैधानिक चेतावनी को सही तरीके से लगाते हैं।भारत में प्रतिदिन करीब ५,५०० नये युवा तम्बाकू का प्रयोग करते हैं और १५ साल से कम उम्र के करीब ४० लाख युवा तम्बाकू के उपभोगता हैं।

युवावों में तम्बाकू के बढ़ते चलन को लेकर भारत के स्वास्थय मंत्री श्री अम्बुमणि रामदोस ने भी अपनी चिंता जताई है। एक शोध के मुताबिक भारत में हर साल करीब १० लाख लोगों की मौत तम्बाकू द्वारा होने वाले रोगों से होती है, जिसमें से ७० प्रतिशत लोगों की मौत ३० से ६९ साल तक के उम्र की होती है। किसी भी देश के लिए इस उम्र के लोग सबसे ज्यादा उत्पादक माने जाते हैं।

अतः व्यापक स्तर पर तम्बाकू के प्रयोग और इसके कुप्रभावों को रोकने के लिए हमें सामूहिक तौर पर न केवल जिम्मेदारी लेन होगी बल्कि जिम्मेदार भी बनाना होगा। सिर्फ़ अधिनियमों को बना देने मात्र से ही इस महामारी पर नियंत्रण नहीं पाया जा सकता है।


अमित द्विवेदी
लेखक सिटिज़न न्यूज़ सर्विस के विशेष संवाददाता हैं।

नो स्मोकिंग के नियम से परेशान हैं पब मालिक


नो स्मोकिंग के नियम से परेशान हैं पब मालिक

निजी व सार्वजनिक इमारतों में 2 अक्टूबर से स्मोकिंग पर प्रतिबंध लगाने के स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदॉस के फैसले को लागू करने के लिए कई कंपनियां तैयार हैं। हालांकि उनका कहना है कि इसके लिए उन्हें काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। पब और रेस्तरां मालिक रामदॉस के इस निर्णय से परेशान हैं। वे भी मजबूरी में इस निर्णय को मानने की बात तो कह रहे हैं लेकिन उन्हें अपनी धंधे की फिक्र सता रही है।

अपने परिसर में पहले से ही स्मोकिंग पर बैन लगा चुके कुछ कॉरपोरेट हाउस और बीपीओ नए नियम को सही कदम मान रहे हैं। जेनपेक्ट के वाइस प्रेजिडंट विभु नारायण का कहना है कि हम नियमों को लागू करेंगे। स्मोकर्स को बाहर जाकर सिगरेट पीनी होगी। क्वाटरो बीपीओ सॉल्यूशंस के सीईओ रमन रॉय कहते हैं कि इस निर्णय से स्मोकर्स के लिए काफी मुश्किल हो जाएगी। लोग इसकी काफी शिकायत भी कर रहे हैं। हालांकि एक बार जब नियम लागू हो जाता है तो उसका पालन भी करना पड़ता है। नए नियम के तहत यह प्रावधान है कि यदि कोई भी कर्मचारी परिसर में स्मोकिंग करता हुआ पाया जाता है तो कंपनी को प्रति स्मोकर 5 हजार रुपये जुर्माना देना होगा।

हालांकि सरकार के पास इस निर्णय को लागू करवाने के पुख्ता इंतजाम नहीं है। गुड़गांव की एक बड़ी बीपीओ कंपनी के इग्जिक्यटिव का कहना है कि दफ्तरों में चेकिंग करने कौन आएगा? क्या सरकार इसके लिए इंस्पेक्टर रखेगी? तीस सीटों से ज्यादा वाले कैफे, पब और डिस्कोथेक भी स्वास्थ्य मंत्री के नए नियमों के दायरे में आ जाएंगे। इस निर्णय से अपने बिज़नस पर पड़ने वाले बुरे प्रभाव को देखते हुए बड़े रेस्तरां मालिक अपने यहां अलग एरिया और सेपरेट वेंटिलेशन लगाने की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन छोटे रेस्तरां के पास ऐसे विकल्प नहीं हैं।

निमंत्रण: आतंकवाद का सच

निमंत्रण: आतंकवाद का सच
पीपुलस यूनियन फॉर सिविल लिबरटीज़ (PUCL) और
पीपुलस यूनियन फॉर ह्यूमन राइट्स (PUHR)

तहलका के संपादक श्री अजीत साही से एक साक्षात्कार पढ़ने के लिए, यहाँ पर
क्लिक कीजिये
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आतंकवाद का सच

तिथि: शनिवार, १३ सितम्बर २००८

समय: ११ - २ बजे

स्थान: प्रेस क्लब, हजरतगंज, लखनऊ

मुख्या वक्ता:
अजीत साही,
संपादक, तहलका

अध्यक्षता
प्रशांत भूषण,
वरिष्ठ अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय

आयोजक:
पीपुलस यूनियन फॉर सिविल लिबरटीज़ (PUCL) और
पीपुलस यूनियन फॉर ह्यूमन राइट्स (PUHR)

अधिक जानकारी के लिए, संपर्क कीजिये:
अरुंधती धुरु, ९४१५०२२७७२
शाहिरा नईम, ९४१५१०८८०६

शाहरुख़ खान के ऊपर कड़ी कार्यवाही की जानी चाहिए

शाहरुख़ खान के ऊपर कड़ी कार्यवाही की जानी चाहिए

हाल ही में भारत के स्वस्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री अंबुमणि रामदोस द्वारा किए गए घोषणा की २ अक्टूबर से सम्पूर्ण भारत में सार्वजानिक स्थानों पर धूम्रपान पर पूरी तरह से प्रतिबन्ध लग जाएगा बालीवुड के मशहूर फ़िल्म स्टार शाहरुख़ खान ने धज्जियाँ उदा दी। अमृतसर के खालसा कालेज के अन्दर उन्होंने नें युवाओं को सिगरेट पीने के लिए उकसाया है जो काफी निन्दनिये है, और यह कोई पहली बार नहीं है जब उन्होंनें इस तरह की गलती की है। सच तो यह है की सारे सच को जानते हुए भी हमारे मशहूर फ़िल्म स्टार शाहरुख़ खान तम्बाकू नियंत्रण अधिनियमों का खुलेआम उल्लंघन कर रहे हैं।

शाहरुख़ खान द्वारा उनके खालसा कालेज के अन्दर धुम्रपान करने पर वहां की सरकार नें इस पुरे मामले की जाँच के आदेश दिए हैं जो काफी सराहनिए है।

सलमान ने किया सिगरेट से तौबा

सलमान ने किया सिगरेट से तौबा


बालीवुड फिल्म स्टार सलमान खान ने कहा है की अब वह अपनी किसी भी फिल्म में धूम्रपान करते हुए नहीं दिखेंगे। सलमान खान ने यह बात अपनी फिल्म की शूटिंग के दौरान कही। उन्होंनें कहा है किसी यदी वह सिखों के लिबाज में हैं तो सिगरेट को हाथ तक नहीं लगायेंगे। किंतु हॉल ही में शाहरुख़ खान ने अपनी एक फिल्म के शूटिंग के दौरान पटियाला के एक खालसा कॉलेज में सिगरेट पिया था।

शिक्षा के मंदिर या धर्म के अखाडे ?

