आदर्श-भ्रष्टाचार और भगवान
ये बेईमान घोटालेबाज "शब्दों" का भी मखौल उड़ा रहे और गैर कानूनी हाऊसिन्ग सोसाइटी तक का नाम "आदर्श" रख कर अत्यंत अपराधिक कुकृत्य किया है। अब सवाल यह नहीं है कि २-जी स्पेक्ट्रम अब तक का सबसे बड़ा घोटाला है। और घोटालो का जिक्र में नहीं कर रहा हूँ।
सवाल है लोकतंत्र में स्थापित और मर्यादित उन सारी संस्थाओं का इस बाढ़ में शामिल होना सेना, मुख्यमंत्री, मंत्री, शक की सुई प्रधानमन्त्री तक जा रही है उद्योगपति, मीडिया, खुद न्यायपालिका की ओर भी न्यायपालिका के अंदर से ही उंगुलिया उठ रही है। ये जो सारे स्तंभ है, देश समाज राज को चलाने वाली सारी मिशनरी में ही बाढ़ का पानी घुसा हुआ है। और अब सड़न के प्रभाव में सब आ गये है। पूरा का पूरा मामला सारी मुख्यधारा की राजनीति शक्तियों में नैतिक मूल्यों, आदर्शों के पूर्ण स्खलन को साफ़-साफ़ दिखाता है।
अब किया क्या जाए कुछ लोगों का मानना है कि धार्मिक शिक्षाओं और ईशभय से ही इसे रोका जा सकता है और कुछ धार्मिक वस्त्रधारी लोग इस प्रयास में लगे भी है। लेकिन मेरा मानना है कि धर्म और भगवान् में वो आग बची नहीं है जिसको लेकर भगवान् और धर्म को ईजाद किया गया आज उसके मूलतत्व और वास्तविक शिक्षाओं, नैतिकता, ईमानदारी, मानवीय मूल्य सिरे से गायब है। आज जो जितना अधार्मिक कुकृत्य करता है, उतना ही धार्मिक आचरण (कर्मकांड) का दिखावा करता है। बल्कि भ्रष्टाचार की मूल जड़ भगवान् है एक मिनट अगरबत्ती घुमाओ और तेईस घंटा उनसठ मिनट चोरी, मक्कारी करो, बस भगवान् को लडडू, पेठे, स्वर्ण मुकुट, यज्ञ, प्रवचन, मंदिर, मस्जिद, गिरजा, गुरुदारे में मंथा टेक लूट की कमाई में से कुछ दान (घुस) दे दो सब ठीक। भ्रष्टाचार को इससे बल मिलेगा, लौकिक जीवन और राजनीतिक व्यवस्था दृढ राजनीतिक इच्छा शक्ति के नैतिक मूल्यों से संचालित होगी इसके लिए समाज में वैज्ञानिक चेतना स्वस्थ राजनीतिक चेतना की जागरूकता के साथ प्रत्येक नागरिक को लोभ रहित लाभ से जीवन को चलाना होगा। उम्मीद है नये वर्ष में हम इस तरफ बढ़ेगें क्योंकि उम्मीद एक ज़िंदा शब्द है कवि सुरेश नारायण कुसून्बी वाल की कविता की इन पंक्तियों "उम्मीद है कि/कुछ भी हो जाए/न छूटे उम्मीद का दामन / हमारे हाथ से क्योंकि / उम्मीद पर ही टिकी है दुनिया" नये वर्ष की सभी को दिली मुबारकबाद ..................
अरविन्द मूर्ति
महानरेगा मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी न देने के मुद्दे पर देश के प्रमुख न्यायाधीशों एवं वकीलों को खुला वक्तव्य
1. न्यायाधीश एस.एन. वेंकटचलैया (भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश),
2. न्यायाधीश जे.एस.वर्मा (भारत के पूर्व मुख्यन्यायाधीश),
3. न्यायाधीश वी.आर. कृष्णा अय्यर (भारत के पूर्व न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय),
4. जस्टिस पी.बी. सावन्त (सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश),
5. जस्टिस के रामास्वामी (सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश),
6. जस्टिस सन्तोष हेगड़े (लोकायुक्त कर्नाटक व पूर्व न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय),
7. जस्टिस ए पी शाह (पूर्व मुख्य न्यायाधीश दिल्ली उच्च न्यायालय),
8. जस्टिस वी एस दवे (पूर्व जज, राज, उच्च न्यायालय),
9. डॉ. उपेन्द्र बक्शी (एमरीटस प्रोफेसर ऑफ़ लाव, दिल्ली विद्यालय),
10. डॉ. मोहन गोयल (पूर्व कानून के प्रो. लाव स्कूल ऑफ़ इण्डिया, बेंगलोर),
11. फली एस नरीमन (वरिष्ठ अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय),
12. कमिनी जायसवाल (वरिष्ठ अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय),
13. डॉ. राजीव धवन (वरिष्ठ अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय),
14. प्रशान्त भूषण (वरिष्ठ अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय),
15. वृन्दा ग्रोवर (अधिवक्ता दिल्ली उच्च न्यायालय)।
आखिर संजरपुर में क्या है ?
अब एक बार फिर इन धमाकों के धुएँ से संजरपुर का नाम निकल कर सामने आ रहा है। घटना के ठीक बाद जांच एजेंसियों ने जिस तेजी के साथ धमाकों के मास्टरमाइंड को खोज निकाला वह अब पुरानी बात हो गई है। पिछली तमाम ऐसी घटनाओं से यह साबित हो चुका है कि जांच एजेंसियों के शक की सुई हमेशा आजमगढ़ और संजरपुर पर ही आकर टिकती है। देश में किसी भी आतंकी घटना का तार कहीं न कहीं से आजमगढ़ और संजरपुर से जरूर जोड़ा जाता है। यह पड़ताल जरूरी है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है।
गौरतलब है कि करीब दो दशकों पहले तक आतंकवाद की घटनाएं मुख्यतया कश्मीर तक सीमित थीं। उस दौर में किसी भी आतंकवादी घटना के पीछे पाकिस्तान स्थित चरमपंथी संगठनो का हाथ बताया जाता था। पाकिस्तान का खुफिया संगठन आईएसआई और चरमपंथी संगठन लश्कर.ए. तैय्यबा का नाम इसमें सबसे ऊपर आते हैं। यह सरकार की उस अघोषित नीति के अनुरूप ही था जिसमें कहा गया था कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकवादियों के ट्रेनिंग सेंटर हैं। पाकिस्तान सरकार और उसकी एजेंसियां इन सेंटरों को धन और ट्रेनिंग मुहैया कराती हैं ताकि ये भारत में जाकर आतंकवादी घटनाओं को अंजाम दे सकें। यहां यह ध्यान देने की जरूरत है कि इस तरह के आरोपों की सत्यता की जांच हो पाना नामुमकिन होता है । क्योंकि किसी संप्रभु देश के अंदर कोई अन्य देश अपनी जांच एजेंसी नहीं भेज सकता। ऐसे मे आरोप लगाने वाले की कोई जवाबदेही नहीं बनती है कि वह अपने आरोपों को पुष्ट करे। आरोप लगाने वाली जांच एजेंसियों के लिए यह सहूलियत की बात होती है कि बिना किसी खास मेहनत वे सामने वाले पर आरोप मढ़ देतीं हैं और उसको सिद्ध करने के लिए कुछ करना भी नहीं पड़ता।
लेकिन कश्मीर की घटनाओं के बाद जब देश के बड़े-बड़े शहरों में आतंकवादी अपनी घटनाओं को अंजाम देने लगे तो स्थानीय जांच एजेंसियों के सामने मुश्किल खड़ी हो गई। सरकार और मीडिया को इसका जवाब देने में उन्हें दिक्कत आने लगी क्योंकि हर वारदात के बाद यह सवाल खड़ा हो जाता था कि आखिर इन घटनाओं के पीछे कौन है और हमारी सुरक्षा एजेंसिया इसे रोक पाने में नाकाम क्यों साबित हो रही हैं। ऐसे में जांच एजेंसियों के लिए जरूरी हो गया कि अपनी जांच को सही साबित करने के लिए वे नए तर्क खोजें।
यह नया तर्क सामने आया हैदराबाद बम धमाकों के बाद जब जांच एजेंसियों ने दावा किया कि इस घटना में देश के ही आतंकवादी संगठन इंडियन मुजाहिदीन का हाथ है। जांच एजेंसियों ने ही यह बताया कि इंडियन मुजाहिदीन को स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट आफ इंडिया यानी सिमी ने बनाया है और इसे लश्कर.ए.तैय्यबा का समर्थन हासिल है। इसके पहले किसी देश विरोधी गतिविधियों के आरोप में प्रतिबंधित किया जा चुका था। सुरक्षा एजेंसियों का दावा था कि इंडियन मुजाहिदीन भारतीय आतंकवादी संगठन है लेकिन इसके नाम के अलावा जांच एजेंसियां आज तक इसके अस्तित्व के बारे में कोई जानकारी नहीं दे पाई हैं।
गौरतलब है इसके बाद लगभग हर बड़ी आतंकी घटना की जिम्मेदारी या तो इंडियन मुजाहिदीन पर डाली गई है या फिर इंडियन मुजाहिदीन ने इसकी जिम्मेदारी ली है। पहले जांच एजेंसियां घटना की प्रकृति को देखकर वारदात में शामिल संगठनो का नाम बताती थी लेकिन पिछले कुछ दिनो में यह ट्रेंड बदला है। हाल की सभी घटनाओं मे देखा गया है कि घटना के बाद इंडियन मुजाहिदीन मीडिया संस्थानो को मेल भेजकर जिम्मेदारी लेता है। इस एक बदलाव ने जांच एजेंसियों की मुसीबत बढ़ा दी है। जो जांच एजेंसियां पहले घटना में शामिल संगठनो का नाम बताकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेतीं थी इस नए ट्रेंड के बाद उसकी जरूरत ही खत्म हो गई है। अब जांच एजेंसियों को अपनी उपयोगिता साबित करने के लिए कुछ और करना था सो अब एजेंसियों ने घटनाओं के मास्टरमाइंड का नाम बताना शुरू किया। अगर आपको ध्यान हो तो पिछली सभी आतंकी घटनाओं के बाद जांच एजेंसियों ने घटना के मास्टरमाइंड का नाम बताया है।
