मंदबुद्धि बच्चा अभिशाप नहीं है!

मंदबुद्धि बच्चा अभिशाप नहीं है!
डॉ० दीप्ति मिश्रा

मंदबुद्धि बच्चा वह है जिसका बौद्धिक स्तर उसकी उम्र के अन्य बच्चों की अपेक्षा कम होता है । इसकी वजह से उसका बोलचाल का तरीका व व्यवहार काफी बचकाना होता है।

किसी भी परिवार में मंदबुद्धि बच्चे का आना अभिशाप माना जाता है। उसके साथ असामान्य व्यवहार किया जाता है। और कई बार तो उसका नाम ही ‘पगला’ रख दिया जाता है। यह बच्चा पास-पड़ोस व कई बार तो घर वालों के भी मजाक का पात्र बनता है।

पर क्या ! उस बच्चे की स्थिति में उसका अपना कोई हाथ है? जाहिर है कि नहीं! फिर वह अपनी स्थिति, जो कि ईश्वर की देन है, की सज़ा क्यों भुगते? और सोचा जाए तो क्या इसमें किसी का भी दोष है? कौन माँ-बाप चाहेंगे कि उनकी संतान इस स्थिति में हो? यह स्थिति किसके लिए रूचिकर या फायदेमंद होगी? इन सभी सवालों के जवाब में शायद ही किसी को कोई संशय होगा लेकिन फिर भी आमतौर पर सभी लोग इन बच्चों को हेयदृष्टि से देखते हैं और हमारे समाज में इससे संबंधित कई भ्रांतियां भी प्रचलित हैं।

इन बच्चों को देखकर साधारण तथा सबसे पहला ख्याल लोगों के मन में यही आता है कि ये सब माँ-बाप या परिवार के बुरे कर्मो का फल है । और तो और , अक्सर माँ को ही दोषी माना जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि यह स्थिति कभी भी किसी भी परिवार में आ सकती है और मेडिकल साइन्स में इसके अनेक कारण बताए गए हैं। यह समस्या गर्भावस्था, प्रसव के दौरान या शैशवकाल की किसी समस्या अथवा बीमारी की वजह से बच्चे के दिमाग पर असर होने पर उत्पन्न होती है। किन्तु यह बढ़ने वाली बीमारी नहीं है अतः यदि छोटी अवस्था से ऐसे शिशु को उचिल प्रशिक्षण व सहायक थेरेपी दी जाए तो उसका विकास अच्छा होता है तथा वह काफी हद तक आत्मनिर्भर हो सकता है। केवल गंभीर व अतिगंभीर मंदता वाले बच्चों की आत्मनिर्भरता में दिक्कत होती है परन्तु यह स्थिति मानसिक मंदता के केवल कुछ ही बच्चों में होती है । और यह भी सत्य है कि यह किसी को दोष नहीं है, खासकर माँ को तो बिल्कुल भी नहीं। बच्चों को तो इससे सबसे अधिक तकलीफ होती है क्योंकि इस बच्चे का पालन-पोषण अत्यधिक मेहनत और जिम्मेदारी का काम है जो माँ को ही करना पड़ता है । और यह प्रक्रिया सालों-साल चलती है। माँ के लिए तो इस बच्चे का पालन-पोषण तपस्या के समान है।

दूसरा विचार जो आमतौर पर लोगों के मन में आता है वह यह है कि ये बच्चे कुछ सीख नहीं सकते और ताउम्र अपने घर-परिवार पर बोझ बने रहते हैं। किन्तु असलियत में ये बच्चे काफी कुछ सीख सकते हैं। इनकी सीखने की गति धीमी होती है अतः इनको कार्यात्मक शिक्षा दी जाती है जिससे ये दैनिक जीवन में आत्मनिर्भर हो जाते हैं तथा व्यावसायिक शिक्षा के द्वारा आर्थिक रूप से भी स्वावलंबी बन सकते हैं। जो लोग इन बच्चों के संपर्क में आए होंगे वे जानते होंगे कि ये बच्चे काम सीख लेते हैं उसे बहुत ही कायदे से करते हैं और अपने कार्य के प्रति पूरे ईमानदार होते हैं।

अक्सर हम सब मानसिक मंदता और मनोवैज्ञानिक बीमारियों को एक ही समझते हैं यह बहुत बड़ी गलती है तथा मंदबुद्धि बच्चे के साथ अन्याय है क्योकि मंदबुद्धि बच्चे की कार्यक्षमता, व्यवहार व सोंच अपनी उम्र से काफी कम उम्र के सामान्य बच्चे की तरह होती है तथा उचित मार्गदर्शन से उसका विकास सीघ्र होता है। इसके विपरीत मनोवैज्ञानिक बीमारी में आदमी की सोंच व व्यवहार अप्राकृतिक होता है तथा बिना इलाज यह समस्या बढ़ती जाती है । जबकि मानसिक मंदता के लिए किसी दवा की आवश्यकता नहीं होती है।

अक्सर यह भी देखा गया है कि लोग मंदबुद्धि बच्चों से डरते हैं कि ये दूसरों को नुकसान पहुचायेंगें । इस विचार के एकदम विपरीत, ये बच्चे अक्सर बहुत ही सौम्य व प्यार करने वाले होते हैं। मारपीट तोड़फोड़ आदि व्यवहार संबंधी दोष इनमें अनुचित माहौल की वजह से उत्पन्न हो जाते हैं और सही माहौल देने पर इस तरह के व्यवहार ठीक भी हो जाते हैं। यह जरूर है कि कभी-कभी ये बच्चे अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति उचित तरीके से नहीं कर पाते हैं और हमें उनका व्यवहार अजीब लगता है किन्तु सही प्रशिक्षण से सही अभिव्यक्ति भी ये शीघ्र सीख लेते हैं।
यदि हम यह सोचें कि इन बच्चों के संपर्क में अन्य बच्चे भी गलत आदतें सीख जायेंगें तो हमारे समाज में वैसे भी अनेक बुराइयाँ हैं। जब हम उनसे बचने के लिए अपने बच्चे का उचित मार्गदर्शन कर सकते हैं तो मंदबुद्धि बच्चे की गलत आदतें सीखने से भी हम उन्हें रोक सकते हैं। जरूरत सिर्फ इतनी है कि मंदबुद्धि बच्चों को हम खुले दिल से अपनाएं उन्हें अपने समाज व परिवार का ही एक हिस्सा समझें। रही बात पूजा-पाठ,ब्रत-अनुष्ठान, टोटके आदि की, तो ये सब केवल मन की शांति के लिए ही उपयोगी हैं। बच्चे की स्थिति या उसकी प्रगति में इन सबका कोई असर नहीं होते है अपितु समय ही नष्ट होना है। जिस चीज की इन्हें आवश्यकता है वह है हमारा भरपूर प्यार व प्रोत्साहन इनकी जरूरत यह है कि हम इन्हें पूरी तरह से अपनाएं ओर इनके प्रति सकारात्मक रवैया रखें।

हमारे मानव शरीर में अनेकों अंग हैं और हमेशा हर अंग सूचारू रूप से काम करता रहे यह तो संभव नहीं है। यदि किसी को गुर्दे को रोग होता है, तो हृदय रोग होता है या पेट की या फेफड़े की बीमारी होती है तो हम उसका यथोचित उपचार करवाते हैं किन्तु यदि दिमाग की कार्यक्षमता कुछ कम होती है तो उस इंसान का उपहास करते हैं, भेदभाव करते हैं। क्या यह उचित है? एक बार कलकत्ता की रानी के मंदिर की मूर्ति का हाथ टूट गयी। रानी ने रामकृष्ण परमहंस जी से पूछा कि क्या यह मूर्ति गंगा में प्रवाहित कर दी जाए। परमहंस जी ने उनसे पलट कर सवाल किया कि यदि आपके दामाद का हाथ टूट जाए तो आप क्या करेंगी? परमहंस जी का कहना था कि हमारा हर कृत्य भावनाओं से ही संचालित होता है इसलिए यदि हम इन बच्चों को अपने समाज और परिवार का हिस्सा मानकर चलें तो इनके प्रति हमारा नज़रिया स्वयं बदल जाएगा।