शिक्षा के मंदिर या धर्म के अखाड़े ?
शोभा शुक्ला

आजकल
हमारी राजनैतिक पार्टियों एवं धार्मिक संगठनों की एक आदत सी बन गयी है की साधारण से साधारणघटना पर भी धर्म का लेप चढा कर उसे साम्प्रदायिकता की आग में झोंक कर अपने अपने स्वार्थ की रोटियां सेंकी जाएँ. धर्म के नाम पर घृणा की भावनाओं को उत्तेजित करना जितना सरल है, धर्मांध हिंसा की आग को बुझानाउतना ही कठिन.

ऐसी हे एक घटना अभी हाल ही में जयपुर के १४२ साल पुराने, अति प्रतिष्ठित सेंत जेवियर स्कूल में घटित हुई. इस स्कूल की बारहवीं कक्षा के सात छात्रों को उनके प्रधानाचार्य फादर जोस जेकब ने अनुशासन एवं उद्दंडता केआरोप में निलंबित कर दिया. ये विद्यार्थी, गणेश चतुर्थी के अवसर पर, कक्षा में गणेश जी का पोस्टर लगा करउसकी तथा कथित पूजा कर रहे थे और पूरी कक्षा शोर मचा कर इस मनोरंजन का मज़ा लूट रही थी. यह तो एकप्रकार से उनके अपने ही धर्म का अपमान करने के समान था.पूजा जैसे पवित्र मांगलिक कार्य को उन विद्यार्थियोंने मौज मस्ती का रूप देकर गणपति जी का ही अपमान किया. और इसके लिए वे छात्र वास्तव में निंदा के पात्र थे. परन्तु भारतीय जनता युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं को तो ऐसे ही सुनहरे अवसरों की तलाश रहती है. उन्होंने फादरजोस पर हिन्दुओं की धार्मिक आस्था को ठेस लगाने का आरोप लगाया. स्कूल में तोड़ फोड़ करने का बहाना मिलगया इन विवेकहीन युवाओं को. युवा मोर्चा के अध्यक्ष ने तो प्रधानाचार्य की गिरफ्तारी तक की मांग कर डाली. स्कूल में अनुशासनहीनता फैलाने वाले विद्यार्थियों का समर्थन कर के भारतीय युवा मोर्चा के सदस्यों ने अपनी हीउश्रन्खालाता का परिचय दिया है.

यह तो सर्व विदित है कि हमारी अधिकांश शिक्षण संस्थाएं असामाजिक कार्यों और गुंडागर्दी का अड्डा बन चुकी हैं, जहाँ पढ़ाई लिखाई के अलावा और सब कुछ होता है. इसका एक बहुत बड़ा कारण है शिक्षा के क्षेत्र में राजनैतिकपार्टियों एवं धार्मिक संगठनों का अनुचित एवं अनावश्यक हस्तकक्षेप .

हम सभी समझदार नागरिकों का कर्तव्य है की युवाओं के चारित्रिक हास को रोकने का प्रयत्न करें कि उसे बढ़ावा दे. हम सभी मन, वचन कर्म से अपने बच्चों को अनुशासन का पाठ पढाएं तथा उनकी निरंकुशता पर प्रेम काअंकुश लगाते हुए उन्हें अपने गुरुजनों का आदर करना सिखाएं. उन्हें धर्म का वास्तविक अर्थ समझना होगा औरधर्म के नाम पर हो रही विचारहीन हिंसा के विरुद्ध आवाज़ उठानी होगी. हमारी तथा कथित धर्म निरपेक्ष राजनैतिक पार्टियों का कर्तव्य है कि वो युवा वर्ग को हिंसा के लिए उकसाने के बजाये उनका उचित मार्गदर्शन करें . स्कूल और कॉलेज मंदिर के समान पवित्र स्थल हैं और उनके प्रांगण में केवल शिक्षा का सम्मानीय कार्य ही होनाचाहिए कि गुंडागर्दी. उपरोक्त प्रकरण में, एक भुक्तभोगी छात्र के पिता ने अपरोक्ष रूप से यह माना कि छात्र नेग़लत काम तो किया, पर निलंबन सज़ा कुछ ज़्यादा ही सख्त थी.

भारतीय युवा मोर्चा के गुंडों के निंदनीय व्यव्हार को नज़र अंदाज़ करने का अर्थ होगा उन गिने चुने शिक्षकों के प्रतिविश्वासघात जो अपने विद्यार्थियों को एक सभ्य एवं संवेदनशील नागरिक बनाने में सतत प्रयत्नशील हैं. साम्प्रदायिकता की आग को बढ़ावा देने वालों का बहिष्कार करमा ही होगा चाहे वे किसी भी जाति या धर्म या पार्टी के हों

शोभा शुक्ला

(लेखिका, सिटिज़न न्यूज़ सर्विस की संपादिका हैं और लखनऊ के प्रसिद्ध लोरेटो कॉन्वेंट में अध्यापिका भी)

धूम्रपानी सावधान हो जाएँ

धूम्रपानी सावधान हो जाएँ

दो अक्टूबर से सरकारी, गैर सरकारी इमारतों और सार्वजनिक स्थलों पर सिगरेट, बीड़ी सुलगाने वालों की नकेल कसने की केंद्र ने पूरी तैयारी कर ली है। यह सच है कि इसे सख्ती से लागू करना राज्यों के सहयोग पर निर्भर करेगा। केंद्र सरकार इस संबंध में पुलिस अधिकारी, चुनिंदा गैर सरकारी संगठनों के कार्यकर्ताओं से लेकर ट्रेन में टिकट चेकरों तक को धूम्रपान नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ दो सौ रुपये का जुर्माना करने का अधिकार देने जा रही है। अगर किसी निजी दफ्तर, होटल, डिस्कोथेक, कैंटीन, पब, बार से लेकर सार्वजनिक स्थल में धूम्रपान हुआ तो रोकने की जिम्मेदारी प्रबंधन व 'बास' की होगी। इस जिम्मेदारी से बचना उन्हें महंगा भी पड़ सकता है।

'तंबाकू नियंत्रण कानून और भारत में संबंधित मुद्दों' पर आयोजित दो दिवसीय नेशनल एडवोकेसी वर्कशाप का उद्घाटन करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा. अंबुमणि रामदास ने माना कि यह काम सरकार अकेले नहीं कर सकती है। इसके लिए आम जनता और गैर-सरकारी संगठनों का सक्रिय सहयोग जरूरी है। मालूम हो कि सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान के खिलाफ कानून पहले से ही था। सरकार इसे अमल में नहीं ला पा रही थी। बाद में कुछ बदलाव किए गए। ३० मई को बाकायदा अधिसूचना जारी कर स्पष्ट कर दिया गया कि इस पर सख्ती से अमल २ अक्टूबर से शुरू कर दिया जाएगा।

स्वास्थ्य मंत्री ने चेताया कि तमाम प्रयासों के बावजूद देश में तंबाकू का सेवन बढ़ रहा है। अब कम उम्र के बच्चे भी इसके शिकार होते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि लोगों को यह बात अच्छी तरह समझनी चाहिए कि ४० प्रतिशत बीमारियां केवल तंबाकू के सेवन के कारण होती हैं।

राज्य सरकारें भी २ अक्टूबर से सार्वजनिक स्थलों पर धूम्रपान के खिलाफ मुस्तैद हो जाएं। इसके लिए मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों को पत्र लिखा गया है। यही नहीं, तंबाकू पैदा करने वाले किसानों को वैकल्पिक फसल उगाने संबंधी सुझावों पर भी विचार किया जा रहा है। तंबाकू जांच के लिए पहले दो आधुनिक प्रयोगशालाएं दिल्ली और अहमदाबाद में और फिर देश के अन्य हिस्सों में स्थापित की जाएंगी। उन्होंने बताया कि खासकर स्कूलों व वयस्क होते बच्चों को इससे बचाने के लिए प्रत्येक जिले को २२ लाख रुपये दिए जाएंगे। इस पैसे से तंबाकू सेवन के दुष्परिणामों के बारे में जागरूकता पैदा की जाएगी। आज देश में १३-१६ साल की आयु के १३ फीसदी बच्चे तंबाकू का सेवन कर रहे हैं।

स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि स्कूलों में किए गए सर्वेक्षणों से यह बात सामने आई है कि यदि बच्चों को सही समय पर धूम्रपान सेवन के दुष्परिणामों से अवगत करा दिया जाए तो अधिकांश बच्चे धूम्रपान छोड़ देते हैं। उन्होंने कहा कि जो लोग धूम्रपान छोड़ना चाहते हैं उनकी सहायता के लिए धूम्रपान उपचार केंद्र खोलने का फैसला किया गया है। शुरुआत में ऐसे सौ केंद्र मेडिकल कालेजों और जिला अस्पतालों में विशेष रूप से खोले जाएंगे। उसके दो साल के बाद देश भर में विभिन्न स्थानों पर इसी प्रकार के एक हजार केंद्र खोले जाएंगे।

भीसन त्रासदी से गुजरता बिहार

भिसनत्रासदी से गुजरता बिहार
यूनाइटेड भारत, लखनऊ, उत्तर प्रदेश




कुपोषण एक गंभीर समस्या

कुपोषण एक गंभीर समस्या
स्वतंत्र भारत, लखनऊ, उत्तर प्रदेश


भारत-अमेरिका का पक्ष लिया जापान नें

भारत-अमेरिका का पक्ष लिया जापान नें
यूनाइटेड भारत, इलाहाबाद , उत्तर प्रदेश


विश्व 'ओज़ोन' दिवस (१६ सितम्बर) पर विशेष

मात्र परम्परा निभाना उचित नहीं
जीवन बचाना है तो पृथ्वी बचाओ

हर वर्ष की ही भांति इस बार भी १६ सितम्बर को विश्व 'ओज़ोन' दिवस मनाया जाएगा ।

शाहरुख़ खान ने कालेज परिसर में किया धूम्रपान

शाहरुख़ खान ने कालेज परिसर में किया धूम्रपान

रब ने बना दी जोड़ी फिल्म के नायक शाहरुख़ खान व फिल्म यूनिट के दो स्पाट ब्यायों ने खालसा कॉलेज में सिगरेट पिया था। यहाँ तक की फिल्म यूनिट में शामिल यूनिट के कुछ और लोगों को भी सिगरेट पीते हुए देखा गया। इस सम्बन्ध में कालेज प्रशासन का कहना है की उन्हें इस बात की कोई जानकारी नही है और यदि इस तरह का कोई प्रमाण मिलता है तो अगली बार से किसी को शूटिंग की इजाजत नहीं दी जायेगी।

तम्बाकू उत्पादनों पर फोटो वाली चेतावनी लागू हो पायेगी

तम्बाकू उत्पादनों पर फोटो वाली चेतावनी लागू हो पायेगी

भारत के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा २७ अगस्त २००८ को जारी किए गए निर्देशों के अनुसार नवम्बर २००८ से प्रत्येक तम्बाकू के उत्पादनों पर तम्बाकू द्वारा होने वाले नुकसानों से सम्बंधित वैधानिक चेतावनी लिखी होगी। मंत्रालय द्वारा यह निर्देश सिगरेट तथा अन्य तम्बाकू उत्पाद अधिनियम २००८ के तहत जारी किया गया है। इस चेतावनी के तहत तम्बाकू के पैकेटों पर एक धुंधले मानव फेफड़े की तस्वीर पैकेट के करीब ४०% हिस्से पर बनी होनी चाहिए उसके साथ ही स्थानीय भाषा में यह भी लिखा होना चाहिय की तम्बाकू घातक और जानलेवा है। इस वैधानिक चेतावनी की स्वीकृति भारत के विभिन्न केन्द्रीय मंत्रालयों द्वारा संयुक्त रूप से की गयी है जिनके नाम हैं: स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, श्रम एवं रोजगार मंत्रालय, वाणिज्य उद्योग मंत्रालय तथा सांस्कृतिक और शहरी विकास मंत्रालय।

