अस्थमा/ दमा कार्यक्रम की अब और न उपेक्षा हो

इंटरनेशनल यूनियन अगेन्स्ट टूबेर्कुलोसिस अँड लंग डीसीज़ (द यूनियन) की ‘ग्लोबल अस्थमा रिपोर्ट 2011’ के अनुसार बच्चों की दीर्घकालिक बीमारियों में से सबसे अधिक अनुपात अस्थमा/ दमा का है। विश्व में 23.5 करोड़ लोग अस्थमा से प्रभावित हैं। 'द यूनियन' के निदेशक डॉ निल्स बिल्लो के अनुसार “अस्थमा नियंत्रण न करने के कारण जो संसाधन व्यर्थ जाते हैं और जितनी पीड़ा लोगों को झेलनी पड़ती है उसकी कीमत प्रभावकारी अस्थमा नियंत्रण से कहीं ज्यादा है”।

अधिकांश अस्थमा के रोगी आकस्मिक चिकित्सा सेवा में ही आते हैं जब तीव्र अस्थमा अटैक पड़ता है। यदि अस्थमा के रोगियों के पास गुणात्मक दृष्टि से उत्तम और आर्थिक रूप से वहन करने योग्य कीमत पर ‘इन्हेलर’ उपलब्ध हों तो अस्थमा नियंत्रित रह सकता है। परंतु अधिकांश अस्थमा से जूझ रहे लोगों तक गुणात्मक दृष्टि से उत्तम, प्रभावकारी और सस्ते ‘इन्हेलर’ नहीं पहुँचते। स्वास्थ्य प्रणाली में अस्थमा नियंत्रण से संबन्धित प्रशिक्षण और एक प्रभावकारी अस्थमा नियंत्रण कार्यक्रम का भी अभाव है।

भारत में अस्थमा: भारत में 2.4 करोड़ लोग अस्थमा से जूझ रहे हैं जिनमें से 11.8% तक बच्चे हैं। अस्थमा के सबसे समान लक्षण ख़ासी, सांस फूलना है जो एलर्जी पैदा करने वाले तत्वों से अधिक भीषण होता है।  आनुवांशिक कारणों के अलावा अनेक बाहरी ऐसे तत्व हैं जो ऐलर्जी पैदा करने से अस्थमा को तीव्र करते हैं जैसे कि फूल का पोलन, धूल, तंबाकू धुआँ, लकड़ी के चूल्हे का धुआँ, ट्रेफिक धुआँ, और अन्य कारण जैसे कि मानसिक तनाव, विशेष भोजन सामग्री, ऐसिडिटी, मोटापा, मौसम बदलाव, आदि। 

चूंकि अस्थमा के लक्षण अन्य रोग जैसे कि टीबी आदि से मिलते-जुलते हैं इसलिए अस्थमा की सही पहचान करने में अकसर बाधा आती है (विशेषकर बच्चों में) और अस्थमा की चिकित्सकीय पहचान, उपचार नहीं होता या विलंब से होता है। लखनऊ के वरिष्ठ चेस्ट रोग विशेषज्ञ डॉ बी.पी.सिंह के अनुसार “यदि बच्चे को निरंतर खांसी और श्वासनली के ऊपरी भाग का संक्रमण हो तो अकसर चिकित्सक उसे गलती से ‘प्राइमरी कॉम्प्लेक्स’ समझ कर टीबी का इलाज आरंभ कर देते हैं। यह बेहद चिंता का विषय है क्योंकि ऐसे केस में न केवल रोग की गलत पहचान हो जाती है बल्कि दवा का भी दुरुपयोग हो जाता है”।

अस्थमा का इलाज मुमकिन नहीं है परंतु इसका नियंत्रण सहजता से संभव है। इसीलिए अस्थमा के साथ जीवित लोगों की जागरूकता आवश्यक है जिससे कि वें स्वस्थ और सामान्य ज़िंदगी जी सकें। डॉ बी.पी.सिंह का कहना है कि “समस्या यह है कि आम लोगों में अस्थमा संबन्धित जागरूकता पर्याप्त नहीं है और अधिकांश अस्थमा रोगी ऐसे उपयुक्त अस्पताल जहां अस्थमा संबन्धित चिकित्सकीय सेवा सही से मिल पाये, तक नहीं पहुँच पाते। मुंबई में हुए शोध के अनुसार अनेक चिकित्सकों तक को अस्थमा का चिकित्सकीय इलाज/ नियंत्रण संबन्धित पर्याप्त ज्ञान नहीं था”।

‘इन्हेलर’: अस्थमा नियंत्रण का सही तरीका ‘इन्हेलर’ के जरिये है। कोर्टिको-स्टीरोइड को ‘इन्हेलर’ द्वारा श्वास में अंदर लेने से अस्थमा नियंत्रित रहता है, और यह ‘इन्हेलर’ का उपयोग नशा नहीं होता और कोई अन्य विपरीत लक्षण (साइड इफैक्ट) भी नहीं होता। द यूनियन के फेफड़े-रोग विभाग के निदेशक डॉ चियांग चेन युआन के अनुसार “‘इन्हेलर’ के जरिये कोर्टिको-स्टीरोइड को श्वास द्वारा अंदर लेने से अधिकांश अस्थमा रोगी अस्थमा नियंत्रित कर सकते हैं। दुर्भाग्य की बात है कि अधिकांश अस्थमा रोगी कोर्टिको-स्टीरोइड को ‘इन्हेलर’ द्वारा नहीं ले पाते। शोध के अनुसार 20% से कम अस्थमा रोगी कोर्टिको-स्टीरोइड को ‘इन्हेलर’ द्वारा ले पाते हैं”।

भारत में 70% से अधिक अस्थमा रोगी ओरल या मुख से दवा लेते है (और न कि ‘इन्हेलर’ से)। डॉ बी.पी.सिंह के अनुसार “भारत में अस्थमा रोगी अकसर कोर्टिको-स्टीरोइड को ‘इन्हेलर’ द्वारा श्वास में नहीं ले पाते हैं क्योंकि चिकित्सकीय परामर्श का अभाव है, लोग दवा नियमित नहीं लेते, या इस दवा से संबन्धित अनेक भ्रांतियाँ है जैसे कि इससे विपरीत लक्षण या साइड इफैक्ट होंगे आदि”।

अस्थमा देखभाल और नियंत्रण मुमकिन है: छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के पलमोनरी मेडिसिन विभाग के प्रमुख प्रोफेसर (डॉ0) सूर्य कान्त के अनुसार “‘इन्हेलर’ द्वारा दी गयी दवा की कीमत रुपया 4-5 प्रति दिन आती है और अस्थमा इलाज इसीलिए सबसे सस्ते इलाजों में से एक है। ‘इन्हेलर’ चश्मे की तरह हैं, जैसे कि जिस व्यक्ति की आँख कमजोर हो वो चश्मा लगाता है उसी तरह जिस व्यक्ति की ‘ब्रोंकीयल नली’ कमजोर है वो ‘इन्हेलर’ का उपयोग करता है। जिस तरह हम लोग रोजाना दंत मंजन करते हैं उसी तरह अस्थमा रोगी को सुबह और शाम ‘इन्हेलर’ से दवा लेनी चाहिए। इससे अस्थमा नियंत्रण प्रभावकारी ढंग से हो पाएगा। जल-नेति करने से भी ऐलर्जी पैदा करने वाले तत्व साफ हो जाते हैं। अस्थमा रोगी को अन्य ऐसे कारण जिनसे अस्थमा तीव्र हो सकता है जैसे कि तंबाकू धुआँ, मानसिक तनाव, आदि से भी बचना चाहिए”।

हमारा मानना है कि यदि अस्थमा नियंत्रण प्रभावकारी और व्यवस्थित ढंग से बिना विलंब नहीं किया गया तो इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। न केवल अस्थमा रोगी को स्वस्थ और सामान्य जीवन-यापन करने का अधिकार है बल्कि अस्थमा नियंत्रण सरल भी है बशर्ते कार्यक्रम समुचित  ढंग से लागू किया जाये।

बाबी रमाकांत - सी.एन.एस.

भारत में दवा प्रतिरोधक टीबी के बढ़ते हुए प्रकोप को चाहिए अधिक प्रतिक्रिया

“भारत में दवा प्रतिरोधक टीबी के बढ़ते हुए प्रकोप को देखते हुए यह अत्यावश्यक हो गया है कि टीबी उपचार एवं निजी बाज़ार में टीबी दवाओं के नियंत्रण से संबन्धित समस्याओं का तुरंत निराकरण किया जाय”। ऐसा मानना है ‘मेडिसिन्स सांस फ़्रंटियर (एमएसएफ)/सीमा रहित डाक्टर’ नामक अंतर्राष्ट्रीय चिकित्सीय मानवतावादी संस्था का, जिसका अनुमोदन जन स्वास्थ्य अभियान, स्टॉप टीबी पार्टनरशिप, तथा दिल्ली नेटवर्क आफ पोसिटिव पीपुल (डीएनपी+) ने भी किया है।
     
औषधि प्रतिरोधक टीबी के रोगियों की संख्या के अनुसार भारत का विश्व में दूसरा स्थान है, तथा अनुमानत: भारत में प्रत्येक वर्ष औषधि प्रतिरोधक (ड्रग रेजिस्टेंट) टीबी अथवा डीआर टीबी के 99,000 नए रोगी होते हैं। परंतु फिर भी 2010 में इनमें से केवल 2% रोगियों को ही राष्ट्रीय कार्यक्रम के अंतर्गत ‘सेकंड लाइन ट्रीटमेंट’ उपलब्ध हो पाया।
     
जन स्वास्थ्य अभियान के डा अमित सेनगुप्ता के अनुसार, “यह बात तो साफ है कि भारत में दवा प्रतिरोधक टीबी का संक्रमण बढ़ रहा है। औषधि प्रतिरोधकता के आविर्भाव की स्थितियाँ निजी स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र तथा सरकारी कार्यक्रमों, दोनों में व्याप्त हैं"।

भारत के संशोधित राष्ट्रीय टीबी नियंत्रण कार्यक्रम (आरएनटीसीपी) के अंतर्गत टीबी रोगियों को प्रतिदिन के स्थान पर एक दिन के अंतराल पर दवा दी जाती है। इससे दवा की खुराक छूट जाने का खतरा बढ़ जाता है जो दवा प्रतिरोधक टीबी कीटाणुओं की उत्पत्ति को बढ़ावा देता है। इसके अलावा यह कार्यक्रम ऐसे उपचार परामर्श पर भी पैसे खर्च नहीं करता जो नियमित दवा लेने में सहायक हो सकता है।
     
डीएनपी+ के हरी शंकर के अनुसार, “आरएनटीसीपी का ‘डाट्स’ माडल अपनी टीबी उपचार पद्धति के द्वारा रोगियों को अपना इलाज पूरा करने की क्षमता और प्रोत्साहन नहीं प्रदान करता है, जिसके चलते इलाज में व्यवधान की संभावना बढ़ जाती है। यह न केवल रोगियों के लिए हानिकारक है, वरन औषधि प्रतिरोधकता का भी विस्तार करती है। उचित परामर्श के चलते ही मेरे जैसे अन्य एड्स रोगी स्वयं ही अपनी एचआईवी दवाओं की बंधी हुई खुराक रोज़ खा लेते हैं - बिना किसी स्वास्थ्यकर्मी के सामने जाये। टीबी कार्यक्रम को भी ऎसी उपचार संहिता  (प्रोटोकॉल) बनानी चाहिए जो सरल हो तथा जिन पर आसानी से अमल किया जा सके। इसमें रोगी को उचित परामर्श देना भी शामिल होना चाहिए, जैसा कि एड्स उपचार के लिए किया गया है।“
     
एमएसएफ के मुंबई स्थित एचआईवी क्लीनिक में एड्स के रोगी अधिकतर काफी खराब हालत में पहुँचते हैं तथा अक्सर उनकी डीआर टीबी का इलाज शुरू होने से पहले ही उनकी मृत्यु हो जाती है। इनमें से अधिकांश अपना इलाज प्राइवेट सेक्टर में करा चुके होते हैं जहां टीबी की उचित दवा और खुराक न मिलने के कारण उनकी हालत बिगड़ जाती है।
     
एमएसएफ के भारत स्थित कार्यालय के प्रमुख पिएरो गंदीनी का मानना है कि, “प्राइवेट मार्केट में विभिन्न प्रकार की टीबी दवाओं की प्रचुरता तथा बिना डाक्टर के पर्चे के एंटीबायोटिक्स की सरल उपलब्धता (जिनमें से कुछ डीआर टीबी के इलाज में भी प्रयोग की जाती हैं) ही औषधि प्रतिरोधकता की वृद्धि को बढ़ावा देती है। डीआर टीबी के गंभीर स्वरूप के बढ़ते हुए फैलाव को रोकने के लिए यह नितांत आवश्यक है कि प्राइवेट सेक्टर में टीबी दवाओं की बिक्री और संचालन को नियंत्रित किया जाय। “स्टॉप टीबी पार्टनरशिप की ब्लेसिना कुमार ने कहा, “पूरे विश्व की निगाहें भारत में डीआर टीबी के बढ़ते हुए संकट पर लगी हैं। अब जब हमारे पास ऐसी नई जाँचें उपलब्ध हैं जिनके द्वारा 2 घंटे से भी कम समय में डीआर टीबी की पक्की जांच की जा सकती है, तो अब सही समय है कि सरकार तुरंत ही आवश्यक कदम उठा कर अपने राष्ट्रीय कार्यक्रम में डीआर टीबी के निदान और उपचार की उपलब्धता की समुचित व्यवस्था कराये, ताकि अधिक से अधिक रोगियों को उचित मात्रा में दवा मिल सके और भारत में इस बीमारी का प्रकोप कम हो सके।“
     
ज्ञात रहे कि सदियों पुरानी बीमारी होने के बावजूद, वर्तमान में विश्व स्तर पर मृत्यु का दूसरा सबसे बड़ा कारण टीबी रोग ही है, और टीबी का इलाज करने वाली फ़र्स्ट लाइन ड्रग्स के प्रतिरोधी रोगियों की संख्या में वृद्धि हो रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रत्येक वर्ष भारत में टीबी से 20 लाख नए रोगी ग्रसित होते हैं जो विश्व भर में सबसे अधिक है, तथा डीआर टीबी के प्रति वर्ष 99,000 नए रोगी बनने के कारण इस बीमारी में भारत का स्थान विश्व में दूसरे नंबर पर है। डीआर टीबी: यह टीबी का वो प्रकार है जो प्रथम चरण (फ़र्स्ट लाइन) टीबी औषधियों का प्रतिरोधी है। रोगी डीआर टीबी से प्रत्यक्ष रूप से संक्रमित हो सकता है अथवा यह उसमें तब विकसित होती है जब टीबी की प्रथम चरण दवाएं या तो उचित मात्रा में न ली गई हों या उपचार की अवधि पूरी न की गई हो। भारत में डीआर टीबी की समस्या को अधिक गंभीर बनाने में अनियंत्रित निजी स्वास्थ्य सेवा का बहुत बड़ा योगदान है, जहां अविवेकपूर्ण ढंग से और अनुचित मात्रा में दवा निर्धारित किए जाने के कारण दवा प्रतिरोधकता बढ़ती है और साथ साथ डीआर टीबी भी। एक अध्ययन के अनुसार भारत में 4 फ़र्स्ट लाइन टीबी औषधियों के 48 विभिन्न प्रकार के ‘फिक्स्ड डोसेज कांबिनेशन’ एवं 22 विभिन्न ‘सिंगल ड्रग निरूपण’ उपलब्ध हैं।
    
डीआर टीबी का उपचार पुरानी एंटी बायोटिक्स पर निर्भर करता है, जिनके विकट दुष्प्रभाव होते हैं, जैसे जी मिचलाना, बहरापन, मनोविकृति, आदि। रोगी को दो वर्ष तक प्रत्येक दिन 17 गोलियां खानी होती हैं और 6 महीने तक कष्टदायक इंजेक्शन भी लगवाने पड़ते हैं।

एमएसऍफ़ नामक अंतर्राष्ट्रीय चिकित्सीय मानवतावादी संस्था लगभग 70 देशों में अति संवेदनशील जनसमुदायों को उच्च-कोटि की नि:शुल्क चिकित्सीय सहायता उपलब्ध कराती है, तथा 29 देशों में डीआर टीबी के रोगियों का इलाज करती है.   और हर वर्ष 1000 नए रोगी इस इलाज के लिए भर्ती होते हैं। 2006 से यह संस्था मुंबई के खार इलाके में एड्स के इलाज के लिए एक ‘एंटी रेट्रो वाइरल ट्रीटमेंट (आए.आर.टी.) सेंटर चला रही है, जिनमें उन एचआईवी+ रोगियों पर विशेष ध्यान दिया जाता है जो डीआर टीबी से भी संक्रमित हैं। वर्तमान में इस क्लीनिक में 29 डीआर टीबी के रोगियों का इलाज हो रहा है।

डीआर टीबी के उपचार के लिए बनाई गईं अपनी मेडिकल योजनाओं में एमएसएफ ने समुदाय केन्द्रित मॉडल अपनाया है। एमएसएफ के द्वारा उपचार करा रहे  रोगियों को मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक सहायता मिलती है तथा वे अपने समुदाय में रह कर ही अपना उपचार करवाते हैं। उन्हे इस बात का इख्तियार होता है कि वे अपनी दवा और इंजेक्शन अपने घर पर या घर के पास से ले सकते हैं। यह पद्धति सेवाओं को रोगी की आवश्यकताओं के अनुकूल बनाने की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है। तथा इससे उनकी यह क्षमता भी बढ़ती है कि दवाओं के विकट दुष्प्रभावों के बावजूद वे अपना 2 साल तक चलने वाला इलाज भली भांति पूरा कर सकें।

शोभा शुक्ला - सी.एन.एस. 

