मैं देशद्रोही कैसे हो सकता हूं?

मैं देशद्रोही कैसे हो सकता हूं?
डॉ संदीप पाण्डेय

अयोध्या में 2003 मार्च में विवादित स्थल की खुदाई चल रही थी यह देखने के लिए कि क्या ऐसे कोई अवशेष प्राप्त हो सकते हैं जिससे मंदिर-मस्जिद विवाद का कुछ हल निकल सके। दुनिया के पैमाने पर अमरीका ईराक पर हमले की तैयारी कर रहा था।


मैं बादल आचारी व रंगेश आचारी, जिन दोनों के पिता दो मंदिरों के महंथ हैं, के साथ तीन मांगों को लेकर तुलसी चौरा मंदिर में सात दिवसीय उपवास पर बैठा था। हमारी मांगें थीं - अयोध्या या राम मंदिर मुद्दे का राजनीतिक इस्तेमाल बंद किया जाए, भारत से बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को बाहर किया जाए व अमरीका ईराक पर हमले की मंशा छोड़ दे। देखने में ये तीनों मांगें अलग लगने के बावजूद एक दूसरे से जुड़ी हुई थीं। हमारा मानना था कि साम्प्रदायिकता, नव-उदारवाद की आर्थिक नीति व साम्राज्यवादी सोच एक दूसरे की पोषक हैं।

तुलसी
चौरा वह मंदिर है जहां बताते हैं कि तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की रचना की थी। उस समय तो आम लोगों की भाषा में लिखने के लिए तुलसीदास का ब्राह्मणों ने काफी विरोध किया था। उनका बहिष्कार इस हद तक था कि तुलसीदास खुद बताते हैं कि वे मांग कर खाते थे और मस्जिद, वही जो 6 दिसम्बर, 1992, को ढहा दी गई, में सोते थे। आज तुलसी चौरा मंदिर की जिम्मेदारी बादल आचारी के परिवार के पास है।

15 मार्च, 2003, की शाम को पुलिस ने उपवास पर बैठे हम तीन लोगों को तुलसी
चौरा मंदिर के अंदर से गिरफ्तार कर लिया। यह उपवास का पहला ही दिन था। इसके अलावा उन्होंने हमारे सहयोगियों गोपाल कृष्ण वर्मा व गौरव तिवारी को भी उनके घरों से गिरफ्तार कर लिया।

2002 में जब हिन्दुत्ववादी शक्तियों का गुजरात में ताण्डव चल रहा था और विश्व हिन्दू परिषद के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष अषोक सिंघल ने ऐलान किया था कि गुजरात तो एक प्रयोगशाला है, वे पूरे देश को गुजरात बना देंगे तो हम लोगों ने तय किया कि हम उत्तर प्रदेश को गुजरात नहीं बनने देंगे। चित्रकूट से अयोध्या की एक 26 दिवसीय साम्प्रदायिक सदभावना पदयात्रा निकाली गई थी। उस पदयात्रा में हमारे साथ कुछ साहित्य भी था जिसमें एक स्टिकर था जिसपर लिखा था - लाशें जिसकी नींव में खूनी हर दीवार, वह मंदिर हे राम तुम मत करना स्वीकार, जिसमे बांटा देश को नफरत का पैगाम, उस मंदिर में भूलकर मत जाना हे राम। इन पंक्तियों के रचयिता हैं लक्ष्मी शंकर वाजपेयी और मुझे ये निर्मला देशपांडे जी की एक पुस्तिका ईश्वर-अल्लाह तेरे नाम सबको सन्मति दे भगवान के पीछे आवरण पर पहली बार पढ़ने को मिली थीं। यह वह दौर था जब निर्मला दीदी भी साम्प्रदायिकता का डट कर मुकाबला कर रही थीं।

हमको गिरफ्तार कर इस एक वर्ष पहले हुई पदयात्रा के दौरान छपे स्टिकर को आधार बना कर हम पांचों के ऊपर देशद्रोह व साम्प्रदायिक सदभावना बिगाड़ने का आरोप लगाया गया। हम जेल चले गए। एक हफ्ते बाद जमानत मिली। यह बात है जब उ.प्र. में भाजपा के समर्थन से मायावती जी की सरकार चल रही थी। देशद्रोह का मुकदमा चलाने की अनुमति इसके बाद बनने वाली मुलायम सिंह की सरकार ने दी।