इन समस्त मंत्रलयों द्वारा तम्बाकू कंपनियों को तीन महीने के वक्त दिया गया है इन चेतावनियो को तम्बाकू उत्पादनों के पैकटों पर पूरी तरह से लागू करने हेतु। वास्तव में इस तरह की चेतावनी पिछले साल वर्ष २००७ में ही भारत के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा दी जा चुकी है किन्तु उसके पश्चात इसको करीब चार -बार स्थगित किया जा चुका है। क्या इस बार इस प्रकार की चेतावनी पूरी तरह से प्रभावी हो पाएगी यह कहना शायद थोडा मुश्किल है। भारत सरकार द्वारा मंत्रालयों के इस समूह की स्थापना वर्ष २००७ में तम्बाकू उत्पादों पर लिखी जाने वाली वैधानिक चेतावनियों पर व्यापक निगरानी रखने के लिये की गई थी।

इसके गठन के पश्चात् समूह द्वारा यह निर्णय लिया गया की फ़रवरी २००८ से तम्बाकू उत्पादों पर मानव की खोपडी और क्रास के आकर को दर्शाता हुआ मानव की हड्डी बनी होने के स्थान पर सिर्फ़ बिच्छू की तस्बीर बने होगें। इसके पीछे मंत्रालय का तर्क यह था की भारत में कराये गए विभिन्न सर्वेक्षणों से यह पता चलता है की भारत को तम्बाकू पैकटों पर वैधानिक चेतावनी पर ज्यादा ध्यान देने की अपेक्षा तम्बाकू नियंत्रण अभियान को मजबूत बनाया जाए।

सिगरेट तथा अन्य तम्बाकू उत्पाद अधिनियम २००३ प्रभावकारी तम्बाकू नियंत्रण के लिए बनी विश्वव्यापी संधी, फ्रेमवर्क कन्वेंशन आन टोबैको कंट्रोल-२००४ जिस पर भारत ने भी दस्तखत किया हुआ है। इस संधि के अनुसार तम्बाकू उत्पादों के पैकेटों के मुख पृष्ठ और पीछे के भाग के करीब ५०% हिस्से पर तम्बाकू की वैधानिक चेतावनी लिखी होनी चाहिए। यदि यह चेतावनी ५०% हिस्से पर नहीं है तो पैकेट के ४०% भाग पर तो होनी ही चाहिए । विश्व के कई देशों कनाडा, थाईलैंड और आस्ट्रेलिया ने अपने यहाँ के तम्बाकू उत्पादों के पैकटों पर करीब ४०% से ६०% तक के हिस्से पर वैधानिक चेतावनी लिखवाई है।

तम्बाकू पर लिखी वैधानिक चेतावनी न केवल महत्वपूर्ण सुचना प्रदान करती है साथ ही साथ यह लोगों को तम्बाकू का सेवन करने के लिए भी रोकती है। इस चेतावनी का काफ़ी व्यापक और प्रभावकारी असर बच्चों पर पडेगा जो तम्बाकू कंपनियों के सबसे बड़े ग्राहक हैं। तम्बाकू के ऊपर लिखी वैधानिक चेतावनी का अन्य दृष्टी से लाभ यह हो सकता है की इसका समस्त खर्चा तम्बाकू कंपनियों द्वारा उठाया जायेगा जो अपने आप में प्रभावकारी तम्बाकू नियंत्रण का हिस्सा बन सकता है।

यह सत्य है की सिर्फ़ तम्बाकू के पैकेटों पर वैधानिक चेतावनी लिख देने से ही लोगों को तम्बाकू का सेवन करने से नहीं रोका जा सकता है, इसके लिए सरकार को तम्बाकू उत्पादनों पर ज्यादा से ज्यादा मात्र में कर भी बढ़ाना चाहिए। अब देखना यह है की क्या सरकार अपने निर्णय को नवम्बर २००८ से प्रभावी कर पायेगी या फिर हर बार की तरह इस बार भी इसको कुछ दिनों के लिए और हटा दिया जायेगा।

अमित द्विवेदी

लेखक सिटिज़न न्यूज़ सर्विस में विशेष संवाददाता हैं।

संपर्क ईमेल: amit@citizen-news.org

धुआं उड़ाने में अव्वल हैं बीपीओ कर्मचारी

धुआं उड़ाने में अव्वल हैं बीपीओ कर्मचारी

साइबर सिटी की बीपीओ कंपनियों में काम करने वाले युवा रात भर जागकर काम करने के लिए सबसे ज्यादा सिगरेट का सहारा ले रहे हैं। एक बीपीओ कंपनी के सर्वे में पता चला है कि बीपीओ में काम करने वाले 65 फीसदी से ज्यादा कर्मचारी स्मोकिंग करते हैं। इस सर्वे में यह भी साफ हो गया है कि दिन के मुकाबले रात को काम करने वाले कर्मचारी ज्यादा स्मोकिंग करते हैं। परेशानी की बात यह है कि महिलाएं भी स्मोकिंग करने में बहुत पीछे नहीं हैं।

इस कंपनी की 30 फीसदी महिला कर्मचारी अपनी टेंशन को सिगरेट के धुएं में उड़ाने में यकीन रखती हैं। पिछले दो सालों से स्मोकिंग कर रही रीना तलवार ने बताया कि उन्हें सिगरेट पीने की ऐसी लत पड़ चुकी है कि अब उनके लिए स्मोकिंग छोड़ना बहुत मुश्किल हो चुका है। रीना के मुताबिक शुरू में उन्होंने अपनी फ्रेंड्स के बीच रुतबा कायम करने के लिए स्मोकिंग शुरू की थी और अब हालत यह है कि वह 20 सिगरेट का एक पैकिट दो दिन में खत्म कर देती हैं।

अपने कर्मचारियों की स्मोकिंग की इस खतरनाक लत से बीपीओ कंपनियां भी परेशान हैं। एक बीपीओ कंपनी के मैनिजर अनेश अग्रवाल ने बताया कि अब वह किसी भी नए कर्मचारी का सलेक्शन करने से पहले उसकी स्मोकिंग की आदतों के बारे में भी जानकारी मांगते हैं। उन्होंने कहा कि बीपीओ कर्मचारियों में स्मोकिंग की बढ़ती लत के लिए ऑफिस के माहौल को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। मनोवैज्ञानिक डॉ। राम त्रिवेदी का कहना है कि यह धारणा बिल्कुल गलत है कि रात को जागने के लिए स्मोकिंग का सहारा लेना जरूरी है।