सच्ची मुच्ची - अप्रैल 2012 अंक

सच्ची मुच्ची, जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय की हिन्दी मासिक पत्रिका है। यह सच्ची मुच्ची का अप्रैल 2012 का अंक है।

क्या मायावती का दलित वोट बैंक खिसका है?

हाल में उत्तर प्रदेश में असेम्बली के चुनाव परिणाम घोषित होने पर मायावती ने अपनी हार के कारण गिनाते हुए यह दावा किया था कि बेशक वह यह चुनाव हार गयी हैं परन्तु उसका दलित वोट बैंक बिलकुल बरकरार है. अब अगर चुनाव परिणामों का विश्लेषण किया जाये तो मायावती का यह दावा बिलकुल खोखला साबित होता है.

आईये सब से पहले उत्तर प्रदेश में दलितों कि आबादी देखी जाये और फिर उसमें मायावती को मिले वोटों का आंकलन किया जाये. उत्तर प्रदेश में दलितों कि आबादी कुल आबादी का २१% है और उनमे लगभग ६६ उपजातियां हैं जो सामाजिक तौर पर बटी हुयी हैं. इन उप जातियों में जाटव /चमार - ५६.३%, पासी - १५.९%, धोबी, कोरी और बाल्मीकि - १५.३%, गोंड, धानुक और खटीक - ५% हैं. नौ अति- दलित उप जातियां - रावत, बहेलिया खरवार और कोल ४.५% हैं. शेष ४९ उप जातियां लगभग ३% हैं. चमार/ जाटव आजमगढ़, आगरा, बिजनौर , सहारनपुर, मुरादाबाद, गोरखपुर, गाजीपुर, सोनभद्र में हैं. पासी सीतापुर, राय बरेली, हरदोई, और इलाहाबाद जिलों में हैं. शेष समूह जैसे धोबी, कोरी, और बाल्मीकि लोगों की अधिकतर आबादी बरेली, सुल्तानपुर, और गाज़ियाबाद जनपदों में है.

आबादी के उपरोक्त आंकड़ों के आधार पर अगर मायावती की बसपा पार्टी को अब तक बिभिन्न चुनावों में मिले दलित वोटों और सीटों का विश्लेषण करना उचित होगा. अब अगर वर्ष २००७ में हुए विधान सभा चुनाव का विश्लेष्ण किया जाये तो यह पाया जाता है कि इस चुनाव में बसपा को ८९ अरक्षित सीटों में से ६२ तथा समाजवादी (सपा) पार्टी को १३, कांग्रेस को ५ तथा बीजेपी को ७ सीटें मिली थीं. इस चुनाव में बसपा को लगभग ३०% वोट मिला था. इस से पहले २००२ में बसपा को २४ और सपा को ३५ अरक्षित सीटों में विजय प्राप्त हुई थी. वर्ष २००४ में हुए लोक सभा चुनाव में बसपा को कुल आरक्षित १७ सीटों में से ५ और सपा को ८ सीटें मिली थी और बसपा का वोट बैंक ३०% के करीब था.

वर्ष २००९ में हुए लोक सभा चुनाव में बसपा को आरक्षित १७ सीटों में से २, सपा को १० और कांग्रेस को २ सीटें मिली थीं. इस चुनाव में बसपा का वोट बैंक २००७ में मिले ३०% से गिर कर २७ % पर आ गया था. इसका मुख्य कारण दलित वोट बैंक में आई गिरावट थी क्योंकि तब तक मायावती के बहुजन के फार्मूले को छोड़ कर सर्वजन फार्मूले को अपनाने से दलित वर्ग का काफी हिस्सा नाराज़ हो कर अलग हो गया था. यह मायावती के लिए खतरे की पहली घंटी थी परन्तु मायावती ने इस पर ध्यान देने की कोई ज़रुरत नहीं समझी.

अब अगर २०१२ के विधान सभा चुनाव को देखा जाये तो इस में मायावती की हार का मुख्य कारण अन्य के साथ साथ दलित वोट बैंक में आई भारी गिरावट भी है. इस बार मायावती ८५ आरक्षित सीटों में से केवल १५  ही जीत पायी है जबकि सपा ५५  सीटें जीतने में सफल रही है. इन ८५ आरक्षित सीटों में ३५ जाटव/चमार और २५ पासी जीते हैं. इस में सपा के २१ पासी और मायावती के २ पासी ही जीते हैं मायावती की १६ आरक्षित सीटों में से २ पासी और १३ जाटव/चमार जीते हैं. इस विश्लेषण से स्पष्ट है कि इस बार मायावती की आरक्षित सीटों  पर हार का मुख्य कारण दलित वोटों में आई गिरावट भी है. इस बार मायावती का कुल वोट प्रतिशत २६% रहा है जो कि २००७ के मुकाबले में लगभग ४% घटा है.

मायावती दुआरा २०१२ में जीती गयी १५  आरक्षित सीटों का विश्लेषण करने से पता चलता है कि उन्हें यह सीटें अधिकतर पशिचमी उत्तर प्रदेश में ही मिली हैं यहाँ पर उसकी जाटव उपजाति अधिक है. मायावती को पासी बाहुल्य क्षेत्र में सब से कम और कोरी बाहुल्य क्षेत्र में भी बहुत कम सीटें मिली हैं.

पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश में यहाँ पर चमार उपजाति का बाहुल्य है वहां पर भी मायावती को बहुत कम सीटें मिली हैं.  मायावती को पशिचमी उत्तर प्रदेश से ७ और बाकि उत्तार प्रदेश से कुल ८ सीटें मिली हैं. इस चुनाव
में यह भी उभर कर आया है कि जहाँ एक ओर मायावती का पासी, कोरी, खटीक, धोबी और बाल्मीकि वोट खिसका है वहीँ दूसरी ओर चमार/जाटव वोट बैंक जिस में लगभग ७०% चमार (रैदास) और ३०% जाटव हैं में से अधिकतर चमार वोट भी  खिसक गया है. इसी कारण से मायावती को केवल पशिचमी उत्तर परदेश जो कि जाटव बाहुल्य क्षेत्र है में ही अधिकतर सीटें मिली हैं. एक सर्वेक्षण के अनुसार मायावती का लगभग ८% दलित वोट बैंक टूट गया है.

मायावती के दलित वोट बैंक खिसकने का मुख्य कारण मायावती का भ्रष्टाचार, कुशासन, विकासहीनता, दलित उत्पीडन की उपेक्षा और तानाशाही रवैया  रहा है. मायावती द्वारा  दलित समस्याओं को नज़र अंदाज़ कर अँधा धुंद मूर्तिकर्ण को भी अधिकतर दलितों ने पसंद नहीं किया है. सर्वजन को खुश रखने के चक्कर में मायावती द्वारा  दलित उत्पीडन को नज़र अंदाज़ करना भी दलितों के लिए बहुत दुखदायी सिद्ध हुआ है. दलितों में एक यह भी धारणा पनपी है कि मायावती सरकार का सारा लाभ केवल मायावती की उपजाति खास करके चमारों/जाटवों को ही मिला है जो कि वास्तव में पूरी तरह सही नहीं है. इस से दलितों की गैर चमार/जाटव उपजातियां प्रतिक्रिया में मायावती से दूर हो गयी हैं. अगर गौर से देखा जाये तो यह उभर कर आता है की मायावती सरकार का लाभ केवल उन दलितों को ही मिला है जिन्होंने मायावती के व्यक्तिगत भ्रष्टाचार में सहयोग दिया है. इस दौरान यह भी देखने को मिला है की जो दलित मायावायी के साथ नहीं थे बसपा वालों ने उन को भी प्रताड़ित किया है. उनके उत्पीडन सम्बन्धी मामले थाने पर दर्ज नहीं होने दिए गए. कुछ लोगों का यह भी आरोप है कि मायावती ने अपने काडर के एक बड़े हिस्से को शोषक, भ्रष्ट और लम्पट बना दिया है जिसने दलितों का भी शोषण किया है. यही वर्ग मायावती के भ्रष्टाचार, अवसरवादिता और दलित विरोधी कार्यों को हर तरीके से उचित ठहराने में लगा रहता है. दलित काडर का भ्रष्टिकरण दलित आन्दोलन की सब से बड़ी हानि है.

 इस के अतिरिक्त बसपा कि हार का एक कारण यह भी है कि मायावती हमेशा यह शेखी बघारती रही है कि मेरा वोट  बैंक हस्तान्तार्नीय है. इसी कारण से मायावती अस्सेम्ब्ली और पार्लियामेंट के  टिकटों को धड़ल्ले से ऊँचे
दामों में बेचती रही और दलित उत्पीड़क, माफिया और अपराधियों एवं धनबलियों को टिकेट देकर दलितों को उन्हें वोट  देने के लिए आदेशित करती रही. इस बार दलितों ने मायावती के इस आदेश को नकार दिया और बसपा को वोट  नहीं दिया. दूसरे दलितों में बसपा के पुराने मंत्रियों और विधायकों के विरुद्ध अपने लिए  ही कमाने के सिवाय आम लोगों के लिए कुछ भी न करने के कारण प्रबल आक्रोश था और इस बार  वे उन्हें हर हालत में  हराने के लिए कटिबद्ध थे. तीसरे मायावती ने सारी सत्ता अपने हाथों में केन्द्रित  करके तानाशाही रवैय्या अपना रखा था जिस कारण उस के मंत्री और विधायक बिलकुल असहाय हो गए थे  और वे जनता के लिए कुछ भी न कर सके  जो उनकी  हार का कारण बना.

मायावती की अवसरवादी और भ्रष्ट राजनीति का दुष्प्रभाव यह है कि आज दलितों को यह नहीं पता है कि उन का दोस्त कौन है और दुश्मन कौन है. उनकी मनुवाद और जातिवाद के विरुद्ध लड़ाई भी कमज़ोर पड़ गयी है क्योंकि बसपा के इस तजुर्बे ने दलितों में भी एक भ्रष्ट और लम्पट वर्ग पैदा कर दिया है जो कि जाति लेबल का प्रयोग केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए ही करता है. उसे दलितों के व्यापक मुद्दों से कुछ लेना देना नहीं है. एक विश्लेषण के अनुसार उत्तर प्रदेश के दलित आज भी विकास की दृष्टि से बिहार, उड़ीसा और मध्य प्रदेश के दलितों को छोड़ कर भारत के शेष अन्य सभी राज्यों के दलितों की अपेक्षा पिछड़े हुए हैं. उतर प्रदेश के लगभग ६०% दलित गरीबी की रेखा से नीचे जी रहे हैं. लगभग ६०% दलित महिलाएं कुपोषण का शिकार हैं. एक ताजा सर्वेक्षण के अनुसार ७०% दलित बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. अधिकतर दलित बेरोजगारी और उत्पादन के साधनों से वंचित हैं. मायावती ने सर्वजन के चक्कर में भूमि सुधारों को जान बूझ कर नज़र अंदाज़ किया जो कि दलितों के सशक्तिकरण का सबसे बड़ा हथियार हो सकता था. मायावती के सर्वव्यापी भ्रष्टाचार के कारण आम लोगों के लिए उपलब्ध कल्याणकारी योजनायें जैसे मनरेगा, राशन वितरण व्यवस्था , इंदिरा आवास, आंगनवाडी केंद्र और वृद्धा, विकलांग और विधवा पेंशन आदि भ्रष्टाचार का शिकार हो गयीं और दलित एवं
अन्य गरीब लोग इन के लाभ से वंचित रह गए. मायावती ने अपने आप को सब लोगों से अलग कर लिया और लोगों के पास अपना दुःख/कष्ट रोने का कोई भी अवसर न बचा. इन कारणों से दलितों ने इस चुनाव में मायावती को बड़ी हद तक नकार दिया जो कि चुनाव नतीजों से परिलक्षित है.

कुछ लोग मायावती को ही दलित आन्दोलन और दलित राजनीति का प्रतिनिधि मान कर यह प्रशन उठाते हैं कि मायावती के हारने से दलित आन्दोलन और दलित राजनीति पर क्या असर पड़ेगा. इस संबंध में यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि मायावती पूरे  दलित आन्दोलन का प्रतिनधित्व नहीं करती है. मायावती केवल एक
राजनेता है जो कि दलित राजनीति कर रही है वह भी एक सीमित क्षेत्र : उत्तर प्रदेश और उतराखंड में ही. इस के बाहर दलित अपने ढंग से राजनीति कर रहे हैं. वहां पर बसपा का कोई अस्तित्व नहीं है. दूसरे दलित आन्दोलन के अन्य पहलू सामाजिक और धार्मिक  हैं जिन पर दलित अपने आप आगे बढ़  रहे हैं. धार्मिक आन्दोलन के अंतर्गत दलित प्रत्येक वर्ष बौद्ध धम्म  अपना रहे हैं और सामाजिक स्तर में भे उनमें काफी नजदीकी आई है. यह कार्य अपने आप हो रहा है और होता रहेगा. इस में मायावती का न कोई योगदान  रहा है और न ही
उसकी कोई ज़रुरत भी है. यह डॉ. आंबेडकर दुआरा प्रारम्भ किया गया आन्दोलन है जो की स्वत सफूर्त है.हाँ इतना ज़रूर है कि इधर मायावती ने एक आध बौद्ध विहार बना कर बौद्ध धम्म के प्रतीकों  का राजनीतक इस्तेमाल ज़रूर किया है. यह उल्लेखनीय है मायावती ने न तो स्वयं बौद्ध धम्म अपनाया है और न ही कांशी राम ने अपनाया था. उन्हें दर असल बाबा साहेब के धर्म परिवर्तन के जाति उन्मूलन में महत्व में कोई विश्वास ही नहीं है. वे  तो राजनीति में जाति के प्रयोग के पक्षधर हैं न कि उसे तोड़ने के.  उन्हें बाबा साहेब के जाति विहीन और वर्ग विहीन समाज कि स्थापना के लक्ष्य में कोई विश्वास नहीं है. वे दलितों का राजनीति में जाति वोट बैंक के रूप में ही प्रयोग करके जाति राजनीति को कायम रख कर अपने लिए लाभ  उठाना चाहते हैं.

