तपेदिक या टीबी समाचार सारांश: १८ मई २००८: अंक ४६

तपेदिक या टीबी समाचार सारांश
अंक ४६
रविवार, १८ मई २००८


भारत में जेल के कैदियों को इसलिए जमानत मिल जाती है क्योकि वह एच.आई.वी और टीबी या तपेदिक दोनों से ग्रसित हैं.

परन्तु अमरीका में और अन्य देशों में लोग इसलिए जेल में कैद किया जा रहे हैं क्योकि उनको टीबी या तपेदिक है और जबरन उनका इलाज पूरा करना सरकार अपनी जिम्मेदारी समझती है, और जेल में कैद कर के इलाज पूरा कराना सबसे कारगर तरीका.

भारतीय कोर्ट के माननीय जज महोदय का कहना था कि एच.आई.वी और टीबी या तपेदिक से ग्रस्त कैदी को साफ-सफ़ाई और स्वच्छ मौहौल चाहिए जिससे कि वह पुन: स्वस्थ्य हो सके. यह कोई मामूली कैदी भी नही, यह वह कैदी है जिसपर २ क़त्ल का मुकदमा चल रहा है. इस पर आरोप है कि इसने एक IAS अधिकारी के लड़के और उसके दोस्त का क़त्ल कर दिया था.

यह भारतीय जज की संवेदनशीलता है और दुनिया के लिये उदाहरण - शोधों के आधार पर यह स्पष्ट है कि जेल के भीतर का मौहौल जिनमें कैदी रहते हैं, अक्सर संक्रामक रोगों को फैलने में मदद करता है. जेल के भीतर संक्रमणों का दर कही अधिक पाया जाता है. गनीमत है कि हमारे यहाँ रोगी-कैदियों को रहम तो मिल रहा है.

यदि अमरीका या अन्य देश में होते, तो अच्छे भले आदमी को यदि टीबी या तपेदिक हो तो जेल होने की सम्भावना रहती है.

इटली की फिनान्स मंत्रालय और एक अन्य इटली की सामाजिक संगठन ने फिलीपींस के बच्चों में टीबी या तपेदिक कार्यक्रमों को सशक्त करने के लिये अनुदान दिया है. बच्चों में टीबी या तपेदिक के संक्रमण की जांच होना भी दुर्लभ है, और इलाज भी, विशेषकर कि अगर एच.आई.वी हो.

जापान ने ग्लोबल फंड टू फाइट एड्स, टीबी और मलेरिया को अमरीकी डालर ५०० मिलियुन अनुदान दिया है, जिससे कि विकासशील देशों में संक्रामक रोगों के कार्यक्रमों को मजबूत किया जा सके.

एड्स और मलेरिया से ही लगभग ५० लाख लोगों की मृत्यु सालाना होती है, और ८० प्रतिशत इनमें से मरने वाले लोग अफ्रीका में हैं.

अमरीका के एकमात्र बचे हुए टीबी या तपेदिक अस्पताल (a.g.holley अस्पताल जो फ्लोरिडा में है) काफी समय से चर्चा में रहा है. अमरीकी सरकार इसको भी बंद करने की मंशा में थी, परन्तु बढ़ते हुए टीबी या तपेदिक के दर से संभवत: उसने अपना इरादा बदल लिया है और इस अस्पताल को एक साल और चलाने का प्रस्ताव पारित किया है.

अगले साल (२००९) इस अस्पताल को निजी अस्पताल में परिवर्तित कर दिया जाएगा. टीबी या तपेदिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह कारगर नीति नही है क्योकि अमरीका में टीबी, खासकर की ड्रग रेसिस्तंत टीबी के बढ़ने का खतरा मंडरा रहा है, और इस मौहौल में आवश्यक है कि टीबी या तपेदिक का विशेष अस्पताल हो जहाँ लोगों को उचित ढंग से पर्याप्त इलाज मिल सके. टीबी या तपेदिक के अस्पताल न होने की वजह से पोलिस या जेल में टीबी या तपेदिक का इलाज जबरन कराया जा रहा है, जो उचित नही है.

इन्तेर्फेरों गाम्मा रिलीज़ ऐसे (IGRA) परीक्षण कम-से-कम तुबेर्कुलिन स्किन टेस्ट (TST) परीक्षण जितना प्रभावकारी तो है ही - इस शोध से यह प्रमाणित होता है.

तुबेर्कुलिन स्किन टेस्ट टीबी या तपेदिक के लिये एक बहुत पुराना परीक्षण है (लगभग १०० साल पुराना परीक्षण विधि). इस परीक्षण से अक्सर झूठे नतीजे आते हैं, जैसे की जिन लोगों को लेटेंट टीबी या तपेदिक का रोग है (यानि कि सक्रिय टीबी या तपेदिक का रोग नही है), उनका नतीजा भी पोसिटिव आता है, और जिन लोगों ने BCG वैक्सीन ले रखी है, उनका नतीजा भी पोसिटिव आता है. इसीलिए तुबेर्कुलिन स्किन टेस्ट कराने के बाद यह पुष्टि कराने के लिये कि टीबी या तपेदिक का संदेह सही है या नही, अन्य परीक्षण की आवश्यकता होती है.

तम्बाकू किल्स समाचार बुलेटिन: १८ मई २००८: अंक ३८१

तम्बाकू किल्स समाचार बुलेटिन
१८ मई २००८
अंक ३८१



तम्बाकू, शराब कम्पनियाँ मुझे खदेड़ना चाहती हैं: डॉ रामादोस

स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामादोस ने शनिवार को चेन्नई में हो रही एक प्रेस वार्ता में कहा कि शराब और तम्बाकू कम्पनियाँ मिल के उनको खदेड़ना चाहती हैं.

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लोकतंत्र में फिल्मों में तम्बाकू सेवन दिखाने पर प्रतिबन्ध क्यो?

भारत के स्वास्थ्य मंत्री डॉ रामादोस का कहना है कि फिल्मों में तम्बाकू सेवन को प्रदर्शित करने से बच्चों और युवाओं पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है, और शोध के अनुसार प्रति वर्ष फिल्मों में तम्बाकू सेवन से प्रेरित हो कर ही अधिकांश बच्चे/ युवा तम्बाकू सेवन आरंभ करते हैं.

परन्तु फ़िल्म कलाकार अजय देवगन का कहना है कि भारत में लोकतंत्र है, इसलिए इस तरह की पाबन्दी कैसे लग सकती है?

देवगन को कोई समझाए कि लोकतंत्र का मतलब यह नही है कि जंगल राज है. तम्बाकू सेवन जान लेवा बीमारियों का जनक है, फिल्मों में तम्बाकू सेवन को देख कर ही बच्चे युवा तम्बाकू सेवन आरंभ करते हैं, इसीलिए डॉ रामादोस और भारतीय तम्बाकू नियंतरण कानून दोनों यही नीति लागू करने का प्रयास कर रहे हैं.

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भारतीय शराब और तम्बाकू कम्पनियाँ अपनी षड्यंत्र बदल रही हैं

भारत में सबसे बड़ी विज्ञापन कराने वाली कंपनियों में से हैं - शराब और तम्बाकू कम्पनियाँ. अब चूँकि भारत में शराब और तम्बाकू दोनों के ही उत्पादनों पर विज्ञापन बंदी है, इसलिए इन कंपनियों को अप्रत्यक्ष और अन्य प्रकार के वैकल्पिक विज्ञापन के तरीकों का सहारा लेना पड़ रहा है.

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दुनिया की सबसे बड़ी तम्बाकू कंपनी फिलिप मोरिस भारत में लोंग वाली सिगरेट ला रही है

इन्डोनेसिया में लोंग वाली सिगरेट काफी लोकप्रिय हैं, और घातक भी, जिनको गुदंग गरम कहते हैं. अब भारत में भी फिलिप मोरिस 'क्लुव स्पिस' नाम से लोंग वाली सिगरेट ला रही है.

कंपनी की धूर्तता देखिये: उसके एक प्रतिनिधि का कहना है कि लोंग स्वास्थ्य और मौखिक स्वच्छता और महक से जुड़ा हुआ है - यानि कि एक बार और सिगरेट कम्पनियाँ तम्बाकू के जान लेवा कुप्रभावों के बजाय लोंग के गुण बताएंगी.