वाराणसी धमाकों के एक दिन बाद ही पुलिस ने इन धमाकों के मास्टरमाइंड के पता लगने का दावा किया। बताया गया कि इस धमाके का मास्टरमाइंड डॉ शाहनवाज नाम का शख्स है जो आजमगढ़ के संजरपुर का रहने वाला है । गृह मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से आई खबर के मुताबिक इस धमाके को 6 दिसंबर को अंजाम दिया जाना था लेकिन सुरक्षा के कारण 6 दिसंबर को ब्लास्ट को अंजाम नहीं दे पाए। गृह मंत्रालय का आरोप है कि आतंकियों की धर-पकड़ के लिए मारे जाने थे लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य में छापों की इजाजत नहीं दी। आश्चर्य है कि जो सुरक्षा व्यवस्था 6 दिसंबर तक मौजूद थी वो अगले ही दिन इतनी कमजोर कैसे हो गई। जाहिर है ऐसे धमाके एक दिन की तैयारी से नहीं होते तो इसका मतलब है कि इसकी तैयारी काफी पहले से चल रही होगी। ऐसे में गृह मंत्रालय का ये दावा बचकाना लगता है। लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि अगर जांच एजेंसियों को पहले से पता था कि ऐसा कुछ होने वाला है तो वे इसे रोकने की तैयारी क्यों नहीं कर पाए। विस्फोट के अगले दिन केंद्र और राज्य की खुफिया एजेंसियां एक दूसरे पर जानकारी न देने का आरोप लगातीं नजर आईं। इससे साबित होता है राज्य सरकार और केंद्र सरकार एक दूसरे के ऊपर आरोप लगाकर अपनी जिम्मेदारियों से मुक्ति पा लेना चाहती हैं। लेकिन जांच एजेंसियों के सारे दावे भी संदेहास्पद और मीडिया को संतुष्ट रखने तथा जनता के बीच भ्रम फैलाये रखने वाले प्रतीत होते हैं। इस बारे में एक उदाहरण देना ही काफी होगा। 2007 में यूपी पुलिस और एसटीएफ ने अजीजुर्रहमान नाम के एक शख्स को हूजी का आतंकवादी बताकर कोलकाता से गिरफ्तार करना बताया था। तत्कालीन डीजीपी विक्रम सिंह ने बकायदा एक प्रेंस कांफ्रेंस बुलाकर यह बताया अजीजुर्हमान संकट मोचन और श्रमजीवी एक्सप्रेस में बम धमाकों का मास्टमाईंड है। उसकी कथित निशानदेही पर लखनऊ के पास मोहनलाल गंज से पुलिस ने हैंडग्रेनेड और डेटोनेटर जैसे भारी हथियार बरामद किए थे। पुलिस के मुताबिक यह विस्फोटक अजीजुर्हमान और उसके साथियों ने 23 जून 2007 की रात छिपाया था। जबकि हकीकत यह थी कि अजीजुर्हमान 22 जून को न सिर्फ चोरी के आरोप में पश्चिम बंगाल की सीआईडी पुलिस कस्टडी में था बल्कि 23 जून को वह मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश किया जा रहा था। जब यह बात खुलकर सामने आ गई तो एसटीएफ और पुलिस के बड़े अधिकारी मुंह छिपाते नजर आए। इस एक उदाहरण से यह समझा जा सकता है कि जांच एजेंसियां किस तरह से अपना काम करती हैं। पुलिस के काम काज पर बना एक चुटकुला बताना भी मौजूं होगा। कहते हैं कि अमेरिका ने एक बार भारत से एक शेर मंगवाया। लेकिन वह शेर पिंजड़े से निकल गया और शहर में घूमने लगा। शेर को पकड़ने के अमेरिकी पुलिस के सारे प्रयत्न जब फेल हो गए तो उन्हें हार मानकर भारत से पुलिस को बुलवाना पड़ा। अमेरिकी पत्रकारों जब इंस्पेक्टर से पूछा कि वे शेर को कब तक पकड़ेंगे तो उन्होने 24 घंटे के भीतर पकड़ने का दावा किया। अंत में लोगों ने देखा कि भारत से गया वह इंस्पेक्टर एक हाथी को क्रेन से लटकाकर मार रहा है और हाथी बार – बार चिल्ला रहा है कि मैं ही शेर हूँ, मैं ही शेर हूं।
अब सवाल ये उठता है कि आखिर इन धमाकों में आजमगढ़ का नाम ही क्यों आता है। दरअसल आज आतंकवाद का सीधा अर्थ एक खास संप्रदाय से लगाया जाता है। आज एक खास संप्रदाय की छवि आतंकी या उसके समर्थकों की बना दी गई है। इसमें मीडिया ने एक बड़ी भूमिका निभाई है। मीडिया ने हर उस आरोपी को अपराधी बना दिया है, जिसे पुलिस शक के आधार पर पकड़ती है। पुलिसिया बयान को मीडिया ने हमेशा इस तरह प्रस्तुत किया है मानो अदालत ने उस पर अपनी मुहर लगा दी हो। मीडिया की इस मूर्खता ने जांच एजेंसियों और सांप्रदायिक ताकतों को बहुत ज्यादा फायदा पहुंचाया है। जिस पुलिस की हिरासत में दिए बयान को अदालतें कोई महत्व नहीं देती हैं, उन्ही बयानो को मीडिया ने फैसला बनाकर सुनाया है। इस पूरी प्रक्रिया ने लंबे समय एक कौम की खास छवि बना दी है। ऐसे में जबकि किसी खास संप्रदाय का कोई शख्स आतंकवादी घटनाओं के आरोप में पकड़ा जाता है तो लोगों को ऐसा प्रतीत होता है मानो सचमुच कोई आतंकी पकड़ लिया गया है। और सुरक्षा एजेंसियों की बदौलत हम कुछ ज्यादा सुरक्षित हो गए हैं। आतंकी घटनाओं में आजमगढ का नाम आना भी इसी प्रक्रिया का एक हिस्सा है। मुंबई के बड़े गैंगस्टरों दाउद इब्राहिम और अबू सलेम का नाम काफी पहले से आजमगढ़ से जोड़ा जाता रहा है। आजमगढ़ की एक बड़ी आबादी खाड़ी देशों मे रोजगार के लिए पलायन करती है। एक ऐसे समय में जब पूरा विश्व एक खास संप्रदाय को शक की दृष्टी से देख रहा है किसी खास जगह को लक्ष्य बनाकर उसे आतंक की नर्सरी का नाम देना कोई कठिन कार्य नहीं है।
ऐसा नहीं है कि आजमगढ़ का कोई पहले से आतंकी इतिहास रहा है। इसके उलट आजमगढ़ बहुत पहले से विचारकों और बुद्धिजीवियों की धरती रहा है। अल्लामा शिब्ली नोमानी राहुल सांकृत्यायन, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरियौध, जामी चिरैयाकोटी, कैफ़ी आजमी और शबाना आजमी जैसी शख्सियतों को जन्म देने वाले आजमगढ़ की धरती वैचारिक रूप से काफी उर्वर रही है। लेकिन सांप्रदायिक ताकतों सुरक्षा एजेंसियों और मीडिया ने मिलकर एक झटके में इसे आतंकगढ़ बना डाला है। आजमगढ़ में शिब्ली नोमानी ने शिक्षा का केंद्र बनाया, जो अब भी यहां के नवयुवकों के लिए बेहतर शिक्षा प्राप्त करने का केंद्र रहा है। इसके अलावा लोगो में शिक्षा के प्रसार को बढ़ावा देने के लिए उन्होने एक लाइब्रेरी बनवाई जो पूरे इलाके में अपना एक अलग स्थान रखती है। राहुल सांकृत्यायन का नाम विश्व प्रसिद्ध है। अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा लिखने वाले सांकृत्यायन ने करीब ढाई सौ से अधिक किताबें लिखीं। कैफी आजमी जैसे शायर और विचारक भी आजमगढ़ की धरती पर ही पैदा हुए। जाहिर है आजमगढ़ के एक गांव को आतंक की नर्सरी के रूप में प्रचारित करना कहीं से भी तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता। लेकिन सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह एक मुनासिब चीज है। लोगों के दिमाग में एक खास संप्रदाय, एक खास जगह की आतंकवादी छवि बनाने से जांच एजेंसियों के लिए यह सहूलियत हो गई है कि वे अपनी जांच को लाकर उसी जगह पर टिका दें। इससे वारदातों में कमी आए या न आए कम से कम कोई ये तो नहीं कहता कि पुलिस कुछ नहीं कर रही है। अब तक पुलिस या जांच एजेंसियां किसी भी कोने से संजरपुर के किसी भी युवक पर आरोप सिद्ध नहीं कर पाई है। बाटला हाउस में मारे गए दोनो लड़कों पर जो आरोप लगे हैं उनकी सफाई देने के लिए वे अब इस दुनिया में नहीं है। जाहिर है कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ तो है।
-अवनीश कुमार राय
नर्मदा बचाओ आंदोलन के 25 वर्ष
विकास के नाम पर निरन्तर प्राकृतिक संसाधनो को दोहन व अमूल्य धरोहरो की विनाश की मार से पूरा इलाका झेल रहा है। इस गांव के प्रमुख आदिवासी नेता ‘‘गोखरू’’ जी ने अपने संघर्ष को बताते हुए कहा कि हम सब अपनी जमीन छोड़कर कही और जाना नही चाहते यद्यपि सरकार ये दावा करती है कि वो हमे दूसरे ग्रामीण इलाको में पुर्नवासित कर देगी परन्तु हम उन क्षेत्रों के लोगो के उनके प्राकृतिक संसाधनो पर अतिक्रमण क्यों करें ? हमें हमारा न्यायोचित अधिकार चाहिए अपनी बात बताते हुए गोखरू कहते है कि हमारे इस आंदोलन में हमारी महिला साथियों ने भी अमूल्य योगदान दिया है। अपने एक साथी का जिक्र करते हुए कहा कि अमुक महिला पेड़ कटने के वक्त उस पेड़ पर चढ़ जाया करती थी, और पेड़ कटने नही दिया करती थी। भादल गांव की आर्थिक स्थिति भी इस विकास की प्रक्रिया की भेट चढ़ी है, इस गांव में ही एक आवासीय स्कूल है जो आंदोलनकारियों के सहयोग से निर्मित है, व संचालित है। अगर विकास किसी से शिक्षा, जीवन, और खुश रहने का अधिकार छीन कर हो तो ये विकास तो नही?