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि मायावती का यह दावा कि उसका दलित वोट बैंक बिलकुल नहीं खिसका है सत्यता से बिलकुल परे है. शायद मायावती अभी भी दलितों को अपना गुलाम समझ कर उस से ही जुड़े रहने की खुश फहमी पाल रही है. मायावती की यह नीति कोंग्रेस की दलितों और मुसलामानों के प्रति लम्बे समय
तक अपनाई गयी नीति का ही अनुकरण  है. मायावती दलितों को यह जिताती रही है कि केवल मैं ही आप को बचा सकती हूँ कोई दूसरा नहीं. इस लिए मुझ से अलग होने की बात कभी मत सोचिये. दूसरे दलितों के उस से किसी भी  हालत में अलग न होने के दावे से वह दूसरी पार्टियों को दलितों से दूरी बनाये रखने की चाल भी चल रही है ताकि दलित अलगाव में पद उस के गुलाम बानर रहें. पर  अब दलित मायावती के छलावे से काफी हद तक  मुक्त हो गए हैं. अब यह पूरी सम्भावना है की उत्तर प्रदेश के दलित मायावती के बसपा प्रयोग से सबक लेकर एक मूल परिवर्तनकारी  अम्बेडकरवादी राजनीतिक विकल्प की तलाश करेंगे और जातिवादी राजनीति से बाहर निकल कर मुद्दा आधारित जनवादी राजनीति में प्रवेश करेंगे.  केवल इसी  से उनका राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक सशक्तिकर्ण एवं मुक्ति हो सकती है.

एस. आर. दारापुरी आई. पी.एस. (से. नि.)

बच्चों में टीबी रोग की पहचान और संक्रमण- एक बड़ी चुनौती

टीबी रोग का निदान मुमकिन है, लेकिन बच्चों में समय रहते इसकी पहचान समाज में आज भी एक गंभीर समस्या के रूप में विद्यमान है जिसका अंदाजा इसी से होता है कि 14 वर्षीय एक टीबी रोगी बच्चे के अभिभावकों के अनुसार “बच्चे को एक साल पहले से खांसी आ रही थी, और गैर सरकारी चिकित्सक का इलाज चल रहा था। पाँच महीने पहले सरकारी अस्पताल में दिखाया और एक्स रे कराया, बलगम जांच कराई गई तब पता चला कि टीबी है और वहीं इलाज शुरू किया गया”

पिछले वर्ष विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा प्रकाशित “ग्लोबल टीबी कंट्रोल रिपोर्ट 2011” के अनुसार इस साल 90 लाख टीबी रोगी मे से 10% से 15% टीबी रोगी 14 वर्ष व उससे कम वर्ष के बच्चे हैं जिनको इलाज की ज़रूरत होगी। यह आंकड़ा दिन प्रति दिन बढ़ता रहेगा यदि हम बच्चो में टीबी संक्रमण को रोकने में विफल रहे। चूंकि बच्चो में टीबी संक्रमण का एक प्रमुख कारण बड़ों की टीबी है, अतः बच्चों में टीबी संक्रमण को रोकने के लिए परिवार के सदस्यों व अभिभावकों की टीबी के बारे में साक्षरता बहुत ज़रूरी है। 6 वर्षीय एक टीबी रोगी की माता का कहना कि “बच्चे के पिता जी को भी टीबी हो चुकी थी जिसका इलाज डाट्स केन्द्र पर 6 महीने तक चला था, लेकिन डाट्स केन्द्र पर परिवार के अन्य सदस्यों का टीबी परीक्षण कराने सम्बन्धी कोई भी जानकारी नहीं दी गई और हम लोगों को टीबी के बारे में कुछ भी नहीं मालूम”। 

स्पष्ट है कि जन साधारण में अभी भी टीबी के साक्षरता की कमी है, तथा सरकार को लोगों में टीबी की साक्षरता को बढ़ाने हेतु राष्ट्रीय कार्यक्रमों में सुधार लाने की आवश्यकता है, साथ ही बच्चों को टीबी रोग के संक्रमण से बचाने के लिए नई रोकथाम विधि जैसे इसोनाइज्ड प्रिवेन्टिव थेरिपी (आई॰पी॰टी) को अपनाना चाहिए।     
इन्टर्नैशनल यूनियन अगेन्स्ट ट्युबरक्लोसिस एंड लंग डिज़ीज़ (द यूनियन) के अनुसार वयस्क टीबी रोगी के परिवार और उनके संपर्क में रह रहे सभी 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों का परीक्षण करना चाहिए। यदि बच्चे स्वस्थ हैं, तो उन्हें इसोनाइज्ड प्रिवेन्टिव थेरिपी देनी चाहिए ताकि उन्हें सक्रिय टीबी न हो सके। यदि बच्चे स्वस्थ नहीं हैं, तो उनका चिकित्सीय परीक्षण कराने के बाद टीबी उपचार करना चाहिए।   

राम मनोहर लोहिया सरकारी अस्पताल के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ अभिषेक वर्मा का कहना है कि “प्रायः बच्चों में प्राइमरी टीबी होती है तो उसमें लक्षण बहुत कम मिलते हैं। यदि बच्चा कमजोर हो,  भूख न लगती हो, वजन न बढ़ रहा हो, एकान्त बैठा रहता हो व अन्य बच्चों के साथ खेलता-घूमता न हो तो ऐसे बच्चों की जाँच करनी चाहिए क्योंकि इन बच्चों में प्राइमरी टीबी की सम्भावना अधिक रहती है। जाँच में अगर फेफड़े में हाइलर शैडो दिखती है तो कई डॉक्टर उसे प्राइमरी टीबी मान लेते हैं, लेकिन ऐसा करना गलत है, 99% मामलों में हाइलर शैडो टीबी से भिन्न प्रकट होते हैं और अगर हाइलर लिम्फ़नोड बड़े हों तो भी ज़रूरी नहीं है कि बच्चे में टीबी हो। जब तक बच्चे में कमजोरी, पैरालाइटिस, और वजन न बढ़ने के लक्षण न हो तब तक प्राइमरी काम्पलेक्स में टीबी की दवा नही देनी चाहिये।

यूनियन के ट्रीट टीबी इनिशिएटिव में कार्यरत बाल टीबी विशेषज्ञा डॉ डेटजेन का कहना है कि “टीबी रोगी के परिवार के सभी सदस्यों का परीक्षण और निवारक चिकित्सा बच्चों में टीबी के रोग को रोकने के लिए सबसे महत्वपूर्ण उपाय है। टीबी मरीजों के निकट संपर्क में आने वाले बच्चों में संक्रमित होने का और टीबी रोग विकसित होने का सबसे ज्यादा खतरा होता है। उचित चिकित्सा के अभाव में अक्सर गंभीर टीबी रोग विकसित हो जाता है। ऐसे बच्चों को खोज न पाना और उपचार न कर पाना अवसर खोने जैसा है। वयस्कों में समय रहते टीबी रोग की पहचान करना और संक्रमण को रोकना, बच्चों में टीबी रोकथाम के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है”.

अतः बच्चों को टीबी रोग से बचाने हेतु भारत सरकार को अपने राष्ट्रीय कार्यक्रमों में सुधार लाने और लोगों को जागरूक करने के साथ-साथ बी.सी.जी टीके के अतिरिक्त अन्य आधुनिक निवारक चिकित्सा प्रणाली, जैसे इसोनाइज्ड प्रिवेन्टिव थेरिपी को भी अपनाना होगा। तभी हम पूर्ण रूप से बच्चों में टीबी के संक्रमण को रोक पाने में सफल होंगे।

राहुल द्विवेदी 
(लेखक ऑनलाइन पोर्टल www.citizen-news.org के लिए लिखता है )  

गैर लोकतान्त्रिक ढंग से परमाणु ऊर्जा थोपने के प्रयास का लखनऊ में विरोध

[English] कुडनकुलम में गहराते परमाणु विरोधी अभियान के समर्थन में देश भर में अनेक जगह आन्दोलन जड़ पकड़ रहे हैं. लखनऊ के हजरतगंज में अनेक नागरिक और संगठन ने परमाणु विरोधी अभियान में पुरजोर हिस्सा लिया. 

ओम प्रकाश पाण्डेय, महासचिव, अखिल भारतीय विद्युत अभियंता संघ, उत्तर प्रदेश इकाई, पूर्व पुलिस महानिरीक्षक एस.आर.दारापुरी, पूर्व पुलिस महानिदेशक इश्वर चन्द्र द्विवेदी, जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता नवीन तिवारी, वरिष्ठ पत्रकार शैलेन्द्र सिंह, सूचना अधिकार कार्यकर्ता उर्वशी शर्मा और अखिलेश सक्सेना, हमसफ़र की कार्यकर्ता ममता सिंह, नर्मदा बचाओ आंदोलन और जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय की वरिष्ठ कार्यकर्ता अरुंधति धुरु, आशा परिवार से चुन्नीलाल, शोभा शुक्ला, राहुल द्विवेदी, रितेश आर्या, किरण जैसवार, नदीम सलमानी, नीरज मैनाली, जीतेन्द्र द्विवेदी, बाबी रमाकांत एवं अन्य शामिल थे.

प्रदर्शनकारियों का कहना था कि: हम भारत सरकार के गैर लोकतान्त्रिक ढंग से परमाणु ऊर्जा थोपने के प्रयास का विरोध करते हैं। अमरीका और यूरोप में जब भारी संख्या में आम लोग सड़क पर उतार आए तब उनकी सरकारों को परमाणु ऊर्जा त्यागनी पड़ी परंतु भारत में जब आम लोग परमाणु ऊर्जा पर सवाल उठा रहे हैं तो उनकी आवाज़ दबाने का प्रयास किया जा रहा है। कुडनकुलम, तमिल नाडु के डॉ एस.पी. उदयकुमार के नेतृत्व में परमाणु ऊर्जा के विरोध में जन अभियान को भारत सरकार ने भ्रामक आरोपों आदि द्वारा दबाने का पूरा प्रयास किया है। जब कि डॉ उदयकुमार ने अपनी संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक किया है और उनके पास ‘एफ.सी.आर.ए.’ ही नहीं है जिससे ‘विदेशी पैसा’ लिया जा सके। यह भी साफ ज़ाहिर है कि भारत सरकार स्वयं ‘विदेशी’ ताकतों (जैसे कि अमरीका, रूस, आदि) के साथ मिलजुल कर सैन्यीकरण और परमाणु कार्यक्रम बढ़ा रही है।

भारत सरकार ने एक जर्मन नागरिक को जिसने शांतिपूर्वक कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा विरोधी अभियान में भाग लिया था, उसको पकड़ कर वापिस जर्मनी भेज दिया। 8 मार्च 2012 को भारत सरकार ने एक जापानी नागरिक का वीसा भी रद्द कर दिया। ‘ग्रीनपीस’ के निमंत्रण पर फुकुशिमा,जापान में 11 मार्च 2011 को हुई परमाणु दुर्घटना झेले हुए माया कोबायाशी को भारत सरकार ने 15 फरवरी 2012 को ‘बिजनेस’ वीसा दिया था जिससे कि वो भारत में एक सप्ताह आ कर जगह-जगह आयोजित कार्यक्रमों में परमाणु विकिरण आदि खतरों के बारे में बता सकें। परंतु 8 मार्च 2012 को भारत ने उनका वीसा ही रद्द कर दिया।

अब विकसित दुनिया यह मानने लगी है कि निम्न चार कारणों से नाभिकीय ऊर्जा का कोई भविष्य नहीं हैः (1) इसका अत्याधिक खर्चीला होना, (2) मनुष्य स्वास्थ्य व पर्यावरण के लिए खतरनाक, (3) नाभिकीय शस्त्र के प्रसार में इसकी भूमिका से जुड़े खतरे, व  (4) रेडियोधर्मी कचरे के दीर्घकालिक निपटारे की चुनौती।

भारत को नाभिकीय ऊर्जा का विकल्प ढूँढना चाहिए जो इतने खर्चीले व खतरनाक न हों। पुनर्प्राप्य ऊर्जा के संसाधन, जैसे सौर, पवन, बायोमास, बायोगैस, आदि, ही समाधान प्रदान कर सकते हैं यह मान कर यूरोप व जापान तो इस क्षेत्र में गम्भीर शोध कर रहे हैं। भारत को भी चाहिए कि इन विकसित देशों के अनुभव से सीखते हुए नाभिकीय ऊर्जा के क्षेत्र में अमरीका व यूरोप की कम्पनियों का बाजार बनने के बजाए हम भी पुनर्प्राप्य ऊर्जा संसाधनों पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करें। भारत को ऐसी ऊर्जा नीति अपनानी चाहिए जिसमें कार्बन उत्सर्जन न हो और परमाणु विकिरण के खतरे भी न हो।

सी.एन.एस.

कूड़ंकुलम परमाणु विरोधी अभियान के समर्थन में देश में जगह-जगह विरोध




इडिंठकरई में चल रहे उपवास के समर्थन में सात दिवसीय देश व्यापी उपवास

[English] कूड़ंकुलम परमाणु बिजलीघर के विरोध में इडिंठकरई, तमिल नाडु में चल रहे उपवास के समर्थन में, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, परमाणु निशस्त्रीकरण और शांति के लिए गठबंधन, और लोक राजनीति मंच ने संयुक्त रूप से जंतर मंतर, दिल्ली, पर 26 मार्च से 1 अप्रैल 2012 तक सात दिवसीय उपवास का आह्वान दिया है। मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता डॉ संदीप पाण्डेय जंतर मंतर दिल्ली में उपवास पर रहेंगे और परमाणु कार्यक्रम के ऊपर लोकतान्त्रिक और खुली बहस की मांग को लेकर आन्दोलनरत रहेंगे. 


कूड़ंकुलम परमाणु बिजलीघर के विरोध में चेन्नई में भी लोग उपवास पर हैं और मुंबई में प्रख्यात फिल्म निर्माता आनंद पटवर्धन दादर रेलवे स्टेशन के सामने विरोध का नेतृत्व करेंगे।

कूड़ंकुलम परमाणु बिजली घर के विरोध में, 27 मार्च 2012 को एक दिवसीय उपवास का आयोजन देश में जगह जगह होगा।

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि यह विडम्बना ही तो है कि एक तरफ भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में, श्री लंका में तमिल लोगों के ऊपर हुए अत्याचार का मुद्दा उठाया है, परंतु देश के भीतर तमिल नाडु में परमाणु बिजली घर बनाने की जिद्द पर भारत अड़ा हुआ है जिसकी वजह से तमिल नाडु में रह रहे लोग खतरनाक परमाणु दुष्परिणामों को आने वाले सालों में भुगत सकते हैं।

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि  हम भारत सरकार के गैर लोकतान्त्रिक ढंग से परमाणु ऊर्जा थोपने के प्रयास का विरोध करते हैं। अमरीका और यूरोप में जब भारी संख्या में आम लोग सड़क पर उतार आए तब उनकी सरकारों को परमाणु ऊर्जा त्यागनी पड़ी परंतु भारत में जब आम लोग परमाणु ऊर्जा पर सवाल उठा रहे हैं तो उनकी आवाज़ दबाने का प्रयास किया जा रहा है। कुडनकुलम, तमिल नाडु के डॉ उदयकुमार के नेतृत्व में परमाणु ऊर्जा के विरोध में जन अभियान को भारत सरकार ने भ्रामक आरोपों आदि द्वारा दबाने का पूरा प्रयास किया है। जब कि डॉ उदयकुमार ने अपनी संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक किया है और उनके पास ‘एफ.सी.आर.ए.’ ही नहीं है जिससे ‘विदेशी पैसा’ लिया जा सके। यह भी साफ ज़ाहिर है कि भारत सरकार स्वयं ‘विदेशी’ ताकतों (जैसे कि अमरीका, रूस, आदि) के साथ मिलजुल कर सैन्यीकरण और परमाणु कार्यक्रम बढ़ा रही है।

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि भारत सरकार ने एक जर्मन नागरिक को जिसने शांतिपूर्वक कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा विरोधी अभियान में भाग लिया था, उसको पकड़ कर वापिस जर्मनी भेज दिया। 8 मार्च 2012 को भारत सरकार ने एक जापानी नागरिक का वीसा भी रद्द कर दिया। ‘ग्रीनपीस’ के निमंत्रण पर फुकुशिमा,जापान में 11 मार्च 2011 को हुई परमाणु दुर्घटना झेले हुए माया कोबायाशी को भारत सरकार ने 15 फरवरी 2012 को ‘बिजनेस’ वीसा दिया था जिससे कि वो भारत में एक सप्ताह आ कर जगह-जगह आयोजित कार्यक्रमों में परमाणु विकिरण आदि खतरों के बारे में बता सकें। परंतु 8 मार्च 2012 को भारत ने उनका वीसा ही रद्द कर दिया।

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि हाल ही में तमिल नाडु मुख्य मंत्री द्वारा डॉ एस.पी. उदयकुमार को नक्सलवादी करार करने का प्रयास यह ज़ाहिर करता है कि सरकार परमाणु कार्यक्रम को लागू करने के लिए कितनी मजबूर है। हम सरकार के आम लोगों को गुमराह करने का और परमाणु कार्यक्रम में पारदर्शिता नहीं रखने का भरसक विरोध करते हैं।

अब विकसित दुनिया यह मानने लगी है कि निम्न चार कारणों से नाभिकीय ऊर्जा का कोई भविष्य नहीं हैः (1) इसका अत्याधिक खर्चीला होना, (2) मनुष्य स्वास्थ्य व पर्यावरण के लिए खतरनाक, (3) नाभिकीय शस्त्र के प्रसार में इसकी भूमिका से जुड़े खतरे, व  (4) रेडियोधर्मी कचरे के दीर्घकालिक निपटारे की चुनौती।

भारत को नाभिकीय ऊर्जा का विकल्प ढूँढना चाहिए जो इतने खर्चीले व खतरनाक न हों। पुनर्प्राप्य ऊर्जा के संसाधन, जैसे सौर, पवन, बायोमास, बायोगैस, आदि, ही समाधान प्रदान कर सकते हैं यह मान कर यूरोप व जापान तो इस क्षेत्र में गम्भीर शोध कर रहे हैं। भारत को भी चाहिए कि इन विकसित देशों के अनुभव से सीखते हुए नाभिकीय ऊर्जा के क्षेत्र में अमरीका व यूरोप की कम्पनियों का बाजार बनने के बजाए हम भी पुनर्प्राप्य ऊर्जा संसाधनों पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करें। भारत को ऐसी ऊर्जा नीति अपनानी चाहिए जिसमें कार्बन उत्सर्जन न हो और परमाणु विकिरण के खतरे भी न हो।

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि हम भारत सरकार से अपील करते हैं कि परमाणु ऊर्जा के मुद्दे पर लोकतान्त्रिक तरीके से खुली बहस करवाए और जब तक यह सर्व सम्मति से निर्णय नहीं होता कि भारत को परमाणु कार्यक्रम चलना चाहिए या नहीं, परमाणु कार्यक्रम को स्थगित करे।

बाबी रमाकांत - सी.एन.एस.