उनके मुताबिक रात को लोग बुरी आदतों के प्रति ज्यादा आसानी से आकर्षित होते हैं। डॉ। त्रिवेदी ने सलाह दी कि बीपीओ में काम करने वाले किसी भी कर्मचारी से लगातार रात को काम नहीं कराना चाहिए, बल्कि बीच-बीच में सभी की शिफ्ट चेंज होती रहनी चाहिए।

भीषण त्रासदी से गुजरता हुआ बिहार

भीषण त्रासदी से गुजरता हुआ बिहार

रास्ट्रीय जनता दल के नेता तथा राज्य जल संसाधन मंत्री श्री जय प्रकाश नारायण यादव का कहना है की बिहार की सरकार बिहार के बाढ़ की स्तिथि से निपटने में पुरी तरह से नाकाम रही है। हाल ही में एक प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए श्री यादव का कहना था की बिहार जल संसाधन समिति की रिपोर्ट के मुताबिक १७ अगस्त तक सभी बाँध सुरक्षित थे, किंतु जब १८ अगस्त २००८ को कोसी नदी से लगा हुआ बाँध टूटा और उसके समीप के जिलों में पानी का स्तर अचानक बढ़ा तो उनका कहना था की सरकार कई दिनों से इस बात तो आगाह कर रही थी की कोसी नदी के निकट बने बाँध का भू- दोहन पिछले कई दिनों से हो रहा था। इससे यह बात साफ़ जाहिर होती है की सरकार ख़ुद ही अपने रिपोर्ट से कैसे मुकरती है और अपनी जिम्मेदारी दूसरों के कन्धों पर लादना चाहती है।

सरकार भले ही एक दूसरे के ऊपर आरोप- प्रत्यारोप लगा रही हो किंतु सत्य तो यह है की इस बाढ़ से लाखों बेक़सूर बच्चों, महिलाओं और पुरुषों की जाने गयी हैं और जो बचे हैं वह अन्य प्रकार की परेशानियों का सामना कर रहे हैं। बाढ़ की इस भीसन त्रासदी ने जानवरों तक तो नहीं बख्शा। बिहार को अपने आप को सही हालात में लाने के लिए वर्षों लग जायेंगे. बिहार की इस भीसन त्रासदी को देखते हुए कई सारे स्वैक्षिक संगठनो ने आगे आकर राहत और बचाव कार्य किया है। इनमे से एक ऑक्सफाम इंडिया भी है. ऑक्सफाम इंडिया अपने कई स्थानीय सहयोगी संस्थाओं के साथ १८ अगस्त २००८ से नेपाल की सीमा से लगे बिहार के ६ पूर्वोत्तर जिलों में इस राहत कार्य को करती आ रही है। यह जिले इस साल बिहार में बाढ़ द्वारा सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं और कोसी नदी से करीब ३ किलोमीटर की दूरी पर हैं। इस साल की बाढ़ ने पूर्वोत्तर बिहार के करीब १६ जिलों में ३० लाख लोगों को प्रभावित किया है। भारत के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने भी इस बार की बाढ़ को राष्ट्रीय आपदा घोषित कर दिया है।

ऑक्सफाम सौपाल जिले में बाढ़ में फँसे आशय बच्चों, महिलाओं और आदमियों को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाने हेतु 'मोटरबोट' या मोटर द्वारा चालित नाविका का सहारा ले रही है। बाढ़ पीड़ित समुदाय के रहने हेतु पतले पाल की भी सहायता प्रदान कर रही है साथ ही साथ पानी शुद्धिकरण कीट, बाल्टी और जीवन रक्षक घोल इत्यादि की भी व्यवस्था कर रही है।ऑक्सफाम इण्डिया में कार्यरत कर्मचारी बिहार के दो स्थानीय संस्थाओं - बिहार सेवा समिति और अभिज्ञान दिशा - तथा कुछ स्वयंसेवी व्यक्तियों के साथ राहत और बचाव का काम कर रही है।ऑक्सफाम इण्डिया की मुख्या कार्यकारी अधिकारी सुश्री निशा अग्रवाल का कहना है कि ऑक्सफाम, बाढ़ से सौपाल जिले के सबसे ज्यादा प्रभावित दो विकास खंडों - बसंतपुर और प्रतापगंज - के २०,००० लोगों को सहायता पहुँचाने की तैयारी कर रही है। निशा अग्रवाल का आगे कहना है कि 'हम लोग बाढ़ पीड़ित लोगों को अस्थाई पुनर्वास केन्द्र, सुरक्षित खाद्य पदार्थों के वितरण और साफ़ पीने योग्य पानी को उपलब्ध करवाने के लिए प्रयासरत हैं।

बाढ़ से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए बच्चे और महिलाएँ खुले आसमान के नीचे रह रहे हैं। ऐसी महिलाएँ जो कि गर्भवती हैं या फिर जिन्होंने अभी जल्दी ही बच्चे को जन्म दिया है, इनको तक सुरक्षित और साफ़ पीने का पानी नहीं मिल रहा है। बाढ़ के बाद पानी द्वारा उत्त्पन्न होने वाले रोगों को भी रोकना अत्यन्त आवश्यक है। हाल ही में बाढ़ पीड़ित इलाकों की वास्तविक स्थिति को जानने हेतु ऑक्सफाम द्वारा एक दस्ता भेजा गया था जिसके द्वारा यह सुझाया गया है कि बाढ़ पीड़ित लोगों को पुनर्वास केन्द्रों, खाद्य पदार्थों और प्राथमिक चिकित्सा की तुंरत आवश्यकता है। ऑक्सफाम इंडिया कई सहायक संस्थाओं और राज्य सरकार के साथ मिलकर यह काम कर रही है जिससे कि राहत सामग्री वास्तव में सही तरीके से जरूरतमंद लोगों तक पहुँचाई जा सके। तो आईये हम सब मिलकर बिहार को इस भीषण त्रासदी से बचाने में अपना सहयोग प्रदान करें।


अमित द्विवेदी
लेखक सिटिज़न न्यूज़ सर्विस में विशेष संवाददाता हैं.