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तपेदिक या टीबी समाचार सारांश: शनिवार, १७ मई २००८: अंक ४५

तपेदिक या टीबी समाचार सारांश
अंक ४५
शनिवार, १७ मई २००८


एली लिल्ली नामक दवा कंपनी ने पिछले हफ्ते ही १० करोड़ अमरीकी डालर दान दिया था जिससे चिकित्सकों को मल्टी-ड्रग रेसिस्तंत टीबी या तपेदिक के सही इलाज के लिये प्रशिक्षित किया जा सके. यह धनराशी वर्ल्ड मेडिकल असोसिएशन या अंतर्राष्ट्रीय चिकित्सकों का संगठन, को दी गई है. यह प्रशिक्षण, नि:शुल्क है, और इंटरनेट के मध्यम से दिया जाएगा. इसके पंजीकरण के लिये, इस वेबसाइट पर जाएं: http://www.wma.net

टीबी या तपेदिक जो ड्रग रेसिस्तंत नही है, उसके उपचार के लिये तो विश्व स्तर पर मानक बने हुए हैं, परन्तु ड्रग रेसिस्तंत टीबी या तपेदिक के इलाज के लिये विभिन्न तौर-तरीके सुनने को मिलते हैं. यह भी सत्य है कि बहुत कम देशों में, और चंद ही शहरों में मल्टी-ड्रग रेसिस्तंत टीबी या तपेदिक की जांच/ परीक्षण की प्रयोगशालाएं उपलब्ध हैं. अधिकांश देशों में जहाँ मल्टी-ड्रग रेसिस्तंत टीबी या तपेदिक होने की संभावना तीव्र है, वहाँ इसकी जांच के लिये प्रयोगशाला है ही नही, उदाहरण के लिये अफ्रीका के सिर्फ़ २-३ देशों में ही मल्टी-ड्रग रेसिस्तंत टीबी की जांच करने के लिये प्रयोगशाला हैं.

यही दवा कंपनी अपने १३२वें साल पूरे होने पर अपने स्थापना दिवस को एक अनोखे तरीके से मना रही है। इस दवा कंपनी के सभी कार्यालयों के सारे कर्मचारी एक दिन के लिये काम को रोक कर अपने अपने शहरों में सामाजिक कार्य करेंगे. कही पर कोई सड़क साफ करेगा तो कही पर कोई वृक्षारोपण करेगा, चीन में सभी कर्मचारी 'ग्रेट वाल ऑफ़ चाइना' पर चल कर मल्टी-ड्रग रेसिस्तंत टीबी या तपेदिक से लड़ने के लिये चन्दा इकठ्ठा करेंगे.
बिओमेरिक्स और FIND (फाउंडेशन फॉर इन्नोवातिवे न्यू दिअग्नोस्टिक) ने मेमोरंदुम ऑफ़ उन्देर्स्तान्डिंग स्थापित किया है कि बिओमेरिक्स जो की एक दवा कंपनी है और FIND जो टीबी या तपेदिक के लिये नई परीक्षण या जांच के शोध को बढावा देने के लिये समर्पित है, दोनों एकसाथ मिलकर टीबी या तपेदिक के नए जांच आदि के लिये शोध करेंगे.

टीबी या तपेदिक की जांच में जो मिक्रोस्कोप इस्तेमाल होता है वह १०० साल पुराना है. खासकर की ड्रग रेसिस्तंत टीबी या तपेदिक के बढ़ते दर को देख के यह और भी अधिक लाज़मी हो जाता है कि नए परीक्षण, नई दवाएं, और नई उपचार विधियाँ जो अधिक प्रभावकारी हों, वह शीघ्र ही लोगों तक पहुचें.

टीबी या तपेदिक का बक्टेरिया कैसे मानव शरीर के भीतर छुप कर बैठता है और कैसे अपनी तादाद बढ़ाता है, इस पर नए शोध के नतीजे से अब वैज्ञानिक टीबी या तपेदिक के लिये अधिक प्रभावकारी दवाएं बना पाएंगे, ऐसी उम्मीद है. इस शोध से यह भी वैज्ञानिक जानकारी मिल रही है कि कौन से कारण हैं जो टीबी या तपेदिक को सक्रिय रोग में परिवर्तित होने से रोक सकते हैं जिससे लेटेंट टीबी या तपेदिक ही शरीर में रहे, जो उपचार से ठीक हो सकती है (इसोनिअजिद थेरेपी).

अफ्रीका के मालावी देश में एक नर्स की दास्ताँ जो पिछले कई सालों से टीबी या तपेदिक की रोकधाम के लिये समर्पित है. इस समाचार में खासकर कि कई मुद्दें ऐसे उठे हैं जो सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दें हैं जिनके कारण महिलाएं टीबी या तपेदिक की सही समय पर जांच और पूरा इलाज नही कर पाती हैं.

अमरीका में टीबी या तपेदिक के इस रपट से यह चौकाने वाले तथ्य सामने आए हैं कि अमरीका में ११.३ प्रतिशत लोगों में टीबी और एच.आई.वी दोनों हैं! वहीं जिन लोगों में टीबी या तपेदिक पुन: हो जाता है, उनमें मल्टी-ड्रग रेसिस्तंत टीबी या तपेदिक होने का अनुपात ७ प्रतिशत है!

भुमाफियाओं द्वारा RTI कार्यकर्ता रोबी शर्मा के ऊपर फर्जी मुकदमा

भुमाफियाओं द्वारा RTI कार्यकर्ता रोबी शर्मा के ऊपर फर्जी मुकदमा
महेश कुमार, सूचना का अधिकार अभियान, कानपुर
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कानपुर में भुमाफियाओं और कानपुर विकास प्राधिकरण (के.डी.ए) के अधिकारियों ने RTI कार्यकर्ता रोबी शर्मा पर पनकी थाने में फर्जी मुकदमा दर्ज कराया.


रोबी शर्मा पिछले २ वर्षों से सूचना अधिकार अभियान कानपूर से जुड़कर सूचना अधिकार के माध्यम से कानपुर में भ्रष्टाचार से जुड़े मुद्दों को उजागर करने में लगे हुए हैं.

रोबी शर्मा जी ने कानपुर में मल्टी-स्टोरी बिल्डिंगों के बावत
के.डी.ए और फायर डिपार्टमेन्ट से सूचना के अधिकार के तहत यह जानकारी चाही कि कानपुर में बने मल्टीस्टोरी बिल्डिंगों में से कितने भवन फायर डिपार्टमेन्ट के मानकों के अनुसार बने हुए हैं, और कितने भवनों ने फायर डिपार्टमेन्ट से एन.ओ.सी लिया हुआ है.

के.डी.ए से उन्होंने यह भी सूचना मांगी कि रिहायशी इलाकों में गेस्ट हॉउस और व्यापारिक गतिविधियाँ किस आदेश के तहत चल रही हैं.

पनकी छेत्र में रामलीला पार्क को किस आदेश के तहत प्राइवेट विद्यालय के लिए आवंटन किया गया है.
के.डी.ए और भुमिमाफियाओं के गठबंधन के कारण कानपुर में कई जगहों पर भुमफियाओं ने जमीन कब्जा किया हुआ है.

उनकी कई सारी सूचनाएँ
के.डी.ए ने अब तक उपलब्ध नही करायी हैं जिसका मुकदमा राज्य सूचना आयोग में चल रहा है. कानपुर में स्थित दो बड़े मल्टीप्लेक्स - रेव थ्री और रेव फाइव भवन भी पिछले कई वर्षों से बिना फायर विभाग की एन.ओ.सी से चल रहे हैं. यह भवन एक प्रमुख दैनिक अखबार के मालिक के हैं.

इस कड़ी में ८/५/२००८ को
के.डी.ए के मुख्य नगर नियाज़ महावीर सिंह ने के.डी.ए सचिव हेमंत कुमार सिंह के कार्यालय में अपील सुनवाई के दौरान रोबी शर्मा जी को अपशब्द कहने के साथ ही धमकी दी कि ज्यादा सूचनाएँ न मांगे नही तो गंभीर परिणाम होंगे. पूर्व में भी एक कतिपय नेता राम जी त्रिपाठी द्वारा भी एक अन्य प्रकरण में धमकाया जा चुका है. इसी क्रम में ९/५/२००८ को पनकी थाने में शर्मा जी के ऊपर नाजायज़ दबाव बनाने के उद्दयेश से उनके ऊपर एक व्यक्ति जिसको श्री शर्मा जी जानते तक नही है, शर्मा जी के विरुद्ध झूठा मनगढ़ंत मुकदमा कायम कर दबाव बनाने का प्रयास किया गया है ताकि रोबी शर्मा जी डर कर सूचना न मांगे.