गैर लोकतान्त्रिक ढंग से परमाणु ऊर्जा थोपने के प्रयास का विरोध

[English] अखिल भारतीय विद्युत् अभियंता संघ के महासचिव श्री शैलेन्द्र दुबे ने कहा कि १२ लाख से अधिक उनके कार्यकर्ता, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय और नर्मदा बचाओ आन्दोलन के साथ, आन्दोलन करेंगे यदि भारत सरकार ने लोकतान्त्रिक तरीके से उर्जा के मुद्दे पर खुली बहस न होने दी. आज (१० मार्च २०१२) को लखनऊ में आयोजित प्रेस वार्ता में यह ज्ञापन जारी किया गया:

गैर लोकतान्त्रिक ढंग से परमाणु ऊर्जा थोपने के प्रयास का विरोध

हम भारत सरकार के गैर लोकतान्त्रिक ढंग से परमाणु ऊर्जा थोपने के प्रयास का विरोध करते हैं। अमरीका और यूरोप में जब भारी संख्या में आम लोग सड़क पर उतार आए तब उनकी सरकारों को परमाणु ऊर्जा त्यागनी पड़ी परंतु भारत में जब आम लोग परमाणु ऊर्जा पर सवाल उठा रहे हैं तो उनकी आवाज़ दबाने का प्रयास किया जा रहा है। कुडनकुलम, तमिल नाडु के डॉ उदयकुमार के नेतृत्व में परमाणु ऊर्जा के विरोध में जन अभियान को भारत सरकार ने भ्रामक आरोपों आदि द्वारा दबाने का पूरा प्रयास किया है। जब कि डॉ उदयकुमार ने अपनी संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक किया है और उनके पास ‘एफ.सी.आर.ए.’ ही नहीं है जिससे ‘विदेशी पैसा’ लिया जा सके। यह भी साफ ज़ाहिर है कि भारत सरकार स्वयं ‘विदेशी’ ताकतों (जैसे कि अमरीका, रूस, आदि) के साथ मिलजुल कर सैन्यीकरण और परमाणु कार्यक्रम बढ़ा रही है। 

भारत सरकार ने एक जर्मन नागरिक को जिसने शांतिपूर्वक कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा विरोधी अभियान में भाग लिया था, उसको पकड़ कर वापिस जर्मनी भेज दिया। 8 मार्च 2012 को भारत सरकार ने एक जापानी नागरिक का वीसा भी रद्द कर दिया। ‘ग्रीनपीस’ के निमंत्रण पर फुकुशिमा,जापान में 11 मार्च 2011 को हुई परमाणु दुर्घटना झेले हुए माया कोबायाशी को भारत सरकार ने 15 फरवरी 2012 को ‘बिजनेस’ वीसा दिया था जिससे कि वो भारत में एक सप्ताह आ कर जगह-जगह आयोजित कार्यक्रमों में परमाणु विकिरण आदि खतरों के बारे में बता सकें। परंतु 8 मार्च 2012 को भारत ने उनका वीसा ही रद्द कर दिया।

अब विकसित दुनिया यह मानने लगी है कि निम्न चार कारणों से नाभिकीय ऊर्जा का कोई भविष्य नहीं हैः (1) इसका अत्याधिक खर्चीला होना, (2) मनुष्य स्वास्थ्य व पर्यावरण के लिए खतरनाक, (3) नाभिकीय शस्त्र के प्रसार में इसकी भूमिका से जुड़े खतरे, व  (4) रेडियोधर्मी कचरे के दीर्घकालिक निपटारे की चुनौती।

भारत को नाभिकीय ऊर्जा का विकल्प ढूँढना चाहिए जो इतने खर्चीले व खतरनाक न हों। पुनर्प्राप्य ऊर्जा के संसाधन, जैसे सौर, पवन, बायोमास, बायोगैस, आदि, ही समाधान प्रदान कर सकते हैं यह मान कर यूरोप व जापान तो इस क्षेत्र में गम्भीर शोध कर रहे हैं। भारत को भी चाहिए कि इन विकसित देशों के अनुभव से सीखते हुए नाभिकीय ऊर्जा के क्षेत्र में अमरीका व यूरोप की कम्पनियों का बाजार बनने के बजाए हम भी पुनर्प्राप्य ऊर्जा संसाधनों पर ही अपना ध्यान केन्द्रित करें। भारत को ऐसी ऊर्जा नीति अपनानी चाहिए जिसमें कार्बन उत्सर्जन न हो और परमाणु विकिरण के खतरे भी न हो।

शैलेंद्र दुबे (महासचिव, अखिल भारतीय विद्युत अभियंता संघ), आलोक अग्रवाल (नर्मदा बचाओ आंदोलन), डॉ संदीप पांडे (जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय), अरुंधती धुरु (नर्मदा बचाओ आंदोलन/ जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय), बाबी रमाकांत, शोभा शुक्ल, राहुल कुमार द्विवेदी, आशा परिवार, परमाणु निशस्त्रिकरण एवं शांति के लिए गठबंधन, शांति एवं विकास के लिए चिकित्सकों का गठबंधन, सोशलिस्ट पार्टी

- सी.एन.एस.

बाल टी.बी./ तपेदिक से बचाव पर सारांश रपट जारी


आज इन्दिरा नगर सी-ब्लॉक चौराहा स्थित प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त केंद्र पर बाल टी.बी./ तपेदिक से बचाव पर सारांश रपट जारी की गयी। यह सारांश रपट आशा परिवार, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, सक्षम फ़ाउंडेशन, अभिनव भारत फ़ाउंडेशन, सी.एन.एस. एवं अन्य 50 सहयोगी संगठनों ने तैयार की है।

विश्व टी.बी./ तपेदिक दिवस, 24 मार्च को है और इस वर्ष का केंद्रीय विचार है: बाल टी.बी./ तपेदिक। यह सारांश रपट अनेक साक्षात्कारों और ऑनलाइन संवादों पर आधारित है जिनमें लखनऊ शहर के अनेक विशेषज्ञों ने भाग लिया जिसमें विश्व स्वास्थ्य संगठन के अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार विजेता प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त, छत्रपति शाहुजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के पलमोनरी मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ सूर्य कान्त, डॉ राम मनोहर लोहिया अस्पताल के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ अभिषेक वर्मा, नेल्सन अस्पताल के वरिष्ठ बाल-रोग विशेषज्ञों का मण्डल डॉ अजय मिश्रा, डॉ दिनेश चन्द्र पांडे, एवं डॉ सुधाकर सिंह, आदि भी शामिल हैं। परंतु सबसे महत्वपूर्ण प्रतिभागी रहे हैं टी.बी./ तपेदिक से जूझ रहे बच्चों के माता-पिता और अभिभावक।

इस सारांश रपट के मुख्य मुद्दे:
यदि टी.बी./ तपेदिक का उपचार पूरा किए हुए लोगों को कार्यक्रम को लागू करने में गरिमा के साथ शामिल किया जाये तो टी.बी./ तपेदिक कार्यक्रम की सफलता बढ़ जाएगी। टी.बी./ तपेदिक रोकथाम, उपचार आदि का लाभ उठाने में जो समस्याएँ आती हैं वह सबसे बेहतर वो लोग जानते हैं जो इन सेवाओं को ले चुके हैं। टी.बी./ तपेदिक नियंत्रण सिर्फ चिकित्सकीय इलाज से नहीं बल्कि उन विकास-से-जुड़े कारणों पर कार्य करने से होगा जिनकी वजह से टी.बी./ तपेदिक होने का खतरा कई गुना अधिक बढ़ जाता है। इस रपट ने मांग की है कि “पेशेंट्स चार्टर फॉर टीबी केयर’ लागू किया जाये, जो भारत सरकार की ‘टी.बी./ तपेदिक नियंत्रण कार्यक्रम’ योजना का भाग भी है।

जिन कारणों से बाल टी.बी./ तपेदिक होने का खतरा बढ़ता है उनपर कार्य आवश्यक है। विशेषज्ञों के अनुसार कुपोषण टी.बी./ तपेदिक होने का खतरा बढ़ा देता है। अंत: भोजन सुरक्षा कार्यक्रमों और टी.बी./ तपेदिक नियंत्रण कार्यक्रमों को आपस में समन्वय से कार्यशील होना चाहिए ताकि किसी भी व्यक्ति या बच्चे को कुपोषण के वजह से टी.बी./ तपेदिक न हो।

बच्चों का तंबाकू धुएँ में सांस लेने से भी (परोक्ष धूम्रपान) टी.बी./ तपेदिक होने का खतरा 2-3 गुना बढ़ जाता है। भारत में सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान यूं भी वर्जित है। माता-पिता और अभिभावकों को चाहिए कि तंबाकू सेवन न करें और जो लोग करते हैं वे तंबाकू नशा मुक्त हों। घर में भीड़-भाड़, साफ-सफाई न रखना, जन्म के उपरांत 6 महीने तक नवजात शिशु को सिर्फ माँ का दूध न देना, चूल्हे के धुएँ से, मधुमेह या डाईबीटीस, एच.आई.वी., आदि से भी टी.बी./ तपेदिक होने का खतरा बढ़ जाता है।

अस्पताल और घर आदि में भी संक्रामण नियंत्रण करना चाहिए। अस्पतालों और घरों में खुली हवा और सूरज की रोशनी उपलब्ध होना, खाँसते वक़्त मुंह पर हाथ या कपड़ा रखना, बिना जरूरत बच्चों को अस्पताल न ले जाना, अस्पताल के कचरे को खुला न फेंकना, आदि ऐसे कदम हैं जिनसे संक्रामण फैलने का खतरा कम होता है।

एक महत्वपूर्ण बात इस रपट में आई कि वयस्क लोगों में टी.बी./ तपेदिक नियंत्रण से बाल टी.बी./ तपेदिक नियंत्रण स्वत: हो जाएगा। इसलिए जरूरी है कि टी.बी./ तपेदिक से ग्रसित वयस्क लोगों को शीघ्र ही ‘डाट्स’ उपचार पर रखा जाये और वें अपना टी.बी./ तपेदिक उपचार सफलता पूर्वक समाप्त करके टी.बी./ तपेदिक मुक्त हों। इससे बच्चों और अन्य वयस्क लोगों में भी टी.बी./ तपेदिक फैलने की संभावना कम होगी।

टी.बी./ तपेदिक का टीका (बी.सी.जी.) कुछ घातक टी.बी./ तपेदिक जैसे कि दिमाग की टीबी आदि से तो बचाता है पर बच्चों को सभी प्रकार की टीबी से सुरक्षा नहीं प्रदान करता। जाहिर है कि प्रभावकारी टीबी टीका होना चाहिए जिससे कि सभी प्रकार की टीबी से सुरक्षा मिले।

इस रपट को शोभा शुक्ला, राहुल कुमार द्विवेदी, नदीम सलमानी, रितेश आर्य, जित्तिमा जनतानामालाका, एवं बाबी रमाकांत ने तैयार किया है। पूरी रपट को डाऊनलोड करने के लिए इस वैबसाइट पर जाएँ: www.citizen-news.org  

सी. एन. एस. 

सभी उम्मीदवारों को खारिज करने का अधिकार

1961 के चुनाव कराने सम्बन्धित अधिनियम की धारा 49 (ओ) के तहत भारतीय मतदाता को यह भी अधिकार दिया गया है कि यदि वह समझती है कि कोई भी प्रत्याशी उपयुक्त नहीं है तो वह अपना मत किसी को न दे और इस बात को प्रारूप 17 ए पर दर्ज कराए। यानी भारतीय नागरिक को मत देने के अधिकार के साथ-साथ मत न देने का भी अधिकार दिया गया है।

कल्पना करें कि सबसे ज्यादा मत पाने वाले उम्मीदवार से ज्यादा मतदाता सभी उम्मीदवारों को खारिज करने का विकल्प चुनते हैं। सैद्धांतिक रूप से इसका अर्थ होगा कि उस चुनाव क्षेत्र में ज्यादा मतदाता यही समझते हैं कि कोई उम्मीदवार चुना जाने लायक नहीं है। ऐसी दशा में चुनाव रद्द करा कर फिर से कराए जाने चाहिए जिसमें पिछली बार खड़ा कोई भी प्रत्याशी पुनः खड़ा न हो। यही बात राजनीतिक दलों के लिए खतरे की बात है। कहीं ऐसा न हो कि बड़े पैमाने पर जनता राजनीतिक दलों व उनके उम्मीदवारों को खारिज करना शुरू कर दे। अधिकारी भी अभी वर्तमान व्यवस्था के बदलाव के पक्ष में नहीं है। उनका निहित स्वार्थ इसी में है कि वर्तमान समय में मौजूद भ्रष्ट व्यवस्था ही कायम रहे। इसका प्रमाण है मतदान कराने हेतु जिम्मेदार अधिकारियों - कर्मचारियों का मतदाता के प्रति रवैया।

