न्यायपालिका के यक्ष प्रश्न

न्यायपालिका के यक्ष प्रश्न

न्यायपालिका के गठन के सम्बन्ध में संविधान के अनुच्छेद १२४ के अन्तर्गत सर्वोच्च न्यायालय के जजों की नियुक्ति और उन्हें सेवा मुक्त करने की प्रक्रिया और व्यवस्था निर्धारित है | अनुच्छेद २१७ में उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और उन्हें उसी प्रक्रिया द्वारा सेवामुक्त करने की व्यवस्था है, जिसके आधार पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को सेवा मुक्त किये जाने का प्रावधान किया गया है | परिशिष्ट ३ में मुख्य न्यायाधीश और न्यायाधीशों की शपथ का प्रारूप दिया गया है जिसके अनुसार प्रत्येक न्यायाधीश अपनी पूरी योग्यता, ज्ञान और विवेक से अपने पद से जुड़े दायित्वों के, भय या पक्षपात, अनुराग या द्वेष के बिना पालन करने की शपथ लेता है |

संविधान यह सुनिश्चित करता है कि सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बिना किसी भय या प्रलोभन के निष्ठापूर्वक अपने कर्तव्यों का पालन करें | उपरले पायदान की न्यायपालिका ने अपने इस दायित्व का निर्वाहन निष्पक्ष और निर्भय होकर करने की उत्कृष्ट परम्परा भी स्थापित की है और इस देश के आम आदमी का विश्ववास जीता है | आज भी यह विश्वास जीवित है, इसीलिए इस देश में जनतंत्र जीवित है | (लेकिन यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि अधीनस्थ न्यायपालिका के लिए यह वक्तव्य नहीं हैं | ) इस देश में मितव्ययता सादगी- सत्यनिष्ठा और बहुत मायनों में समतामूलक सामाजिक परम्पराएँ थी जिन्होनें हमें एक जीवंत और मूल्य आधारित संविधान दिए और उनका सर्वोच्च न्यायालय ने नागरिकों के पक्ष में निर्वचन करके एक उत्कृष्ट परम्परा स्थापित की है | उच्च न्यायपालिका के इतिहास में अपवाद स्वरुप कभी-कभार किसी न्यायाधीश के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामले भी आये हैं | एक अपवाद को छोड़कर भारत के मुख्य न्यायाधीश ने अपने नैतिक अधिकार का उपयोग करके, भ्रष्टाचार के मामले में लिप्त होने के आरोपों की आन्तरिक जाँच में सही पाए जाने पर त्यागपत्र प्राप्त कर, समस्या का समाधान गरिमामय तरीके से कर लिया | न्यायमूर्ति मदान, उसके ताजा उदाहरण हैं | उस समय मुख्य न्यायाधीश बी.एन.खरे थे | देश की अर्थव्यवस्था को ठीक करने के लिए १९९० में डॉ.मनमोहन सिंह के वित्त मंत्री के पद पर नियुक्त होने के साथ ही देश में आर्थिक सुधारों का अवतार हुआ | फिर आर्थिक सुधारों को लागू करने की प्रक्रिया में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को निमंत्रण देकर जो धन देश में निवेश किया गया उससे एक बहुत प्रबल मध्यवर्ग देश में पनपा जिसके लिए धन प्राप्त करना आसान हो गया लेकिन साथ-साथ सामाजिक मूल्य भी तेजी से विघटित हुए |