यह जानकारी चौकी इंचार्ज पनकी श्री आर.के.पाण्डेय जी ने शर्मा जी को बुलवाकर बताई (पाण्डेय जी का मोबाइल नो. ९४१५१७४९७० है). दिनांक १२/५/२००८ को सूचना अधिकार अभियान कानपुर के साथी एस.एस.पी कानपुर से मिलकर इस प्रकरण के बावत जानकारी दी साथ ही प्रेस क्लब में प्रेस वार्ता कर के मीडिया को प्रसाशनिक अधिकारियों और भुमाफियों के गठजाड़े का खुलासा करते हुए व रोबी शर्मा पर बनाये जा रहे दबाव की जानकारी दी.

प्रेस वार्ता के बाद १२/५/२००८ की शाम आठ बजे के करीब अभियान के साथी कुलदीप सक्सेना जी को प्रमुख दैनिक अखबार के कार्यालय में उनके किसी परिचित के माध्यम से बुलाया गया. वहाँ पर दैनिक अखबार के ब्यूरो प्रमुख संजीव मिश्रा द्वारा कुलदीप सक्सेना को यह धमकी दी गई कि रोबी शर्मा को रेव के मामले से बाहर हटने को कहें वरना इसके गंभीर परिणाम होंगे. साथ ही यह भी कहा कि हमारे अखबार के मालिकों के पीछे न पड़े वरना उनको जेल के अन्दर सड़ा देंगे.

१३/५/२००८ को कानपुर जिला अधिकारी और एस.एस.पी से मिलकर एक बार फिर इस प्रकरण के सन्दर्भ में उन्हें जानकारी से अवगत कराया गया.

उन्होंने आश्वासन दिया कि इस सन्दर्भ में कार्यवाही करेंगे.

रोबी शर्मा जी का कहना है कि भुमाफियाओं और
के.डी.ए के भ्रष्ट अधिकारियों के ख़िलाफ़ उनका यह संघर्ष अन्तिम लड़ाई तक जारी रहेगा. हो सकता है कि अखबार के मालिक और भुमाफियाओं के द्वारा आने वाले समय में मेरे ऊपर किसी और प्रकार से दबाव बनाने के साथ-साथ हत्या की भी साजिश की जा सकती है.

अधिक जानकारी के लिए सम्पर्क करें:

महेश

सूचना का अधिकार अभियान, कानपुर

(१५/२४५ सिविल लाइन्स, कानपुर - २०८००१)
मोबाइल: +91 98385 46900
ईमेल: maheshballia@yahoo.com


तम्बाकू किल्स समाचार बुलेटिन (१५ मई २००८): अंक ३७९

तम्बाकू किल्स समाचार बुलेटिन

१५ मई २००८
अंक ३७९

वायु प्रदुषण और तम्बाकू के धुएँ से तपेदिक या टीबी रोग सक्रिय हो सकता है

एक नए शोध से यह स्थापित हो गया है कि वायु में प्रदूषण, मोटर-गाड़ी से निकलते धुए से प्रदूषण और धूम्रपान से टीबी या तपेदिक का रोग होने की सम्भावना बढ़ जाती है. एक जहरीली गैस - कार्बन मोनो औकसाइड - जो मोटर गाड़ी से निकलते धुए में और तम्बाकू के धुए में पायी जाती है, लेटेंट टीबी या तपेदिक को सक्रिय रोग में परिवर्तित करने के लिये जिम्मेदार है.


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बीड़ी सेवन करने से लाख या २००,००० लोग तपेदिक या टीबी से मृत्यु के शिकार
इंडो एशियन न्यूज़ सर्विस

भारत में १० करोड़ बीड़ी सेवन करने वालों में से २ लाख लोगों की मृत्यु टीबी या तपेदिक की वजह से होती है। इनमें से अधिकांश लोग गरीब और पढे लिखे नही होते हैं। यह रपट बीड़ी सेवन के ऊपर पहली रपट है जो बीड़ी से संबंधित सभी मुद्दों को व्यापक ढंग से रखती है।

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मलिन बस्तियों में रहने वाले लोगों ने लिया तम्बाकू न खाने का संकल्प

आई - नेक्स्ट, लखनऊ, बुधवार, १4 मई २००८


हर साल ५० लाख से अधिक लोग तम्बाकू जनित जानलेवा बिमारिओं की वजह से मौत के शिकार हो जातें हैं। यदि तम्बाकू का सेवन इसी तरह से बढ़ता रहा तो २०३० तक यह अनुपात करीब ८० लाख हो जाएगा।

तम्बाकू मृत्यु का विश्व का चौथा सबसे बड़ा कारण है। यह जानकारी 'इंडियन सोसिएटी अगेन्स्ट स्मोकिंग ' के कार्यक्रम समन्वयक रितेश आर्या ने दी जो कि कुछ साल पहले तक ख़ुद भी तम्बाकू का सेवन करते थे।

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तम्बाकू नियंत्रण कानूनों का सही तरीके से पालन हो: प्रो० रमाकांत

अमर उजाला, लखनऊ, बुधवार, १4 मई २००८


तम्बाकू नियंत्रण कानूनों का सही तरीके से पालन से तम्बाकू के प्रयोग पर नियंत्रण पाया जा सकता है। यह जानकारी 'इंडियन सोसिएटी अगेन्स्ट स्मोकिंग ' के अध्यक्ष प्रो० रमाकांत ने दी। ।हर साल ५० लाख से अधिक लोग तम्बाकू जनित जानलेवा बिमारिओं की वजह से मौत के शिकार हो जातें हैं।

कल विश्व स्वास्थ्य संगठन की नशा उन्मूलन क्लिनिक तथा कई अन्य संगठनों ने तम्बाकू से होने वाली जानलेवा बिमारिओं पर पोस्टर प्रदर्शनी और आन स्पॉट नशा छोड़ने के लिए परामर्श अभियान का आयोजन आशा सामाजिक विद्यालय में जो कि गोमती नदी के किनारे मलिन बस्ती में स्थित है किया गया ।

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तपेदिक या टीबी समाचार सारांश: १५ मई २००८: अंक ४४

तपेदिक या टीबी समाचार सारांश
अंक ४४
१५ मई २००८


अमरीका में रहने वाले दक्षिण एशिया देशों से आए लोगों में तपेदिक या टीबी का दर बढ़ता ही जा रहा है, जो अमरीकी जन-स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिये एक चिंता का विषय है.

अमरीका में ५० प्रतिशत से भी अधिक होने वाली टीबी या तपेदिक, दक्षिण एशिया से आए लोगों में होती है.

हालांकि इमिग्रेशन की प्रक्रिया में इस बात का प्रावधान है कि सभी विदेशी नागरिकों के इमिग्रेशन आवेदन पत्र में लेटेंट टीबी या तपेदिक की जांच की रपट लगाई जाए और यदि लेटेंट टीबी या तपेदिक हो तो उसके लिये थेरपी (इसोनिअजिद) दिलाई जाए. इस थेरपी के बाद टीबी या तपेदिक होने की सम्भावना लगभग नगण्य हो जाती है.

इस प्रावधान के होने के बावजूद भी इमिग्रेशन अधिकारी अक्सर इसको लागू करने में ढिलाई दिखाते आए हैं. अब शोध और आकड़ों के आधार पर इसको सख्ती से लागू किया जाएगा और उम्मीद है कि अमरीका के टीबी नियंतरण कार्यक्रम अधिक प्रभावकारी हो पाएंगे.

एली लिल्ली नामक दवा कंपनी ने अमरीकी डालर १ मिलियन दान दिया है जिससे कि टीबी या तपेदिक चिकित्सकों को ओनलाइन या इंटरनेट के मध्यम से ड्रग रेसिस्तंत टीबी या तपेदिक के चिकित्सकीय इलाज और रोकधाम के लिये पर्याप्त प्रशिक्षण दिया जा सके. यह अतिआवश्यक है क्योकि ड्रग रेसिस्तंत टीबी या तपेदिक का दर बढ़ता ही जा रहा है और इलाज के विकल्प सीमित हो रहे हैं. इसलिए आवश्यक है कि ड्रग रेसिस्तंत टीबी या तपेदिक का इलाज सही तरीके से पूरा किया जाए और टीबी नियंतरण को, खासकर कि विकासशील देशों में, अधिक प्रभावकारी बनाया जा सके.