संपर्क ईमेल: amit@citizen-news.org

बिहार में बाढ़ पीड़ित लोगों की तत्काल सहायता के लिए जन समुदाय से अपील

बिहार में बाढ़ पीड़ित लोगों की तत्काल सहायता के लिए जन समुदाय से अपील

ऑक्सफाम इंडिया (Oxfam India) के नई दिल्ली कार्यालय ने, सोमवार, १ सितम्बर २००८ को, बिहार में बाढ़ पीड़ित लोगों के बाचाव और उनको राहत पहुँचाने हेतु, जन समुदाय से सहयोग की अपील की है। इस अपील के द्वारा जो भी सहायता राशि इकठ्ठी की जायेगी उसका व्यय बिहार में बाढ़ पीड़ित लोगों के लिए पुनर्वास केन्द्र बनाने में, उनको नियमित खाद्यान प्रदान करने में तथा उनको साफ़ और सुरक्षित पीने का पानी उपलब्ध कराने में किया जायेगा।
ऑक्सफाम इंडिया अपने कई स्थानीय सहयोगी संस्थाओं के साथ १८ अगस्त २००८ से नेपाल की सीमा से लगे बिहार के ६ पूर्वोत्तर जिलों में
इस राहत कार्य को करती आ रही है। यह जिले इस साल बिहार में बाढ़ द्वारा सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं और कोसी नदी से करीब ३ किलोमीटर की दूरी पर हैं। इस साल की बाढ़ ने पूर्वोत्तर बिहार के करीब १६ जिलों में ३० लाख लोगों को प्रभावित किया है। भारत के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने भी इस बार की बाढ़ को राष्ट्रीय आपदा घोषित कर दिया है। ऑक्सफाम सौपाल जिले में बाढ़ में फँसे आशय बच्चों, महिलाओं और आदमियों को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाने हेतु 'मोटरबोट' या मोटर द्वारा चालित नाविका का सहारा ले रही है। बाढ़ पीड़ित समुदाय के रहने हेतु पतले पाल की भी सहायता प्रदान कर रही है साथ ही साथ पानी शुद्धिकरण कीट, बाल्टी और जीवन रक्षक घोल इत्यादि की भी व्यवस्था कर रही है।

ऑक्सफाम इण्डिया में कार्यरत कर्मचारी बिहार के दो स्थानीय संस्थाओं - बिहार सेवा समिति और अभिज्ञान दिशा - तथा कुछ स्वयंसेवी व्यक्तियों के साथ राहत और बचाव का काम कर रही है।

ऑक्सफाम इण्डिया की मुख्या कार्यकारी अधिकारी सुश्री निशा अग्रवाल का कहना है कि ऑक्सफाम, बाढ़ से सौपाल जिले के सबसे ज्यादा प्रभावित दो विकास खंडों - बसंतपुर और प्रतापगंज - के २०,००० लोगों को सहायता पहुँचाने की तैयारी कर रही है। निशा अग्रवाल का आगे कहना है कि 'हम लोग बाढ़ पीड़ित लोगों को अस्थाई पुनर्वास केन्द्र, सुरक्षित खाद्य पदार्थों के वितरण और साफ़ पीने योग्य पानी को उपलब्ध करवाने के लिए प्रयासरत हैं। बाढ़ से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए बच्चे और महिलाएँ खुले आसमान के नीचे रह रहे हैं। ऐसी महिलाएँ जो कि गर्भवती हैं या फिर जिन्होंने अभी जल्दी ही बच्चे को जन्म दिया है, इनको तक सुरक्षित और साफ़ पीने का पानी नहीं मिल रहा है। बाढ़ के बाद पानी द्वारा उत्त्पन्न होने वाले रोगों को भी रोकना अत्यन्त आवश्यक है। हाल ही में बाढ़ पीड़ित इलाकों की वास्तविक स्थिति को जानने हेतु ऑक्सफाम द्वारा एक दस्ता भेजा गया था जिसके द्वारा यह सुझाया गया है कि बाढ़ पीड़ित लोगों को पुनर्वास केन्द्रों, खाद्य पदार्थों और प्राथमिक चिकित्सा की तुंरत आवश्यकता है। ऑक्सफाम इंडिया कई सहायक संस्थाओं और राज्य सरकार के साथ मिलकर यह काम कर रही है जिससे कि राहत सामग्री वास्तव में सही तरीके से जरूरतमंद लोगों तक पहुँचाई जा सके।

जन समुदाय इन बाढ़ पीडितों को अपना सहयोग देने के लिए इन दूरभाष (फ़ोन) नंबरों पर संपर्क कर सकते हैं: + ९१ ११ ४६५३८००० । वह लोग जो अपना आर्थिक सहयोग 'चेक' द्वारा देना चाहते हैं कृपया इस पते और नाम पर 'चेक' भेजें: ऑक्सफाम ट्रस्ट, पता- ऑक्सफाम इंडिया, प्लाट नम्बर १, दूसरी मंजिल, सुजान महिंदर अस्पताल, न्यू फ्रेंड्स कालोनी, नई दिल्ली - ११००६५। वेबसाइट: (
www.oxfam.org )

२००० रूपये का अनुदान एक परिवार को पुनर्वास केन्द्र प्रदान कर सकता है। ८५० रूपये के अनुदान से ५ परिवारों को साफ़- सफाई का कीट दिया जा सकता है तथा १००० रूपये के अनुदान से २ परिवारों के लिए साफ़ शोचालय बनाया जा सकता है।

सहायता राशि को देने हेतु अधिक जानकारी के लिए कृपया निम्न पते पर संपर्क करें:
पामेला श्रीवास्तव ( अनुदान के लिए) + ९१ ११ ४६५३८०००, आदिति कपूर ( प्रेस से सम्बंधित जानकारी के लिए) + ९१ ११ ४६५३८०००, ९८१०३०६२००, ईमेल
aditi@oxfamindia.org; akapoor@oxfam.org.uk

माननीय संपादकों के लिए नोट:
ऑक्सफाम इंडिया एक भारतीय संस्थान है जो कि ऑक्सफाम इंटरनेशनल के परिवार का इक बड़ा हिस्सा है। ऑक्सफाम इंडिया का अपना अलग से समिति या 'बोर्ड' भी है जिसमें भारतीय लोग हैं। ऑक्सफाम इंडिया भारत में सन १९५२ से काम कर रही है जब बिहार में भयानक सूखा पड़ा था। ऑक्सफाम इंडिया समानता और न्याय में विश्वास रखती है और उन लोगों को समानता और अधिकार दिलाने के लिए काम कर रही है जो सामाज में दबे कुचले वर्ग से हैं।