11 फरवरी, 2012, को गाजीपुर जिले के मोहम्मदाबाद विधान सभा क्षेत्र के मुर्की कलां मतदाता केन्द्र पर जब स्वतंत्र पत्रकार व वकील खान अहमद जावेद एवं उनकी पत्नी राजदा जावेद ने इस अधिकार का इस्तेमाल करने की मंशा प्रकट की तो सेक्टर इन्चार्ज उनसे माफी मांगने लगा कि उसके पास प्रारूप 17 ए उपलब्ध नहीं है। वह जावेद युगल से गुजारिश करने लगा कि वे इस विकल्प कर इस्तेमाल न करें। दो घंटों तक बहस करने के बाद अ्रततः जावेद युगल ने हार मान कर अपना मत मजबूरी में किन्हीं को डाल ही दिया। 11 फरवरी को ही गोरखपुर में जरूर 97 लोग इस अधिकार का इस्तेमाल करने में सफल रहे। किन्तु यह तभी सम्भव हुआ जब महाराणा प्रताप डिग्री कालेज के प्राचार्य प्रदीप राव ने मतदान केन्द्र पर काफी हंगामा किया। 19 फरवरी को उन्नाव जिले में भगवंत नगर विधान सभा क्षेत्र में स्वतंत्र पत्रकार नागेश त्रिपाठी को पूरे दिन बेथर में मतदान केन्द्र संख्या 79 पर बैठाए रखने के बाद वहां उपस्थित अधिकारी ने कहा कि उसी रजिस्टर पर दर्ज कर दें कि अपना मत किसी को नहीं देना चाहते जिस पर सभी मतदाता हस्ताक्षर कर रहे थे। बॉबी रमाकांत को लखनऊ पूर्वी क्षेत्र में कुछ देर भ्रमित करने के बाद अधिकारियों ने बताया कि उनके पास प्रारूप 17 ए उपलब्ध नहीं है। उनसे कहा गया कि मतदान की प्रकिया में व्यवधान उत्पन्न न करें। अंततः बॉबी को अपना मत किसी उम्मीदवार को देना पड़ा क्योंकि मत देने हेतु उनसे धोखे से शेष प्रक्रियाएं, जैसे रजिस्टर पर हस्ताक्षर कराना, उंगली पर स्याही लगाना, आदि, पूरी करा ली गईं थीं। इसी मतदान केन्द्र पर जब थोड़ी देर बाद राहुल द्विवेदी ने अपने इस अधिकार का इस्तेमाल करना चाहा तो उनसे कहा गया कि जिस रजिस्टर पर हस्ताक्षर कर रहे हैं वहीं पर लिख दें कि वे अपना मत किसी को नहीं देना चाहते। इसी चुनाव क्षेत्र के इंदिरा नगर, सी ब्लॉक स्थित रानी लक्ष्मीबाई विद्यालय में जब सुधाकर रेड्डी ने इस अधिकार का इस्तेमाल करना चाहा तो वहां उपस्थित अधिकारी अनिल ने ऐसे किसी नियम के बारे में अनभिज्ञता प्रकट की। सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें बाहर जा कर शिकायत करने की सलाह दी तो किसी अधिकारी ने कहा कि उप-जिलाधिकारी के आने पर शिकायत दर्ज होगी। जब सुधाकर ने अपनी पत्नी को परेशान होते हुए देखा तो उन्होंने भी इस सोच से कि मत बेकार न जाए मजबूरी में किसी उम्मीदवार को अपना मत दे ही दिया। सीतापुर के हरगांव विधान सभा क्षेत्र में यदि पत्रकार एम.आर. शर्मा ने पर्वेक्षक से बात कर हस्तक्षेप न किया होता तो झरीखापुर विद्यालय के मतदान केन्द्र संख्या 115 व 116 से कक्षा पांच उत्तीर्ण शांति व संत राम, जो 49 (ओ) के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल करना चाहते थे, को वापस भेजा जा रहा था। इस क्षेत्र से कुल 283 लोगों ने अपने सभी उम्मीदवारों को खारिज करने के अधिकार का इस्तेमाल किया। लखनऊ में ममता सिंह ने न्यू हैदराबाद कालोनी स्थित मोतीलाल नेहरू इण्टर कालेज में मतदान केन्द्र संख्या 219 पर जब सभी उम्मीदवारों को खारिज करने के अधिकार का इस्तेमाल करना चाहा तो वहां उपस्थित अधिकारी माफी मांगते हुए गिड़गड़ाने लगे कि वे इसके लिए आग्रह न करें और किसी को अपना मत दे दें। इसी तरह बक्शी के तालाब विधान सभा क्षेत्र के मटियारी मतदान केन्द्र पर छात्र पवन सिंह को कहा गया कि जब अपना मत बेकार ही करना है तो किसी भी ऐरे गैरे को डाल दीजिए। पवन ने अंततः अपना मत एक छोटे दल के प्रत्याशी को डाला जिसके जीतने की कोई सम्भावना नहीं है।

यह बड़ी अजीब बात है कि मतदाता जागरूकता को तो अच्छा समझा जाता है। लेकिन क्या मतदाता जागरूकता इतना भर है कि हम घर से निकल कर किसी को भी मतदान कर आएं? अधिकारियों को अभी यह लगता है यदि कोई मतदाता धारा 49 (ओ) के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल करना चाहे तो उनका काम बढ़ जाएगा। मत देना तो जागरूक मतदाता की पहचान है लेकिन यदि आप किसी को मत न देने का अधिकार इस्तेमाल करना चाहें तो ऐसी टिप्पणी की जाती है कि क्या सबसे ज्यादा जागरूक आप ही हैं? या फिर यह कहा जाता है कि किसी को मत नहीं देना है तो यहां आए ही क्यों हो? इससे तो अच्छा होता कि घर बैठते। अधिकारियों की सोच इस मामले में अभी मतदाता के प्रति नकारात्मक है।

इस विडम्बना को सबसे अच्छी तरह उ.प्र. के एक ईमानदार आई.ए.एस. अधिकारी अभिव्यक्त करते हैं जिनका कहना है कि इतना जोर लगा कर यह तो सुनिश्चित कर लिया जाता है कि मतदान एकदम निष्पक्ष और बिना गड़बड़ी के हो लेकिन जब जनता के सामने चुनने के लिए विकल्प ही ठीक न हो तो दुर्भाग्य यह है कि ठीक प्रक्रिया से अंततः एक गलत व्यक्ति ही चुन कर आता है। अधिकारियों को यह समझना होगा कि सभी उम्मीदवारों को नकारना भी एक किस्म की राजनीति है। यह जनता की राजनीति है जो राजनीतिक दलों के खिलाफ जाती है। असल में देखा जाए  तो भ्रष्ट एवं आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों को चुनाव के मैदान से बाहर करने का यह बहुत कारगर औजार हो सकता है। यदि जनता तय कर ले कि सभी अवांछनीय लोगों को चुनाव लड़ने से रोका जाए तो बड़े पैमाने पर लोग सभी उम्मीदवारों को खारिज करने के अधिकार का इस्तेमाल कर सकते हैं। और राजनीतिक दल भी फिर इस डर से कि कहीं जनता उनके उम्मीदवारों को नकार न दे सही किस्म के लोगों को उम्मीदवार बनाना शुरू करेंगे। अभी तो उनको मालूम है कि जनता की मजबूरी है कि उसे उन्हीं में से किसी एक को चुनना है। इसलिए दल जनता की भावना को धता बताते हुए भ्रष्ट एवं अपाराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को ही उम्मीदवार बनाते हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त कह चुके हैं कि अब वक्त आ गया है कि सभी उम्मीदवारों को खारिज करने के अधिकार का क्रियान्वयन हो। इसका सबसे कारगर तरीका होगा इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर आखिर में इस विकल्प हेतु एक बटन उपलब्ध कराना। दूसरा यह नियम बनाना कि यदि सबसे ज्यादा मत पाए  उम्मीदवार से भी ज्यादा लोग सभी उम्मीदवारों को खारिज करने वाला बटन दबाते हैं तो चुनाव रद्द कर पुनः नए उम्मीदवारों के साथ मतदान कराना जिसमें पिछली बार खड़े प्रत्याशियों पर प्रतिबंध हो। इस प्रकिया से जनता अंततः सही उम्मीदवार को चुन लेगी और तमाम अवांछनीय प्रत्याशी खारिज कर दिए जाएंगे।

डॉ. संदीप पाण्डेय 

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 8 मार्च पर विशेष

यथार्थ की त्रासदी
हमका बताओ आपन नाम बहिनी
हमार नाम का कौनो काम बहिनी

अम्मा की गोदिया मा मुनिया रहीं हम
पाछे रामेसुर की दिदिया बनीं हम
स्कूल मा हमरा कौनो नाम न लिखऊली
भौजी की रसोई मा हाथ बस बटऊली
गुड़िया खेलत जब ससुर घर गयली
तब हम बटेसर की दुलहिन कहऊली

साल पीछे बिटिया का जनम जब भयली
सास हमें तब कुलच्छिनी कहली
अबके डाक्टरनी जो हम लरिका जनिबे
तब हम मुन्ना की अम्मा कहइबे
हमरी न कौनो औकात बहिनी
हमार नाम का कौनो काम बहिनी

शोभा शुक्ला -सी. एन. एस. 

मतदान अधिकारी ने कहा: फार्म १७-ए जैसा कोई नियम है ही नहीं

इंदिरा नगर निवासी श्री सुधाकर रेड्डी जब मतदान करने "रानी लक्ष्मी बाई स्कूल सी-ब्लाक, इंदिरा नगर" गए तो उन्होंने फार्म १७-ए की मांग की जिससे कि वें अपना मत सभी उम्मीदवारों को ख़ारिज करने के लिए दे सकें. परन्तु वहाँ उपस्थित अधिकारीयों ने, जिनमें श्री अनिल शामिल थे, फार्म १७-ए के बारे में 'अज्ञानता' जताई और कहा कि "ऐसा कोई नियम है ही नहीं". सुधाकर जी के निरंतर आग्रह करने पर वहाँ टास्क फ़ोर्स के सुरक्षा कर्मी आ गए और उनसे बाहर आ कर शिकायत आदि दर्ज करने के लिए कहा गया. अधिकारीयों ने कहा कि 'ए.डी.एम्' साहब जब आयेंगे तब आप अपनी शिकायत दर्ज करें.' अंतत: सुधाकर भाई को भी मजबूरन मतदान करना पड़ा क्योंकि वो अपना वोट व्यर्थ नहीं जाने देना चाहते थे और किसी भी उम्मीदवार से संतुष्ट भी नहीं थे. 

सुधाकर भाई का कहना है कि चुनाव आयोग द्वारा आयोजित दो-दिवसीय प्रशिक्षण में फार्म १७-ए क्यों नहीं शामिल किया गया है? चुनाव आयोग द्वारा नियुक्त अधिकारियों और प्रशिक्षित लोगों को फार्म १७-ए के बारे में क्यों नहीं जानकारी है?

बड़ा मुद्दा यह है कि लोकतंत्र में जब मतदान गोपनीयता के साथ होता है तब 'सभी उम्मीदवारों को ख़ारिज करने का मतदान' गोपनीय क्यों नहीं है? फार्म १७-ए के उपयोग करने के लिए हमको मतदान केंद्र पर तमाशा खड़ा क्यों करना पड़ता है?

हमारा मानना है कि यदि फार्म १७-ए की संख्या जीतने वाले प्रत्याशी से अधिक हो तो चुनाव ख़ारिज कर देना चाहिए और पुन: चुनाव में इन सभी ख़ारिज उम्मीदवारों पर, पुन: चुनाव में उम्मीदवार होने पर पाबंद लगना चाहिए.

सी.एन.एस.

उन्नाव चुनाव प्रेक्षक को ही फार्म १७-ए सम्बंधित सही जानकारी नहीं

उन्नाव चुनाव प्रेक्षक को ही फार्म १७-ए सम्बंधित सही जानकारी नहीं थी. जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता और सच्ची मुच्ची के संपादक श्री नागेश त्रिपाठी जब उन्नाव में अपना मतदान करने पहुंचे और फार्म १७-ए के इस्तेमाल की बात की तो वहाँ उपस्थित मतदान केंद्र अधिकारीयों को पर्याप्त जानकारी नहीं थी. जब नागेश जी ने उन्नाव चुनाव प्रेक्षक से शिकायत की तो उन्होंने कहा कि: "फार्म १७-ए मंगवा रहे हैं".

सुबह से शाम होने को आई और फार्म १७-ए आने का नाम ही नहीं ले रहा था. अंतत: उन्नाव चुनाव प्रेक्षक ने कहा कि "जिस रजिस्टर में सभी मतदाता हस्ताक्षर कर रहे हैं या अंगूठे का निशाँ लगा रहे हैं उसी में आप टिपण्णी दर्ज करें कि "I reject all candidates". 

सवाल यह उठता है कि उन्नाव के चुनाव प्रेक्षक जो सुबह से 'फार्म १७-ए' मंगवा रहे थे उनको सही जानकारी क्यों नहीं थी? 

सरकार जैसे कि मतदान करने के प्रचार करती है उसी तरह सरकार फार्म १७-ए के उपयोग करके सभी उम्मीदवारों को ख़ारिज करने का वोट डालने के विकल्प का प्रचार क्यों नहीं करती है?

फार्म १७-ए के उपयोग को इतना जटिल और सार्वजनिक क्यों बनाया गया है? जैसे कि एक मतदाता अपने अधिकार का उपयोग गोपनीयता के साथ करता है उसी तरह फार्म १७-ए का उपयोग गोपनीय क्यों नहीं रखा गया है? फार्म १७-ए के उपयोग के लिए इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन में एक बटन क्यों नहीं है? 

फार्म १७-ए के जरिये जो मतदाता सभी उम्मीदवारों को ख़ारिज करते हैं यदि उनकी संख्या ५० प्रतिशत हो तो पुन: चुनाव होने चाहिए और इन ख़ारिज उम्मीदवारों को इस चुनाव से बे-दखल करना चाहिए.

अधिक जानकारी के लिए नागेश त्रिपाठी जी से संपर्क करें: ९४५२११२००४

सी.एन.एस. 

चुनाव उम्मीदवारों को ख़ारिज करने के लिए फार्म १७-ए उपलब्ध क्यों नहीं?

चुनाव रूल्स १९६९ के सेक्शन ४९ (ओ) के अनुसार मतदाताओं के पास अधिकार है कि वें चुनाव क्षेत्र के सभी प्रतियाशियों को ख़ारिज भी कर सकें. परन्तु लखनऊ पूर्व के एक मतदान केंद्र पर यह फार्म १७-ए उपलब्ध नहीं था और न ही फार्म १७-ए जैसा कोई रजिस्टर. बल्कि जिस रजिस्टर पर सभी मतदाता हस्ताक्षर कर रहे थे उसी पर टिपण्णी लिखवा कर पीठासीन अधिकारी ने कहा कि यह फार्म १७-ए जैसा माना जायेगा. सवाल यह है कि फार्म १७-ए के उपयोग के बारे में सही जानकारी मतदान केन्द्रों के अधिकारीयों और जनता के पास क्यों नहीं है? राहुल कुमार द्विवेदी ने अपना अनुभव और चुनाव आयोग से की गयी अपनी शिकायत बांटा:

सेवा में,
श्री उमेश सिन्हा,
चुनाव आयुक्त, उत्तर प्रदेश
तिथि: 19 फरवरी 2012

विषय: फार्म 17-ए के संबंध में शिकायत

माननीय श्री सिन्हा,

मैं लखनऊ पूर्व विधान सभा क्षेत्र का निवासी हूँ और डाबेल कॉलेज, सेक्टर-15, इन्दिरा नगर, लखनऊ, में मेरा मतदान केंद्र है।

जब मैंने सेक्शन 49 (ओ) के तहत फार्म 17-ए का उपयोग करना चाहा तो मतदान केंद्र के अधिकारियों ने मुझसे विनम्रतापूर्वक व्यवहार नहीं किया – उदाहरण के तौर पर सबसे पहले अधिकारी से जब मैंने कहा कि मुझे फार्म 17-ए का उपयोग करना है तो उसने मुझे रूखा जवाब देते हुए कहा कि “आपको वोट नहीं डालना है क्या ?” जब मैंने कहा कि मुझे वोट डालना है पर फार्म 17-ए के उपयोग करके सभी उम्मीदवारों के विरोध में वोट डालना है, तब उन्होने कहा कि मैं पीठासीन अधिकारी से बात करूँ।

पीठासीन अधिकारी ने फार्म 17-ए न देते हुए कहा कि आप अपना ‘किसी प्रत्याशी को वोट न देने की टिप्पणी’ उसी रजिस्टर पर लिख दीजिये जिस रजिस्टर पर अन्य सभी मतदाता हस्ताक्षर कर रहे थे। इसी रजिस्टर पर मेरी टिप्पणी फार्म 17-ए की तरह मानी जाएगी, ऐसा अधिकारी ने मुझे बताया। स्वाभाविक है कि अधिकारी से फार्म 17-ए के संबंध में पता करने के सिलसिले में वहाँ उपस्थित सभी को ज्ञात हो गया कि मैं किसी उम्मीदवार को वोट नहीं दे रहा हूँ और सभी को खारिज करने के लिए आया हूँ। जब मतदान गोपनीय है तो फार्म 17-ए का उपयोग भी गोपनीय रहना चाहिए. अंतत: मैंने उसी रजिस्टर में जिसमें सभी अन्य मतदाता हस्ताक्षर कर रहे थे हस्ताक्षर करके अपनी टिप्पणी लिखी कि “मुझे किसी उम्मीदवार के पक्ष में वोट नहीं डालना है अंत: मैं फार्म 17-ए का उपयोग करना चाहता हूँ परंतु मुझे फार्म 17-ए नहीं दिया गया और इसी रजिस्टर में हस्ताक्षर और टिप्पणी करने को कहा गया।”

मेरी शिकायत यह है कि:
1) फार्म 17-ए की जानकारी मतदान केंद्र अधिकारियों को स्पष्ट होनी चाहिए, और यह प्रशासन की ज़िम्मेदारी है कि मतदाताओं को सूचित करे कि वें कैसे फार्म 17-ए का उपयोग कर सकते हैं।
2) जिस तरह मतदान गोपनीय रहता है उसी तरह सभी उम्मीदवारों को खारिज करने का वोट भी गोपनीय होना चाहिए, यह तभी संभव है जब फार्म 17-ए ई.वी.एम. मशीन में एक बटन की तरह उपलब्ध हो।

राहुल द्विवेदी
सी-2211, इन्दिरा नगर, लखनऊ – 226016, फोन: 983-999-0966

लोकतांत्रिक राजनीति में विकृतियों से लड़ने की जरूरत

लोकतांत्रिक राजनीति में कारपोरेट घरानों की घुसपैठ एक चिंता का विषय है। राजनीति में धन की जरूरत होती है यह बात सर्वविदित है। यह धन पहले कुछ जनता और ज्यादा पूंजीपतियों से चंदे के रूप में लिया जाता था। फिर वसूली शुरू हो गई। इस वसूली के कार्य में गुण्डे-माफिया सहायक होते थे अतः राजनीति में उनकी एक भूमिका हो गई। बहुमत जुटाने के वक्त उनका बाहुबल भी उपयोगी सिद्ध होने लगा। लेकिन पैसों की बढ़ती भूमिका से अब निजी कम्पनियों ने राजनीति पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। अब तो निजी कम्पनियां ही कई बार नीतियां तय करती हैं और इनके नुमाइंदों की सरकारों में घुसपैठ होती है, कहीं तो सीधे मंत्री के ही रूप में। हम जिनको जन प्रतिनिधि चुन कर भेजते हैं वे निजी कम्पनियों के दलाल हो जाते हैं।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 2 जी स्पैट्रम की आवंटन नीति को खारिज कर जितने भी 122 लाइसेंस दिए गए थे उनको रद्द कर देने से अब यह साफ हो गया है कि केन्द्र सरकार के मंत्रियों ने देश को बेशर्मी से लूटा है। कहा जा रहा है कि प्रधान मंत्री ने ए. राजा को ये आवंटन न करने का सुझाव दिया था। किन्तु प्रधान मंत्री का यह कहना कि वे गठबंधन की सरकार को बचाने के लिए राजा को रोक नहीं रहे थे तर्कसंगत बात नहीं है। इस पूरे कांड के लिए प्रधान मंत्री जिम्मेदार हैं और उन्हें इस्तीफा देना ही चाहिए।

इसी तरह उत्तर प्रदेश में किस पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा था इसका अंदाजा खुद मायावती ने अपनी ही सरकार के जितने मंत्री निकाले हैं उससे लगाया जा सकता है। यह कैसे माना जा सकता है कि प्रदेश में जो कुछ भी हो रहा था वह मुख्य मंत्री की जानकारी के बिना हो रहा था? क्या पोंटी चड्ढा या बाबू सिंह कुशवाहा को बहन जी का संरक्षण प्राप्त नहीं था? जैसे केन्द्र के भ्रष्टाचार के लिए प्रधान मंत्री दोषी हैं उसी तरह प्रदेश के भ्रष्टाचार के लिए मायावती दोषी हैं।

उत्तर प्रदेश में सत्ता के लिए दावेदार सभी बड़े दल भ्रष्ट हैं या/और साम्प्रदायिक। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के संदर्भ में यह समझना जरूरी है कि भ्रष्टाचार की मूल वजह हमारी राजनीतिक व्यवस्था का भ्रष्टाचार से वित्तीय पोषण है। जब तक राजनीतिक व्यवस्था का चरित्र नहीं बदलता तब तक भ्रष्टाचार से पीछा छुड़ाना मुश्किल है।                      

युवा नेताओं का बोलबाला है। किन्तु क्या ये सामान्य युवा हैं? 30-40 वर्ष की आयु में कौन सा सामान्य युवा किसी राष्ट्रीय-प्रादेशिक दल का नेता बन सकता है, वह भी बिना कोई जमीनी काम किए हुए? ये तथाकथित युवा नेता तो सामंती वंशवादी परम्परा की देन हैं जिन्हें पार्टी नेतृत्व विरासत में मिल गया है। लोकतंत्र में यह सवाल तो कोई पूछ ही नहीं रहा कि नेता का बेटा कैसे नेता बन गया? यह तो घोर अलोकतांत्रिक बात है। जिस दल के अन्दर लोकतंत्र नहीं है वह लोकतंत्र को कैसे मजबूत करेगा? सामंती सोच वाली राजनीति जो भ्रष्टाचार और अपराध की नींव पर टिकी है एक भ्रष्ट-आपराधिक-सामंती व्यवस्था का ही निर्माण कर सकती हैं। ऐसी राजनीति को जड़-मूल से खत्म किए बगैर हम सही लोकतंत्र का सपना साकार नहीं कर सकते।

किन्तु आज लोकतंत्र के नाम पर यही लोकतंत्र विरोधी दल व्यवस्था पर हावी हैं जो सत्ता को अपनी जागीर समझते हैं और मनमाने ढंग से काम करते हैं। यदि इन्हें कोई चुनौती देता है, जैसे अण्णा हजारे ने दिया, तो यह लोकतंत्र की दुहाई देने लगते हैं। क्या भ्रष्टाचार को बढ़ावा देकर, अपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को संसद व विधान सभाओं में पहुंचाकर, दलों को निजी कुनबों की तरह चलाते हुए ये लोकतंत्र व संसद की गरिमा को बढ़ा रहे हैं या गिरा रहे हैं?

राजनीति से मुद्दे गायब हो गए हैं इसलिए संसदीय बहस या कार्यवाही की गम्भीरता भी खत्म हो गई। क्या हमारे संविधान निर्माताओं में से किसी ने सोचा होगा कि एक दिन ऐसा भी आएगा कि विधायक सदन में बैठ कर अश्लील तस्वीरें देख रहे होंगे? क्या इस तरह की कार्यवाही से सदन की गरिमा नहीं गिरती? लेकिन फिर भी राजनीतिक दल अपने तौर तरीके बदलने को तैयार नहीं। वे उन्हीं भ्रष्ट व आपराधिक पृष्ठभूमि वालों पर निर्भर हैं जो उनकी सरकारें बनवा सकते हैं। राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के कारण इन दलों के लिए बड़ा मुश्किल हो गया है कि वे गलत तरीके और लोगों को छोड़ सही को अपना लें। अण्णा हजारे के आंदोलन की तरह अब जनता ही उन्हें मजबूर करेगी की वे बदलें। अन्यथा जनता उन्हें अपने मताधिकार से खारिज कर देगी।


 स्वामी अग्निवेश गिरीश पाण्डेय              संदीप पाण्डेय
सामाजिक कार्यकर्ता राज्य अध्यक्ष, सोशलिस्ट पार्टी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, सोशलिस्ट पार्टी

यूरोपियन यूनियन और भारत के बीच मुक्त व्यापार समझौते के विरुद्ध भारी जन-प्रदर्शन

यूरोपियन यूनियन और भारत के बीच मुक्त व्यापार समझौता विकासशील देशों में सस्ती दवाओं की उपलब्धता को बाधित कर सकता है

नई दिल्ली में इस समझौते के विरुद्ध एच आई वी के साथ जीवित 2000 लोगों का सामूहिक प्रदर्शन

आज जब भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच मुक्त व्यापार समझौते से संबन्धित विवादों को समाप्त करने हेतु नई दिल्ली में शिखर सम्मेलन आरंभ हुआ , तो 2000 से अधिक एच आई वी के साथ जीवित व्यक्तियों ने प्रदर्शन करके इस समझौते के हानिकारक प्रावधानों के बारे सावधान किया जिनके रहते गरीब देशों में रहने वाले लोगों को कम मूल्य की दवाएं मिलने में बाधा होगी॰

दिल्ली नेटवर्क औफ़ पोसिटिव पीपुल की मुन्द्रिका गहलोत ने कहा कि, “हमारी ज़िंदगी और मौत व्यापारी मध्यस्थों के हाथ में नहीं होनी चाहिए॰ हम यहाँ पर भारत और यूरोपियन यूनियन को यह संदेश देना चाहते हैं कि हमारे जीवन का कारोबार मत करो।"

भारत को विकासशील देशों की फार्मेसी माना जाता है क्योंकि यह उच्च कोटी परंतु कम दाम की प्रजातिगत दवाएं बना कर विश्व के लाखों लोगों को सस्ता इलाज सुलभ कराता है।

जेनेरिक दवाओं के भारतीय उत्पादकों के बीच की प्रतिस्पर्धा के कारण ही एच आई वी के प्रथम चरण की दवाओं के दाम सान 2000 में 10,000 डॉलर से घट कर आज 150 डॉलर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष हो गए हैं। इस 99% मूल्य गिरावट के कारण ही आज एच आई वी का इलाज गरीबों को भी उपलब्ध हो पा रहा है। विकासशील देशों के 6.6 मिलियन लोगों के इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली 80% से अधिक दवाएं भारत में ही बनती हैं। इसी प्रकार एच आई वी से पीड़ित बच्चों को दी जाने वाली 90% दवाएं भी भारतीय उत्पाद हैं॰ एम एस एफ एवं अन्य उपचार प्रबन्धक भी भारत निर्मित जेनेरिक दवाओं का उपयोग करते हैं।

वर्तमान व्यापार नियमों के अंतर्गत भी नई दवाओं के जेनेरिक प्रारूप बनाना कठिन होता जा रहा है। परंतु यूरोपियन यूनियन--भारत मुक्त व्यापार समझौता तो नए बौद्धिक संपत्ति व्यवधान पैदा करके स्थिति की गंभीरता को और बढ़ा रहा है।

लाएर्स कलेक्टिव की एच आई वी/एड्स शाखा के डाइरेक्टर श्री आनंद ग्रोवर के अनुसार, “ यह व्यापार समझौता तो विश्व व्यापार संगठन की हदों को भी पार कर रहा है। यूरोपियन यूनियन भारत से बौद्धिक संपत्ति के ऐसे माप दंडों की अपेक्षा रखता है जिनके चलते दूसरे देशों के मरीजों को भेजी जाने वाली दवाएं, भारतीय बन्दरगाहों पर रोकी जा सकती हैं, तथा उपचार प्रबन्धक के विरुद कोर्ट में मुकदमा भी चलाया जा सकता है। ये सभी प्रावधान बाज़ार में जेनेरिक दवाओं के प्रवेश को विलंबित करके भारत तथा सभी विकास शील देशों के रोगियों के स्वास्थ्य के अधिकार को प्रभावित करेंगे।

 समझौता वार्ता में दोनों देश लेन-देन की सौदेबाज़ी की घोषणा करेंगे। जानकार सूत्रों के हवाले से पता चला है कि यूरोपियन यूनियन भारत पर इस बात का दबाव डाल रहा है कि वह अनेक ऐसे बौद्धिक संपत्ति उपायों के लिए स्वीकृति दे दे जिनके चलते कम मूल्य की जेनेरिक दवाओं के उत्पादन, रेजिस्ट्रेशन और वितरण में बाधा पड़ेगी।

एम एस एफ (जो 19 देशों में 170,000 लोगों को एच आई वी उपचार उपलब्ध कराता है) भारत की हेड ऑफ मिशन, पीएरो गंदीनी का मानना है कि, “यूरोपियन यूनियन का यह व्यापार समझौता कम दाम की उन जेनेरिक दवाओं के उत्पादन के लिए एक धीमे जहर का काम करेगा जिनकी मदद से आज लाखों लोग ज़िंदा हैं। यह समझौता हम जैसे उपचार प्रबन्धकों को भी निशाना बना सकता है, जो भारत से सस्ती दवाएं खरीद कर रोगियों को उपलब्ध कराते हैं। मेरे पेरु प्रवास के दौरान लेटिन अमेरिकन देशों ने यूएसए के साथ ऐसा ही मुक्त व्यापार समझौता किया था, जिसके कारण ये सभी लेटिन अमेरिकन देश अपने नागरिकों को सस्ती दवाएं, (विशेषकर एच आई वी की दवाएं) उपलब्ध कराने में अत्यंत कठिनाई का सामना कर रहे हैं।“

बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, गुजरात, नागालैंड, मिज़ोरम, और मणिपुर आदि विभिन्न प्रान्तों से आए हुये एच आई वी के साथ जीवित व्यक्तियों ने दिल्ली प्रदर्शन में भाग लिया और साफ शब्दों में चेतावनी दी कि ‘यूरोप, खबरदार! हमारी दवाओं से दूर ही रहो’।

शोभा शुक्ला - सी.एन.एस.

मन न रहत एक समान

(दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित - रविवार, १२ फरवरी २०१२)
आज 104 बरस की उम्र में भी, उस्ताद अब्दुल रशीद खान का मन एक नवजात शिशु के समान निर्मल और निश्चल है। 1908 में उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के सलोन कस्बे में एक लब्ध प्रतिष्ठ संगीतज्ञ परिवार में जन्मे, खान साहब आज हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के ग्वालियर घराने के सबसे वयोवृद्ध गायक हैं। उनका सीधा ताल्लुक मियां तानसेन के घराने से है। इस उम्र में भी चेहरे पर न कोई झुर्री और न ही माथे पर कोई शिकन। बस एक दिल अजीज मासूमियत और एक खुशनुमा मुस्कान। हाल ही में खान साहब लखनऊ में महिंद्रा सनतकदा फेस्टिवल में शिरकत करने आए थे। लखनऊ के पार्क सरोवर होटल के कमरे में सी एन एस के माध्यम से उनसे बातचीत करने की खुशकिस्मती हासिल हुई। उसी गुफ्तगू की थोड़ी सी बानगी--

आपको देख कर जीने की ललक पैदा होती है। आप क्या संदेश देंगे आज के नौजवान को जो बचपन से ही मानसिक तनाव से जूझ रहा है।आपको देख कर यह जानने का दिल करता है की क्या राज है ज़िंदगी में खुश रहने का?

कोई राज़ नहीं है, बस एक रूटीन है जो चलता जाता है बराबर—हर पल को हर दिन को एक नए अंदाज़ से जीना। यह तो कुदरत का तमाशा है कि किसी को बीमार डाल दे किसी को अच्छा कर दे, किसी को मार दे, किसी को जिला दे। लेकिन मन से कभी खुद को बीमार नहीं समझना चाहिए।यह न समझे कि वो बीमार है। वही बीमार जल्दी अच्छा होता है।

इस उम्र में आपको कोई तकलीफ या परेशानी?

वैसे तो मुझे कोई परेशानी नहीं है, पर यह तो अपने अपने नज़रिये का सवाल है। अगर देखा जाय तो दो आदमी मुझे पकड़ कर उठाते, बैठाते हैं, तकलीफ और दर्द तो होता रहता है। एक वक़्त ऐसा था कि मुझे व्यावसायिक जलन के चलते पारा दिया गया जिससे मेरी सारी उँगलियाँ टेढ़ी होकर ठूंठ जैसी हो गयी। मगर अल्लाह का करम है कि मालिक ने मेरी आवाज़ बचा ली और वो आज भी बरकरार है। इस बात को बहुत अरसा बीत गया, पचासों बरस बीत गए। (शायद वो इस हादसे को याद ही नहीं करना चाहते)॰

आपने रियाज़ कब से शुरू किया?

वैसे तो जब बच्चा पैदा होता है, माँ की गोद में जाता है, माँ लोरी सुनाती है, तो वो भी सुर में सुनाती है। तो सुर तो उस वक़्त से ही कान में पड़ता रहता है। मैंने तालीम शुरू की 8,9 बरस की उम्र से। रायबरेली जिला के सलोन कस्बे में।मेरी पैदाइश वही की है। वही मैं गाया बजाया, पला बढ़ा। अभी भी मेरा खानदान वहाँ रहता है और मैं अब भी आता जाता रहता हूँ। 15-16 बरस की उम्र में पहला प्रोग्राम दिया और तब से लगातार प्रोग्राम कर रहा हूँ। अब तक 4000 से ऊपर अपनी बन्दिशें बना चुका हूँ (रसन पिया के नाम से)।

आप तो दुनिया के लिए एक मिसाल हैं। ताज्जुब है कि आपका नाम लिमका या गिनेस बुक में नहीं आया?