जय प्रकाश नारायण के बाद देश का कोई ऐसा नेतृत्व नहीं रह गया जो नैतिक आदर्शों के लिए युवजनों को आकर्षित कर सके | नई पीढ़ी के एक महत्वपूर्ण हिस्से ने,धन और सम्पदा के प्रभुत्व को बढ़ाकर, एक नया प्रभुवर्ग स्थापित किया और समाज में येन केन प्रकारेण, धन अर्जित करना एक मात्र आदर्श रह गया | सारांश यह है कि समाज में नैतिक मूल्य तिरोहित होने लगे और भ्रष्टाचार को सामान्य रूप से समाज में स्वीकृत मिलने लगी | १९९० के बाद उच्च न्यायपालिका में भी न्यायाधीशों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामले बढ़ने लगे | इसका तात्पर्य यह नहीं है कि १९९० के पहले ऐसे कोई आरोप नहीं थे लेकिन पहले यह मामले अपवाद स्वरुप सामने आये | बाद में ऐसे बहुत से मामले सामने आये, उन सबका विवरण देने का कोई औचित्य नहीं है लेकिन अभी हाल में यह समाचार पत्रों की सुर्खियों में छाये हैं, इसलिए इस गंभीर समस्या पर नए सिरे से विचार विशेष परिस्थितियों में आवश्यक हो गया है | हाल में जो समाचार छपा है, उसमें मुख्य न्यायाधीश ने स्वयं सरकार को यह संस्तुति की है कि कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग चलाया जाए |

उनको उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को दायित्व से वंचित किया जा चुका है लेकिन वह वेतन और सभी सुविधाएँ यथापूर्वक प्राप्त कर रहे हैं | हाल का दूसरा महत्वपूर्ण मामला भी समाचार पत्रों में छपा है कि चंडीगढ़ उच्च न्यायालय की न्यायाधीश निर्मला यादव को १५००० रुपए किसी वाद को किसी विशिष्ट प्रकार से निर्णीत करने के लिए दिए गए | इस मामले की जाँच के लिए मुख्य न्यायाधीश ने तीन न्यायाधीशों की एक समिति गठित की है तथा साथ में केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सी.बी.आई.) को जाँच करने की अनुमति दी गई है ।

उपरोक्त दोनों मामलों के अतिरिक्त एक और बहुत महत्वपूर्ण मामला इस सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय में विचारार्थ लंबित है जिसका उल्लेख किये बिना समस्या की गंभीरता को समझना कठिन है | उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जनपद के तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों की भविष्यनिधि से (कुछ सूत्रों के अनुसार, यह राशि २३ करोड़ या उससे अधिक) करोडों रुपयों का गबन किया गया है | यह सूचना जनपद के विशेष न्यायाधीश(सी.बी. आई.) या पुलिस की प्राथमिकी द्वारा कराई और मामले की जाँच प्रारम्भ हुई | आरोप प्रथम दृष्या सही पाया गया और जनपद न्यायाधीश, न्यायालय के नजीर आशुतोष अस्थाना और ८२ अन्य को भविष्यनिधि से अनाधिकृत रूप से धनराशि निकालने आदि के आरोप में निरुद्ध किया गया | श्री अस्थाना ने जाँच न्यायाधीश के समक्ष भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा १६४ के अंतर्गत दिए गए बयान में यह स्वीकार किया कि भविष्यनिधि से उनके द्वारा अनाधिकृत रूप से धनराशि निकाली गयी लेकिन साथ में यह भी बयान दिया गया कि उक्त धनराशि का उपयोग उन्होंने विभिन्न जजों और उनके परिवार के लोगों को बहुत सी मूल्यवान वस्तुएं खरीद कर देने में खर्च किये हैं | शपथ पर जाँच न्यायाधीश के समक्ष दिए गए बयान के अनुसार, उस धनराशि कि खरीदी हुई वस्तुओं को जिन जजों या उनके परिवार के लोगों को दी गई है उसमें उच्च न्यायालय से वर्तमान न्यायाधीशों में आठ जज, कलकत्ता और उत्तराखंड के उच्च न्यायालय के एक-एक जज तथा २३ जनपद न्यायाधीश आदि बहुत से लोग सम्मिलित हैं | आरोप के सम्बन्ध में पुलिस को उपरोक्त न्यायाधीशों से भी पूंछताछ करनी पड़ेगी |