दफ्तरों में स्मोकिंग पर लगेगी पूरी तरह पाबंदी

दफ्तरों में स्मोकिंग पर लगेगी पूरी तरह पाबंदी

2 अक्टूबर से किसी भी दफ्तर चाहे वह प्राइवेट हो या सरकारी, के अंदर स्मोकिंग नहीं की जा सकेगी। केंद्र सरकार ने तंबाकू विरोधी अभियान के तहत 'वर्कप्लेस स्मोक फ्री पॉलिसी' को लागू करने का फैसला किया है। किसी भी बिल्डिंग में स्मोकिंग रूम नहीं बनाया जा सकेगा।

केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री डॉ। अंबुमणि रामदॉस ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति स्मोक करना चाहता है तो उसे बाहर निकलकर सड़क पर जाना होगा। यह बैन आईटी सेक्टर सहित सभी कंपनियों के लिए लागू होगा। उन्होंने बताया कि यह नियम छोटे कैफे, रेस्तरां और पबों में भी लागू होगा। जिन होटलों में 30 सीटों से ज्यादा का इंतजाम है, वहां अलग से स्मोकिंग जोन बनाकर वेंटिलेशन का इंतजाम करना होगा।

इस समय बैन का उल्लंघन करने पर 200 रुपये जुर्माने का प्रावधान है। सरकार इसे बढ़ाकर अकेले व्यक्ति के लिए एक हजार रुपये और संगठनों के लिए पांच हजार रुपये करना चाहती है। सरकार बैन के बारे में विज्ञापनों के जरिए लोगों को बताएगी। इसमें फिल्मी सितारे सहित कई बड़ी हस्तियां दिखेंगी। इसी तरह 1 दिसंबर से हर तंबाकू उत्पाद पर तस्वीर सहित चेतावनी होगी। इसके लिए तंबाकू उत्पादकों को नोटिस दे दिया गया है।

रामदॉस का कहना था कि देश में करीब दस लाख लोग तंबाकू की वजह से जुड़ी बीमारियों का शिकार हैं। भारत में तंबाकू का इस्तेमाल घटने की बजाय 15 फीसदी से बढ़कर 26 फीसदी हो गया है।

कुपोषण से ग्रसित देश का भविष्य

राष्ट्रीय पोषण सप्ताह १-७ सितम्बर पर विशेष

कुपोषण से ग्रसित देश का भविष्य

विकास के हम लाख दावे कर लें किंतु इसके बावजूद भी विश्व में भारत एक अकेला ऐसा देश है जहाँ हर साल नवजात शिशुओं के जन्म दर और मृत्यु दर का अनुपात सबसे अधिक है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य परिवार कल्याण सर्वेक्षण २००५-२००६ के अनुसार देश के करीब ४६% बच्चे कुपोषण से ग्रसित हैं. वहीं उत्तर प्रदेश में यह आँकड़ा लगभग ४७% है. भारत में सबसे ज्यादा कुपोषण से ग्रसित बच्चे मध्य प्रदेश में हैं. उत्तर प्रदेश में लगभग ४०% बच्चे औसत दर्जे से कम भार के पैदा होते हैं. प्रत्येक साल ० से ५ वर्ष तक की आयु वर्ग के बच्चों में होने वाली मृत्यु के अंतर्निहित कारणों में लगभग ६०% मृत्यु कुपोषण के कारण होती है. कुपोषण की समस्या ग्रामीण छेत्रों में पिछड़ी जाति के लोगों, तथा अशिक्षित वर्ग के लोगों में अधिक व्याप्त है. गर्भवती महिलाओं में कुपोषण की समस्या व्यापक होने के कारण पैदा होने वाले बच्चे कम भर के होते हैं.

कुपोषण द्वारा होने वाली इन समस्त मौतों पर आसानी से नियंत्रण पाया जा सकता है. यदि हम प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था की तरफ़ ध्यान दें और लोगों में इसके प्रति जागरूकता पैदा करें. अक्सर हम लोग जानकारी के अभाव में अपने घर में ही उपलब्ध खान-पान और उनके उचित उपयोग के प्रति ध्यान नही दे पाते. जैसे घर में उपलब्ध हरी सब्जी, दूध, दही, अंडा, चना, दलिया, केला, पपीता, आँगनबाडी कार्यक्रम के तहत प्राप्त पूरक पोषाहार तथा 'आयरन' की गोलियाँ आदि. यदि हम इन समस्त खाद्य पदार्थों को सही तरीके से लें तो माँ और बच्चे दोनों का स्वास्थ्य सही व संतुलित रह सकता है.

कुपोषण की समस्या का एक प्रमुख कारण शिशु को सही समय और पर्याप्त मात्र में माँ का दूध न मिल पाना भी है. इस सम्बन्ध में वात्सल्य संस्था की संस्थापिका तथा प्रसिद्ध स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ नीलम सिंह का कहना है कि शिशु के जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान की शुरुआत, शिशु और ५ साल से कम आयु के बच्चों की मृत्यु के अनुपात को कम कराने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है. जिसके द्वारा उच्च नवजात मृत्यु दर को जबरदस्त ढंग से घटाया जा सकता है और भारत में हर साल करीब दस लाख शिशुओं की जान बचाई जा सकती है . आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में केवल २३% माताएँ ही शिशु के जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान करा पाती है . वहीं उत्तर प्रदेश में यह आँकड़ा सिर्फ़ ७.२% है . जो कि भारतीय राज्यों में शिशु स्तन पान के अनुपात में २८ वें स्थान पर आता है. जो महिलायें शिशु को जन्म के पहले एक घंटे में स्तनपान शुरू करा देती हैं उनके पास शिशुओं को पहले ६ महीने तक सफलतापूर्वक और पूर्णतः स्तनपान कराने के व्यापक अवसर बढ़ जाते है. पहले ६ महीनों तक पूर्णतः स्तनपान कराने से शिशु स्वस्थ रहता है और पूर्ण छमता के साथ उसके विकास को भी सुनिश्चित करता है ।