एक नए शोध से यह स्थापित हो गया है कि वायु में प्रदूषण, मोटर-गाड़ी से निकलते धुए से प्रदूषण और धूम्रपान से टीबी या तपेदिक का रोग होने की सम्भावना बढ़ जाती है. एक जहरीली गैस - कार्बन मोनो औकसाइड - जो मोटर गाड़ी से निकलते धुए में और तम्बाकू के धुए में पायी जाती है, लेटेंट टीबी या तपेदिक को सक्रिय रोग में परिवर्तित करने के लिये जिम्मेदार है.

तम्बाकू किल्स समाचार बुलेटिन: १६ मई २००८: अंक ३८०

तम्बाकू किल्स समाचार बुलेटिन
१६ मई २००८
अंक ३८०


भारत में सबसे अधिक शोषण झेल रहे हैं बीड़ी मजदूर

बीड़ी उद्योग तो अपने ही मजदूरों तक पर रहम नही करता है. जो मजदूर बीड़ी बनाने में लगे हैं, वह भारत में मजदूरों में सबसे अधिक शोषण झेल रहे लोगों में से हैं.

इनमें ७६-९५% तो महिलाएं हैं जो गंभीर फेफड़े की बीमारियों से झूझ्ती हैं, और यौनिक शोषण भी झेलती हैं. बच्चों के लिए बीड़ी उद्योग एक खतरनाक रोज़गार माना जाता है परन्तु इसके बावजूद भी ढाई लाख बच्चे बीड़ी बनाने में लगे हैं.

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२० लाख तपेदिक या टीबी के रोगियों में से १० लाख धूम्रपान की वजह से टीबी से ग्रसित

भारत में बीस लाख टीबी या तपेदिक से ग्रसित लोग हैं जिनमें से आधे धूम्रपान की वजह से टीबी का रोग झेल रहे हैं. बीड़ी मोनोग्राफ, बीड़ी स्मोकिंग एंड पब्लिक हैल्थ, इस बात पर जोर देता है कि गरीब और अनपढ़ लोगों को बीड़ी के कुप्रभावों से विशेषतौर पर बचाया जाये. यह मोनोग्राफ स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा १२ मई २००८ को विमोचित हुआ था.

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बीड़ी सिगरेट से अधिक खतरनाक है: क्या रेवोल्वर पिस्टल से अधिक खतरनाक है? तम्बाकू हर रूप में घातक है!

यह बात सत्य है कि बीड़ी सिगरेट से अधिक खतरनाक है क्योकि बीड़ी से निकोटीन और टार अधिक मात्रा में धूम्रपानी को नुकसान पहुचते हैं. परन्तु यह कहना कि सिगरेट कम खतरनाक है, यह सही नही होगा. तम्बाकू हर रूप में घातक है, और उसके हर रूप में सेवन से जानलेवा रोग होने का खतरा बहुत बढ़ जाता है. श्रेयेस्कर यही है कि तम्बाकू से दूर रहा जाये और जो लोग सेवन कर रहे हैं, वह समय रहते इसको त्याग दें.

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भारत में बीड़ी तम्बाकू-जनित मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है: नई रपट

भारत में बीड़ी तम्बाकू-जनित मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है: नई रपट

भारत में १० करोड़ लोगों से भी अधिक बीड़ी का सेवन करने वाले लोग हैं. जितने लोग बीड़ी पीने की वजह से तम्बाकू-जनित मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उतने अन्य सभी प्रकार के तम्बाकू उत्पादनों द्वारा जनित बीमारियों से भी नही मरते.

यह तथ्य बीड़ी मोनोग्राफ नामक रपट में सामने आए हैं जो स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा सोमवार, १२ मई २००८ को विमोचित की गई.

भारत में ८० करोड़ से अधिक बीड़ी प्रति वर्ष बिकती हैं.

चौकाने वाला तथ्य यह है कि भारत में ५३ प्रतिशत तम्बाकू सेवन बीड़ी के रूप में होता है, जब कि सिर्फ़ १९ प्रतिशत तम्बाकू सेवन सिगरेट के रूप में होता है. औसतन हर एक बिकने वाली सिगरेट पर बीड़ी बिकती हैं.

"तम्बाकू हर रूप में घातक है. इसीलिए तम्बाकू विरोधी गतिविधियाँ इस मंत्रालय की प्रमुख जिम्मेदारियों में से एक हैं" कहना है डॉ नरेश दयाल का, जो स्वास्थ्य सचिव हैं.

डॉ नरेश दयाल ने इस बीड़ी मोनोग्राफ को विमोचित किया.

डॉ नरेश दयाल का यह भी कहना है कि खाद्य और कृषि विभाग के अनुसार २९ लाख़ लोगों को बीड़ी उद्योग से रोज़गार प्राप्त है.

वर्त्तमान में बीड़ी पीने का दर कई प्रदेशों में अधिक है, जैसे कि मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड और सिक्किम में १०.६ - १४.२ प्रतिशत, अरुणाचल प्रदेश, असाम, बिहार, चंडीगढ़ और मेघालय में ४.६ - ९.२ प्रतिशत, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, त्रिपुरा, उड़ीसा, उत्तराखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश में १.1 - २.९ प्रतिशत, और गोया, तमिल नाडू, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, कर्नाटक, गुजरात, हिमाचल प्रदेश और पंजाब में १० प्रतिशत है.

भारत में मिजोरम में बीड़ी सेवन का दर सबसे अधिक है और पंजाब में सबसे कम.

"जिन घरों में शराब या पान का सेवन होता हो, वहाँ पर बीड़ी पीने की सम्भावना अधिक होती है" ऐसा इस रपट में निकल के आया है, जो ३५ विशेषज्ञों द्वारा और ५१ मुल्यान्कंकर्ताओं द्वारा रचित है.

"बीड़ी में तम्बाकू की मात्रा सिगरेट की तुलना में कम होती है पर निकोटीन, टार और अन्य हानिकारक पदार्थों की मात्रा काफी अधिक होती है. इनमें से कई ऐसे पदार्थ हैं जिनसे कैंसर होने की सम्भावना बढ़ जाती है" कहना है डॉ प्रकाश गुप्ता का, जो इस मोनोग्राफ के सह-लेखक हैं.

बीड़ी पीने से स्वास्थ्य पर जान-लेवा कु-प्रभावों में से मुह के कैंसर, खाने की नली के कैंसर आदि प्रमुख हैं, जो तम्बाकू-जनित कैंसर के कुल अनुपात का ७५ प्रतिशत हैं!

इस रपट में यह भी प्रमाणित हुआ है कि बीड़ी पीने और तपेदिक या टीबी के मध्य सीधा सम्बन्ध है.

चंद तथ्य:

- ८५ प्रतिशत बीड़ी में इस्तेमाल होने वाली तम्बाकू भारत में ही उगाई जाती है

- गुजरात, कर्नाटक और महाराष्ट्र में ३५ प्रतिशत कृषि योग्य खेतों में बीड़ी बनाने के लिए तम्बाकू और तेंदू पत्ते आदि की खेती होती है

- बीड़ी बनाने के लिए १०,५०,००० टन तम्बाकू और ३,००० टन तेंदू पत्ता लगता है

- मध्य प्रदेश और राजस्थान से अधिकांश बीड़ी बनाने के लिए तेंदू पत्ता आता है.

मलिन बस्तियों में रहने वाले लोगों ने लिया तम्बाकू न खाने का संकल्प

दैनिक आज, लखनऊ, बुधवार, १4 मई २००८


२० लोगों ने लिया तम्बाकू न खाने का संकल्प

कल विश्व स्वास्थ्य संगठन की नशा उन्मूलन क्लिनिक तथा कई अन्य संगठनों ने तम्बाकू से होने वाली जानलेवा बिमारिओं पर पोस्टर प्रदर्शनी और आन-स्पॉट नशा छोड़ने के लिए परामर्श अभियान का आयोजन आशा सामाजिक विद्यालय में किया जो कि गोमती नदी के किनारे मलिन बस्ती में स्थित है।

कार्यक्रम के दौरान अभिनव भारत फाउंडेशन के प्रवक्ता राहुल द्विवेदी ने बताया कि "प्रभावकारी तम्बाकू नियंत्रण के लिए यह जरूरी है कि तम्बाकू नियंत्रण संधियों का सही तरीके से पालन हो"।