नर्मदा नदी पर निर्मित हो रहा सरदार सरोवर बांध जिससे गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र एवं राजस्थान को अत्यन्त लाभ मिलने की बात कही गयी थी पिछले ढ़ाई दशक से चर्चा में है इस बांध को आर्थिक एवं तकनीकी दृष्टिकोण से ही नही अपितु इससे होने वाली पर्यावरणीय, वित्तीय, सांस्कृतिक एवं मानवीय लागत को भी ध्यान में रखकर बनाना चाहिए।
इसी के साथ नर्मदा घाटी के किसानो, आदिवासियों, मछुआरों एवं अन्य प्रकृति निर्भर समुदायों द्वारा किए जा रहे अहिसंक, तर्क संगत, संघर्ष को भी ध्यान में रखना चाहिए।
इन 25 वर्षो की लड़ाई में हमारे कई संघर्षें शहीद हुए। नर्मदा घाटी के 25 वे साल में ऐसे ही एक समर्पित व्यक्तित्व को याद किया गया जिनका नाम था आशीष मंडलाई। जिन्होंने अपने जीवन का स्वर्णिम काल इस आंदोलन को सर्मपित किया।
-शशांक सिंह
पंचायतो की लूट छिपाती सरकार
इस पूरी भव्यता के पीछे सिर्फ एक कारक है। पंचायतों में विकास के नाम पर आने वाली अथाह धनराशि यू तो यह पैसा लगभग बीस वर्षों पूर्व से ही आना शुरू हो गया भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के समय से और सीधे भ्रष्ट्राचार की भेंट भी चढना शुरू हो गया था इसकी भनक भी राजीव गाँधी को लग गई थी और उनकी बहुत ही प्रसिद्ध टिप्पणी की "दिल्ली से भेजे गये एक रूपये का सिर्फ पन्द्रह पैसा ही गांवों को पहुंचता है" इस लुट की पुष्टि के लिए काफी हैं। फिर भी यह बात समझ से परे है कि उनकी पत्नी के नेतृत्व में चलने वाली केन्द्रीय सरकार ने इस लूट की बिना रोकथाम और कारगर निगरानी तंत्र के बनाये बिना (सूचना अधिकार अधिनियम २००५ के झुनझुना के सिवाय) नरेगा/मनरेगा जैसी महत्वाकांक्षी योजना और इसके क्रियान्यवन के लिये पुन: अथाह धनराशि देना उनकी सरकार की नीति नियत में गहरी साजिश का हिस्सा जान पड़ता है।
अरविन्द मूर्ति
आंबेडकर जी की याद
डॉ बिनायक सेन की उम्र कैद के कोर्ट के निर्णय के विरोध में धरना
समय: ११-१ बजे
तिथि: ३१ दिसम्बर २०१०
रायपुर के जिला एवं 'सेशन' कोर्ट के निर्णय पर हम सब अत्यंत चिंता व्यक्त करते हैं जिसमें डॉ बिनायक सेन पर राजद्रोह, छल एवं षड़यंत्र रचने जैसे आरोप लगे हैं, और उनको उम्र कैद की सजा सुने गयी है। ये एक और उदहारण है जहां सरकार को झूठे सबूतों के आधार पर एक बेक़सूर व्यक्ति को सजा देने में सफलता मिली है। हम सब, व्यक्तिगत रूप से और विभिन्न सामाजिक संगठनों के सदस्य के रूप में इस निर्णय को अस्वीकार करते हैं।
हम सब, डॉ बिनायक सेन के ऊपर लगाये गए आरोपों का, और उनके लिये कोर्ट द्वारा घोषित सजा का खंडन करते हैं क्योंकि हमारा मानना है कि यह लोकतंत्र पर एक भीषण प्रहार है। हम उम्मीद करते हैं कि उच्च-स्तरीय न्यायालय उनको बिना-विलम्ब रिहा करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि न डॉ बिनायक सेन पर और न ही मानवाधिकार आन्दोलन पर कोई और प्रहार हो।
हम सब हर उस प्रयास का समर्थन करेंगे जो डॉ बिनायक सेन को न्याय दिलाने के लिये होगा।
डॉ रमेश दीक्षित - लखनऊ विश्वविद्यालय
डॉ वंदना मिश्रा (पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिब्रटीस)
अरुंधती धुरु (जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय - एन-ए-पी-एम)
अधिक जानकारी के लिये संपर्क करें: अरुंधती धुरु, ९४१५० २२७७२
पूना पैक्ट का दलितों पर प्रभाव
(भारत रत्न बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के 54 निवार्ण दिवस पर हम इस बार दो लेख पूना पैक्ट पर छाप रहे चूंकि दोनों लेख पैक्ट के समर्थन में ही है, हम एक स्वस्थ बहस इस पर आमंत्रित कर रहे, जिसका उद्देश्य आज की मौजूदा दलित राजनीति और पूना पैक्ट का दीर्घकालिक प्रभाव का विवके संगत वि’लेषण हो यह लेख भारतीय दलित साहित्यकार सम्मेलन की पत्रिका प्रज्ञा मंथन से साभार-सम्पादक)
स्वतंत्र भारत के पूर्व, स्वतंत्र भारत का संविधान बनाने के लिए ब्रिटेन की सरकार ने, भारत के सभी राजनैतिक दलों, नवाबों के प्रतिनिधियों और कुछ निर्दलीय बुद्धिजीवियों की एक गोल मेज कोंफ्रेंस लंदन में बुलाई जिसमें दलित प्रतिनिधि के रूप में डॉ.बी.आर. आंबेडकर और राय साहब श्री निवासन भी आमंत्रित थे। निर्दलियों से सर, तेज बहादुर सप्रु० और सी० वाई चिन्तामणि भी उसमें सम्मिलित थे। इसकी पहली बैठक १२ नवम्बर १९३० ई० से १८ जनवरी १९३१ ई० तक तथा दूसरी बैठक ०७ सितम्बर १९३१ से ०९ दिसम्बर १९३१ ई० तक लंदन में चली। जिसकी अध्यक्षता ब्रिटिश प्रधानमंत्री सर रैमजे मैकानाल्ड ने की थी। इन बैठकों में डॉ. अम्बेडकर ने भारत में दलितों की दुर्दशा बताते हुए उनकी सामाजिक, राजनीतिक स्थिति में सुधार के लिए दलितों के लिए "पृथक निर्वाचन" की मांग रखी। पृथक निर्वाचन में दलितों को दो मत देना होता जिसमें एक मत दलित मतदाता, केवल दलित उम्मीदवार को देते और दूसरा मत वे जनरल कास्ट के उम्मीदवार को। महात्मा गाँधी ने डॉ. अम्बेडकर के पृथक निर्वाचन की इस मांग का विरोध किया । दोनों कांफ्रेंसों में सर्वसम्मति से निर्णय न होने पर सभी ने ब्रिटिश प्रधानमन्त्री पर इसका निर्णय लेने की जिम्मेदारी छोड़ दिया और कांफ्रेंस ख़त्म हो गयी।
ब्रिटिश प्रधानमंत्री सर रैमजे मैकानाल्ड ने १७ अगस्त १९३२ ई० को कम्युनल एवार्ड की घोषणा की उसमें दलितों के पृथक निर्वाचन की मांग को स्वीकार कर लिया था। जब गांधी जी को इसकी सूचना मिली, तो उन्होंने इसका विरोध किया और २० सितम्बर १९३२ ई ० को इसके विरोध में यरवदा जेल में आमरण अनशन करने की घोषणा कर दी। महात्मा गाँधी जहां पृथक निर्वाचन के विरोध में अनशन कर रहे थे वही पर डॉ० अम्बेडकर के समर्थक पृथक निर्वाचान के पक्ष में खुशियाँ मना रहे थे इसलिए दोनों समर्थकों में झड़पें होने लगी। तीसरे दिन गाँधी जी की दशा बिगड़ने लगी तब डॉ.अम्बेडकर पर दबाव बढ़ा कि वह अपनी पृथक निर्वाचन की मांग को वापस ले लें किन्तु उन्होंने अपनी मांग वापस न लेने को कहा। उधर गाँधी जी भी अपने अनशन पर अड़े रहे। इन दोनों के बीच सर तेज बहादुर सप्रू बात करके कोई बीच का रास्ता निकालने का प्रयास कर रहे थे। २४ सितम्बर १९३२ ई० को सर तेज बहादुर सप्रू ने दोनों से मिलकर एक समझौता तैयार किया जिसमें डॉ.आंबेडकर को पृथक निर्वाचन की मांग को वापस लेना था और गाँधी जी के दलितों को केन्द्रीय और राज्यों की विधान सभाओं एवं स्थानीय संस्थाओं में दलितों की जनसंख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व देना एवं सरकारी नौकरियों में भी प्रतिनिधित्व देना था। इसके अलावा शैक्षिक संस्थाओं में दलितों को विशेष सुविधाएं देना भी था। दोनों नेता इस समझौते पर सहमत हो गये। २४ सितम्बर १९३२ को इस समझौते पर सहमत हो गये। २४ सितम्बर १९३२ ई० को इस समझौते पर गाँधी जी और डॉ. अम्बेडकर ने तथा इनके सभी समर्थकों ने अपने हस्ताक्षर कर दिए। इस समझौते को "पूना पैक्ट" कहा गया। पूना पैक्ट में ही दलितों के लिए आरक्षण की व्यवस्था उनके उन्नति की आधारशिला बनी।