पोषण में सुधार लाने के लिया समुदाय स्तर पर पोषण से सम्बंधित व्यवहारों में परिवर्तन लाकर पोषण स्तर में सुधार लाया जा सकता है . उचित पोषण के कुछ प्रमुख व्यवहार को हमें ध्यान रखना चाहिए जैसे – शिशु को गरम रखना एवं किसी भी बाह्य संक्रमण से बचाना , ६ माह के ऊपर के बच्चों को घर में बना हुआ भोजन जैसे गली दाल , घुटा चावल, खिचड़ी, मसला आलू , केला इत्यादि आवश्यक रूप से देना चाहिए . गर्भावस्था के दौरान गर्भवती महिला को दिन में दो घंटे आराम तथा एक अतिरिक्त खुराक अवश्य लेना चाहिए .उम्र के अनुसार निर्धारित टीकाकरण अवश्य कराना चाहिए .माँ को पोष्टिक आहार लेते रहना चाहिए .खाने में ऐसे खाध्य पदार्थों का इस्तेमाल करना चाहिए जिसमें लोहे की मात्र ज्यादा से ज्यादा हो , इस बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि माँ और बच्चा दोनों ही हमेशा 'आयोडीन' युक्त नमक का ही प्रयोग करें ।

मातृत्व एवं शिशु विकास तथा उनके उचित पोषण को लेकर ग्रामीण स्तर पर लोगों को जागरूक करना होगा। जिसके लिया हमें डॉक्टर , नर्स , व्यक्तिगत महिला स्वास्थय कर्मी ,आंगनबाडी कार्यकर्तियों, आशा कार्यकर्ताओं,दाइयों इत्यादि को पर्याप्त प्रोत्साहन और प्रशिक्षण देना होगा। कुपोषण की समस्या पर नियंत्रण प्रभावकारी रूप से तभी पाया जा सकता है जब लोगो में इसके प्रति जागरूकता हो. इस सम्बन्ध में केरल का उदाहरण हमारे सामने है जिसने कुपोषण की समस्या पर प्रभावकारी नियंत्रण पाया है। प्रदेश में जहाँ कहीं पर भी सरकारी और गैरसरकारी संगठनों द्वारा जो भी कार्यक्रम कुपोषण की समस्या को दूर कराने के लिया चलाया जा रहा है उन कार्यक्रमो को वहां के स्थानीय लोगो के द्वारा ही मूल्यांकन करवाना चाहिए. लेकिन स्थानीय लोगों द्वारा किसी भी कार्यक्रम का मूल्यांकन तभी किया जा सकता है जब उन लोगों को चलाये जा रहे कार्यक्रमो के बारे में पर्याप्त जानकारी हो . इसके लिए स्थानीय लोगो को, जिनके लिए कार्यक्रम चलाया जा रहा है, इसके प्रति जागरूकता पैदा करना अति आवश्यक है तभी वे अपने अधिकारों के लिए आगे आयेंगे .

आज हम विकास के बड़े बड़े दावे करते हैं तथा वैश्वीकरण की बात करते है . बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ हमारे देश में तेजी से अपना पाँव फैला रही हैं लेकिन इन सारे दावों के बाद जब हम पीछे मुड़कर ग्रामीण छेत्रों में रहने वाले लोगो की तरफ़ देखते है तो पाते हैं कि आज भी वहाँ लोग भूख से मर रहे हैं . हम विकास की मुख्य धारा में पूरी तरह से तबतक शामिल नही हो सकते जबतक हम प्राथमिक अनिवार्यताओं, जैसे प्राथमिक शिक्षा, प्राथमिक स्वास्थ्य आदि के विकास के लिए प्रयाप्त नहीं करते हैं


अमित द्विवेदी

लेखक सिटिज़न न्यूज़ सर्विस में विशेष संवाददाता हैं. संपर्क ईमेल: amit@citizen-news.org

तम्बाकू उत्पादों पर नियंत्रण जरूरी है

तम्बाकू उत्पादों पर नियंत्रण जरूरी है

तम्बाकू उपभोग के मामले में भारत का दुनिया में दूसरे स्थान पर आता है। सम्पूर्ण विश्व के करीब १० प्रतिशत तम्बाकू उपभोगता भारत में निवास करतें हैं। भारत में सबसे ज्यादा तम्बाकू का सेवन बीडी के रूप में किया जाता है। पिछले कुछ सालों में तम्बाकू के प्रयोग में भारत में बढोत्तरी देखी गई है। सार्वजानिक स्थानों पर धूम्रपान में प्रतिबन्ध लगा देने से न केवल तम्बाकू का सेवन करने वाला तम्बाकू के सेवन से बचेगा बल्कि वह अन्य लोगों को भी इसके घातक शिकार होने से बचायेगा।

तम्बाकू कंपनियों के इस बढ़ते हुए जल के पीछे तम्बाकू कंपनियों का हाथ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आँकडे के मुताबिक पूरे विश्व में करीब ५५ लाख लोगों की मौत हर साल होती।

महंगा पड़ेगा सार्वजनिक स्थलों पर कश लगाना

महंगा पड़ेगा सार्वजनिक स्थलों पर कश लगाना

यदि आप स्मोकिंग का शौक रखते हैं तो सावधान हो जाइए। क्योंकि सार्वजनिक स्थल या आफिस में धूम्रपान करने वालों पर शिकंजा कसने के लिए सरकार नया कानून लागू करने जा रही है। कानून के लागू होने के बाद यदि आपके बास ने आपको कश लगाते देख लिया तो वह जुर्माना लगा सकता है।यह कानून गांधी जयंती यानी दो अक्टूबर से लागू हो जाएगा। स्वास्थ्य मंत्रालय पहले ही इस कानून को गजट में शामिल करने के लिए भेज चुका है। सितंबर के दूसरे हफ्ते तक इसे सार्वजनिक किया जाएगा। स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि धूम्रपान करते पकड़े जाने पर दो हजार रुपये का जुर्माना देना होगा। नए कानून के तहत सरकारी कार्यालयों के अलावा निजी कार्यालय व भवनों में भी धूम्रपान पर पाबंदी होगी।

अधिकारी ने बताया कि नए कानून के तहत स्कूल प्रिंसिपल, स्टेशन मास्टर, डाकिया या हवाई अड्डा प्राधिकरण के अधिकारी को धूम्रपान करने वालों के विरुद्ध चालान काटने का अधिकार दिया गया है। साथ ही निजी कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों को भी चालान काटने का अधिकार दिया गया है।