अब लिमका या गिनेस बुक में नाम नहीं है तो उसका मुझे कोई गिला नहीं। कलकत्ता में एक प्रोग्राम के दौरान किन्ही गीता देसाई ने मुझसे कहा कि आप जैसा हिंदुस्तान में कोई नहीं है, पूरी दुनिया में कोई नहीं है—इतना उम्दा गायक।

कोलकाता की आई टी सी संगीत रिसर्च अकेडमी में कबसे हैं?

कलकत्ता में रहते हुए 20-21 साल हो गए हैं। उसके पहले रियासतों में आना जाना लगा रहता था, सैकड़ों कान्फरेंसों में शिरकत करी। रियासतों ने बड़ा साथ दिया। मुगल पीरियड खत्म होने के बाद तो गाना बजाना रियासतों में आ गया। राजा इसमें अपनी शान समझते थे कि दरबार में एक दो गायक होने चाहिए, एक दो पहलवान होने चाहिए। जब रियासतें खत्म हो गईं तब हमें कान्फरेंसे देखना पड़ी।

बीते हुए वक़्त की कोई यादें? क्या आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लिया?

नहीं कोई यादें नहीं हैं। मैं बीते वक़्त को याद नहीं करना चाहता। आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा नहीं लिया। पर यह ज़रूर है कि 1947 से पहले के जो हालात थे उनके मुक़ाबले आज का हिंदुस्तान कहीं बेहतर है। परेशानी और आराम तो लगा रहता है। पर आज हम आज़ाद हैं। यह बहुत बड़ी नेमत है।

क्या आप अब भी रियाज़ करते हैं?

वो कुछ नाराज़ हो गए। बोले—क्या मेरी यह उम्र रियाज़ करने की है? क्या यह मुमकिन है कि मैं इस उम्र में रियाज़ करूंगा?

पर इस उम्र में तो आप बहुत कुछ ऐसा कर रहे हैं जो एक आम इंसान के लिए मुमकिन ही नहीं है।

यह तो खुदा की मर्ज़ी है कि मैं ऐसा कुछ नामुमकिन सा कर पा रहा हूँ। आज भी कोलकाता की अकेदेमी में 15-20 शागिर्दों को रोज़ तालीम दे रहा हूँ। मेरे दो बेटे और दो बेटियाँ हैं। एक बेटे ने थोड़ा बहुत सीखा और अब नोयडा के एक कालेज में म्यूज़िक सिखा रहा है। दूसरा लड़का सड़क और पुल का कांट्रैक्टर है। बेटियों को मैंने संगीत नहीं सिखाया। हमारे यहाँ बेटियों को मौसीकी नहीं सिखाई जाती. हमारे यहाँ पुरखों से यह सिलसिला चला आ रहा है कि औरतें नहीं गाएँगी। वैसे मेरी महिला शागिर्द भी हैं। हालांकि अगर बेटियों ने सीखा होता तो शायद मुझसे अच्छा ही गातीं। एक बेटी मेरे साथ रहती है दूसरी हाथरस में ब्याही है। घर परिवार में नाती, पर नाती, पोते, परपोते, नगरपोते सब ही हैं। पर गाने का शौक किसी को नहीं है। मेरी विरासत यही लड़का (शुभोमोय भट्टाचार्य जो उनसे कोलकाता में पिछले 15 सालों से संगीत की शिक्षा ले रहे हैं) लेगा।

आप आई टी सी संगीत रिसर्च अकेदेमी में पढ़ा रहे हैं। क्या इस कंपनी को सिगरेट बेचने का धंधा करना चाहिए या नहीं?

वो हँसते हुए कहते हैं कि यह तो धंधा है। वो जहर बाँट रहे हैं तो बांटने दीजिये। आप क्यों खाते हैं। मैं जहर बाटूंगा, आप की मर्ज़ी खाएं या न खाएं। यह आप की समझ की बात है।

शुभोमोय हमेशा मेरे साथ रहते हैं। यहाँ लखनऊ से में अपने वतन रायबरेली जाऊंगा, फिर दिल्ली होते हुए नागपुर, अमरावती, रायपुर, खैरागढ़ से वापस कोलकाता। सभी जगह प्रोग्राम लगे हैं।  पिछले महीने भी काफी राउंड हुआ। पुणे, मुंबई, बरोदा, अहमदाबाद।

मगर आपके चेहरे पर थकान का कोई निशान नहीं? 

थकान किस बात की? खुदा ने मुझे आवाज़ की नेमत दी जिसे मैं खुले दिल से तकसीम कर रहा हूँ। तकलीफ़े कम नहीं हैं। मैं अब चल फिर नहीं सकता। दो आदमी पकड़ें तो उठूँ बैठूँ। बीस साल पहले कूल्हे की हड्डी टूट जाने से ऐसी हालत हो गयी। आपरेशन भी हुआ, पर चलने की ताकत वापस नहीं आई।

पर उनके चेहरे पर दर्द का नामोनिशान नहीं है। आँखों में एक खास तरह की चमक है।और ज़िंदगी को भरपूर जीने का उत्साह। मेरे बहुत इसरार करने पर उन्होने अपनी ही बनाई हुई यह बंदिश अपनी शीशे जैसी चमकदार आवाज़ में गा कर मुझे धन्य कर दिया :

मन न रहत एक समान, मन न रहत एक समान। छिन नाहीं छिन हाँ ही, बलमा तोरी कौन बान।  अँचरा गहत, झगड़ा करत, बतियाँ करत भौएँ तान। मन न रहत एक समान, मन न रहत एक समान

शोभा शुक्ला - सी.एन.एस. 
(दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित - रविवार, १२ फरवरी २०१२)
(दैनिक हिंदुस्तान में प्रकाशित - रविवार, १२ फरवरी २०१२)

लिंग-जनित भेदभाव समाप्त हो: स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं

[English] ‘जेंडर’ या ‘सामाजिक लिंग’ जनित भेदभाव और असमानता सभी महिलाओं और पुरुषों के जीवन को प्रभावित करती है और अनैतिक और भ्रामक प्रत्यक्ष/ अप्रत्यक्ष विज्ञापनों से कैसे हमारी जीवनशैली हमको जानलेवा रोगों की ओर ले जा रही है, इन्हीं मुद्दों पर शेरवुड कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, रिसर्च और टेक्नॉलॉजी, फ़ैज़ाबाद रोड,बाराबंकी, में छात्रों  और शिक्षकों के साथ परिचर्चा हुई।

असोशिएशन फॉर अडवोकेसी एंड लीगल इनीशियाटिव्स (आली) की सामाजिक कार्यकर्ता डॉ फ़रजाना ने बताया कि महिलाओं और पुरुषों दोनों को ही अधिकार है कि सम्मान और गरिमा के साथ जीवन जी सकें। सामाजिक लिंग, या जेंडर जनित भेदभाव अक्सर महिलाओं को असमानता झेलने पर मजबूर कर देता है और इसके लिए महिलाओं और पुरुषों दोनों को जागरूक होना चाहिए और सामाजिक बदलाव लाने के लिए सक्रीय  रहना चाहिए।

'नागरिकों का स्वस्थ लखनऊ' अभियान के समन्वयक राहुल कुमार द्विवेदी ने कहा कि गैर संक्रामक रोगों का अनुपात चिंताजनक रूप से बढ़ रहा है और भारत में 2/3 होने वाली मृत्यु का कारण गैर संक्रामक रोग ही हैं, जैसे कि हृदय रोग, कैंसर, श्वास संबंधी रोग, मधुमेह, आदि। गौर करना चाहिए कि इन सब जानलेवा रोगों का खतरा बढ़ाने वाला एक समान कारण है – तंबाकू सेवन। जो लोग तंबाकू सेवन करते हैं उनको कैंसर होने की संभावना 5 गुना अधिक होती है।

राहुल कुमार द्विवेदी का संदेश स्पष्ट था: तंबाकू और शराब सेवन न करें, रोजाना व्यायाम करें, पौष्टिक और संतुलित आहार लें, और फास्ट फूड से बचें। सामाजिक लिंग या जेंडर जनित भेदभाव न करें क्योंकि यह महिलाओं को गरिमा से जीने नहीं देता, उनके अधिकार मारता है और उन्हे अनेक रोगों के प्रति धकेलता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार प्राप्त बाबी रमाकांत ने कहा कि यदि बच्चे और युवा वर्ग तंबाकू सेवन करते हैं तो इससे तंबाकू उद्योग का ही अकेले मुनाफा होता है । तंबाकू से जो राजस्व भारत सरकार को प्राप्त होता है वो तंबाकू जनित जानलेवा बीमारियों के इलाज में व्यय होने वाले धन से बहुत कम है। यदपि तंबाकू सेवन से जानलेवा गैर संक्रामक रोग (कैंसर, हृदय रोग, आदि) का खतरा कई गुना बढ़ता है, तंबाकू उद्योग ऐसे  खतरनाक उत्पाद बनाता जा रहा है।

इस परिचर्चा को ‘नागरिकों का स्वस्थ लखनऊ अभियान’, आशा परिवार, ‘आली’, इंडियन सोसाइटी अगेन्स्ट स्मोकिंग ने आयोजित किया था।

सी.एन.एस.

जनराजनीति की ताकतें हुयी एकसाथ

राष्ट्रीय ओलमा कौसिंल, सीपीएम, सोशलिस्ट पार्टी तथा जन संघर्ष मोर्चा के घटक दल उत्तर प्रदेश के आगामी विधान सभा चुनाव में मिलकर चुनाव लड़ेंगे और एक दूसरे के प्रत्याशियों के पक्ष में प्रचार अभियान चलायेगें।

प्रदेश की जनता कांग्रेस-भाजपा, सपा-बसपा की तमाम यात्राओं, रैली और आम सभाओं व उनकी भारी-भरकम घोषणाओं में दिलचस्पी नहीं ले रही है। साथ ही बहुरंगी छोटे दलों और उनके रोज बनते बिगड़ते मोर्चो को न केवल अवसरवादी बल्कि अपराधियों-माफियाओं की नयी शरणस्थली के रूप में देख रही है। इन परिस्थितियों में कारपोरेट, भ्रष्ट और माफिया राजनीति के खिलाफ बलवती हो रही जनता की नई राजनीति की आकांक्षा को ध्यान में रखते हुए यह तय किया गया कि जनराजनीति की सभी ताकतों  को चुनावी संघर्ष में भी साथ लेकर चला जाए और प्रदेश में नया राजनीतिक वातावरण तैयार किया जाए। हमारा यह दृढ़मत है कि चुनाव भी सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई का एक औजार है और जनता के राजनीतिक संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिये ही हमें चुनाव लड़ना है। इसलिए कांग्रेस-भाजपा, सपा-बसपा की जन-विरोधी एवं लोकतंत्र-विरोधी कारपोरेट राजनीति को शिकस्त देना और राजनीति को मोलतोल तथा धंधा के रूप में लेने वाली ताकतों के तथाकथित मोर्चो के घोर अवसरवाद का भण्डाफोड़ करना और जनवादी राजनीति को विकल्प के रूप में खड़ा करना हमारा फौरी कार्यभार है। इसी मकसद को आगे बढ़ाने के लिए हम चुनाव में एक साथ उतर रहे है। इस चुनाव में मजदूर, किसान, कर्मचारी, व्यापारी और छात्र युवाओं के मुद्दों के साथ दलित, अति पिछड़ों, मुसलमानों व अन्य उत्पीड़ित तबकों के अधिकारों के सवाल को मजबूती से उठाया जायेगा।

आमिर रशादी मदानी, राष्ट्रिय ओलमा कौसिंलः एस.पी. कश्यप, भारत की कम्युनिस्ट  पार्टी (मार्क्सवादी): गिरीष पाण्डेय,  सोशलिस्ट  पार्टी (इंडिया): कौशल किशोर, कम्युनिस्ट पार्टीः मोहम्मद शोएब, जनसंघर्ष  मोर्चा 

सोशलिस्ट पार्टी क्यों ?

भारत के हर धार्मिक समुदाय के मेहनतकश स्त्री, पुरूषों को अच्छी जिन्दगी जीना समाजवाद लाने से ही सम्भव होगा। दुनिया भर में बदलाव की हवा जोर से चल रही है।
  • दक्षिण अमेरिका के कई देशों के लोगों ने अमरीकी पूंजीपतियों के वर्चस्व को उखाड़ फेंक दिया है।
  • समाजवाद के प्रति प्रतिबद्ध है ऐसे नेता एवं पार्टियों को सत्ता में बैठाया है-मतदान के जरिये।
  • ब्राजील में जिन्होंने जमीन काश्त की थी, उन्हें उस जमीन का कानूनी पट्टा मिल गया है।
  • क्यूबा की सरकार एवं जनता ने अमेरिका के कई हमलें नाकाम कर दिये, वहाँ के डॉक्टर एवं नर्सो ने प्राकृतिक विपदा से ग्रस्त हुये अमेरीकी नागरिकों को स्वस्थ्य सेवा बहाल की।
  • ह्वेनाजुएला जैसे देशों ने भूमिगत तेल पर का विदेषी पूंजीपतियों का अधिकार हटा दिया तथा उन पर जनता का अधिकार कायम किया।
  • कई देशों में प्राकृतिक साधनों का इस्तेमाल आम जनता का जीवन स्तर ऊँचा उठाने के लिये किया जा रहा है।
  • अफ्रीका एवं पश्चिम एशिया के कई अरब या मुस्लिम देशों ने तानाशाह सत्ता देशों के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किये जिसके चलते कई सत्ताधिशों के सत्ता से हाथ धोना पड़ा।
  •  इजिप्ट, ट्यूनेशिया आदि देशों ने जनतात्रिक ढंग से नये सत्ताधीश चुने गये। वहाँ के राजनैतिक एवं सामाजिक आन्दोलन पर उदारवादी इस्लाम का प्रभाव बढ़ रहा है। बहुतांश देशों में परिवर्तन का परचम उठाने में महिलायें आगे है।
  • पूंजीवाद के पूराने गढ़ अमेरिका (यू0एस0ए0) तथा पष्चिम यूरोप के इग्लैण्ड फ्रांस आदि देशों में ‘‘बाल्स्ट्रीट पर कब्जा करों’’ जैसे जन आन्दोलन तेजी से बढ़ रहे हैः- ‘‘1 प्रतिशत के लिये, एक प्रतिशत द्वारा, एक प्रतिशत की हुकूमत’’ इसके खिलाफ लोग बगावत कर उठे है।
  • ‘‘जनता के लिये, जनता द्वारा, जनता के राज्य’’ चलाने के लिये कई जन आन्दोलन चल रहे है। वित्तीय संस्थायें, बैंक आदि पर वहाँ के केन्द्रीय बैंकों में जबरदस्त नियंत्रण बैठाये है। ये सब संस्थायें जनता की प्रतिनिधित्व संस्थाओं को जवाब देह बनाई जा रही है। क्या भारत पीछे रहेगा ? नहीं।
हमारे सम्प्रभुतासम्पन्न, धर्मनिर्पेक्ष, जनतांत्रिक, गणतंत्र की बुनियाद भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, रोशन सिंह जैसे शहीदों ने डाली है। 