पूना पैक्ट में दलितों के आरक्षण के कारण उनकी आर्थिक, शैक्षिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक स्थिति में सुधार आया है। किन्तु कुछ लोग पूना पैक्ट को दलितों के लिए हानिकारक बताकर उसका विरोध कर रहे हैं। विशेषकर बसपा समर्थकों का विरोध एक फैशन बन गया है। जबकि आरक्षण के कारण ही दलितों में सशक्तिकरण की प्रक्रिया शुरू हुई है।
पूना पैक्ट विरोधियों के अनुसार यदि पृथक निर्वाचन को मान लिया जाता तो क्या स्थिति होती ? देश के लोग दो भागों में बँट जाते, एक पृथक निर्वाचन के समर्थक, दूसरी ओर सारे गौर दलित जिनमे पिछड़ी जातियां और अल्पसंख्यक भी सम्मिलित होते, क्योंकि पृथक निर्वाचन में पिछड़ी जातियों का आरक्षण सम्मिलित नहीं था। पृथक निर्वाचन में दलित दो वोट देता एक जनरल कास्ट के उम्मीदवार को ओर दूसरा दलित उम्मीदवार को। ऐसी स्थिति में दलितों द्वारा चुना गया दलित उम्मीदवार दलितों की समस्या को अच्छी तरह से तो रख सकता था किन्तु गैर उम्मीदवार के लिए यह जरूरी नहीं था कि उनकी समस्याओं के समाधान का प्रयास करता। आज भी देखने में आ रहा है कि गैर दलित उम्मीदवार को दलित अपना मत देता है किन्तु गैर दलित उम्मीदवार उनकी कितनी सहायता करते है यह बताने कि आवश्यकता नहीं है। ऐसी दशा में विरुद्ध बहुमत हो जाता ओर दलितों को अधिक कठिनाईयां उठानी पडती। दो समुदायों में बँट जाने पर इनमें कटुता पैदा होती, मजदूर ओर गरीब दलित को गांवों में इसका खामियाजा भुगतना पड़ता। डॉ.अम्बेडकर ने इसी स्थिति को समझ कर ही उस समय की परिस्थिति में पूना पैक्ट करना आवश्यक समझा। यदि पृथक निर्वाचन की स्थिति मान ली जाती तो उस स्थिति में क्या कोई दलित भारत का राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, अध्यक्ष लोकसभा, मुख्य मंत्री, सुप्रीम कोर्ट का प्रधान न्यायाधीश अथवा अन्य संवैधानिक पदों पर जा पाता ? आज बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर के बनाए हुए संविधान की प्रशंसा करते हुए सभी दलित नहीं अघाते। यदि पृथक निर्वाचन की स्थिति होती तो क्या डॉ.आंबेडकर को भारत का संविधान बनाने का अवसर मिलता ?
डॉ.अम्बेडकर की पृथक निर्वाचन की मांग छोड़ देने एवं दलितों के लिए वर्तमान आरक्षण व्यवस्था को मान लेने की स्थिति के संबंध में प्रसिद्ध बौद्ध विचारक, जे.एन.यू. नई दिल्ली के प्रोफ़ेसर डॉ. तुलसी राम कहते हैं 'पूना पैक्ट के ही चलते स्वंतत्र भारत में आरक्षण की नीति लागू हुई जिससे लाखों लाख दलितों का शैक्षिक, आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक सबलीकरण हुआ। मगर बसपा समर्थक दलित पूना पैक्ट को सिरे से खारिज करके उसे दलितों के साथ गाँधी जी की दगाबाजी बताते हैं। स्वयं कांशीराम ने पूना पैक्ट का विश्लेषण करते हुए चमचायुग नाम की एक पुस्तक लिखी जिसका मूल मन्त्र यह है कि पूना पैक्ट के तहत लाभान्वित लाखों दलित कांग्रेस या शासक दल के चमचे हैं। इसलिए उन्होंने खांटी दलित सत्ता का नारा दिया है, यही से शुरू होती है दलितों की आत्मघाती राजनीति। काशीराम का यह मत था कि अगर पूना पैक्ट नहीं होता तो दलित जितना ज्यादा अत्याचार झेलते उतना ही ज्यादा बसपा का साथ देते। बसपा वालों की यह समझ माओवादियों की तरह है जो कहते हैं कि जनता जितना ज्यादा गरीबी, भुखमरी में रहेगी उतना ही ज्यादा क्रान्ति को सफल बनाएगी।
इस प्रकार कुछ लोग राजनीतिक कारणों से पृथक निर्वाचन को वर्तमान आरक्षण व्यवस्था से अच्छा बताकर दलितों को झूठे स्वर्ग का स्वप्न दिखाकर उन्हें भरमा रहे है। डॉ.आंबेडकर ने उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए जो पैक्ट किया वह सामयिक, उचित और दलितों के हित में सिद्ध हुआ। उक्त समझौते में दलितों का आरक्षण ही दलितों की शक्ति का इस समय स्त्रोत है।
डॉ.अंगनेलाल पूर्व कुलपति अवध विश्वविद्यालय अपनी पुस्तक "बाबा साहब डॉ.अम्बेडकर" में पूना पैक्ट की अन्य उपलब्धियों का इस प्रकार बताते हैं-
१- जहां कम्युनल एवार्ड में दलितों को केवल ७१ सीटें प्राप्त हुई थी वहीं पूना पैक्ट में उन्हें १४८ सीटें प्राप्त हुई।
२- महात्मा गाँधी के प्राणों की रक्षा का श्रेय दलितों को मिला।
३- छुआछूत मिटाने तथा अछूतों की शैक्षिक, सामाजिक, आर्थिक उन्नति की जिम्मेदारी हिन्दुओं ने अपने ऊपर ली।
४- भारत के इतिहास में यह पहली घटना थी जब अछूतों ने हिन्दुओं से अलग स्वतंत्र समुदाय के रूप में समतल धरातल पर खड़े होकर कोई राजनैतिक अधिकार संधि की हो। इस प्रकार पूना पैक्ट का लाभ दलितों को पृथक निर्वाचन की अपेक्षा अधिक मिला है।
इरोम शर्मिला : हमारी लियू जियाओबो
1989 में थ्यांनमेन प्रतिरोध के बाद उनको प्रति-क्रांति प्रचार व उकसाने के जुर्म में कड़ी सुरक्षा वाले क्विंचेंग कारागार में रखा गया। 1995 में लोकतंत्र व मानवाधिकार के पक्ष में आंदोलन में शामिल होने तथा सार्वजनिक रूप से सरकार से 1989 कांड में हुई गलती को ठीक करने की मांग की वजह से छह माह की सजा हुई। 1996 में सार्वजनिक व्यवस्था में विध्न डालने व चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की आलोचना के जुर्म में उन्हें तीन वर्ष की श्रम के माध्यम से पुनशिक्षा की सजा हुई। 2004 में जब वे चीन में मानवाधिकार पर रपट तैयार कर रहे थे तो उनका कम्प्यूटर, दस्तावेज, इत्यादि सरकार द्वारा जब्त कर लिए गए।
2008 में लियू जियाओबो ने घोषणा पत्र 08 को लिखने में सक्रिय भूमिका निभाई। इस घोषणा पत्र में चीन में मानवाधिकार की स्थिति को सुधारने हेतु निम्नलिखित 19 बदलावों की मांग की गई है :
1 संविधान में संशोधन,
२. शक्तियों को अलग-अलग करना,
३. विधायिका आधारित लोकतंत्र,
४. स्वतंत्र न्यायपालिका,
५. जन सेवकों पर लोक नियंत्रण,
६. मानवाधिकार की गारण्टी,
७. लोक अधिकारियों का चुनाव,
८. ग्रामीण-शहरी बराबरी,
९-संगठन की स्वतंत्रता,
१०-एकत्रित होने की स्वतंत्रता,
११-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता,
१२-धर्म की स्वतंत्रता,
१३-नागरिक शिक्षा,
१४- निजी सम्पत्ति की सुरक्षा,
१५- वित्तीय एवं कर सुधार
16. सामाजिक सुरक्षा,
१७-पर्यावरण की सुरक्षा,
१८-संघीय लोकतंत्र,
१९-सत्य के आधार पर सुलह।
इस घोषणा पत्र ने एक-दलीय शासन व्यवस्था को समाप्त कर चीन में राजनीतिक लोकतांत्रिक सुधारों की मांग की।
इसमें कोई दो राय नहीं कि चीन में हेतु आवाज बुलंद करना कोई आसान काम नहीं हैं। थ्यानमेन का दमन सबने देखा है। इसी तरह तिब्बत के लोगों के साथ अमानवीय व्यवहार भी चीन की सरकार का अपने खिलाफ कोई भी प्रतिरोध न बर्दास्त करने का अच्छा नमूना है।
८ अक्तूबर, २०१० को जब नोबेल समिति ने लियू जियाओबो को चीन में मौलिक मानवाधिकार के लिए लंबे व अहिंसक संघर्ष के लिए पुरस्कृत किया तो चीनी सरकार ने कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की। चीनी सरकार ने लियू जियाओबो को एक अपराधी बताया है जिसने चीन के कानून को तोड़ा है। दुनिया भर से लियू जियाओबो के समर्थन में आए संदेशों के बावजूद चीनी सरकार ने लियू या उनके किसी भी रिश्तेदार को नार्वे जाकर पुरस्कार प्राप्त करने पर पाबंदी लगा दी है।