इन परिस्थितियों में जाँच निष्पक्ष हो सके, इसलिए यह प्रार्थना की गई है कि यह जाँच स्थानीय पुलिस से न कराकर केन्द्रीय जाँच ब्यूरो द्वारा कराई जाये | इन विशेष परिस्थितियों में आरोपों की जाँच के लिए क्या प्रक्रिया अपनाई जाये, यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है | उपरोक्त विशेष अनुमति याचिका की सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति बी.एन. अग्रवाल द्वारा की गई टिप्पणी उल्लेखनीय है -"उच्च न्यायालय के न्यायाधीश स्वर्ग से अवतरित नहीं होते, वे भी इसी समाज की उपज हैं जो समाज भ्रष्ट राजनेता और भ्रष्ट बाबू बनाता है|"

एक और समाचार के अनुसार, उपरोक्त मामले की जाँच करते हुए एक वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने पुलिस महानिरीक्षक को लिखे गए सरकारी पत्र में कहा कि स्थानीय पुलिस के उपरोक्त मामले को स्वतंत्र रूप से जाँच करना संभव नहीं हो पा रहा है, क्योंकि उसमें उच्च न्यायालय के ८ वर्तमान न्यायाधीश, एक सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, २३ जनपद न्यायाधीश, एक कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और एक उत्तराखंड उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के विरुद्ध आरोप हैं और पुलिस पर इस मामले में दबाव डाला जा रहा है | इसलिए जाँच ब्यूरो के द्वारा कराई जाये | सर्वोच्च न्यायालय में मामले की सुनवाई कर रही पीठ ने उत्तर प्रदेश के अधिवक्ता से इस सम्बन्ध में अपना आक्रोश प्रकट किया कि पत्र को पहले न्यायालय के समक्ष क्यों नहीं लाया गया | उपरोक्त मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचारार्थ लंबित है | जिन प्रश्नों पर विचार करना है-

- भ्रष्टाचार में लिप्त न्यायाधीशों की जाँच किस प्रकार कराई जाए- पुलिस द्वारा या न्यायाधीशों द्वारा ? यदि न्यायपालिका के भ्रष्टाचार की जाँच न्यायपालिका स्वयं अपनी आन्तरिक प्रक्रिया द्वारा करे तो क्या लोगों का विश्वास न्यायपालिका से समाप्त होगा |

- क्या इस प्रकार की जाँच का भ्रष्टाचार को दबाने का प्रयास नहीं माना जायेगा ?

- क्या न्यायाधीश कानून से ऊपर हैं ?

- क्या उनके लिए अलग से कानून बनना चाहिए ?
- और इन प्रश्नों के ऊपर सबसे बड़ा यक्ष है कि यदि हर आरोप की जाँच पुलिस या केंद्रीय जाँच ब्यूरो द्वारा कराई जाये तो क्या न्यायाधीशों का स्वतंत्र रूप से कार्य करना संभव रहेगा ?

क्या महाभियोग की प्रक्रिया से भ्रष्ट न्यायाधीश को सेवामुक्त करना आज संभव रह गया है ? सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश श्री सावंत के अनुसार, महाभियोग की प्रक्रिया राजनैतिक हस्तक्षेप से प्रभावित होने के कारण आज व्यवहारिक नहीं रह गई है | इस वक्तव्य की पुष्टि स्वयं विधि मंत्री ने की है | बहुत से गंभीर प्रश्न इन विषय पर मुंह बाये खड़े हैं जिनका उत्तर ढूँढ़ना मुश्किल हो रहा है, क्योंकि सब कुछ मिलाकर, न्यायपालिका, कार्यपालिका और एक बिकाऊ संसद के पास उसका उत्तर नहीं है | संभवतः देश का जाग्रत समाज उस समस्या का उत्तर ढूंढेगा|

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राम भूषण मेहरोत्रा

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