19 वीं सदी के क्रान्तिदर्शी समाज सुधारक एवं 20वीं सदी के राजनीतिक नेताओं ने प्रजातांत्रिक संविधान का ढांचा बनाया जिसे डॉ0 बाबा साहब अम्बेडकर ने शब्दबद्ध किया।
  • सत्ताधीशों को मतदान द्वारा बदलने का कौशल भारत की जनता ने प्राप्त कर लिया है।
  •  शिक्षा का बड़े पैमानें पर फैलाव हुआ है लेकिन व्यवसायीकरण को समाप्त कर समान शिक्षा की आवश्यकता है। सदियों से शोषित तथा पीड़ित रखें हुये तबकों के स्त्री, पुरूष पढ़ाई के द्वारा आत्मभान प्राप्त कर चुके है। वे अपने अधिकार मांग रहे है। परिवर्तन की शक्तिया तेजी से उभर रही है।
  •  दुर्भाग्य से बाहुबली लोग एवं धन्ना सेठ चुनाव प्रक्रिया पर प्रभाव डालकर राजनीतिक सत्ता हथिया रहे है क्या कांग्रेस, क्या भाजपा- वे सब खुले बाजार पर आधारित भूमण्डलीयकरण का गुणगान कर रहे है। भारत की अर्थव्यवस्था के दरवाजे उन्होंने धनी देशों के कम्पनियों के लियें खोल दिये है। पिछले 20-22 साल में देश में बेरोजगारी बढ़ी, गरीब तथा अमीर के बीच वैसे ही औद्योगिक शहर बनाम ग्रामीण या झोपड़पट्टी इलाको के दरम्यान खाई बढ़ गयी है। विषमता बहुत बढ़ गयी है। जीवनावश्यक चीजों के दाम इतने बढ़ गये कि आम जनता की जिन्दगी हराम हो गयी है।
  • ‘‘विकास के लिये औद्योगीकरण होना जरूरी है’’ ऐसा कहते कहते कम्युनिष्ट पार्टिया भी देशी तथा विदेशी पूंजीपतियों के आगत स्वागत में जूट गयी है। इन सभी प्रतिष्ठित पार्टियों के सोच में बड़ी खोट है। जिन देशों में केवल दो या 10 प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर है, ऐसे देशों के विकास का नमूना वे भारत के लिये भी अनुकरणीय मानते है। उन देशों अफ्रीका, एशिया एवं लैटिन अमेरिका के लोगों पर साम्राज्यवादी हुकूमत चलाकर वहाँ की जनता का 200 साल तक जबरदस्त शोषण किया। उसी से उनके विकास के लिये पूंजी का संचय हुआ। वह तरीका अन्यायपूर्ण था तथा आज अब विकासशील देशों को वह उपलब्ध नहीं है। इन्हें अपना विकास अपने बलबूते पर ही करना होगा। उधार खाते पर वर्ल्ड बैंक व अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के बलबूते पर नहीं- वह अमेरिकी गुलामी है।

सोशलिस्ट पार्टी मानती है कि खेती, पशुपालन, मंछीमारी, वन विकास तथा न्यायोचित खनन इन्हीं क्षेत्रों को बढ़ावा दिया जाये ताकि समाज की अन्नसुरक्षा, बरकरार रहे। छोटे मशीन द्वारा ग्रामीण इलाके में उद्योग चलाये जाये, जिनका संचलन सहकारी संस्था करें। इसी रास्ते से जाने पर हर बालिग स्त्री, पुरूष को अर्थपूर्ण रोजगार मिलेगा। किसी का शोषण नहीं होगा।

वित्तीय पूंजीवाद सबसे खतरनाक है। इण्डोनेशिया, थाईलैण्ड, फिलीपीन्स आदि देशों की अर्थव्यवस्थायें उन्हीं के चलते ध्वस्त हो गयी थी। भारत जैसे देश में भी शेयर बाजार के उतार चढ़ाव लोगों को बिना कारण भयभीत करते है। बैंकों में गरीब तथा मध्यवर्ग के लोगों का पैसा जमा रहता है। उसे सुरक्षित रखने के लिये उन पर रिजर्व बैंक शख्त नियंत्रण रखे, ऐसा सोशलिस्ट पार्टी का कहना है और शेयर बाजार की सट्टाबाजी (जुआड़खाना) बन्द कर दिया जाये तभी महंगाई पर काबू हो सकेगा।

खेती उपज को किफायती दाम मिले तथा उससे डेढ़ गुना दाम में साधारण ग्राहक को गेंहू, चावल, दाल आदि मिले। इस तरह पूरी व्यवस्था सहकारी संस्था की सहायता से सरकार को चलानी चाहियें। ऐसा सोशलिस्ट पार्टी का कहना है और मूल्य संतुलन स्थापित हो पायेगा।

गत् कुछ सालों में किसानों की अच्छी जमीनें सरकार ने कम दाम देकर जबरदस्ती अधिग्रहण (सम्पादित) करके पूँजीपतियों  को सौपी है। उसके लिये जिसका इस्तेमाल किया, वह कानून अंग्रेजों ने बनाया था। सन् 1894 का भूमि अधिग्रहण कानून रद हो जाना चाहियें। नये कानून का जो विधेयक भारत सरकार ने पेश किया है, उसके उद्देश्य में साफ लिखा है कि कारखानदारी एवं शहरीकरण को मदद करने के लिये नया भूमि अधिग्रहण कानून बनाया जायेगा। क्या जमीन पर इन  पूँजीपतियों  का ही अधिकार है ? इस देश में ऐसे घुमन्तु कबीले या कुन्बे है, जिनका न कोई गांव है और न कोई घर। वे हर जगह निर्वासित ही माने जाते है। न उनको राशन कार्ड मिलता है न मतदाता कार्ड। क्या घर बाँटने के लिये जमीन का छोटा सा टुकड़ा उन्हें मिले, यह उनका अधिकार नहीं है ? उन्हें तथा वनवासियों को वहीं बसाया जाये और उन्हें खेती के लिये प्रथमतः जमीनें व कुठीर उद्योग स्थापित करने के बाद ही शेष भूमि पर पावर लूम तब बड़े उद्योग स्थापित किये जाये।

सोशलिस्ट पार्टी ने सुझाव रखा है कि जमीन के इस्तेमाल सम्बन्धी राष्ट्रीय नीति निर्धारित की जाये जिसमें पहला अधिकार बेघर लोगों को घर बसाने का होगा। खेती, मंछीमारी को दूसरा स्थान हो। कारखानों को तीसरा स्थान हो। सड़क, नहर, रेल आदि सार्वजनिक योजनाओं के लिये जमीन का अधिग्रहण ग्राम सभा से करवाया जाये ऐसी सोशलिस्ट पार्टी की पक्की राय है।

सोशलिस्ट पार्टी ‘‘पिछड़ें पावे 100 में 60’’ इस डॉ. लोहिया के नारे पर अभी भी विश्वास करती है। शिक्षा, खेती, उद्योग, नौकरी एवं सत्ता-सभी में उनको न्यायोचित हिस्सा मिलना चाहियें। सोशलिस्ट पार्टी का आग्रह है कि देश के सभी बालक-बालिका को मुफ्त अनिवार्य, समान एवं गुणात्मक शिक्षा मिले ऐसी व्यवस्था चलाना सरकार का फर्ज है और शिक्षा के बाजारीकरण को सख्त कानून बनाकर समाप्त कर दिया जाये। आम आदमी को स्वास्थ्य सेवा, सुलभता से उपलब्ध करा देने की जिम्मेदारी भी सरकार को उठानी चाहिये ऐसा सोशलिस्ट पार्टी का कहना है। बाहुबल एवं धनबल का चुनाव पर प्रभाव न हो, इस हेतु चुनाव प्रणाली में सुधार करना सोशलिस्ट पार्टी आवश्यक मानती है। 

आज राजनीति में मौका परस्ती, स्वार्थ, भाई-भतीजावाद बहुत बढ़ गया है। साधारण आदमी को अच्छी जिन्दगी जीने का अवसर मिले, इसलिये पूरे ढांचे में परिवर्तन लाने का प्रण किये हुये आदर्शवादी, जूझारू एवं कार्य कुशल कार्यकर्ताओं की सेना खड़ी करना यह सोशलिस्ट पार्टी का उद्देश्य है। इसलिये दलित, आदिवासी, महिला, युवा खेत मजदूर, किसान, असंगठित श्रमिक आदि सब लोग सोशलिस्ट पार्टी के झण्डें तले अपना संगठन मजबूत बनाये, ऐसा पार्टी का आहवान है। सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवारों को भारी बहुमत से जिताये ऐसा भी हमारा  आहवान  है।

भाई बैद्य (अध्यक्ष), केषव राव जाधव तथा संदीप पाण्डेय (उपाध्यक्ष), प्रेम सिंह, नुरूल अमीन तथा ओंकार सिंह (प्रमुख सचिव), जयन्ती पांचाल (कोशाध्यक्ष), पन्नालाल सुराणा अध्यक्ष, एवं जया विदियाला सचिव (केन्द्रीय संसदीय बोर्ड), गिरीष पाण्डेय अध्यक्ष,  सोशलिस्ट  पार्टी राज्य शाखा उत्तर प्रदेश

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिए

आजादी की लड़ाई का एक साफ मकसद था, गुलामी के जुए को उतार फेकना। जब उद्देश्य ऊंचा और साफ-साफ होता है तब समाज का हर तबका उस  राजनीति से जुड़ जाता है। मौजूदा विधान सभा चुनाव एक ऐसे दौर में हो रहा है जब देश के हर नागरिक के मन में भ्रष्टाचार के खिलाफ तीव्र भावना है। लेकिन राजनीति की मुख्यधारा के अधिकांश’ दलों के पांव भ्रष्टाचार के कीचड से सने हैं। इसी वजह से आम जनता का इन चुनावों में उत्साह कम दिख रहा है। देश में बड़े बड़े घोटालों की आई बाढ़ की जड़ से १९९२ से चलाई गई आर्थिक नीतियों का सीधा सम्बन्ध है। इन नीतियों को केन्द्र और राज्य में रही हर दल की सरकार ने अपना लिया है। इसीलिए ये तमाम पार्टियां इस चुनाव में इन मसलों से मुंह चुरा रही हैं।

शिक्षित नौजवानों को छोटी-सी नौकरी भी बिना रिश्वत नहीं मिल रही। नई आर्थिक नीतियों से रोजगार के अवसर संकुचित हुए हैं। आबादी के मुट्ठी-भर लोगों के लिए रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा की सुविधाओं को बढ़ावा देने का सीधा मतलब है कि आम लोगों को इन सुविधाओं से दूर किया जाना। जब आम जनता की जरूरतों को पूरा करना उद्देश्य होगा तब ही रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और वे रोजगार सुरक्षित रहेंगे।

एक प्रभावशाली जन लोकपाल कानून की धज्जियां उड़ाने में सभी बड़े दलों ने कोई कसर नहीं छोड़ी।  भ्रष्टाचार का सफाया करने के लिए जन लोकपाल के अलावा भी अन्य पहल भी करनी होंगी। बुनकरी-जरदोजी तथा अन्य रोजगार, स्वास्थ्य , शिक्षा - इन सभी क्षेत्रों में जनता की दुशवारियां बढ़ गई हैं। आम बुनकर और दस्तकार को ध्यान में रखकर कपड़ा नीति और दस्तकार नीति अब तक नहीं बनी है। सभी बड़ी पार्टियां इसके लिए जिम्मेदार हैं। बुनकरों की सहकारी समिति के नाम पर फर्जीवाड़े के मामले भी सामने आए हैं। जरदोजी और दस्तकारी से जुड़े लोगों को बुनकरों के समान सुविधायें मिलनी चाहिए। बुनकर और दस्तकार इस देश के लिए बहुमूल्य विदेशी मुद्रा अर्जित करते हैं लेकिन उनकी तरक्की की हमेशा अनदेखी की जाती है।

खेती और दस्तकारी के बाद हमारे देश में सबसे बड़ा रोजगार खुदरा-व्यापार है जिस पर हमले की रणनीति बन चुकी है। केन्द्र सरकार की पार्टी के राजकुंवर की समझदारी के अनुसार दानवाकार विदेशी कम्पनियों को देश का खुदरा-व्यापार सौंप कर वे किसानों का भला करने जा रहे हैं। देश के सबसे बड़े घराने के द्वारा जिन सूबों में सब्जी का खुदरा-व्यवसाय हो रहा है क्या वहां के किसानों ने खुदकुशी से मुक्ति पा ली है ?

प्रदेश की सरकार द्वारा भ्रष्टाचार को नया संस्थागत रूप दे दिया गया है। किसानों की जमीनें लेकर जो बिल्डर नये नगर और एक्सप्रेस-वे बनाने की जुगत में है, उनके खर्च पर प्रदेश सरकार ने पुलिस थाने (चुनार) का निर्माण करवाया है। कई पुलिस चौकियां अपराधियों के पैसों से बनवाई गई हैं। समाजवादी जनपरिषद नई राजनैतिक संस्कृति की स्थापना के लिए बना है। जिन इलाकों में दल ने संघर्ष किया है और मजबूत जमीन बना ली है सिर्फ वहीं चुनाव में शिरकत करता है।  मजबूत राजनैतिक विकल्प बनाने का काम व्यापक जन-आन्दोलन द्वारा ही संभव है। इसलिए भ्रष्ट राजनीति के दाएरे से बाहर चलने वाले आन्दोलनों और संगठनों के मोर्चे का वह हिस्सा है। राष्ट्रीय-स्तर पर  ‘लोक राजनीति मंच’ तथा जन आन्दोलनों का राष्ट्रीय समन्वय ऐसी बड़ी पहल हैं तथा स्थानीय स्तर पर साझा संस्कृति मंच, जो सामाजिक सरोकारों का साझा मंच है।

वाराणसी के हमारे प्रत्याशी की राजनैतिक यात्रा इसी शहर में जयप्रकाश आन्दोलन के किशोर कार्यकर्ता के रूप में  शुरु हुईः छात्र-राजनीति को जाति-पैसे-गुंडागर्दी से मुक्त कराने की दिशा में समता युवजन सभा से वे जुड़े और एक नयी राजनीति की सफलता के शुरुआती प्रतीक बने। लोकतांत्रिक अधिकार और विकेन्द्रीकरण, सामाजिक न्याय ,पर्यावरण तथा आर्थिक नीति के दुष्परिणामों के विरुद्ध संगठनकर्ता बने तथा इन्हीं संघर्षों के लिए समाज-विरोधी ताकतों के लाठी-डंडे खाये और थोपे गए फर्जी मुकदमों में कई बार जेल गये।

फिरकावाराना ताकतों का मुकाबला करने के लिए नगर में गठित ‘सदभाव अभियान’ से वे सक्रियता से जुड़े। साम्प्रदायिक दंगों के दौरान थोपे गये फर्जी मुकदमों को हटाने के पक्ष में तथा हिंसा में शरीक लोगों पर लगे मुकदमों को सरकार द्वारा हटाने के विरुद्ध अफलातून ने कामयाब कोशिश की। पुलिस उत्पीड़न के खिलाफ हमारे समूह ने रचनात्मक संघर्ष का सहारा लिया है तथा मानवाधिकार आयोग द्वारा सार्थक हस्तक्षेप के लिए पहल की है। वाराणसी के स्त्री सरोकारों के साझा मंच - समन्वय के माध्यम से शहर में ही नहीं समूचे राज्य में हुए नारी-उत्पीड़न के विरुद्ध कारगर आवाज उठाई गई है।

रोज-ब-रोज की नागरिक समस्याओं का समाधान नगर निगम और उसके सभासदों के स्तर पर होना चाहिए। विधायक-नीधि का दुरुपयोग ज्यादा होगा यदि कोई ठेकेदार ही विधायक बन जाए। इसलिए वाराणसी कैन्ट क्षेत्र में भ्रष्ट राजनीति से जुड़े दलों का विकल्प खोजने की आप कोशिश करेंगे तो आपकी निराशा दूर हो सकती है। बड़े दलों से जनता की निराशा के कारण फिर अस्पष्ट बहुमत का दौर शुरु होगा ऐसा  प्रतीत  हो   रहा   है।   इसलिए समाजवादी जनपरिषद के उम्मीदवार विधान सभा में विपक्ष में रहने और जन आकांक्षाओं की आवाज को बुलन्द करने का संकल्प लेते हैं। हमें जनता के विवेक पर भरोसा है। यह सिर्फ अफवाह ही हो सकती है कि सुबह होगी ही नहीं। सुबह होगी क्योंकि मत, बल,समर्थन आपके हाथ में है। भ्रष्ट राजनीति से जुड़े दलो से छुटकारा पाने की आपकी कोशिश सफल होगी यह हमे यकीन है। विधान सभा में आपकी आवाज बुलन्द हो इसलिए हम आप से अपील करते हैं कि अपना अमूल्य वोट देकर वाराणसी कैन्ट से समाजवादी जनपरिषद के साफ-सुथरे और जुझारु उम्मीदवार अफलातून को भारी मतों से विजयी बनाएं।

अफ़लातून देसाई, वाराणसी कैन्ट से प्रत्याशी