अपने देश में मणिपुर के जवाहरलाल नेहरू अस्पताल में इरोम शर्मीला को कैद में अनशन करते हुए अब दस वर्ष पूरे हो गए है। वे सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम को खारिज करने की मांग को लेकर संघषरत हैं। यह अधिनियम एक काला कानून है जिसकी वजह से पूर्वोत्तर भारत व कश्मीर में सुरक्षा बलों द्वारा आम नागरिकों का काफी मानवाधिकार हनन हुआ है।
इरोम शर्मिला भी लियू जियाओबो की तरह लोकतंत्र व मानवाधिकार के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद कर रही हैं। लेकिन चीन की ही तरह हमारी सरकार ने भी उसको अनसुना कर कैद में रखा हुआ है। इरोम शर्मिला से किसी को मुलाकात करनी हो तो पांच स्तरों से, जिसमें अंतिम स्तर मुख्य मंत्री का है, की अनुमति लेनी होती है। 2 से 6, नवम्बर, 2010, के दौरान जब देश भर से सामाजिक कार्यकर्ता इरोम के उपवास के दस वर्ष पूरे होने के मौके पर इम्फाल आए हुए थे तो उनको इरोम से नहीं मिलने दिया गया। इसी तरह लगभग एक वर्ष पूर्व जब महाश्वेता देवी इरोम से मिलने इम्फाल पहुंची तो उन्हें भी उससे नहीं मिलने दिया गया।
अपनी बात को रखने का जो तरीका इरोम शर्मिला ने चुना है उससे शांतिपूर्ण शायद ही कोई और तरीका हो। उसने गांधी जी का रास्ता चुना है-अपने को कष्ट देकर अपनी बात कहने का। लेकिन फिर भी सरकार इतनी संवेदनहीन है। जिससे किसी को कोई खतरा हो नहीं सकता उसको इतनी भारी सुरक्षा में रखा है। इसके अपने परिवार वालों के लिए भी उससे मिलना मुश्किल है। जवाहर लाल नेहरू अस्पताल के बाहर मणिपुर की महिलाओं के पारम्परिक संगठन माइरा पाईबी का भी 10 दिसम्बर, 2008, क्रमिक अनशन चल रहा है। मणिपुर व पूरे पूर्वोत्तर में शर्मिला को व्यापक जन समर्थन प्राप्त है किन्तु फिर भी सरकार इस ऐतिहासिक प्रतिरोध को नजरअंदाज कर रही है। इरोम शर्मिला हमारी लियू जियाओबो है।
संदीप पाण्डेय
मुआवजा की नीति बदलो-जमीन के बदले जमीन दो
पश्चिम उत्तर प्रदेश में भड़के किसानों के आंदोलन पर चर्चा शुरू हुई जिसका मुख्य बिन्दू उ.प्र. व देश में अन्धा-धुन्ध गैर कृषि कार्यों हेतु अधिग्रहित की जा रही कृषि भूमि रहा, देश में सदियों से जिनके पास जमीन है लोग खेती करते आ रहे हैं। लेकिन पिछले बीस वर्षों से देश/प्रदेश में खेती घाटे का सौदा हो गई और जमीने बेचने के बाद भी किसानों की आत्महत्याओं का सिल-सिला जारी है। जिसे सम्मेलन ने एक नीतिगत हत्या करा दिया और इसके लिये सरकारों की नीतियों को जिम्मेदार माना गया और तय हुआ कि जिस तरीके से सरकार ने अलीगढ़, मथुरा के किसानों को मुआवजे की रकम बढ़ा कर प्रलोभन देकर जमीन हथियाने का हथकड़ा अपनाया है। इस पर समन्वय की नीतिगत मांग मुआवजे के रूप में जमीन के बदले जमीन की बात को इन क्षेत्रों मेधा जी का कार्यक्रम लेकर किसानों का सम्मेलन जल्द ही कराया जायेगा।
सम्मेलन के आखिरी सत्र में बावरी मस्जिद विवाद पर आये हाईकोर्ट के फैसले पर चर्चा हुई और यह बात रेखांकित की गई कि यह फैसला संविधान के बुनियादी मूल्यों को दर किनार करते हुए आस्थाओं, विश्वासों को तरजीह देते हुए आया है। जो भारत जैसे बहुधर्मी विविधता वाले देश मे नये विवादों को जन्म देगा और देश के लिये संवैधानिक संकट खड़ा करेगा। जिससे एक तर्कशील न्यायप्रिय समाज बनाने में बाधा पहुँचेगी इस फैसले पर राष्ट्रीय बहस नागरिक समाज में खड़ी करने की रणनीति पर भी विचार हुआ।
सम्मेलन का आयोजन कैमूर क्षेत्र महिला मजदूर किसान संघर्ष समिति ने राबर्टसगंज के कलेक्ट्रट बार एसोसिएशन सभागार में किया सम्मेलन में आशा परिवार, समाजवादी जन परिषद, गंगा कृषि भूमि बचाओं संघर्ष समिति ने हिस्सा लिया भाग लेने वाले प्रमुख साथियों में केशव चन्द्र, संदीप, अजय पटेल, शंकर सिंह, महेश, हौसला यादव, जे.पी. सिंह, विक्रमामौर्य, वलंवत यादव, रोमा बहन, शांता, भट्टाचार्या आदि रहे। समन्वय के नये समन्वयक के रूप में जय शंकर व शांता, भट्टाचार्या को चुना गया तथा नई समन्वय समिति का भी चयन किया गया।
अरविन्द मूर्ति
स्वतंत्र चुनाव क्षेत्र नकारना दलितों पर अन्याय है क्या ?
उनकी सम्पादकीय में पूना पैक्ट का जिक्र हैं। यह बड़ा संवेदनशील मुद्दा हैं। गांधी जी ने दलितों पर बड़ा अन्याय किया ऐसी धारणा कई लोगों की बनी रही हैं उससे गांधी जी के व्यक्तित्व पर धब्बा लगाया जाता है या नही यह मुद्दा मेरी नजर में महत्वपूर्ण नही है। दलित समाज के लिये स्वतंत्र चुनाव क्षेत्र होना फायदेमंद है या नही यह मुद्दा गंभीर रूप से समझ लेना चाहिये। अंग्रेज साम्राज्य ने उन्नीसवीं सदी में राज चलाने के पूरे अधिकार उनके आला अफसरों को दे रखे थे। इग्लैंड में साधारण जनता को राज कारोबार में शिरकत करने के लिये जैसे अधिकार है वैसे भारतीय नागरिकों को यहां के लिये मिलने चाहिये यह मांग कई नेता तथा संगठनों के द्वारा उठायी गयी थी। दादा भाई नौरोजी तथा लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक आदि ने अंग्रेज सरकार किसानों पर जो जुल्म थोप रही है उन्हें खोल कर जनता के सामने रखने का काम बड़े प्रभावशाली ढंग से चलाया था। १८८५ में बनी कांगेस संगठन की तरफ से अंगेजी सल्तनत के खिलाफ भारतीय जनता में असंतोष फैलाने का काम हो रहा था। हिंदु, मुसलमान आदि धार्मिक समूहों के नहीं बल्कि किसान, मजदूर, कारीगर आदि श्रमिक वर्गों के सवाल उठाये जा रहे थे। धार्मिक भेदभाव को राजनीतिक से अलग रखा जा रहा था भारतीय जनता की व्यापक एकता मजबूत बनेगी तो अपनी हुकूमत नही चल पायेगी यह बात अंग्रेज शासकों को सताने लगी थी। भारतीय जनता में दरार डाले बिना अपनी सत्ता टिक नही पायेगी यह उन्होंने जान लिया।
भारत में तीन चार हजार वर्षों में कई छोटे-बड़े राज रियासतें चलती रही। राजा या सरदार अपना अधिकार क्षेत्र बढानें के लिये आपस में लड़ते रहे। पश्चिम उत्तर दिशा में कई आक्रमणकारी आये। इसाई धर्म स्थापना होने के पहले ग्रीस का सिकन्दर आया। इस्लाम की स्थापना होने के पहले मंगोलिया, ईरान आदि प्रदेशों से भी आक्रमणकारी आये। उनके इलाके में भूमि तथा आबुहवा खेती के अनुकूल न होने के कारण वहां अनाज पर्याप्त मात्रा में नहीं पकता था। सिन्धु नदी के पूरब में अनाज की फसल अच्छी होती है, तथा दुधहारु जानवर भी अच्छे पलते है। वहाँ तो दूध-घी की नदिया बहती है, ऐसा कहा जाता था। इसलिए पश्चिम-उत्तर की ओर से आक्रमणकारी आते रहे वे किसी धर्मविशेष के प्रसार या फैलाव हेतु नहीं आये थे। लेकिन अंग्रेजों ने ऐसा इतिहास लिखा कि भारत में प्राचीन काल था। बाद में मुस्लिम राज चला तथा उन्नीसवी सदी में अंग्रेज शासन कायम हुआ।
