जन-आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय - भारत-अमरीका परमाणु संधि का विरोध करता है

जन-आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय - भारत-अमरीका परमाणु संधि का विरोध करता है

जब भारत में बुनियादी सामानों की कीमतें बढ़ रही हैं, भारत के प्रधान मंत्री मन मोहन सिंह भारत-अम्रीका परमाणु संधि क बारे में पुन: बात बढ़ा रहे हैं.

यह भारत-अमरीका परमाणु संधि गैर-लोकतान्त्रिक तरीके से बढाई जा रही है, यहाँ तक कि भारत की संसद तक से इसको पारित नही किया गया था. हकीक़त यह है कि अधिकाँश राजनीतिज्ञों ने इस संधि का भरसक विरोध किया है.

इस भारत-अमरीका परमाणु संधि की वजह से इस छेत्र में शान्ति भंग होने का खतरा है, खासकर कि पड़ोसी राष्ट्रों से जिनमें चीन, पाकिस्तान और इरान प्रमुख हैं. भारत-अमरीका परमाणु संधि से परमाणु निशस्त्रीकरण के ऊपर जो कार्य हो रहा है, वोह भी कुंठित होता है.

भारत-अमरीका परमाणु संधि से यह भी खतरा बढ़ता जा रहा है कि भारत कही अमरीका का छोटा सैन्यिक सहयोगी न बन के रह जाए, जिसकी वजह से अमरीकी कंपनियों को और परमाणु उद्योग को अपना बाज़ार बढ़ाने में भी खुली छूट मिल जाए.

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि पर्यावरण के लिए लाभकारी तरीकों से उर्जा बनाने के बजाये भारत परमाणु जैसे खतरनाक और नुकसानदायक तरीकों को अपना रहा है. विकसित देशों में परमाणु उर्जा एक असफल प्रयास रहा है. विश्व में अभी तक परमाणु कचरे को नष्ट करने का सुरक्षित विकल्प नही मिल पाया है, और यह एक बड़ा कारण है कि विकसित देशों में परमाणु उर्जा के प्रोजेक्ट ठंडे पड़े हुए हैं.

भारत सरकार क्यों भारत-अमरीका परमाणु संधि को अधिक तवज्जो दे रही है और इरान-पाकिस्तान-भारत तक की गैस पाइपलाइन को नकार रही है, यह समझ के बाहर है. हकीक़त यह है कि आने वाले २०-३० सालों तक गैस ही उर्जा का सबसे बड़ा स्त्रोत रहेगा, ऐसा अनुमान है.

जान आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, भारत-अमरीका परमाणु संधि के विरोध में अपनी भूमिका लेता है.


सुरेन्द्र मोहन, अचिन वनिक, मजोर जनरल .गया. वोम्बत्केरे (रेत्द.), जे. श्री रमन, थॉमस कोचेर्री, सुकला सेन, मुक्त श्रीवास्तव, आनंद पटवर्धन, अजित झा, फेरोज़े मिथिबोर्वाला, किशोर जगताप, पर.टी.. हुसैन, आशीष रंजन झा, कामायनी, संजय .गया., अरुंधती धुरु, मेधा पाटकर, संदीप पाण्डेय

National Alliance of People's Movements
(NAPM)
या
जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय


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