खाद्य सुरक्षा पर गहराता संकट

खाद्य सुरक्षा पर गहराता संकट

आहार का आभाव गरीबी का शायद सर्वाधिक तात्कालिक, स्वाभाविक और सहवर्ती लक्षण है। लेकिन आहार आवश्यकताओं या भोजन के अधिकार की धारणा को विकसित रूप से समझने की आवश्यकता है, ताकी यह जाना जा सके की इसे कैसे बेहतर ढंग से पूरा किया जा सकता है।

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार अभी तक विश्व में भूखों की संख्या ७.५ करोड़ है और यदि अनाज के दामों की यह बढ़त जारी रही तो यह संख्या बढ़कर ९२।२५ करोड़ हो सकती है. इस संगठन की स्थापना १६ अक्टूबर १९४५ में की गई थी। इस संगठन की स्थापना के दिन ही विश्व के करीब १५० देशों ने १६ अक्टूबर को विश्व खाद्य दिवस के रूप में घोषित कर दिया। इस साल खाद्य दिवस की थीम रखी गयी है, ‘विश्व खाद्य संकट: जलवायु परिवर्तन की चुनौती और जैव उर्जा।’ इसमें कोई दो राए नहीं की वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन का सीधा असर कृषि पर पड़ रहा है, जिसका सीधा सम्बन्ध खाद्य सुरक्षा से है क्योंकि भारत सदियों से कृषि प्रधान देश रहा है। बढती कीमतों की वजह से वैश्विक स्तर पर वर्ष २००७ में करीब २.५ अरब भूख से ग्रसित लोगों में वृद्धि हुई है। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा जारी की गई ‘ सहस्त्राब्दी घोषना पत्र भी वैश्विक स्तर पर खाद्य सुरक्षा के संकट को कम करने में असफल रहा है। जबकी ‘ सहस्त्राब्दी घोषना पत्र की खाद्य संकट से निपटना उच्च प्राथमिकता थी।

तेल की बढ़ती कीमतों तथा अस्थिर अर्थव्यवस्था ने विकासशील देशों में खाद्यान संकट को और भी गंभीर बना दिया है। वर्ष २००७ में गेहूं की कीमतों में बढोत्तरी देखि गयी है। विश्व के दो प्रमुख गेहूं उत्पादक देश आष्ट्रेलिया और यूरोप नें गंभीर सूखे की मार झेली है। यद्यपी की वैश्विक स्तर पर भारतीय अर्थव्यवस्था को एक मजबूत अर्थव्यवस्था के रूप में देखा जा रहा है। किंतु विश्व के कुल भूख से पीड़ित लोगों में अकेले भारत में ही ५० प्रतिशत लोग रहते हैं। भारत की कुल जनसँख्या की २५ प्रतिशत लोगों की आमदनी प्रतिदिन १२ रूपये से भी कम है और करीब ७५ प्रतिशत लोगों की आमदनी एक डालर से भी कम है। भारत की करीब ८० प्रतिशत जनसँख्या को कम से कम पोषक आहार की मात्र भी प्राप्त नहीं नसीब होती है। भारत के ०-३ वर्ष के करीब ४६ प्रतिशत बच्चे कुपोषण से ग्रसित हैं। वहीँ उत्तर प्रदेश में यह आंकडा ४७ प्रतिशत है जहाँ देश के सबसे ज्यादा बच्चे कुपोषण से ग्रसित हैं।

तमाम तकनीकी विकास के बावजूद भी भारत की अधिकतर कृषि मौसम के ऊपर निर्भर है। भारत को सार्वजानिक वितरण प्रडाली को भी मजबूत बनाने की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन के निदेशक डाक्टर जैकुस दिओउस ने विश्व के लोगों से अनुरोध किया है की वह अपने देश की कृषि उत्पादकता और जल प्रबंधन पर पर्याप्त ध्यान दें। खाद्य सामग्री की कमी को देखते हुए राज्य सरकार को कमजोर वर्ग की तरफ़ ज्यादा ध्यान देना चाहिए क्योंकि खाद्य संकट का सबसे बुरा असर इसी वर्ग पर पड़ता है. यह बड़े दुर्भाग्य का विषय है की कृषि प्रधान देश होते हुए भी भारत को खाद्य संकट से गुजरना पड़ रहा है।

इस सम्बन्ध में गोरखपुर इन्वायरमेंटल एक्शन ग्रुप के अध्यक्ष डाक्टर शिराज ऐ वजीह का कहना है “ की यह बात सत्य है की पिछले वर्षो में भारतीय आर्थव्यवस्था के सकल घरेलु उत्पाद में ८.५ प्रतिशत की वृद्धि हुई है किंतु कृषि खेत्र में विकास की यह दर मात्र २.६ प्रतिशत रही है। उद्योगों को प्रोत्साहित करने और विशेष आर्थिक खेत्र के तहत ज्यादा से ज्यादा कृषि योग्य भूमी पर अधिग्रहण से कृषि उत्पादकता में कमी आयी है। उनका आगे कहना है की चुकी आहार एक अधिकार है अतः यह राज्य के लिए अनिवार्य है की वह इस बारे में एक निति और वैधानिक ढांचा कायम करे की सामाजिक भौगोलिक या अन्य विभिन्न घटकों जैसे की कृषि सब्सिडी इत्यादी में उनके अधिकार को और सुरक्षित किया जाए। भूख से मुक्ति प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। भोजन के आभाव के रूप में भूख एक ऐसे स्थिति है जिसे अवश्य समाप्त कर देना चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं की जिन्हें भूख की बेचैनी महसूस नहीं होती उन्हें अच्छा - खासा भोजन प्राप्त होता है। इसलिए आहार की आवश्यकता पर पर्याप्तता बल दिया जाना।

अमित द्विवेदी
लेखक सिटिज़न न्यूज़ सर्विस के विशेष संवाददाता हैं


प्रकाशित

डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट

मेरी ख़बर, बिहार/ झारखण्ड


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