जिस कालावधि को उन्होंने मुस्लिम राज का नाम दिया उन पांच- छ: शासकों में यहाँ कई राज-रियासतें हिन्दू, सिख आदि की भी चलती थी। हिन्दू तथा मुस्लिम राजाओं में कभी एक दूसरे से लड़ाई, तो कभी तीसरे राजा के खिलाफ हिन्दू, एवं मुस्लिम राजा की साझेदारी ऐसा भी होता रहा। उसे मुस्लिम पीरिअड (अवधि) कहना बिल्कुल अवैज्ञानिक है। वह तो छोटे-बड़े लड़ाकुओं की सामंतशाही थी। लेकिन उसे मुस्लिम पीरिअड कहा गया तो उन्नीसवी सदी के मुस्लिम जमींदार तथा शहरों में बसे व्यापारी वकील आदि को भी लगने लगा कि वे यहाँ के एक समय के राज्यकर्ता थे। इसलिए कांग्रेस के सर्व समावेशक भारतीय जनता की एकता में शामिल होना नहीं चाहते थे। सन १९०६ में प्रिंस आगा खाना की अध्यक्षता में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई। व्हाइसरॉय से उनका प्रतिनिधि मंडल मिला। अब भारत में कोलेस्लेटिव कौंसिल बनाने की तथा उसमें अपने प्रतिनिधि चुनकर भेजने का अधिकार भारतीय नागरिकों को देने की बात चली है। तो हम कहना चाहते है कि साधारण चुनाव प्रक्रिया से यहाँ हिन्दुओं का ही बहुमत विधि सभा में होगा। मुस्लिम जनता पर नाइंसाफी होगा। अत: चुनाव क्षेत्र ही अलग हो- सेपरेट इलेक्तोरेट फॉर दि मुस्लिम-यह हमारी मांग हैं। दूसरी यह भी है कि चूंकि हम यहां के एक समय के शासक थे इसलिये हमे ज्यादा प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिये। यानिकी उस समय भारत में मुस्लिमों का संख्या २५ प्रतिशत थी तो लेजिस्लेरिटव कौसिल में 30 प्रतिशत सीटें दी जाय।
और बड़े आश्चर्य की बात है कि पहली ही मुलाकात में व्हाइसरॉय ने वे दोनों मांग कबूल कर दी। साफ है कि वह पहले बनी बनायी साजिश थी। अलग चुनाव क्षेत्र याने सेपरेट इलेक्टोरेट का माने क्या ? तो समझो मुरादाबाद जिले से सटे हुये तीन चार जिलों को मिलाकर दो सीटें दी जानी है। तो उसमें से एक होगी मुसलमानों के लिये तथा दूसरी होगी। आम-याने जनरल मुस्लिम छोड़कर अन्य सभी के लिये मुस्लिम सीट के लिये जो चुनाव होगा उसमें मत देने का अधिकार उस पूरे क्षेत्र के केवल मुसलमानों को होगा। हालांकि मताधिकार बड़े जमीनदार स्नातक, आयकर देने वाले आदि को ही दिया गया था। उनमें भी मुस्लिम मतदाता केवल मुस्लिम सीट के लिये मतदाता जनरल सीट के लिये यानी चुनाव क्षेत्र के स्तर पर मुस्लिम तथा गैर मुस्लिम फाके बनाई गयी। एक क्षेत्र में रहने वाले व्यापार तथा दैनिक जीवन के सभी कामों में एक दूसरे से व्यवहार करने वाले लोगों को चुनाव के लिये मुस्लिम तथा गैर मुस्लिम दो धर्मों में बाटा गया।
मुस्लिम उम्मीदवार केवल मुस्लिम मतदाता को मिलेंगे। जनरल सीट के उम्मीदवार मुस्लिम मतदाता के साथ नहीं मिलेगे। यह बहुत बड़ी दरार डाली गयी। जो आगे चलकर देश के १९४७ में हुये बंटवारे का एक कारण रहा होगा ऐसा राजनीति शास्त्री मानते हैं।
सन 1909 में बने इंडियन कौसिंल एक्ट में सेपरेट इलेक्टोरेट का प्रावाधान किया गया। कांग्रेस के नेताओं ने उसकी मुखालिफत की थी। उस समय में जिन्ना कांग्रेस संगठन में थे। उन्हें भी सेपरेट इलेक्टोरेट पसंद नही था। उसके बावजूद कांग्रेस के नेतृत्व में आजादी का आंदोलन बलशाली बनता गया तो सन 1919 में बने भारत सरकार कानून मुस्लिमों के साथ-साथ सिख युरोपीयनस तथा इंडियन खिश्चचन्स को भी सेपरेट इलेक्टोरेट दिया गया। यानि सभी भारतीय जनता की इकठ्ठा राजनीति न चले इस तरह की व्यवस्था अंग्रेजों ने की। राजनीति सभी जनता को एक मानकर चलानी चाहिये। मतभेद हो तो वे नीतियां तथा कार्यक्रमों को लेकर हो, अलग-अलग पार्टियां बने तो वे जातियां या धर्म के आधार पर नहीं नीतियों के आधार पर बने जिनमें हर किसी में हिंदु, मुस्लिम आदि कोई भी शामिल हो सके यह सभी भी शामिल हो सके यह सभी का जनतांत्रिक राजनीतिक नक्शा होना चाहिए। अंग्रेजों ने मुस्लिमों की अलग पार्टी, सिखों की अलग पार्टी ऐसा नक्शा बनाने की कोशिश की हालांकि आजादी की प्रेरणा सर्व संग्राहक रही। आजादी के आंदोलन में तिरंगा झंडा फहराने तथा वंदे, मातरम कहते-कहते फांसी के फंदे, पर चढ़ने के लिये सोलापुर के मलपा धनसेठी जगन्नाथ शिंदे, श्री किशन सारदा तथा कुर्बान हुसैन भी थे।
१९२० तथा १९३०-३९ में आजादी के दो बड़े जंग हुये। भारतीय जनता की व्यापक एक जुटता रही थी। नये हथकंडे चलाने के लिये अंग्रेजों ने सन १९२६ में सायमन कमिश्नर नियुक्त किया। जिस में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था। उनके सामने बयान देते हुये डॉ. बाबा साहब आम्बेडकर ने कहा था कि मतदान का अधिकार सभी बालिग स्त्री-पुरूष को दिया जाय। कश्मीर के एक सदस्य ने पूछा- ‘‘क्या आप डिस्प्रेस्ड क्लासेज के लिये सेपरेट इलेक्तोरेट नही मांगेगे।’’ उस पर बाबा साहब ने जवाब दिया-‘‘अगर बालिग मताधिकार दिया जाता है तो उसकी जरूरत नही अगर बालिग मताधिकार नहीं दिया गया तो फिर सेपरेट इलेक्टोरेट की मांग करनी पड़ेगी’’ उसके पीछे की भूमिका समझ में आने वाली हैं अगर स्नातक, आयकर देने वाले तथा बड़ी मात्रा में लगान देने वाले को ही मताधिकार रहेगा तो दलितों में बहुत थोड़े मतदाता बनेंगे। तो साधारण सीट पर दलित उम्मीदवार वार चुने जाने की संभावना बहुत कम होगी। अगर दलितों को सेपरेट इलेक्टोरेट दिया गया जो कोई इने गिने दलित स्नातक होगे, या आयकर देने वाले ठेकेदार होंगे उनके बलबूते पर दलित उम्मीदवार को जीतना आसान होगा।
सायमन कमिश्नर कोई अच्छी रिपोर्ट नहीं दे पाया तब अंगेजों ने लंदन में दूसरी राउंड टेबल कांफ्रेंस में कांग्रेस उम्मीदवार को भी बुलाया। उस सम्मेलन मे भारत के रियासतों के नुमाइदें भी बुलाये गये थे। उस पर गांधी जी ने आपत्ति उठायी। फिर अल्पसंख्यको का मामला आया। मुस्लिम, सिख, युरोपियन, इंडियन क्रिश्चन तथा एग्लो इंडियन इनके साथ दलितों के नुमाइंदे इनकी मिलकर अलग बैठक बुलाई गयी है। जिसमें उस हर समूह के लियें सेपरेट इलेक्टोरेट मांगा गया। सम्मेलन की आम सभा मे गांधी जी ने उसका विरोध करते हुये यह तर्क कि मुस्लिम, सिख ये मजहब मिटाये जाये ऐसा तो हम नहीं कह सकते। लेकिन दलितो का दलितपन मिटाया जाये, उन्हें समानता का अधिकार मिले ऐसी हमारी भूमिका है तथा कोशिश भी चल रही है। कांग्रेस के 1917 के सम्मेलन में अछूत प्रथा मिटा देने का प्रस्ताव बिठ्ठल रामजी शिंदे ने रखा था जो सर्वसम्मती से पारित हुआ था। पारंपारिक मानसवाले कट्टरपंथी लोगों का विरोध हो रहा था, लेकिन ज्यादा से ज्यादा लोग अछूत प्रथा मिटाने को समर्थन देने लगे थे। और वही सही दिशा है। अछूतों को हमेशा के लिये अछूत नहीं रखना है। तो फिर उनके लिये सेपरेट इलेक्टोरेट क्यों दिया जाए ? गाँधी जी ने दूसरी बात उठायी दलित लोग देहातों में ज्यादा बसते हैं। रोजगार आदि मामलें में सवर्णों से उनका व्यवहार चलता हैं। अगर उन्हें सेपरेट इलेक्टोरेट दिया जायेगा तो ग्रामीण इलाके उन पर अत्याचार बढ़ेगें, यह अच्छा नहीं होगा।
खैर गाँधी जी का बात नही मानी गयी। अगस्त १९३२ में ब्रिटिश प्रधानमंत्री का कम्युनल अवार्ड घोषित हुआ। दलितों के लिये केन्द्रीय कौंसिल में ७३ सीटें सेपरेट इलेक्टोरेट के रूप में रखी गयी। प्रांतीय कौंसिलों में एक भी सीट नही दिखाई गयी थी। तब गांधी ने आमरण अनशन शुरू कर दिया। सितम्बर में जो पूना पैक्ट हुआ उसके दलितों के लिये १९२ आरक्षित सीटें दी गयी। प्रांतीय कौंसिल में भी जनसंख्या अनुपात पर आरक्षित सीटें देने का प्राविधान किया गया। सरकारी नौकरियों में आरक्षण का समर्थन किया गया। तथा पंडित मदनमोहन मालवीय जो अभा. सनातन हिन्दू, सभा के अध्यक्ष थे, ने आहवान किया कि गाँव-गाँव के मंदिर तथा पनघट दलितों के लिये खुले किये जाय।