इस कार्यक्रम में स्कूल के करीब १०० बच्चों ने जो कि इन मलिन बस्तियों में रहतें हैं के साथ-साथ उनके माता-पिता तथा आस - पास के और भी लोगों ने भाग लिया । कार्यक्रम के दौरान विभिन्न स्कूलों और विश्वविद्यालयों के जन-स्वास्थ्य विभाग के छात्रों ने भी भाग लिया जिनमें अलोक द्विवेदी , हिमांशु कुमार, सारिका त्रिपाठी आदि प्रमुख थे।
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आई - नेक्स्ट, लखनऊ, बुधवार, १4 मई २००८

मलिन बस्तियों में रहने वाले लोगों ने लिया तम्बाकू न खाने का संकल्प

हर साल ५० लाख से अधिक लोग तम्बाकू जनित जानलेवा बिमारिओं की वजह से मौत के शिकार हो जातें हैं। यदि तम्बाकू का सेवन इसी तरह से बढ़ता रहा तो २०३० तक यह अनुपात करीब ८० लाख हो जाएगा।

तम्बाकू मृत्यु का विश्व का चौथा सबसे बड़ा कारण है। यह जानकारी 'इंडियन सोसिएटी अगेन्स्ट स्मोकिंग ' के कार्यक्रम समन्वयक रितेश आर्या ने दी जो कि कुछ साल पहले तक ख़ुद भी तम्बाकू का सेवन करते थे।

कार्यक्रम में तम्बाकू से होने वाली जानलेवा बिमारिओं पर पोस्टर प्रदर्शनी और आन स्पॉट नशा छोड़ने के लिए परामर्श अभियान का भी आयोजन किया गया। कार्यक्रम के दौरान विभिन्न स्कूलों और विश्व विद्यालयों के जन स्वास्थ्य विभाग के छात्रों - अलोक द्विवेदी , हिमान्सू कुमार, सारिका त्रिपाठी आदि - ने भी भाग लिया।
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अमर उजाला, लखनऊ, बुधवार, १4 मई २००८

तम्बाकू नियंत्रण कानूनों का सही तरीके से पालन हो: प्रो० रमाकांत

तम्बाकू नियंत्रण कानूनों का सही तरीके से पालन से तम्बाकू के प्रयोग पर नियंत्रण पाया जा सकता है। यह जानकारी 'इंडियन सोसिएटी अगेन्स्ट स्मोकिंग ' के अध्यक्ष प्रो० रमाकांत ने दी। ।हर साल ५० लाख से अधिक लोग तम्बाकू जनित जानलेवा बिमारिओं की वजह से मौत के शिकार हो जातें हैं।

कल विश्व स्वास्थ्य संगठन की नशा उन्मूलन क्लिनिक तथा कई अन्य संगठनों ने तम्बाकू से होने वाली जानलेवा बिमारिओं पर पोस्टर प्रदर्शनी और आन स्पॉट नशा छोड़ने के लिए परामर्श अभियान का आयोजन आशा सामाजिक विद्यालय में जो कि गोमती नदी के किनारे मलिन बस्ती में स्थित है किया गया ।

यदि तम्बाकू का सेवन इसी तरह से बढ़ता रहा तो २०३० तक यह अनुपात करीब ८० लाख हो जाएगा। तम्बाकू विश्व का चौथा सबसे बड़ा कारण है, लोगों की मौत का। कार्यक्रम में तम्बाकू से होने वाली जानलेवा बिमारिओं पर पोस्टर प्रदर्शनी और आन स्पॉट नशा छोड़ने के लिए परामर्श अभियान का भी आयोजन किया गया।

कार्यक्रम के दौरान विभिन्न स्कूलों और विश्व विद्यालयों के जन स्वास्थ्य विभाग के छात्रों - अलोक द्विवेदी , हिमान्सू कुमार, सारिका त्रिपाठी आदि - ने भी भाग लिया।
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वाइस ऑफ़ लखनऊ, लखनऊ, बुधवार, १4 मई २००८

२० लोगों ने लिया तम्बाकू न खाने का संकल्प

कल विश्व स्वास्थ्य संगठन की नशा उन्मूलन क्लिनिक तथा कई अन्य संगठनों ने तम्बाकू से होने वाली जानलेवा बिमारिओं पर पोस्टर प्रदर्शनी और आन स्पॉट नशा छोड़ने के लिए परामर्श अभियान का आयोजन आशा सामाजिक विद्यालय में जो कि गोमती नदी के किनारे मलिन बस्ती में स्थित है किया गया।

कार्यक्रम के दौरान अभिनव भारत फाउंडेशन के प्रवक्ता राहुल द्विवेदी ने बताया कि "प्रभावकारी तम्बाकू नियंत्रण के लिए यह जरूरी है की तम्बाकू नियंत्रण संधियों का सही तरीके से पालन हो। इस कार्यक्रम में स्कूल के करीब १०० बच्चों ने जो की इन मलिन बस्तियों में रहतें हैं के साथ-साथ उनके माता-पिता तथा आस - पास के और भी लोगों ने भाग लिया । कार्यक्रम के दौरान विभिन्न स्कूलों और विश्वविद्यालयों के जन स्वास्थ्य विभाग के छात्रों - अलोक द्विवेदी , हिमान्सू कुमार, सारिका त्रिपाठी आदि - ने भी भाग लिया।


तपेदिक या टीबी समाचार सारांश: १४ मई २००८: अंक ४३

तपेदिक या टीबी समाचार सारांश
अंक ४३
१४ मई २००८


दिल्ली में १२ मई २००८ को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, सेंटर फॉर डिसीस कंट्रोल और विश्व स्वास्थ्य संगठन के संयुक्त तत्वावधान में बीड़ी के ऊपर एक व्यापक रपट का विमोचन हुआ है (बीड़ी मोनोग्राफ).

इस रपट के अनुसार भारत में लगभग १० करोड़ बीड़ी के रूप में तम्बाकू सेवन करने वाले लोग हैं, और इनमें से २ लाख लोग प्रतिवर्ष तपेदिक या टीबी से मृत्यु को प्राप्त होते हैं.

इस रपट से साफ है की बीड़ी पीने की वजह से २ लाख लोगों की मृत्यु टीबी या तपेदिक से होती है. तम्बाकू और तपेदिक का सम्बन्ध पहले से स्थापित तो है परन्तु मृत्यु दर इतना अधिक होना निश्चय ही चिंताजनक बात है.

फरवरी २००८ में भी एक रपट के अनुसार भारत में तम्बाकू-जनित मृत्यु का सबसे बड़ा कारण कैंसर नही टीबी या तपेदिक निकल के आया था.

किसी भी रूप में तम्बाकू सेवन से जान लेवा रोग होने का खतरा अत्यधिक बढ़ जाता है. जरुरत है जन-स्वास्थ्य कार्यक्रमों को अधिक सक्रिय होने की और आपस में मिलजुल के कार्य करने की.

टीबी या तपेदिक नियंतरण कार्यक्रम, तम्बाकू नियंतरण कार्यक्रम और अन्य जन स्वास्थ्य कार्यक्रम अलग-अलग आख़िर कब तक चलते रहेंगे? कुछ तो तालमेल होना चाहिए!

उदाहरण के तौर पर जो टीबी या तपेदिक के रोगी हैं उनको तम्बाकू नशा उन्मूलन परामर्श और सुविधाएँ टीबी या तपेदिक की क्लीनिक में क्यो नही मिलती हैं?

तम्बाकू नशा उन्मूलन क्लिनिक में जिन लोगों को टीबी या तपेदिक होने का संशय है, उनकी जांच क्यो नही की जा सकती जिससे टीबी या तपेदिक के रोगियों का सही समय से परीक्षण हो पाये और उचित इलाज भी.

तम्बाकू किल्स समाचार बुलेटिन: १४ मई २००८: अंक ३७८

तम्बाकू किल्स समाचार बुलेटिन

अंक ३७८
बुधवार, १४ मई २००८
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१० करोड़ से अधिक लोग भारत में बीड़ी का सेवन करते हैं

लगभग १० करोड़ लोग जिनमें से अधिकांश लोग गरीब और अनपढ़ होते हैं, वह बीड़ी का सेवन करते हैं। इनमें से २ लाख या २००,००० लोग तपेदिक या टीबी से प्रतिवर्ष मृत्यु को प्राप्त होते हैं।

भारत में बीड़ी के रूप में सबसे अधिक तम्बाकू सेवन होता है।

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बीड़ी में सिगरेट से कम तम्बाकू होती है परन्तु कहीं अधिक निकोटीन और अन्य जहरीले पदार्थ व्यसनी को मिलते हैं

रॉयटर्स

सिगरेट की तुलना में बीड़ी में तम्बाकू की मात्रा कम होती है परन्तु बीड़ी पीने से व्यसनी को निकोटीन और अन्य जहरीले पदार्थ कही अधिक मात्रा में प्राप्त होते हैं। ऐसा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा पारित एक रपट में सामने आया।

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बीड़ी सेवन करने से लाख या २००,००० लोग तपेदिक या टीबी से मृत्यु के शिकार
इंडो एशियन न्यूज़ सर्विस

भारत में १० करोड़ बीड़ी सेवन करने वालों में से २ लाख लोगों की मृत्यु टीबी या तपेदिक की वजह से होती है। इनमें से अधिकांश लोग गरीब और पढे लिखे नही होते हैं। यह रपट बीड़ी सेवन के ऊपर पहली रपट है जो बीड़ी से संबंधित सभी मुद्दों को व्यापक ढंग से रखती है।

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भारत में बीड़ी सेवन करने से लाख लोगों की प्रतिवर्ष मृत्यु
द टाइमस ऑफ़ इंडिया

भारत में बीड़ी सेवन करने से लगभग ६ लाख लोगों की मृत्यु तम्बाकू-जनित जानलेवा बीमारियों की वजह से हर साल होती है। ऐसा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा विमोचित रपट में निकल के आया है। लगभग २.३ प्रतिशत बच्चे भी बीड़ी का सेवन करते हैं।

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इस टीम को भारतीय तम्बाकू नियंत्रण संगठन (इंडियन सोसिएटी अगेन्स्ट स्मोकिंग), आशा परिवार, अभिनव भारत फाउंडेशन, सिटिज़न न्यूज़ सर्विस और छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय की तम्बाकू नशा उन्मूलन क्लीनिक का सहयोग प्राप्त है।

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विश्व तम्बाकू निषेध दिवस, ३१ मई २००८

विश्व तम्बाकू निषेध दिवस

३१ मई २००८

केंद्रीय विचार: तम्बाकू मुक्त युवा


कोई दो राय नही है कि तम्बाकू विश्व में सबसा बड़ा ऐसा मृत्यु का कारण है जिससे पूरी तरह बचाव मुमकिन है।

यह एकमात्र ऐसा उत्पाद है जो यदि इसको बनाने वाली कंपनियों के निर्देश के अनुसार भी इस्तिमाल किया जाए, तब भी घातक होगा।

तम्बाकू सेवन करने वालों में से आधे लोगों की मृत्यु तम्बाकू-जनित रोग से होनी तय है।

दुनिया के करीब १ अरब नवयुवकों में ८५ प्रतिशत विकासशील देशों में निवास करतें हैं। इन नवयुवकों को बचपन से ही तम्बाकू जनित बीमारियों का खतरा रहता है ।
तम्बाकू कंपनिओं के सबसे बड़े लक्ष्य हैं अवयस्क युवक जिनको तम्बाकू की लत लगा कर जिंदगी भर के लिए नशेडी बनाया जा सकता है।

नवयुवकों में तम्बाकू के प्रयोग को रोकने का सबसे प्रभावकारी तरीका है कि तम्बाकू के भ्रामक प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष विज्ञापनों पर पूर्णतय: प्रतिबन्ध लगा दिया जाए तथा तम्बाकू कंपनिओं द्वारा प्रायोजित किसी भी सार्वजनिक समारोह पर भी प्रतिबन्ध लगा हो।

केन्द्र बिन्दु
इस साल का विश्व तम्बाकू निषेध दिवस निम्न बिन्दुओं पर अपना ध्यान केंद्रित करेगा:

- तम्बाकू के उत्पाद का भ्रामक बाजारीकरण, इसके अप्रत्यक्ष व प्रत्यक्ष विज्ञापन तम्बाकू कंपनियों द्वारा प्रायोजित किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम पर पूर्णतः प्रतिबन्ध लगाना। तम्बाकू उत्पाद के भ्रामक विज्ञापन, प्रोत्साहन कम दामों पर आसानी से लोगों तक इसकी उपलब्धता आदि से इसके उत्पादों की संख्या आसानी से बढ़ती जा रही है। तम्बाकू उत्पाद के भ्रामक प्रचार- प्रसार की मुख्य गतिविधियाँ अवयस्क युवाओं को केन्द्र में रखकर की जाती हैं। क्योकि यह युवा इसके सबसे बड़े ग्राहक होते हैं। तम्बाकू कंपनिया
अपने मौत के समान के विज्ञापन पर करीब दस अरब रूपये सालाना खर्च करतीं हैं।

इस विज्ञापन के पीछे इन कंपनियों का सीधा मकसद अपने उत्पाद के उपयोग के लिए नये ग्राहकों को तैयार करना है क्योकि हर साल लाखों लोग तम्बाकू के उपयोग से मरते हैं। तम्बाकू कंपनिया अपने उत्पादों के प्रत्यक्ष विज्ञापनों के लिए विभिन्न माध्यमों का सहारा लेतीं हैं। जैसे रेडियो, पत्र- पत्रिकाएं, बैनर, पोस्टर, होर्डिंग्स, सीधे तौर पर मेल द्वारा, कूपन के द्वारा, ब्रांड आधारित कार्यक्रमों के आयोजन के द्वारा, किसी बड़े मनोरंजन कार्यक्रमों में प्रायोजन के द्वारा, ऐसे स्थानों को जहाँ शहरी युवा वर्ग ज्यादा एकत्रित हों वहाँ अपने उत्पादों के विज्ञापन आदि द्वारा।

एक आवाज सक्रिय होने के लिए : विश्व में सिर्फ़ ५ प्रतिशत जनसंख्या इस तरह की है जो ऐसे देशों में रहती है जहाँ तम्बाकू के उत्पादों के विज्ञापन और इसके प्रोत्साहन पर पूर्णतः प्रतिबन्ध लगा हुआ है।

विश्व स्तर पर बच्चों की आधी जनसंख्या पर तम्बाकू के उत्पाद के निःशुल्क वितरण पर किसी तरह का प्रतिबन्ध नही है। आज यहाँ रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा का सबसे ज्यादा प्रभावकारी तरीका किसी भी देश के लिए यह हो सकता है कि वह अपने यहाँ तम्बाकू उत्पाद के विज्ञापन प्रोत्साहन और इसके द्वारा प्रायोजित कार्यक्रमों पर पूर्णतः प्रतिबन्ध लगा दे।

सिर्फ़ और सिर्फ़ पूर्ण और व्यापक प्रतिबन्ध ही नए तम्बाकू सेवन करने वालों के दर को कम कर सकते हैं। राष्ट्र स्तर पर कराये गए शोध से यह पता चलता है कि तम्बाकू पर व्यापक प्रतिबन्ध लगा देने से इसके उपयोग में दस प्रतिशत की कमी आई है।

एक आवाज तम्बाकू उत्पाद के विज्ञापनों, इसके प्रचार- प्रसार और प्रयोजन पर १०० प्रतिशत रोकथाम के लिए :

** नीति निर्माताओं को शामिल करना :-
नीति निर्माताओं में इस बात की जागरूकता पैदा करना कि सिर्फ़ स्वैच्छिक नीतियों द्वारा ही तम्बाकू कंपनियों के भ्रामक विज्ञापन पर प्रतिबन्ध नही लगाया जा सकता है। नीति निर्माताओं को इस बात की भी जानकारी देना कि तम्बाकू का खतरा विकासशील देशों में ज्यादा है जहाँ विश्व की कुल उपभोगताओं में से एक तिहाई निवास करते हैं।

** स्थान आधारित अवसरों पर प्रतिबन्ध : जैसे इंटरनेट के द्वारा इसके बिक्री, वेंडिंग मशीन के प्रयोग पर प्रतिबन्ध तथा नए - नए तम्बाकू के छोटे दुकानों आदि पर प्रतिबन्ध जो की युवओं को लुभाने आदि के लिए बनाये जातें हैं ।

** तम्बाकू उत्पाद के भ्रामक पैकेजिंग आदि पर प्रतिबन्ध :- अक्सर तम्बाकू कम्पनियाँ अपने उत्पाद के पैकेटों पर विभिन्न तरीके के भ्रामक स्लोगन आदि का इस्तेमाल करती हैं । जैसे ' लाईट ' माइल्ड' ' लो टार' आदि । इसके साथ गुटखा "विभिन्न स्वादों में उपलब्ध है" इत्यादि जैसे कथन पर भी प्रतिबन्ध लगाना क्योंकि इस तरह की युक्तियाँ भी युवाओं को इसके प्रयोग के लिए लुभाती हैं।

तम्बाकू की वैकल्पिक कीमतें: तम्बाकू की कम्पनियाँ अपने उत्पाद के ज्यादा से ज्यादा बिक्री के लिए विभिन्न तरह की योजनाएं आदि लाती हैं जैसे किड्स पैक आदि। तम्बाकू कंपनिया अपने कई लाख ग्राहकों को जो कि या तो तम्बाकू के द्वारा होने वाली बीमारिओं से मर जातें हैं या फिर किसी अन्य प्रभाव में आकर इसका उपयोग बंद कर देते हैं।

ऐसे में नए ग्राहकों को तैयार करना इनका सबसे बड़ा लक्ष्य होता है।महिलाओं में बढ़ते तम्बाकू के स्वरूप ने विश्व में एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। यद्यपि कई सारे देशों में महिलाएं परम्परागत रूप से तम्बाकू का सेवन नहीं करती हैं और पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं में तम्बाकू का सेवन लगभग एक चौथाई कम है किंतु तम्बाकू कंपनिया इन महिलाओं को भी अपने उत्पादों के ज्यादा से ज्यादा प्रयोग की तरफ़ रिझाने में लगीं हैं।

तपेदिक या टीबी समाचार सारांश: १३ मई २००८ (अंक ४२)

तपेदिक या टीबी समाचार सारांश

अंक ४२

१३ मई २००८

भारत के पश्चिम बंगाल प्रदेश में पताम्दा छेत्र में टीबी या तपेदिक नियंतरण सफल माना जा रहा है.

पिछले एक साल से इस छेत्र में मासिक स्वास्थ्य शिविर, जागरूकता शिविर, टीबी या तपेदिक के लक्षणों के बारे में जानकारी, टीबी या तपेदिक के उपचार को सही तरीके से पूरा करने का आह्वान और पौष्टिक भोजन और साफ-सफ़ाई पर ध्यान देने से इस छेत्र में टीबी या तपेदिक नियंतरण अधिक प्रभावकारी हो पाया है.

पिछले साल ८० नए टीबी या तपेदिक के रोगी थे और इस वर्ष सिर्फ़ १५ ही हैं.

सवाल यह उठता है कि यदि लोग जागरूक हों और टीबी या तपेदिक के प्रारंभिक लक्षणों के प्रति सचेत हों, और परीक्षण करवाएंगे तो शुरुआत में तो अधिक नए टीबी या तपेदिक के रोगी निकलने चाहिए न कि कम.

एक साल की अवधि में इस छेत्र में कोई ऐसा सामाजिक बदलाव नही आया है कि लोगों को टीबी या तपेदिक का जो खतरा था वह कम हुआ हो, उदाहरण के लिए न उनकी आर्थिक अवस्था में कोई विशेष बदलाव आया है, न ही भोजन पर. मासिक स्वास्थ्य शिविर लगाने से इतना प्रभाव कि नए टीबी या तपेदिक के मरीजों की संख्या ८० से घट कर १५ ही रह जाए? समझ नही आता है यह करिश्मा, पर समाचार पत्र में छपा है, तो 'सत्य ही होगा' :)

कनाडा के अल्बेर्ता में लगभग ९० साल पहले (१९२० में) आज के दिन जंग से वापस लौट रहे फौजियों में ६० लोगों को टीबी या तपेदिक निकल के आई थी. इन फौजियों के लिए सनातोरियम खुलवाया गया था जिससे कि इनकी उचित देखभाल हो सके. १९२० में तो टीबी या तपेदिक की दवाएं भी इजात नही हुई थी, सोचने का विषय है कि इतने कम संसाधन में किस तरह से ९० साल पहले टीबी या तपेदिक नियंतरण होता होगा!

मणिपुर में मानवाधिकार कार्यकर्ता गिरफ्तार

मणिपुर में मानवाधिकार कार्यकर्ता गिरफ्तार
एमनेस्टी इंटरनेशनल इम्फाल ग्रुप

नाम: सपं कंग्लेइपल मिटी (२७ वर्षीया)
(सपम्चा कंग्लेइपल के नाम से भी जाना जाता है)

पिता का नाम: सपं श्यामसुंदर मीटी

पता: नोंगादा थोंग्खोंग, इम्फाल पूर्व, लम्लाई पोलिस स्टेशन, मणिपुर के छेत्र में

कार्य: सामाजिक कार्यकर्ता और अध्यक्ष, मणिपुर फोरवर्ड यूथ फ्रंट (MAFYF) या मणिपुर प्रगतिशील युवाओं का मोर्चा

हादसे की तारीख: मई २००८

हादसे का स्थान: मणिपुर प्रेस क्लब, इम्फाल

आरोपी: मणिपुर पोलिस, इम्फाल पोलिस स्टेशन और मणिपुर शहर की पोलिस, इम्फाल और मणिपुर पोलिस के कमांडो

हादसे का विवरण:
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मणिपुर पोलिस ने सपम्चा कंग्लेइपल मीटी को गिरफ्तार कर लिया है. सपम्चा मणिपुर के प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं जो मणिपुर की राजधानी इम्फाल में "शहरियों को यदि अस्त्र-शास्त्र दे दिए जाए तो उसका मणिपुर में परिणाम क्या होगा" के विषय पर एक परिचर्चा को आयोजित कर रहे थे. सपम्चा ने अपने उदबोधन में मणिपुर के मुख्य मंत्री के इस्तीफे की मांग की थी.

मई २००८ को प्रेस क्लब से सपम्चा को पोलिस ने गिरफ्तार कर लिया. श्री मुनन और श्री खोम्दन पोलिस टीम का नेतृत्व कर रहे थे और जबरन उन्होंने एक स्थानिये केबल टीवी नेट्वोर्क (ISTV) का सजीव प्रसारण रुकवाया.

यह परिचर्चा इसलिए आयोजित की गई थी क्योकि पीपुल रेवोलुशनारी पार्टी ऑफ़ कन्ग्लेइपक (प्रेपक), जो कि एक अस्त्र-शास्त्र-से-लैस विपक्षी संगठन है, उसने २४ मार्च २००८ को एक स्थानीय नृत्य (थाबल चोंग्बा) के दौरान, थौबल जिले में, दो लड़कियों और एक लड़के को गोली से मार दिया था, और एक अन्य लड़की की आँख को जख्मी कर उसको अँधा बना दिया था.

इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के विरोध में, स्थानीय लोगों ने जिला प्रसाशन से अस्त्र-शास्त्र के लाइसेंस की मांग की थी. अन्य गावं ने भी अस्त्र-शास्त्र के लाइसेंस की मांग कि थी. सरकार ने एन दोनों गावं में लगभग ५०० लाइसेंस देने का वादा किया था. मई २००८ से नए अस्त्र-शास्त्र लाइसेंस प्रदान करने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई थी.

जैसे ही मई २००८ को सपम्चा ने अपना उदबोधन समाप्त किया, पोलिस के कमांडो ने उसको गिरफ्तार करने का प्रयास किया परन्तु सपम्चा ने पुन: मंच पर के सभी प्रतिभागियों को स्तिथि से अवगत कराया. मंच पर आसीन वकील ने पोलिस को सावधान किया कि कोई भी गैर-कानूनी कार्य करें. पोलिस ने करवाई को तुरंत रोक दिया और सभा को समाप्त होने दिया.

सभा समाप्त होते ही सपम्चा को गिरफ्तार कर लिया गया.

सपम्चा ने गिरफ्तारी से पहले मीडिया से यह कहा था कि

"यदि लोकतंत्र में सरकार द्वारा लिए गए निर्णय पर कोई परिचर्चा नही हो सकती है तो ऐसे लोकतंत्र के क्या माएने हैं?"