आज हमारा फर्ज़ यह है कि इन बच्चों को छोटी उम्र से उचित शिक्षण-प्रशिक्षण दिया जाए, इनकी कमजोरियों को दूर करने के लिए उचित उपाय किए जायें और इनके हुनर को बढ़ावा देने के लिए उचित अवसर दिए जाएं। बच्चे की स्थिति को समझते हुए उनकी क्षमता के अनुसार उन्हें कार्य सिखाया जाए जिससे वे अपना कार्य स्वयं बेहतर ढंग से कर पाएं तथा घर समाज का उपयोगी किस्सा बन सकें।

बच्चों के अलावा और जिनको समाज की सही सोंच व सहायता की आवश्यकता है वह हैं इन बच्चों के अभिभावक! बच्चों के साथ-साथ वे भी समाज से कटते जाते हैं। अपने बच्चे की स्थिति व उसके भविष्य को स्वीकार कर पाना ही उनके लिए काफी मुश्किल हो जाता है, ऊपर से बच्चे के प्रति दूसरों की उपेक्षा व तिरस्कार भी मिलता है। इसके साथ-साथ बच्चे की परवरिश की अतिरिक्त जिम्मेदारी का दबाव अभिभावकों में कई बार अवसाद व हीन-भावना की स्थिति उत्पन्न कर देता है। कई बार वे इस स्थिति को स्वीकार करने में असमर्थ होते हैं और पलायन-वादी रवैया अपना लेते हैं। वे बच्चे की जरूरतों को अनदेखा करके अन्य चीजों में अपनी खुशियाँ ढूढ़ने लगते हैं लेकिन उनका कर्तव्य बोध उन्हें वहां भी खुश नहीं रहने देता।

इस सब का सीधा असर बच्चे पर ही पड़ता है क्योंकि जो उसके सीखने की उम्र है वो तो इन्हीं सब बातों में निकल जाती है और जितना विकास हो सकता था वो नहीं होता है। इसके अलावा समुचित प्यार व देखभाल के अभाव में बच्चे में व्यवहार संबंधी दोष भी उत्पन्न हो जाते हैं जो कि उसके विकास में बाधक होते है तथा घरवालों के लिए भी कष्टकारी होते हैं।

इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए हम सब को यह सोंचना है कि क्या हममें से कोई भी संपूर्ण हैं? कमियां तो सभी में होती हैं। ऐसे में इन बच्चों का तिरस्कार करना क्या उचित है? किसी ना किसी रूप में ईश्वर की उपासना हम सभी करते हैं तो फिर ईश्वर की इस रचना की उपेक्षा करना क्या न्याय-संगत है? वह बच्चा जो अपनी जरूरत और इच्छा व्यक्त करने तक में असमर्थ है और वे अभिभावक जो तन-मन धन से अपने बच्चे की सेवा में लगे रहते हैं, क्या उपहास के पात्र है अथवा प्रशंसा व संवेदना के ?
यदि ऐसा कोई भी बच्चा आपके परिवार या पास-पड़ोस में है तो उसके समुचित विकास के लिए हम क्या कर सकते हैं इसके विषय में जानकारी अगले स्तम्भ में..........।

लेखिकाः दो० दीप्ति मिश्रा, जो एम0बी0एस0डाक्टर हैं, अब संकल्प डे केयर सेन्टर के नाम से मंदबुद्धि बच्चों के लिए एनजीओ मेकरबर्ट हास्पिटल, सिविल लाइन्स में चलाती हैं।

प्रस्तुत द्वारा: चुन्नीलाल (सिटिज़न न्यूज़ सर्विस)

1 comment:

Rajneesh Shukla said...

mai chunnilal ji aur dr. deepti ke prayason ki sarahna karta hoon ki unhone is vishay par logon ko awagat karaya |