गांधी जी ने सेपरेट इलेक्टोरेट का विरोध किया लेकिन आरक्षित सीटों को समर्थन दिया। आगे चलकर भारत का संविधान बनाते समय स्वयं बाबा साहब ने भी सेपरेट इलेक्टोरेट का आग्रह नहीं रखा। विधि सभा में फैसले होते है बहुमत से अगर अल्पसंख्यक अपने प्रतिनिधियों के आधार पर ही अपने हक में फैसला करवाना चाहेंगे तो वह कभी नही संभव होगा। अन्य लोगों में से ज्यादा से ज्यादा प्रतिनिधियों का समर्थन जुटना ही पड़ेगा। समाज की एकता अक्षुण्ण रखते हुयें सामाजिक न्याय की स्थापना की दिशा में भी कदम उठाने है तो आरक्षण से ही काम चलाना होगा। दलितों पर गांधी जी ने अन्याय किया ऐसा बार-बार कहने से अपनी बुद्धि को ही गुमराह करना होगा।
पन्नालाल सुराणा
हम हैं हिन्दुस्तानी
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जो देश में अपने को बहुसंख्यक हिन्दुओं का संगठन मानता है, उसकी स्थापना १९२५ में हुई थी। लेकिन आज तक यह संगठन इस देश की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी का प्रतिनिधित्व नहीं कर पाया है इसलिए इसने अपने प्रचार तंत्र के माध्यम से दूसरे धर्मों के अनुयायियों के प्रति घृणा का उग्र प्रचार किया है और इससे अपने अनुवांशिक संगठनो के माध्यम से दंगे-फसाद करने का कार्य पूरे देश में नियोजित तरीके से किया है।
अपने स्थापना काल से ही १९४७ तक ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ चले आन्दोलन में संघ परिवार का कोई भी व्यक्ति जेल नहीं गया था और ब्रिटिश साम्राज्यवाद की समय-समय संघ परिवार मदद करता रहा है। संघ ने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की हत्या से लेकर उड़ीसा, गुजरात, दिल्ली, यू-पी, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, आन्ध्र प्रदेश में नरमेध कार्यक्रम जारी रखा है। जब इतने प्रयासों के बाद भी इस संगठन को बहुसंख्यक हिन्दू जनता का प्रतिनिधित्व नहीं मिला तो इसने आतंकवाद का ही सहारा लिया, महाराष्ट्र के नांदेड कस्बे में इसके कार्यकर्ता खतरनाक आयुध बनाते समय विस्फोट हो जाने से मारे गए। दूसरी तरफ यू-पी के कानपुर में भी बजरंग दल के कार्यकर्ता बम बनाते समय मारे गए।
६ अप्रैल २००६ में नांदेड में हुए बम विस्फोट में ५ लोग पकडे भी गए जब पुलिस ने आर.एस.एस. के लोगों के घरों पर छपे डाले तो छपे में मुसलमानों जैसी ड्रेस, नकली दाढ़ी, बरामद हुई जिसका उपयोग वे मस्जिद पर हमले करने की योजना बनाते समय करते थे। जिससे साम्प्रदायिक दंगे भड़के। नांदेड बम कांड के आरोपियों ने यह भी खुलासा किया था कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, दक्षिण भारत में आतंकी नेटवर्क बनाकर आतंकवाद का सहारा ले रहा है।
हिन्दुत्ववादी आतंकवाद ने देश को गृह युद्ध में झोकने के लिए आर.एस.एस. के इन्द्रेश ने मोहन राव भागवत की हत्या का षडयंत्र रचकर पूरे देश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ जारी दुष्प्रचार के तहत (यदि षडयंत्र कामयाब हो जाता) पूरे देश में अल्पसंख्यकों के विनाश की तैयारी कर ली गयी थी। मालेगांव बम विस्फोट के आरोपितों के बयानों में यह भी आया है कि आर.एस.एस. के उच्च पदस्थ अधिकारी इन्द्रेश ने पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई. से तीन करोड़ रुपये लिए थे। पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेसी आई.एस.आई. को एक समय में भारत विरोधी कार्यों के लिए सी.आई.ए. ने उन्हें बाकायदा प्रशिक्षण देने के साथ आर्थिक मदद की थी। सन १९४७ में भारत ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्त हुआ था और दुनिया में ब्रिटिश साम्राज्यवाद कमजोर होने की वजह से अमेरिकन साम्राज्यवाद का उदय हुआ था।
सुमन
केवल हास्यास्पद नही है अरूंधती पर मुकदमें की मांग
संकीर्ण और दकियानूसी दलीय दृष्टियां ऐसे ही सीधी-सादी बात का बतंगड़ बना देती है। पिछलें दिनों अपनी धर्मनिरपेक्ष मानववादी, स्त्री-स्वातंत्रय-समर्थक दृष्टि के कारण बांग्लादेश से निर्वासित प्रतिष्ठित लेखिका तस्लीमा नसरीन का लेख छापने पर कर्नाटक के शिमोगा और हासन में कुछ कट्टपंथी मुस्लिम गुंडों द्वारा जो तोड़-फोड़ की गयी वह तो शिव सेना की तर्ज पर समझ में आ सकती है, पर उस लेख के लिये जिसमें केवल यह कहा गया था कि पैगंबर हजरत मोहम्मद पर्दें या बुरके के पक्ष में नहीं थे, मुस्लिम कर मुल्लों को संतुष्ट रखनें के लिये कर्नाटक की भाजपा सरकार ने ‘कन्नड़ प्रभा’ के संपादन कर्मियों की जो गिरफ्तारी की और उन पर जो ‘ईश निन्दा’ के बाबा आदम के जमाने के कानून के अन्तर्गत मुकदमें चलाए, उनको कैसा समझा जाए ?
अगर इस तरह के विचारों की अभिक्ति भी ईश निन्दा है, तो सनातन हिन्दू धर्म समर्थित सती प्रथा का विरोध तो ईश-द्रोह ही हो जाएगा और उसकी सजा देने के लिए कोई सरकार कटिबद्ध हो जाय तो उसे कम से कम आधे भारत वासियों की जेल भेजना पड़ेगा। क्या यह गजब की दिलचस्प बिडंबना नहीं है कि ईश के नाम पर सम्पादकों को जेल भेजने वाली भाजपा ही देशद्रोह के नाम पर अरूंधती को जेल भेजने की मांग कर रही है।
डॉ. रणजीत
चुनाव के बाद पंचायत
पंचायतों चुनाव को लेकर पूरे प्रदेश में एक सा हाल दिखा। चुनाव जीतने के तरीके और भविष्य का संकट एकजैसा ही दिखाई दिया। मतदाताओं को अपने वादों और सक्रियता से पक्ष में करने के उदाहरण सीमित दिखाईदिये,जबकि साम-दाम-भेद-दंड की कूटनीति अपनाने वाले उम्मीदवारों ने विजय हासिल की। ऐसे में वे लोगहारते दिखाई दिये, जो धनबल से वोट नहीं खरीद सकते थे। पूर्व प्रधान हरीराम कहते हैं कि प्रधान बनने केलिए इतनी भीड़ जुटी है,लेकिन अगर किसी से पूछ लिया जाये कि प्रधान क्यों बनना चाहते हो तो शायद हीकोई जवाब हो। जबकि एक और पूर्व प्रधान बाबूराम तिवारी का कहना है कि क्या करें,शराब गोश्त का प्रचलनइतना ज्यादा बढ़ गया है कि अगर जीतना है तो लोगों को खिलाना पिलाना पड़ेगा। कहने का मतलब है कि इसबार पंचायत चुनाव में वह सब कुछ हुआ जो कहीं से इस प्रत्यक्ष लोकतंत्र के लिए जायज नहीं था।
हालांकि पूरी चुनावी प्रक्रिया में धनबल और बाहुबल के इस्तेमाल के पीछे कई कारण बहुत ही स्पष्ट हैं। पिछली पंचायतों के कामकाज में उत्तर प्रदेश में जबरदस्त भ्रष्टाचार देखा गया। लाखों और करोड़ों में घोटाले उजागर हुए। पदाधिकारियों ने नरेगा(मनरेगा) से लेकर कल्याणकारी योजनाओं के लिए लाभार्थी चुनने तक में पैसा बनाया। उत्तरप्रदेश के बहराइच जिले में करोड़ों का पेंशन घोटाला इसका सबूत है। जहां निर्वाचित प्रतिनिधियों और नौकरशाही के बीच तालमेल करके एक कल्याणकारी योजना का बंटाधार कर दिया। ध्यान रहे कि आर्थिक कदाचार की बनती जगह ने स्थानीय शासनतंत्र को धन निवेश करने और भ्रष्टाचार के जरिए पैसा उगाहने का उपक्रम बना दिया है। यही वजह है कि चुनाव पूर्व और चुनाव के दौरान खिलाने-पिलाने का एक लंबा दौर देखा गया। आलम यह रहा कि उत्तर प्रदेश में दूसरे राज्यों से भारी मात्रा में अवैध शराब की तस्करी भी की गई। हालांकि प्रशासन ने अपनी खाल बचाने के लिए सक्रियता दिखाते हुए लाखों रुपये की अवैध शराब जब्त की। पंचायत चुनावों में हुए खर्च का सटीक आकलन मुश्किल है,लेकिन लाखों रूपये खर्च करने वाले प्रत्याशी चर्चा में रहे हैं। चर्चा ऐसे प्रत्याशियों की भी रही,जो अपनी जमीनें बेंचकर मतदाताओं को लुभाने में खर्च कर रहे थे। जनता की राजनीतिक चेतना भी नकारात्मक रूप से प्रभावित हुई है। क्योंकि मतदाताओं के बीच से उम्मीदवारों के गुणों-अवगुणों और चरित्र को केंद्र में रखकर बात करने क्षमता में कमी देखी गई है। यही वजह है कि ज्यादा खिलाने पिलाने वाले उम्मीदवारों ने ही बाजी मारी है। जबकि विकसित राजनीतिक चेतना पर ऐसे उम्मीदवारों का खुला बहिष्कार होना चाहिए था,जो पूरे प्रदेश में देखने को नहीं मिला। पंचायत चुनावों को लंबे समय से देखने वाले पत्रकार संजीव श्रीवास्तव बताते हैं कि लोगों ने गन्नों के खेतों छिपा-छिपाकर शराब बांटी गई है। वे ताज्जुब करते हैं कि अचानक इतने पीने वाले लोग कहां से आ गये हैं ? गांव के स्तर पर चुनाव बाद यह चर्चा आम है कि जीतने वाले उम्मीदवार ने कितने लाख रुपये खर्च किये हैं। ऐसे हालात में इस नवनिर्वाचित त्रिस्तरीय पंचायतीराज व्यवस्था में होने वाले आर्थिक कदाचार का महज अंदाजा लगाया जा सकता है। क्योंकि ये जनप्रतिनिधियों ने लाखों का निवेश कर ब्याज सहित उगाही की मंशा से ही इस लोकतंत्र का हाथ थामा है।
खर्चें के बलपर जन समर्थन हासिल करने की मंशा दरअसल अवसरवादी राजनीति की परवरिश का असर है। पंचायतों को रातों रात जिस मात्रा में धनापूर्ति की गई है,वह भी अवसरवादी राजनीति के जरिए लाभ लेने की कोशिश भर है। चुनावी लाभ लेने के लिए रातोंरात नरेगा जैसी योजनाओं का विस्तार कर दिया जाता है,जबकि काम को करने वाली मशीनरी न केवल प्रशिक्षण की कमी से जूझ रही है,बल्कि स्थानीयता की समस्याओं का शिकार है। ग्राम स्तर पर धनप्रबंधन की कमजोर प्रणाली ने पूरे मामले को भ्रष्टाचार में तब्दील कर दिया है। आज परिणाम सबके सामने हैं,नरेगा का बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचारियों खाते में गया है। पैसे को तमाम गैर जरूरी मदों में खर्च करते हुए भ्रष्टाचार को अंजाम दिया गया है।उदाहरण के लिए ग्राम सभा के स्तर पर वानिकीकरण का काम या फिर मिट्टी पटाई जैसे कामों तरजीह दी गई है। क्योंकि पेड़ों की खरीद से लेकर उसकी बाड़ बनाने तक में पैसा चुराने के काफी विकल्प मौजूद है,तो मिट्टी पटाई के काम में मानकों की अनदेखी और एक बरसात के बाद दोबार उसी काम को कराने का अवसर भी बना रहता है। कुल मिलाकर पंचायतों ने अपने कामकाज से स्थानीय अपढ़ जनता को भी भ्रष्टाचार के जरिए पैसा कमाने की परवरिश दे डाली है। जिसका इस बार के पंचायत चुनाव में साफ रहा है। लोगों ने अपनी सारी पूंजी लगाकर चुनावों में शिरकत की है।
धन बल और बाहुबल के बोलबाले के बीच चुनावों सामंती मानसिकता भी पूरी तरह से हावी रही। चुनाव प्रचार के पोस्टर इस बात का सबूत हैं,कि महिला प्रत्याशियों का सहारा लेकर पति या पुरूष संबंधियों ने ही चुनाव लड़ा है। पोस्टर में पति या पुरूष सगे-संबंधी हाथ जोड़कर समर्थन और वोट मांग रहे थे। जबकि कई पोस्टर तो ऐसे जिसमें महिला प्रत्याशी की फोटो या तो छोटी रखी गई थी या फिर रखी ही नहीं गई थी। यही वजह है कि महिला आरक्षित सीटों पर चुनाव जीतने वाली महिलाएं घरों चूल्हा फूंक रही हैं,जबकि पति या पुरूष सदस्य आम सभा की बैठक में हिस्सा लड़ रहे हैं। चुनाव जीतने के बाद पति ही प्रधान के संबोधन से नवाजे जा रहे हैं। गांवों के हालात देखकर कह सकते हैं कि महिला सशक्तिकरण दूसरे दावों की तरह कागजी ही साबित हुआ है। लगभग यही हाल जातीय आरक्षण का हुआ है। थोड़े बहुत फेरबदल के साथ आरक्षण के सहारे सामाजिक परिवर्तन की पूरी योजना वर्गीय चेतना के अभाव में बेसहारा साबित हुई है। स्थानीय स्तर पर अस्मिता की लड़ाई को अवसरवादी और सामंती असर के लोगों ने अपहृत कर लिया है। चुनाव प्रचार को देखने के दौरान गुजरा एक वाकया हैरतंगेज था। बहराइच जिले में वार्ड नंबर 24 से जिला पंचायत सदस्य की उम्मीदवार का पति चुनाव प्रचार करते हुए दावा कर रहा था कि कि आप हमें वोट दीजिए,हम आपकी एक आवाज पर “एक हाथ में माल और दूसरे हाथ में तलवार” लेकर हाजिर रहेंगे। जबकि प्रचार करने वाला व्यक्ति कई संज्ञेय मामलों में न्यायिक प्रक्रिया से गुजर रहा है। “माल और तलवार” का दावा व्यक्तिवादी राजनीति की तरफ इशारा करती है, जो सीधे-सीधे राजनीति की सामूहिक भावना से कोसों दूर है।
स्थानीय स्तर पर पैदा हुए इस माहौल के लिए राजनीति की अनिवार्य शर्त का उल्लंघन जिम्मेदार है। पंचायत चुनावों में राजनीति दलों को सीधी भागीदारी नहीं दी गई है। जिसकी वजह से न केवल राजनीतिक माहौल से व्यक्तिवादी असर कम हो पाता है और न ही राजनीतिक विपक्ष ही खड़ा हो पाता है। जिसकी वजह से पूरा चुनाव व्यक्तिगत क्षमताओं और प्रतिबद्धताओं के बल पर लड़ा जाता है और विपक्षी स्वर को व्यक्तिगत विरोध मानते हुए उससे निपटा जाता है। पंचायत चुनावों में हिंसा और मार-काट के पीछे वर्तमान में यही सबसे बड़ा कारण बनकर उभरा है। दलीय भागीदारी न होने की वजह से आज स्थानीय निकाय अपनी सफलता को लेकर चौतरफा दबाव में हैं। सवाल है कि जब तमाम चीजों को अनिवार्य बनाया गया तो राजनीतिक दलों की भागीदारी को क्यों वैकल्पिक बना दिया गया ? इसकी वजह से स्थानीय निकाय गैर-राजनीतिक निर्वाचन क्षेत्र के रूप में बदल जाता है,जहां त्वरित व सीमित लाभ के लिए तर्क बनाये और बिगाड़े जाते हैं। जिसके चलते वे बातें सहज स्वीकार्य हो जाती हैं,जिन्हें बड़े स्तर पर राजनीतिक गलत माना जाता है। हालांकि इसे स्थानीय शासन व्यवस्था की रूपरेखा तय करने में चूक और मंशा दोनों कह सकते हैं। क्योंकि भारतीय संविधान में 73वें व 74वें संविधान संशोधन के समय राजनीतिक दलों की भागीदारी का निर्णय राज्य सरकारों को दे दिया गया। जिसे परिस्थितियों का आकलन करने में चूक भी कह सकते हैं और राज्य सरकारों को कटघरे में खड़ा करने की मंशा भी,क्योंकि इसी विकल्प के सहारे राज्य सरकारें राजनीतिक दलों की भागीदारी को खारिज कर रही हैं। जिसका सीधा मकसद जनता से उचित और कम से कम दूरी बनाये रखने की मंशा है। राज्य सरकारें जानती हैं कि अगर राजनीति दलों की भागीदारी आयी,तो उन्हें अपनी नीतियों को लेकर राजनीतिक दल के रूप में जनता के बीच जाना पड़ेगा। जहां उसकी नीतियों को मिलने वाला जनादेश ही अगले राजनीति कार्यकाल का फैसला करेगा, यानी जनादेश की कसौटी पर किसी भी रूप में जाने से बचने की कोशिश में राज्य सरकारें राजनीतिक दलों की भागीदारी को तवज्जो नहीं दे रही हैं।
उत्तर प्रदेश के स्थानीय निकाय चुनावों को देखते हुए कह सकते हैं कि माहौल ईमानदार और ईमानदारी दोनों के खिलाफ बन चुका है। क्योंकि अब लाखों के निवेश का उपक्रम साबित हुए चुनाव और उसकी उगाही के बीच में आने वाले सीधे तौर पर निशान बनाये जायेंगे। इसके लिए राजनीतिक अवसरवाद सीधे तौर पर जिम्मेदार है। जिसने प्रतिबद्धताओं की राजनीति को पटरी से उतारकर सत्ता की राजनीति बना दिया है। जहां राजनीति का उद्देश्य जनकल्याण की जगह उगाही का औजार बना दिया गया है। केंद्र और राज्य स्तर पर भ्रष्टाचार के मामले उदाहरण हैं,तो स्थानीय निकाय इस असर से अपने को कब तक बचाये रख पाते,यह सिर्फ एक सवाल है ?
-ऋषि कुमार सिंह