कृपया कर के सपम्चा के रिहाई की अपील करें,


जिनिने
समन्वयक
एमनेस्टी इंटरनेशनल इम्फाल ग्रुप

तपेदिक या टीबी समाचार सारांश: ११ मई २००८

तपेदिक या टीबी समाचार सारांश
११ मई २००८



सात महीने जबरदस्ती जेल में कैद रखने के बाद, ५० वर्षीया अमरीकी नागरिक को एरिजोना जेल से रिहा किया गया - इनका जुर्म था कि इन्होने टीबी या तपेदिक की दवा लेने में आनाकानी की थी।

क्या जबरन जेल में कैद कर के दवा देना ही 'रोगों के नियंत्रण' की निति प्रभावकारी रह गई है? आखिर वह कौन से कारण थे जिनकी वजह से यह सज्जन दवा नही ले रहे थे? अमरीका जैसे देश में जहाँ टीबी या तपेदिक के मरीजों की संख्या कम है, वहाँ तो यह मुमकिन भी है कि टीबी या तपेदिक के रोगियों को जबरन जेल में महीनों रख के दवा दी जाए, परन्तु विकासशील देशों में जैसे कि भारत, जहाँ लगभग / जनता को लेतेंट टीबी या तपेदिक है (यानि कि टीबी या तपेदिक का बक्टेरिया तो है परन्तु सक्रिय रोग नही है) यह मुमकिन है ही नही कि / जनता को जेल में रख के दवा दी जाए या ऐसे टीबी या तपेदिक नियंत्रण कार्यक्रम चलाये जायें।

हकीकत यह है कि विकासशील देशों के जेल में ऐसे मौहौल हैं जहाँ टीबी या तपेदिक और अन्य संक्रमण होने का खतरा बढ़ जाता है। जेल में टीबी ही नही, हेपेटाइटिस सी, एच.आई.वी आदि का भी खतरा रहता है।

बजाय इसके कि उन कारणों को संवेदनशीलता से समझा जाए कि टीबी या तपेदिक के रोगी क्यो दवा नही ले पा रहे हैं, उनको जेल में कैद करके टीबी या तपेदिक नियंत्रण को हम कही और जटिल तो नही बना रहे हैं? ऐसा हो कि जिन लोगों को टीबी या तपेदिक होने का संशय हो वह अस्पताल के आसपास जाने से भी कतराएँ।

न्यू जर्सी मेडिकल स्कूल अमरीका की प्रोफेसर पद्मिनी सल्गाने का कहना है कि अभी चिकित्सा विज्ञान ने यह ठीक से नही समझा है कि वह कौन से कारण हैं जिनकी वजह से टीबी का बक्टेरिया लेतेंट रहता है और वह कौन से कारण है जिनकी वजह से वह सक्रिय हो जाता है। यदि हम यह समझ लें कि मानव शरीर कैसे टीबी बक्टेरिया को लेतेंट या निष्क्रिय रखता है, और सक्रिय होने से रोकता है, तो टीबी नियंत्रण और अधिक मजबूत हो सकता है। चंद कारण तो अब पता हैं जैसे कि जिनसे मनुष्य की प्रतिरोधक छमता छीन होती है, उनसे टीबी सक्रिय हो सकती है, जैसे कि एच.आई.वी होने पर, या भोजन पौष्टिक होने पर। इस दिशा में अभी अधिक शोध होने की आवश्यकता है कहना है डॉ पद्मिनी का।

तम्बाकू और शराब नियंत्रित करना यदि स्वास्थ्य मंत्री के काम नही हैं, तो किसका है? - अंबुमणि रामादोस

तम्बाकू और शराब नियंत्रित करना यदि स्वास्थ्य मंत्री के काम नही हैं, तो किसका है? - अंबुमणि रामादोस

[यह लेख मौलिक रूप से ' हिंदू' समाचार पत्र में रविवार, ११ मई २००८ को छपा है। इसका सारांश प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है, मौलिक लेख अंग्रेज़ी में पढने के लिए यहाँ क्लिक्क कीजिये अनुवाद में त्रुटियों के लिए छमा कीजियेगा]
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मैं हैरान हूँ कि मेरे तम्बाकू, शराब और जंक फ़ूड या स्वास्थ्य-के-लिए-हानिकारक-खाने-पीने के
उत्पादन के ख़िलाफ़ अभियान को भारत में इतना प्रतिरोध झेलना पड़ रहा है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तो स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को पुरुस्कार और प्रशंसा मिल रही है पर भारत के भीतर लोग इसका भीषण विरोध कर रहे हैं।

मैंने कई बार कहा है कि भारत में ४०% स्वास्थ्य-समस्याओं की जड़ तम्बाकू है। जल्दी मृत्यु के लिए शराब और तम्बाकू का सेवन लगभग शर्तिया रास्ता है। एक अरब लोगों के देश भारत का स्वास्थ्य मंत्री होने के नाते मेरा कर्तव्य है कि मैं देश के निवासियों
स्वास्थ्य के लिए समर्पित रहूँ और कर्ताव्यबध भी। जब तम्बाकू और शराब के प्रचार पर बंदी लग गई थी तब फिल्मों में तम्बाकू सेवन को प्रदर्शित करने पर रोक लगने पर भीषण वाद-विवाद होने लगा था। मैं यह जानना चाहता हूँ कि फिल्मों में तम्बाकू और शराब को प्रदर्शित करने पर रोक लगाना क्या इतना आपत्तिजनक कार्य है? क्या मेरी यह मांग इतनी नाजायज़ है?

१० लाख से अधिक लोग तम्बाकू सेवन से प्रति वर्ष भारत में मृत्यु को प्राप्त होते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रपट के अनुसार भारत में १५ प्रतिशत स्कूली बच्चे तम्बाकू का सेवन करते हैं। सर्वे के आधार पर यह स्थापित हो चुका है कि युवाओं को तम्बाकू सेवन शुरू करने के लिए उकसाने में सीधे प्रत्यक्ष विज्ञापन से भी अधिक कारगर है फिल्मों में तम्बाकू सेवन को प्रदर्शित करना। ५२% बच्चे-युवा फिल्मों में तम्बाकू सेवन को देख के ही शुरू करते हैं।


इसीलिए यह अनुमान लगाना कठिन नही है कि फिल्मों में तम्बाकू सेवन को प्रदर्शित करने से और तम्बाकू के ब्रांड को दिखाने से हमारे देश के बच्चों-युवाओं पर इसका क्या असर होता है।

१९५० में ३० प्रतिशत फिल्मों में धूम्रपान को प्रदर्शित किया गया था और २००४ में ८९% फिल्मों में धूम्रपान को प्रदर्शित किया गया था। पहले फिल्मों में सिर्फ़ वह पात्र जो खलनायक हैं वही तम्बाकू का सेवन करते थे, पर आजकल ७६% फिल्मों में फिल्मों के प्रमुख नायक तम्बाकू का सेवन करते हैं।

गोद्फ्रे फिलिप्स रेड एंड व्हाइट पुरुस्कार उन दस लोगों को दिए जाते हैं जो दस जिंदगियों को बचाते हैं, पर हम यह भूल जाते हैं कि तम्बाकू कंपनी हर साल पचास लाख से भी अधिक लोगों की मृत्यु के लिए
जिम्मेदार है।

भारत में शराब का सेवन भी ९० करोड़ लीटर प्रति वर्ष से बढ़ कर . अरब लीटर प्रति वर्ष हो चुका है। भारत आज दक्षिण-पूर्वी एशिया में शराब का सबसे बड़ा बाज़ार हैं, जहाँ इस छेत्र की ६५% शराब की खपत होती है। १५ साल पहले औसतन लोग २८ साल पर शराब पीना आरंभ करते थे, आज कल १९ साल पर ही शराब सेवन आरंभ हो जाता है।


भारत में ६० करोड़ युवा हैं (जिनकी आयु ३० वर्ष से कम है) यह वह लोग हैं जो भारत के उत्पादन और विकास के आधार-स्तम्भ हैं। परन्तु यह वह लोग भी है जो तम्बाकू-शराब और जंक फ़ूड आदि से भी ग्रसित हो रहे हैं। यदि भारत के भविष्य को संग्रक्षित रखना है और भारत के अधर स्तम्भ को डगमगाने से बचाना है तो लाज़मी है कि युवाओं को जागरूक करना अतिआवश्यक है कि वह अपनी जिम्मेदारी पर खरे उतरे और व्यसनों को त्यागें।


/ सड़क दुर्घटनाएं शराब पी कर होती हैं। यह विवेक की बात नही है कि हम शुतुरमुर्ग की तरह हकीकत से नज़र बचाएं, जरुरत है इस हकीकत का सामना करने की और स्वास्थ्य की ओर कदम बढ़ाने की।

यदि इन मुद्दों को स्वास्थ्य मंत्री उठाये तो कौन उठाएगा?

- डॉ अंबुमणि रामादोस

(लेखक भारत के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री हैं)
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[यह लेख मौलिक रूप से 'द हिंदू' समाचार पत्र में रविवार, ११ मई २००८ को छपा है। इसका सारांश प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है, मौलिक लेख अंग्रेज़ी में पढने के लिए यहाँ क्लिक्क कीजिये अनुवाद में त्रुटियों के लिए छमा कीजियेगा]