जन-स्वास्थ्य नीतियों को बिना-विलम्ब लागु करे भारत!

जन-स्वास्थ्य नीतियों को बिना-विलम्ब लागु करे भारत!

जन-स्वास्थ्य नीतियों को, विशेषकर कि सिगरेट एवं अन्य तम्बाकू उत्पाद अधिनियम २००३ को, लागु करने में भारत बारम्बार देर कर रहा है।


अब मात्र २ हफ्ते बाद २ अक्टूबर २००८ से संपूर्ण भारत में धूम्रपान पर प्रतिबन्ध लगने की आह्वान है, और चंद हफ्तों बाद, ३० नवम्बर २००८ से हर तम्बाकू उत्पादन पर फोटो-वाली चेतावनी भी लगायी जायेगी।

आज नई दिल्ली में, 'तीसरी ग्लोबल टोबैको ट्रीटी एक्शन गाइड: जन स्वास्थ्य नीतियों को तम्बाकू उद्योग के हस्तछेप से बचाएं' रपट का विमोचन हुआ। इस रपट से साफ़ ज़ाहिर है कि जन स्वास्थ्य नीतियों को बनाने की प्रक्रिया में तम्बाकू उद्योग की भागीदारी नहीं होनी चाहिए। यह रपट 'कारपोरेट अकौंताबिलिटी इंटरनेशनल' के द्वारा प्रकाशित की गयी है।


यदि तम्बाकू उद्योग सही मायने में तम्बाकू-जनित कुप्रभावों के अनुपात को कम करना चाहता है, और जन-स्वास्थ्य के प्रति अपना सहयोग देना चाहता है, तो उसको सरकार को जन स्वास्थ्य नीतियों को लागु करने देना चाहिए। सिगरेट एवं अन्य तम्बाकू उत्पाद अधिनियम २००३ और अंतर्राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण संधि जिसे फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन टोबैको कंट्रोल कहते हैं, इन नीतियों को भारत को सक्रियता से लागु करना चाहिए. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, इन नीतियों को भरसक तरीके से लागु करने पर २० करोड़ लोगों की जान बच सकती है।

तम्बाकू से ५४ लाख से भी अधिक लोग प्रति वर्ष मृत्यु को प्राप्त होते हैं. भारत में १० लाख से अधिक लोग तम्बाकू जनित कारणों से मृत्यु को हर साल प्राप्त होते हैं.

सिगरेट एवं अन्य तम्बाकू उत्पाद अधिनियम २००३ के तहत और अंतर्राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण संधि के तहत, कई ऐसे कार्यक्रम प्रस्तावित हैं जो असरदायक हैं और अन्य देशों में तम्बाकू जनित मृत्यु दर को कम करने में प्रभावकारी रहे हैं। इनमें तम्बाकू विज्ञापनों पर बंदी, तम्बाकू उद्योग द्वारा खेलों आदि के प्रायोजन पर बंदी, तम्बाकू पर कर बढ़ाना और तम्बाकू उत्पादनों पर प्रभावकारी फोटो-वाली चेतावनी लगाना शामिल है।

विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों को एकजुट हो कर इन जन स्वास्थ्य नीतियों को बिना-विलम्ब लागु करना चाहिए - कहना है स्वस्थ्य कार्यकर्ताओं का.

(यह लेख मेरी ख़बर में प्रकाशित हुआ है)

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