सिंगुर से टाटा का बाहर जाना जन-शक्ति की विजय है

सिंगुर से टाटा का बाहर जाना जन-शक्ति की विजय है

यह सामाजिक न्याय के लिए प्रशंसनिए बात है कि रतन टाटा और टाटा मोटर्स ने नानो कार प्रोजेक्ट को सिंगुर में न लगाने का फैसला लिया है। जो उपजाऊ और कृषि-योग्य जमीन इस प्रोजेक्ट के लिए कब्जाई गयी थी, उसको वापस किसानों को सौंपे जाने की सम्भावना है, जो नि:संदेह सराहनीय बात है।

इस संघर्ष में प्रभावित लोगों को अनेकों राजनीतिक दलों ने, जिसमें तृणमूल कांग्रेस और एस.यु.सी.आई प्रमुख हैं, का समर्थन प्राप्त हुआ और अनेकों जन-संगठनों ने जिनमें जन-आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, पश्चिम बंगाल खेत मजदूर समिति, आदि ने भी सक्रिय सहयोग दिया.

सिंगुर में संघर्ष सत्ताधारी सी.पी.ऍम सरकार और विपक्षी दल में नहीं था, बल्कि सिंगुर में अपनी जमीनों से खदेड़े लोगों और सत्ता के बीच यह घमासान संघर्ष था. यह प्रशंसनीय बात है कि कृषि योग्य उपजाऊ जमीन वापस किसानों को मिल रही है।

यह दुर्भाग्य की बात होगी यदि टाटा यह कहेगा कि उसने नानो कार प्रोजेक्ट को इसलिए हटाया क्योंकि उसके कर्मचारियों और सहयोगियों की सुरक्षा खतरे में थी, और वहाँ के स्थानीय लोगों की सुरक्षा को नज़रंदाज़ करेगा। यह महत्त्व की बात है कि इस प्रोजेक्ट से वहाँ के स्थानीय मजदूर, किसान, बर्गादार, आदि की आजीविका और स्वायत्ता खतरे में पड़ गयी थी।

टाटा मोटर्स अब भारत में कही भी नानो कार प्रोजेक्ट लगाये, उसको वहाँ के स्थानीय लोगों की संस्तुति अवश्य लेनी पड़ेगी. जनता को सामूहिक रूप से ये निर्णय लेना चाहिए कि उनकी जमीन पर किस प्रकार क उद्योग पनपें, जिससे की लोगों को स्थायी रोज़गार मिले, और पर्यावरण को नुक्सान न पहुचे.

जैसा की सिंगुर की जनता जानती है कि न केवल सिंगुर में, बल्कि नंदीग्राम, नन्दगुदी, काकीनाडा, रायगड, गोराई आदि में भी, अलोकतांत्रिक तरीकों से किसानों की जमीनों पर कब्जा किया गया था, और कृषि के लिए आवंटित जमीन को उद्योग में परिवर्तित किया गया था।

ममता बनर्जी ने नि:संदेह इस सिंगुर आन्दोलन में एक केंद्रीय भूमिका निभाई है और पैसे के बल और बाहुबल दोनों को करारी पराजय दी है।

टाटा का स्वेच्छा से सिंगुर से बाहर जाने के निर्णय को अन्य उद्योगपतियों को प्रोत्साहित करना चाहिए जो लोगों की जमीनों पर कब्जा किया बैठे हैं। जैसे कि अम्बानी ग्रुप भी अनेकों जगह स्थानीय जनता का विरोध झेल रहे हैं।

मेधा पाटकर, आनंद मज्गओंकर, मुक्त श्रीवास्तव, पी चिन्नऐअह

नर्मदा बचाओ आन्दोलन

और
जान आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय
(NATIONAL ALLIANCE of PEOPLE'S MOVEMENTS)

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