मामला मुख्य न्यायिक मैजिस्ट्रेट, फैजाबाद, के यहां लम्बित है। हमने मुकदमा खत्म करने की अर्जी लगाई क्योंकि हमारा मानना है कि देशद्रोह व साम्प्रदायिक सदभावना बिगाड़ने का कोई मामला ही नहीं बनता है। पुलिस ने झूठा मामला दर्ज किया है कि हम घूम-घूम कर स्टिकर-पोस्टर लगा रहे थे और नारेबाजी कर रहे थे जिससे लोगों में आतंक फैल गया था। यह भी कहा गया कि हम मुसलमानों को हिन्दुओं के खिलाफ भड़का रहे थे। स्टिकर को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

पुलिस की कहानी में बाकी बाते झूठी हैं। यदि स्टिकर की बात करें तो जो पंक्तियां हैं वह साम्प्रदायिक सदभावना का संदेश देती हैं। लोगों को साम्प्रदायिक राजनीति से आगाह कर रही हैं। हिन्दू समुदाय को सम्बोधित किया गया है। इसका मुसलमानों से तो कोई लेना-देना ही नहीं है। इन पंक्तियों के आधार पर देशद्रोह का मामला कैसे बनता है यह हमारी समझ से परे है?

असल में देशद्रोही तो वे लोग हैं जिन्होंने बाबरी मस्जिद ढहाई। बाबरी मस्जिद गिरने से पहले भारत में श्रन्ख्लाबद्ध बम धमाके नहीं हुआ करते थे। और आतंकवादी घटनाओं की शुरुआत तो तब हुई जब 2001 में हम बिना बुलाए अमरीका की आतंकवाद के खिलाफ जंग का हिस्सा बन गए। भारत की पहली आतंकवादी कही जाने वाली घटना उसी वर्ष संसद पर हमला थी। कुल मिलाकर हिन्दुत्ववादी संगठनों की कारगुजारियों का खामियाजा देश को भुगतना पड़ रहा है। उनकी करतूतों ने आतंकवाद को आमंत्रित किया है। हमें यह सोचना पड़ेगा कि दुनिया के बहुत से देश हैं जहां आतंकवाद कोई खतरा नहीं है। इन देशों ने क्या नीतियां अपनाई हैं? हमारे यहां बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना, परमाणु परीक्षण, अमरीका से सम्मानजनक दूरी बनाए रखने की नीति को छोड़ कर उसका मित्र बनना, अमरीका व इजराइल की मदद से राज्य का सैन्यीकरण - ये आतंकवाद के लिए जिम्मेदार हैं। इस लिहाज से बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना इस देश की पहली आतंकवादी कार्यवाही मानी जाएगी। यदि अयोध्या में बाबरी मस्जिद न ढहती तो आज देश की स्थिति कुछ और होती। हमारी ऊर्जा एवं संसाधन नकारात्मक को रोकने में नहीं बल्कि सृजनात्मक प्रयासों में लग रहे होते। देश ज्यादा खुशहाल होता। महौल शान्ति एवं सदभावना का होता।

जहां तक मेरी बात है तो मैं तो जाति, धर्म, राष्ट्र, जैसी संकीर्ण पहचानों से मुक्त हूं। ये सारी कृत्रिम पहचानें हैं जिन्होनें इंसानों को लड़ाने का काम ही ज्यादा किया है। इनका जो सकारात्मक योगदान है वह तो हम इंसान की सिर्फ एक इंसान के रूप में पहचान रख कर भी हासिल कर सकते थे। अब जब मैं राष्ट्र की अवधारणा को ही नहीं मानता तो मैं देशद्रोही कैसे हो सकता हूं? मैं दुनिया में कहीं भी किसी अन्याय का प्रतिकार करूंगा और सदभावना के काम का हितैषी होऊंगा। मैं साम्प्रदायिक सद्भावना बिगाड़ने का काम भी नहीं कर सकता क्योंकि मैं मनुष्यों को उनकी साम्प्रदायिक पहचानों में बांटकर देखने का आदी नहीं हूं।

डॉ संदीप पाण्डेय

(लेखक, मग्सय्सय पुरुस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय के राष्ट्रीय समन्वयक हैं, लोक राजनीति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्षीय मंडल के सदस्य हैं और आशा परिवार का भी नेतृत्व कर रहे हैं। ईमेल: ashaashram@yahoo.com )

No comments: