बच्चों में निमोनिया से बचाव के लिए पोषण और स्वच्छता जरूरी

किसी भी व्यक्ति को जीवित रहने हेतु पौष्टिक आहार की आवश्यकता होती है।  कोई भी व्यक्ति अगर चुस्त व तंदुरूस्त रहना चाहता है तो उसे अपने शिशुओं को भी सही मात्रा में स्वच्छ व पौष्टिक आहार देना चाहिए।  अगर भोजन स्वच्छ व पौष्टिक न हो तो फायदा न करके नुकसान पहुँचाता है और शारीरिक क्षमता को भी कम करता है, फलस्वरूप कई खतरनाक बीमारियां हो जाती हैं।  जिसमें से निमोनिया प्रमुख है।

 12 नवम्बर को मनाये जाने वाले विश्व निमोनिया दिवस के सन्दर्भ में वात्सल्य क्लीनिक के सुप्रसिद्ध बाल-रोग विषेषज्ञ डा. संतोष राय ने हमें बताया कि बच्चों को अच्छा पोषण देना अति आवश्यक है क्योंकि एक अच्छे पोषण में कई तरह के एण्टीबाडीज, विटामिन जैसे विटामिन-‘सी’ होती है जो एक ‘एण्टीआक्सीडेन्ट’ की तरह काम करती है और शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है, जो बच्चों को जल्दी-जल्दी बीमार होने से बचाती है। कुपोषण से शिकार बच्चों को उन बच्चों की तुलना में संक्रमण अधिक होता है, जो स्वच्छ व पौष्टिक आहार लेते हैं।

डा. संतोष राय ‘जंक फूड’ को आज के परिवेश में खतरनाक मानते हैं, स्वच्छता की भूमिका को अति आवश्यक मानते हुए डा. राय बताते हैं कि पेट की बीमारी ही नहीं ‘वाइरल निमोनिया’ भी स्वच्छ न होने से हो सकता है, जिसमें माता पिता या घर के अन्य सदस्यों का हाथों, बर्तन, दूध की बोतल आदि का साफ न रखना सामान्यतः पाया गया है।

बच्चे के लिए मॉं का दूध ही सर्वोत्तम
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‘होप मदर एण्ड चाइलड केयर सेण्टर’ के बाल-रोग विशेषज्ञ डा. अजय कुमार का कहना है कि बच्चे को 6 महीने के बाद स्तनपान पर ही न रखकर ठोस व संतुलित आहार देना चाहिए जिसका महंगा होना जरूरी नहीं। यहाँ पर भी डा. अजय कुमार ‘फास्ट फूड’, ‘जंक फूड’ का जिक्र करते हुए इसको बच्चों को न देने की सलाह देते हैं एवं विशेष बात का जिक्र करते हुए वह कहते हैं कि बच्चे के लिए माँ का दूध ही सर्वोत्तम है न कि गाय, भैंस या डिब्बे का।  क्योंकि गाय या भैंस का दूध गाय या भैंस के बच्चे के लिए सर्वोत्तम हो सकता है, मनुष्य के बच्चे के लिए नहीं।  स्वच्छता पर उनका भी एक ही मत है कि स्वच्छ शरीर ही बच्चे को निमोनिया व अन्य रोगों से बचाता है।

यश अस्पताल की प्रख्यात स्त्री रोग एवं प्रसूति विशेषज्ञा डा. ऋतु गर्ग भी मानती हैं कि अच्छे आहार का महंगा होना कोई जरूरी नहीं है, पर उनका पौष्टिक होना अति आवश्यक है।  हाथों के धोने के विषय में उनका कहना है कि आमतौर पर मातायें बच्चों को खिलाने, दूध पिलाने से पहले हाथों को नहीं धोती हैं जो बच्चे को संक्रमित कर सकता है और उससे निमोनिया व अन्य कई बीमारियों के होने का खतरा रहता है।

‘होप मदर एण्ड चाइलड केयर सेण्टर’ की स्त्री रोग विशेषज्ञा (गोल्ड मेडिलिस्ट) डा. निधि जौहरी कहती हैं कि अच्छा पोषण तो महत्वपूर्ण है ही पर उसका स्वच्छ होना भी उतना ही जरूरी है।  अक्सर घर में माताओं को पूर्ण ज्ञान न होने की वजह से भी बच्चे कुपोषण का शिकार हो जाते हैं।  उनका मानना है कि महंगे खाने की ना तो बच्चों को न ही बड़ों को आवश्यकता है।  मौसम के फल व सब्जी से अच्छा पोषण कोई दूसरा नहीं है। कई बार मरीज उन्हें ‘प्रोटीन ड्रिंक’ नुस्खे में लिखने के लिए कहते हैं, पर वे मौसमी फल व सब्जी को ही प्राथमिकता देती हैं।

स्वच्छता पर वे कहती हैं कि सारे रोग स्वच्छता की कमी से ही शुरू होते हैं।  वे अपने अस्पताल में आने वाली माताओं को स्वच्छता, खास तौर पर हाथों को और बच्चों की दूध की बोतल, निप्पल आदि को कैसे साफ रखें, का विशेष ज्ञान देती हैं।  परन्तु ऐसा भी पाया गया है कि पूर्ण ज्ञान व स्वच्छता के बावजूद भी निमोनिया रोग बच्चे को हो सकता है, जैसे कि आशीष निगम एवं संगीता निगम के शिशु को जन्म से 5 महीने के भीतर ही निमोनिया हो गया था।

अतः प्रकृति व स्वच्छता से जितने करीब रहेंगे, उतने ही स्वस्थ जीवन का निर्माण कर सकेंगे।

नीरज मैनाली - सी0एन0एस0
(लेखक, ऑनलाइन पोर्टल सी.एन.एस. www.citizen-news.org के लिये लिखते हैं)

बच्चों को निमोनिया से बचाता है मां का दूध

"बच्चों को जन्म से 6 माह तक केवल मां का ही दूध पिलाएं क्योंकि यह उनके शरीर को निमोनिया, दस्त, और दिमागी बुखार आदि जैसी बीमारियों से बचाने का कार्य करता है।" यह कहना है राजधानी लखनऊ के चिकित्सकों का। डॉ. राम मनोहर लोहिया संयुक्त चिकित्सालय के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. अभिषेक वर्मा के अनुसार "माँ के दूध में बहुत सारे ऐसे तत्व होते हैं जिन्हें हम एन्टीबाडीज़ कहते हैं | ये एन्टीबाडीज़ निमोनिया ही नहीं, वरन और बहुत सारी बीमारियों से बच्चों को बचाते हैं। इसलिए जन्म के शुरू  के 6 महीने में माँ का दूध देना अति आवश्यक  है।"

डॉ. अभिषेक वर्मा ने बताया कि "जब भी कोई गर्भवती स्त्री हमारे अस्पताल में आती है तो उनको प्रसवपूर्व जांच के समय से ही इस बात के लिए तैयार किया जाता है  कि वह बच्चे को अपना ही दूध पिलायें, और हमारे यहां जब भी कोई बच्चा पैदा होता है तो आवश्यक रूप से उनको यह बताते है कि माँ का दूध ही सबसे अच्छा होता है | आप अपना ही दूध 6 महीने तक बच्चे को पिलाएं | बच्चे की संवृद्धि के लिए 6 महीने तक माँ का दूध पर्याप्त होता है।  उसके ऊपर बीमारी का कोई असर नहीं पड़ता है। ऐसी स्थिति में अधिकांश माँऐं बच्चे को अपना दूध पिलाना पसन्द करती हैं, और जो ऐसा नहीं करती हैं उनके बच्चों में संक्रमण जैसे निमोनिया, दस्त, पोषण की कमी और बहुत सारी समस्याएं ज्यादा आती हैं।" डॉ. वर्मा ने यह भी बताया कि "बोतल के दूध को हम मना करते हैं | अगर कुछ अनुपूरक देना है तो घर का ही देते हैं और दूध मां का ही देते हैं। बोतल के दूध में वो पोषक तत्व नहीं होते हैं जो माँ के दूध में पाये जाते हैं| इसलिए हमारी कोशिश यही रहती है कि मां बच्चे को अपना दूध ही पिलाए।"

एक निजी क्लीनिक की निदेशक एवं स्त्री रोग विशेषज्ञा डॉ. रमा शंखधर के अनुसार "शुरू में बच्चे में प्रतिरोधक क्षमता इतनी नहीं होती है कि वह बीमारियों से लड़ सके। इसलिए जब भी उसे कोई संक्रमण हो जाता है तो वह अपने को उससे नही बचा पाता है | लेकिन जब वह स्तनपान करता है तो माँ के दूध में इतने एंटीबाडीज़ होते हैं जो बीमारियों से लड़ने में बच्चे की सहायता करते हैं, और निमोनिया, टीबी, जुकाम, दिमागी बुखार, दस्त आदि बहुत सारी बीमारियों से बच्चे को बचाते हैं। हम सभी महिलाओं को यह राय देते है कि कम से कम 6 महीने तक बच्चों को तो जरूर स्तनपान कराएँ।"

डॉ. रमा शंखधर आगे बताती हैं कि "कुछ माँओं में  दवा देने के बावजूद दूध नहीं आता है | लेकिन उनको हम सुझाव देते है कि जब तक दूध आ रहा है आप बच्चे को दूध पिलाती रहिये और बाकि अनुपूरक भी दें जिससे वह भूखा न रहे। अगर माँ का दूध पर्याप्त मात्रा में हो रहा है तो बच्चे को अलग से कुछ भी देने की जरूरत नहीं है। यदि दूध पर्याप्त मात्रा में नहीं है तो बोतल का दूध दे सकती हैं। जब बच्चा तीन महीने का हो जाए तो उसे दाल का पानी भी छानकर दे सकते हैं।"

डॉ. राम मनोहर लोहिया संयुक्त चिकित्सालय के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डा. आर. एस. दूबे भी स्तनपान का समर्थन करते हैं। उनके अनुसार "जब माँ बच्चों को स्तनपान नही कराती है, और दूध चम्मच आदि से देती है तो दूध उसकी साँस की नली में जाने का खतरा रहता है। पर यदि उसका सर उठाकर स्तनपान कराया जाए तो इसकी सम्भावना निश्चित रूप से कम होगी। बच्चों को 6 से 12 माह तक स्तनपान करायें। इससे बाहरी खतरनाक तत्व बच्चे के शरीर के अन्दर नहीं जाएंगे। इसीलिए जो बच्चा हमारे अस्पताल में पैदा होता है तो उसकी माता को हम मार्गदर्शित करते है, और स्तनपान के लिये बताते है।"

वहीँ इसी अस्पताल में जन्म लेने वाली इस्माईलगंज झोपड़पट्टी की एक निमोनिया से पीड़ित बच्ची तुलसी की मां रेखा ने बताया कि बच्ची के जन्म के समय चिकित्सकों ने स्तनपान के लिए कुछ नही बताया | फिर भी मां ने बच्ची को 6 महीने तक अपना दूध पिलाया | इसके बावजूद बच्ची को निमोनिया हो गया। इसी बस्ती में रहने वाली निमोनिया से पीड़ित ज्योति, यास्मीन और फरीद की मांओं ने भी अपने बच्चों को 6 महीने तक केवल अपना ही दूध पिलाने की बात कही।

अपने शिशु को जन्म से 6 माह तक केवल स्तनपान ही कराएं | क्योंकि यह आसानी से बच्चे के पेट में पच जाता है। जिससे बच्चे का पेट खराब होने का खतरा नहीं रहता है। मां के दूध में सारे आवश्यक तत्व मौजूद होने के कारण बच्चे को  बाहर से कुछ भी लेने की आवश्यकता नही होती है। मां के दूध में मौजूद तत्व ही उसे बीमारियों से लड़ने की शक्ति प्रदान करते हैं। इसलिए बच्चों के लिये पहले 6 माह तक स्तनपान बहुत ही जरूरी है, क्योंकि यह बच्चों को निमोनिया जैसी बीमारियों से लड़ने में सहायता करता है। इसलिए प्रत्येक मां को चाहिये कि वह अपने नवजात शिशु  को 6 माह तक केवल स्तनपान ही कराएं, और निमोनिया जैसी बीमारियों से बच्चों को दूर रखें । साथ ही चिकित्सकों को चाहिए कि वे स्तनपान के बारे में महिलाओं को बताएं और उन्हें बच्चों को 6 माह तक केवल स्तनपान ही कराने की सलाह दें जिससे निमोनिया जैसी बीमारियों पर काबू पाया जा सके ।

नदीम सलमानी - सी.एन.एस.
(लेखक, ऑनलाइन पोर्टल सी.एन.एस. www.citizen-news.org के लिये लिखते हैं)

शिशु के जीवन के पहले 6 महीने स्तनपान : एकमात्र सुरक्षित उपाय

मौसम के करवट बदलते ही बीमारियों की आशंका बढ़ जाती है। सबसे ज्यादा असर देखने को मिलता है, बच्चों पर। वजह, बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बड़ों की अपेक्षा कम होती है। निमोनिया एक ऐसा रोग है जो छोटे बच्चों में प्रायः देखने को मिलता है। लाखों बच्चे इस रोग का शिकार होते हैं। पूरी दुनिया में 5 वर्ष से कम उम्र के लगभग 16 लाख बच्चे इस खतरनाक बीमारी से मरते हैं। अगर कुछ बातों का ध्यान रखा जाये तो इस रोग पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है।

‘होप मदर एण्ड चाइलड केयर सेण्टर’ के बाल-रोग विशेषज्ञ डा0 अजय कुमार के अनुसार शिशु के जन्म के पहले घण्टे से ही एकमात्र स्तनपान कराना चाहिए जो शिशु को निमोनिया के साथ-साथ कई अन्य बीमारियों से भी बचाता है। मगर आज के समाज में इसको लेकर माताओं में कई भ्रांतियां हैं जैसे कम दूध होना, जबकि शुरुआत में कम दूध आना एक आम बात है जिसे कोलस्ट्रम कहते हैं जो कि एक चिपचिपा पदार्थ होता है, लेकिन अगर स्तनपान कराया जाये तो कुछ ही समय में यह तेजी से बढ़ने लगता है, जिसे अक्सर मातायें समझती हैं कि यह दूध नहीं है, परन्तु ऐसा नहीं है।

कोलस्ट्रम बच्चे में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। इसी ‘होप मदर एण्ड चाइलड केयर सेण्टर’ की स्त्री रोग विशेषज्ञा डा0 निधि जौहरी का भी यही मानना है कि स्तनपान पूर्ण रुप से सुरक्षित एवं स्वच्छ तरीका है। उनका यह भी कहना है कि आज की भाग दौड़ भरी जिन्दगी में कई मातायें स्तनपान से कतराती हैं, जैसे कि वे कहती हैं कि दूध नहीं हो रहा है, कमर में तकलीफ है, काम पर जल्दी जाना पड़ता है इत्यादि। डा0 निधि जौहरी का भी यही कहना है कोई भी दूध जो हम शरीर से बाहर से पिलाते हैं उसको संक्रमण रहित करना बहुत मुश्किल हो जाता है, जो निमोनिया का एक बड़ा कारण है।

यश अस्पताल की स्त्री रोग विशेषज्ञा डा0 ऋतु गर्ग भी अपने यहॉ आने वाली माताओं को स्तनपान की सलाह देती हैं। मगर कई बार मातायें स्तनपान कराने में असमर्थ होती हैं तो वे उन्हें विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित लेकटोजेन नं0-1 या 2 की सलाह देती हैं, साथ-साथ यह भी सलाह देती हैं कि दूध की बोतल, कटोरी-चम्मच का पूर्ण रुप से संक्रमण रहित होना बहुत जरुरी है। 5 महीने के बाद वे दाल, चावल का पानी व फलों के रस पिलाने पर भी जोर देती हैं।

वात्सल्य क्लीनिक के सुप्रसिद्ध बाल-रोग विशेषज्ञ डा0 संतोष राय का कहना है कि एकमात्र स्तनपान का कोई दूसरा विकल्प नहीं है। यह नवजात शिशु में कई एण्टीबॉडीज की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है जो किसी भी फार्मूला दूध से नहीं मिल सकती है। डा0 संतोष राय का मानना है कि बोतल से दूध पिलाने में शिशु की साँस की नली और फेफड़े में कई विकार पैदा हो सकते हैं, जिसमें से निमोनिया प्रमुख है। डा0 संतोष राय कहते हैं कि ऊपर के दूध से हम शिशु के अन्दर संक्रमण के कई रास्ते खोल देते हैं। सभी विशेषज्ञों की यही राय बनती है कि एकमात्र स्तनपान से अधिक सुरक्षित कोई दूसरा विकल्प नहीं है।

नीरज मैनाली - सी0एन0एस0
(लेखक, ऑनलाइन पोर्टल सी.एन.एस. www.citizen-news.org के लिये लिखते हैं)

स्तनपान बढ़ाता है बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता

नवजात शिशुओं को जन्म के उपरांत ६ महीने तक एकमात्र माँ का दूध मिलने से उनके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है. गोरखपुर के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ के.एन. द्विवेदी के अनुसार: "निमोनिया से ही नहीं बल्कि बहुत सारी बीमारियों से बचाने के लिए स्तनपान जरूरी है। स्तनपान से बच्चों की 'इम्यूनिटी' (प्रतिरोधक क्षमता) अधिक बढ़ती होती है। स्तनपान से निमोनिया होने की सम्भावना कम होती है उस बच्चे की तुलना में जो स्तनपान नहीं कर रहा है। हांलांकि निमोनिया से बचाने के लिए और  भी सावधानियां बरतनी चाहिए, जैसे कि ठण्ड से बचाना चाहिए। लेकिन जो  बच्चें स्तनपान कर रहे है उनको निमोनिया होने की सम्भावना कम होती हैं क्योंकि उनकी प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है।"

पहले की तुलना में स्तनपान के बारे में लोग कहीं अधिक जागरूक हैं. "स्तनपान के बारे में जागरूकता बढ़ गयी है। जो महिलाएं पहली बार माँ बनी हैं वें स्तनपान करने का सही तरीका सीखने के लिये बहुत इच्छुक हैं. इस पर जागरूकता अभियान भी चल रहा है। चिकित्सक भी स्तनपान को काफी बढ़ावा देते हैं. देखा जाए तो स्तनपान पहले की तुलना में बढ़ी है" कहना है डॉ के.एन.द्विवेदी का ।

गोरखपुर की एक बस्ती में रहने वाले श्री प्रदीप श्रीवास्तव बताते हैं कि: "यहां तो माताएं बच्चों को दूध पिलाती हैं, लेकिन कुछ अभी भी नहीं पिलाती है। अब तो कई सारे कार्यक्रम चल रहे है जिसकी वजह से माताएं स्तन पान कराने लगी हैं।"

गोरखपुर की बस्ती में रहने वाली इन्द्रावती बताती हैं कि उनके नाती को निमोनिया हुआ था. उन्होंने बताया कि: "हमारे नाती को निमोनिया हुआ था। बच्चे के गले में परेशानी थी, श्वास फूल रही थी, पेट में भी दर्द था, बुखार भी था। चिकित्सकों ने बताया कि निमोनिया ठण्ड की वजह से हुआ था। इस बच्चे को मां का दूध 5-6 महीने तक पिलाया गया था और अब उसे गाय का दूध पिला रहे हैं।"

समाज में जागरूकता होने के बावजूद भी अनेक समुदाय ऐसे हैं जहां स्तनपान के हितों के बारे में पर्याप्त जागरूकता नहीं पहुंची है. समाज में व्याप्त भ्रांतियां है और ऐसे रीति-रिवाज़ हैं जो बच्चे को एकमात्र स्तनपान से वंचित कर देते हैं। डॉ द्विवेदी का कहना है कि: "स्तनपान न कराने का सबसे बड़ा कारण है अज्ञानता। कुछ परिवारों को नवजात शिशु को स्तनपान कराने के फायदों के बारे में पता ही नहीं है। ज्यादातर लोगों को स्तनपान का महत्व समझाने से समझ में आ जाता है। अधिकतर लोग रुढ़िवादी हो कर और समझ न होने की वजह से, या फिर समाज में कुछ गलतफहमी होने के कारण शिशु को स्तनपान से वंचित रखते हैं।"

जो माताएं बोतल से दूध पिलाती हैं वो ठीक नहीं है। डॉ द्विवेदी के अनुसार: "बोतल से दूध नहीं पिलाना चाहिए क्योंकि उससे इन्फेक्सन (संक्रमण) होने का खतरा होता है, बोतल से दूध पीने से बच्चे के सांस की नली में दूध जा सकता है। बोतल का दूध पीने वाले बच्चे में सामान्य स्तनपान करने वाले बच्चे से चार से पांच गुना अधिक 'ऐसपिरेशनल निमोनिया' होने का खतरा होता है। बोतल से दूध पीने के दौरान श्वास नली में दूध चला जाता है जिसकी वजह से बच्चे निमोनिया के खतरे में आ जाते हैं।" शिशु को जन्म-उपरांत ६ महीने तक माँ का दूध ही पिलाना चाहिए - इसका लाभ बच्चे को सम्पूर्ण जीवन में मिलता है.

जितेन्द्र द्विवेदी - सी०एन०एस०
(लेखक, ऑनलाइन पोर्टल सी.एन.एस. www.citizen-news.org के लिये लिखते हैं)

निमोनिया ग्रस्त-बच्चों को अक्सर नहीं मिलता समय से उपचार

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि निमोनिया टीकाकरण और उपचार को सरकारी अस्पतालों में मुहैया करवाना चाहिए क्योंकि निमोनिया ५ साल से कम आयु के बच्चों के लिए मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है, जबकि इससे पूर्णतय:बचाव और  उपचार दोनों ही मुमकिन हैं. हालत यह है कि निज़ी और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था दोनों में ही अक्सर गुणात्मक दृष्टि से उत्तम टीकाकरण और उपचार उपलब्ध नहीं है. हालाँकि निमोनिया टीकाकरण निज़ी स्वास्थ्य व्यवस्था में अक्सर मिल जाता है परन्तु  कुछ अपवाद छोड़, अनेक निज़ी चिकित्सक विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा बताये गए उपचार की तुलना में निमोनिया की अलग-अलग उपचार विधि  अपनाते हैं.

सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में निमोनिया टीकाकरण उपलब्ध नहीं है, जबकि गरीब घर के बच्चों को ही निमोनिया होने का अधिक खतरा रहता है, और इस बात की सबसे कम सम्भावना भी कि वे निज़ी अस्पताल में जा कर महंगा निमोनिया टीका लगवा पाएंगे. निज़ी स्वास्थ्य व्यवस्था में कुछ जगह सर्वोत्तम निमोनिया टीकाकरण और उपचार सेवा उपलब्ध है, परन्तु यह इतनी महंगी है कि आम लोगों की पहुँच के बाहर ही है. गौर तलब बात यह है कि निमोनिया कुपोषण, अस्वच्छता, भीड़-भाड़, परोक्ष धूम्रपान, चूल्हे के धुएं, आदि से पनपता  है जिसकी सम्भावना आर्थिक रूप से कमज़ोर घरों में अधिक होती है.

सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली में कुछ जगह तो बहुत ही कुशल स्वास्थ्यकर्मी और निमोनिया उपचार सेवाएँ उपलब्ध हैं, परन्तु निमोनिया टीकाकरण नहीं. निमोनिया ग्रसित बच्चों के अभिभावकों से बात करने से पता चला कि केवल बड़े सरकारी अस्पताल में ही निमोनिया उपचार मिलना न्याय संगत नहीं है.

गोरखपुर के सरकारी अस्पताल की एक स्वास्थ्यकर्मी ने कहा कि अक्सर जब तक बच्चे यहाँ पहुँचते हैं तब तक निमोनिया विकराल रूप धारण कर चुका होता है. जब निमोनिया के आरंभिक लक्षण आते हैं तो लोग स्वयं ही इलाज करते हैं, आसपास दिखाते हैं और जब स्थिति सुधरती नहीं है तब ही जिला अस्पताल ले कर आते हैं.

गोरखपुर की एक बस्ती में रहने वाली इन्द्रावती का कहना है कि जब उनके नाती को निमोनिया हुआ था तब वे उसे अस्पताल तब ही लेकर गयीं जब आसपास के चिकित्सकों के इलाज से स्थिति नहीं सुधरी. जिला अस्पताल, जो उनके घर से १५ किलोमीटर दूर है, वहाँ जाने में समय और पैसा दोनों लगता हैं, उस दिन की मजदूरी भी नहीं मिलती है, मजदूरी से छुट्टी लेनी पड़ती है, और यदि बच्चा अस्पताल में भर्ती कर लिया जाए तो रहना पड़ता है. इसका यह मतलब नहीं है कि लोग अस्पताल जाएँ नहीं, परन्तु ये सारी सेवाएँ पास के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर क्यों नहीं उपलब्ध हैं?

इन्द्रावती का कहना सही है. यदि गुणात्मक दृष्टि से बढ़िया स्वास्थ्य सेवाएँ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर उपलब्ध होंगी तो निमोनिया का उपचार शीघ्र हो सकेगा, और मृत्यु दर में भी वांछनीय सुधार होगा. निमोनिया टीकाकरण को राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में भी शामिल करना होगा वर्ना जिन बच्चों को निमोनिया का सबसे अधिक खतरा है वही इस टीके से वंचित रह जाते रहेंगे.

भारत सरकार के योजना आयोग को अपनी आगामी १२वीं पञ्च वर्षीय योजना (२०१२-२०१७) में  निमोनिया टीकाकरण को भी शामिल करना चाहिए.

जीतेन्द्र द्विवेदी - सी.एन.एस.

सबसे जरूरतमंद बच्चों को नहीं लग रहा है निमोनिया टीका

पांच वर्ष से  कम आयु के बच्चों में निमोनिया  मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है. इसके बावजूद निमोनिया का टीका भारत सरकार के बाल टीकाकरण कार्यक्रम का भाग नहीं है. इसको निजी रूप से खरीदना पड़ता है और महंगा होने के कारण अधिकाँश लोगों की पहुँच के बाहर है. सबसे दुःख की बात तो यह है कि जिन बच्चों को निमोनिया का खतरा सबसे अधिक है, उनको ही निमोनिया टीका लगने की सम्भावना सबसे कम है. उदहारण के तौर पर क्योंकि निमोनिया टीकाकरण सरकार अपने स्वास्थ्य कार्यक्रमों में नहीं प्रदान करती है, तो  ऐसे बच्चे जो गरीब परिवार से हैं, जिनके लिए स्वच्छता, धुआ-रहित वातावरण, भीड़-भाड़, पौष्टिक आहार, स्वास्थ्य जागरूकता, आदि मिलने की सम्भावना भी कम है, उनमें निमोनिया अधिक होती है और घटक स्वरुप लेती है.

गोरखपुर की एक बस्ती में रहने वाले प्रदीप श्रीवास्तव बताते हैं कि: "मेरे बच्चे को भी निमोनिया हुआ था. जिस बस्ती में हम लोग रहते हैं वहाँ अधिकांश लोग अपने बच्चों का टीकाकरण तो करा रहे है पर कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अभी भी नहीं लगवा रहे हैं. ऐसे लोगों के लिए जो अपने बच्चों को टीका नहीं लगवा रहे हैं, उनके लिए जागरूकता कार्यक्रम की जरूरत है और उनको जागरूक किया जा सकता है। पिछले वर्ष एक परिवार टीकाकरण नहीं करवा रहा था, जिनको हम लोगों ने जागरूक किया उसके बार उसने लगवाया।"

गौर हो कि प्रदीप को यह नहीं मालूम है कि निमोनिया का टीका लगा है कि नहीं. जिस टीकाकरण का प्रदीप जिक्र कर रहे हैं वो सरकारी स्वास्थ्य कार्यक्रम के अंतर्गत  बच्चों को नि:शुल्क मुहैया किया जाता है और उसमें निमोनिया का टीका नहीं शामिल है. परन्तु प्रदीप इस बात से अनजान हैं.

गोरखपुर की एक और बस्ती में रहने वाली इन्द्रावती बताती है कि उनके नाती को निमोनिया हुआ था. उन्होंने बताया कि: "हमारे नाती को निमोनिया हुआ था। बच्चे के गले में परेशानी थी, श्वास फूल रही थी, पेट में भी दर्द था, बुखार भी था। चिकित्सकों ने बताया कि निमोनिया ठण्ड के वजह से हुई थी. इस बच्चे को मां का दूध 5-6 महीने तक पिलाया गया था और अब उसे गाय का दूध पिला रहे हैं."


इन्द्रावती आगे बताती हैं कि "बच्चों का टीकाकरण बराबर करा रहे हैं." यह पूछने पर कि "कौन-कौन सा टीका लगा है?", इन्द्रावती कहती हैं कि: "टीका के बारे में नहीं बता पायेगें। सरकारी अस्पताल से लगवाया था और कोई पैसा नहीं लगा था."

ज़ाहिर है कि निमोनिया टीका सरकारी टीकाकरण योजना में शामिल होना चाहिए क्योंकि बच्चों में यह एक बड़ा मृत्यु का कारण है.

जीतेन्द्र द्विवेदी - सी.एन.एस.

बच्चों में निमोनिया जनती है अस्वच्छता और परोक्ष धूम्रपान

घर के भीतर विशेष तौर पर साफ़-सफाई रखनी चाहिए और अंगीठी या धूम्रपान के धुएं से अपने बच्चों को बचाना चाहिए. शोध के अनुसार इस धुएं से न केवल बच्चों के स्वास्थ्य पर अवांछनीय कुप्रभाव पड़ता है बल्कि उनमें निमोनिया होने का खतरा बढ़ भी जाता है.

गोरखपुर के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ के.एन. द्विवेदी का कहना है कि: "निमोनिया नियंत्रण के लिए स्वच्छता तो बहुत आवश्यक है। अपने देश में परम्परा है बच्चों को काजल लगाने की, तेल मालिश करने की. इन सब चीजों से बच्चो को बचाना चाहिए। बच्चा स्वस्थ तभी रहेगा जब वह स्वच्छ रहेगा। दोनों एक दूसरे के पर्यायवाची हैं।"

गोरखपुर की एक बस्ती में रहने वाले प्रदीप श्रीवास्तव बताते हैं कि: "जिस झोपड़-पट्टी में मैं रहता हूँ वहाँ ७-१० साल की उम्र से ही बच्चे धूम्रपान कर रहे हैं. बच्चे को परोक्ष रूप से धूम्रपान से बचाना मुश्किल है क्योंकि घर इतने छोटे होते हैं और आस पास भी लोग परोक्ष धूम्रपान के नुक्सान से अनभिज्ञ हैं. मुझे भी आज ही यह जानकारी हुई कि धुएं से बच्चे को निमोनिया हो सकता है."

नवजात शिशुओं की दो और माताओं से पूछने पर पता चला कि उन्हें भी परोक्ष धूम्रपान के खतरों के बारे में नहीं पता था. यह भी नहीं पता था कि परोक्ष धूम्रपान से बच्चों को निमोनिया हो सकता है. इनमें से एक माता तो स्वयं सुरती तम्बाकू खाती हैं. श्रीवास्तव साहब कहते हैं कि अधिकाँश लोग बीड़ी पीते हैं, या सुरती तम्बाकू  खाते हैं. सिगरेट पीने वालों की संख्या कम है.

गोरखपुर की एक बस्ती में रहने वाली इन्द्रावती बताती हैं कि उनके नाती को निमोनिया हुआ था. उन्होंने बताया कि: "हमारे नाती को निमोनिया हुआ था। बच्चे के गले में परेशानी थी, श्वास फूल रही थी, पेट में भी दर्द था, बुखार भी था। चिकित्सकों ने बताया कि निमोनिया ठण्ड के वजह से हुई थी. इस बच्चे को मां का दूध 5-6 महीने तक पिलाया गया था और अब उसे गाय का दूध पिला रहे हैं. घर में कोई बीड़ी या सिगरेट तो नहीं पीता है, पर खाना लकड़ी जला कर ही बनता है. तम्बाकू 'सुरती' खाई जाती है."

विशेषज्ञों के अनुसार लकड़ी आदि जला कर चूल्हे पर खाना बनाने से जो धुआं निकलता है उससे बच्चों को बचाना चाहिए. सिगरेट बीडी के धुएं से भी सभी को बचना चाहिए क्योंकि इससे स्वास्थ्य पर अनेक कुप्रभाव पड़ते हैं जिनमें से निमोनिया एक है. तम्बाकू सेवन तो हर रूप में खतरनाक और जान लेवा नशा है.

भारत में १० करोड़ से भी अधिक बीड़ी का सेवन करने वाले लोग हैं. जितने लोग बीड़ी पीने की वजह से तम्बाकू-जनित मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उतने अन्य सभी प्रकार के तम्बाकू उत्पादों द्वारा जनित बीमारियों से भी नही मरते. विश्व स्वास्थ्य संगठन अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार विजेता प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने बताया कि ये तथ्य बीड़ी मोनोग्राफ नामक रपट में सामने आए हैं जो स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने जारी की थी.

"तम्बाकू हर रूप में घातक है. वर्तमान में बीड़ी पीने की दर कई प्रदेशों में अधिक है, जैसे  मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड और सिक्किम में १०.६ - १४.२ प्रतिशत, अरुणाचल प्रदेश, असाम, बिहार, चंडीगढ़ और मेघालय में ४.६ - ९.२ प्रतिशत, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, त्रिपुरा, उड़ीसा, उत्तराखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश में १.1 - २.९ प्रतिशत, और गोवा, तमिल नाडू, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, कर्नाटक, गुजरात, हिमाचल प्रदेश और पंजाब में यह दर १० प्रतिशत है. भारत में मिजोरम में बीड़ी सेवन की दर सबसे अधिक है और पंजाब में सबसे कम." बताया प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने.

"बीड़ी में तम्बाकू की मात्रा सिगरेट की तुलना में कम होती है पर निकोटीन, टार और अन्य हानिकारक पदार्थों की मात्रा काफी अधिक होती है. इनमें से कई ऐसे पदार्थ हैं जिनसे कैंसर होने की सम्भावना बढ़ जाती है" कहा प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने जो अखिल भारतीय शल्य-चिकित्सकों (सर्जनों) के संघ के नव-निर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.

बीड़ी पीने से स्वास्थ्य पर जान-लेवा कु-प्रभावों में मुख के कैंसर, खाने की नली के कैंसर आदि प्रमुख हैं, जो तम्बाकू-जनित कैंसर के कुल अनुपात का ७५ प्रतिशत हैं! इस रपट में यह भी प्रमाणित हुआ है कि बीड़ी पीने और तपेदिक या टीबी के मध्य सीधा सम्बन्ध है.

बच्चों को विशेषकर तम्बाकू के धुएं से और चूल्हे से निकलने वाले धुएं से बचाना चाहिए, और जहाँ तक मुमकिन हो उन्हें स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण में ही रखना चाहिए.

जीतेन्द्र द्विवेदी - सी.एन.एस.

सुपोषण से निमोनिया का बचाव मुमकिन

बच्चों को निमोनिया और कुपोषण से बचाने के लिए पौष्टिक आहार की जरूरत होती है। गोरखपुर के बाल-रोग विशेषज्ञ डॉ कें.एन.द्विवेदी का कहना है कि: "पौष्टिक आहार तो जीवन की धुरी है, जैसे पेट्रोल आप कार में डालते हैं। बच्चे के लिए सबसे अच्छा पोषण 6 महीने तक मां का दूध है।  6 महीने के बाद ठोस आहार की शुरुआत करनी चाहिए। फिर धीरे-धीरे कर के 1 वर्ष तक भोजन बढ़ाना चाहिए। एक साल का बच्चा वह सभी खाना खा सकता है जो बड़े लोग खा सकते है। इसको कई चरणों में बांटा गया है। 0 से 6 महीने तक केवल स्तन पान, 6-9 महीने, 9-11 महीने,11-12 महीने के बीच में खाने की मात्रा थोड़ी-थोड़ी बढ़ाते है। पोषण तो किसी भी शरीर की आधार शिला है।"

डॉ द्विवेदी बताते हैं कि बच्चे के लिए नुकसानदायक आहार क्या है: "शुरू से ही बच्चों को ऊपर का दूध पिला देना, मां का दूध न देना, फास्टफूड खिलाना, खाने में पोषक तत्वों की कमी होना, अच्छा भोजन नहीं देना, संतुलित आहार न देना, समय पर खाना न खिलाना, ये सब नुकसानदेह हैं। बच्चों के विकास के लिए संतुलित आहार अति आवश्यक है।  6 माह तक के शिशु के लिए केवल मां का दूध ही संतुलित आहार है।"

नवजात शिशुओं को जन्म के उपरांत ६ महीने तक एकमात्र माँ का दूध मिलने से उनके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है. निमोनिया से ही नहीं, बल्कि बहुत सारी बीमारियों से बचाने के लिए स्तनपान जरूरी है। स्तनपान से बच्चों की 'इम्यूनिटी' (प्रतिरोधक क्षमता) अधिक बढ़ती होती है। स्तनपान से निमोनिया होने की सम्भावना कम होती है उस बच्चे की तुलना में जो स्तनपान नहीं कर रहा है। हांलांकि निमोनिया से बचाने के लिए और  भी सावधानियां बरतनी चाहिए जैसे कि ठण्ड से बचाना चाहिए। लेकिन जो  बच्चें स्तनपान कर रहे हैं  उनको निमोनिया होने की सम्भावना कम होती हैं क्योंकि उनकी प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है।

पहले की तुलना में आजकल लोग स्तनपान के बारे में कहीं अधिक जागरूक हैं. "स्तनपान के बारे में जागरूकता बढ़ गयी है। जो महिलाएं पहली बार माँ बनी हैं वें स्तनपान करने का सही तरीका सीखने के लिये बहुत इच्छुक हैं. इस पर जागरूकता अभियान भी चल रहा है। चिकित्सक भी स्तनपान को काफी बढ़ावा देते हैं. देखा जाए तो पहले ली तुलना में, स्तनपानकराने वाली महिलाओं का प्रतिशत बढ़ा है " कहना है डॉ के.एन.द्विवेदी का ।

गोरखपुर की एक बस्ती में रहने वाले श्री प्रदीप श्रीवास्तव बताते हैं कि: "यहां तो अधिकतर माताएं बच्चों को दूध पिलाती हैं, लेकिन कुछ अभी भी नहीं पिलाती हैं। अब तो कई सारे कार्यक्रम चल रहे है जिसकी वजह से माताएं स्तन पान कराने लगी है।"

गोरखपुर की बस्ती में रहने वाली इन्द्रावती बताती है कि उनके नाती को निमोनिया हुआ था. उन्होंने बताया कि: "हमारे नाती को निमोनिया हुआ था। इस बच्चे को मां का दूध 5-6 महीने तक पिलाया गया था और अब उसे गाय का दूध पिला रहे हैं."

समाज में जागरूकता होने के बावजूद भी अनेक समुदाय ऐसे हैं जहां स्तनपान के हितों के बारे में पर्याप्त जागरूकता नहीं पहुंची है. समाज में व्याप्त भ्रांतियां है और ऐसे रीति-रिवाज़ हैं जो बच्चे को एकमात्र स्तनपान से वंचित कर देते हैं. डॉ द्विवेदी का कहना है कि: "स्तनपान न कराने का सबसे बड़ा कारण है कि कुछ परिवारों को नवजात शिशु को स्तनपान कराने के फायदों के बारे में पता नहीं है. ज्यादातर लोगों को स्तनपान का महत्व समझाने से समझ में आ जाता है। अधिकतर लोग रुढ़िवादी हो कर और समझ न होने की वजह से, या फिर समाज में कुछ गलतफहमी होने के कारण शिशु को स्तनपान से वंचित रखते हैं."

जो माताऐं बोतल से दूध पिलाती हैं वह ठीक नहीं है. डॉ द्विवेदी के अनुसार: "बोतल से दूध नहीं पिलाना चाहिए क्योंकि उससे इन्फेक्शन (संक्रमण) होने का खतरा होता है। बोतल से दूध पीने से बच्चे के सांस की नली में दूध जा सकता है। बोतल दूध पीने वाले बच्चे में सामान्य स्तनपान करने वाले बच्चे से चार से पांच गुना अधिक 'एस्पिरेशनल निमोनिया' होने का खतरा होता है। यह निमोनिया बोतल से दूध पीने के दौरान श्वास नली में दूध चला जाता है जिसकी वजह से बच्चे खतरे में आ जाते हैं।"

जीतेन्द्र द्विवेदी - सी.एन.एस.

चमत्कारी औषधि द्वारा निमोनिया का उपचार

निमोनिया निचली श्वसन नली के संक्रमण का एक गम्भीर रोग है, जो  फेफड़ों को प्रभावित करता है। बच्चों की मृत्यु का यह एक प्रमुख कारण है तथा विश्व भर के 20 प्रतिशत शिशुओं की मृत्यु के लिये जिम्मेदार है। निमोनिया के कारण होने वाली मृत्यु कम करने का सर्वोत्तम उपाय समय से दी गयी प्रभावी चिकित्सा है। निमोनिया से पीड़ित बच्चों का रोग प्रतिकारक दवाओं, जिन्हें साधारणत: चमत्कारी औषधि के नाम से जाना जाता है, से त्वरित इलाज करने पर मृत्यु की सम्भावना काफी कम की जा सकती है। विश्व स्तर पर प्राक्कलन आंकड़े बताते है कि निमोनिया से ग्रसित बच्चों को यदि रोग प्रतिकारक(Antibiotic) चिकित्सा उपलब्ध हो पाती  तो प्रतिवर्ष लगभग 600,000 जीवन बचाये जा सकते हैं। निमोनिया से होने वाली मृत्यु को कम करने के लिये यदि विश्व स्तर पर रोकथाम एवं चिकित्सा दोनों  किया जाता तो यह संख्या दुगनी से भी अधिक अर्थात लगभग 13 लाख होती।

यह बीमारी, जिसमें एक अथवा दोनों फेफड़ों में पस तथा द्रव एल्विओली (Alveoli) भर जाता है, को सुनिश्चित करने के लिये सीने (छाती) का एक्स-रे तथा प्रयोगशाला में जाँच की जाती है। यह बीमारी ऑक्सीजन ग्रहण करने (साँस लेने) की क्रिया को प्रभावित करती है, जिससे साँस लेना कठिन हो जाता है। लेकिन संसाधनों के अभाव के कारण सम्भावित निमोनिया के मामलों को उनके क्लीनिकल लक्षणों जैसे तेज या कठिनता से साँस लेना, खाँसी, बुखार आदि द्वारा पहचाना जाता है। नवजात शिशु स्तनपान करने में अक्षम हो सकते हैं तथा बेहोशी, हाइपोथर्मिया व दौरे का अनुभव कर सकते हैं। इसलिये बच्चों में निमोनिया के लक्षण पहचानने तथा उचित चिकित्सा सुविधा देने में देखभाल करने वालों का आवश्यक योगदान होता हैं।
निमोनिया के कम गम्भीर मरीजों का इलाज उचित रोग प्रतिकारक दवाओं द्वारा किया जा सकता हैं। गम्भीर निमोनिया के मामलों को अविलम्ब इंजेक्शन द्वारा एन्टीबायोटिक्स तथा, यदि आवश्यक हो तो, ऑक्सीजन दिए जाने के लिये चिकित्सालय भेज देना चाहिए।

निमोनिया से पीड़ित पाँच वर्ष तक के बच्चों में मृत्यु दर कम करने हेतु तीन आवश्यक स्तर हैं:
1. निमोनिया से पीड़ित बच्चों को पहचानना
2. चिकित्सालय-स्वास्थ्य केन्द्र-मातृ व बाल स्वास्थ्य केन्द्र में उचित चिकित्सा-सुविधा प्राप्त करना,
3. चिकित्सक द्वारा बताया गया उपचार प्राप्त करना।
प्रगतिशील देशो में लगभग 20 प्रतिशत देखभाल करने वाले ही बीमारी के लक्षण पहचानते हैं, तथा उनमें से केवल 54 प्रतिशत बच्चों को चिकित्सा उपलब्ध करवा पाते हैं।

गरीब बच्चों की तुलना में शहर व शिक्षित परिवारों के बच्चों को उचित चिकित्सा-सुविधा अधिक मिल पाती है तथा आर्थिक विषमताओं से जूझते हुए 68 देशों में लगभग 33 प्रतिशत निमोनिया से पीड़ित बच्चे एन्टीबायोटिक का लाभ पाते हैं।

निमोनिया / सेपसिस के लक्षण वाले दो माह तक के शिशुओं में अन्य शिशुओं की अपेक्षा गम्भीर बीमारी तथा मृत्यु की सम्भावना का अधिक खतरा रहता है। अत: ऐसे शिशुओं को अविलम्ब चिकित्सा हेतु किसी अस्पताल में भेज देना चाहिये। स्थानीय उपलब्ध चिकित्सा की निपुणता के आधार पर चिकित्सा का तरीका चुना जाना चाहिए। कुछ क्षेत्रों में किन्ही विशेष एन्टीबायोटिक के लिए प्रतिरोधक क्षमता का स्तर अधिक हो सकता है जिससे निमोनिया के बचाव के लिये वे औषिधियाँ कम प्रभावी हो सकती है। अन्य स्थानों में अधिक खतरे वाले वर्ग, जैसे कुपोषित या एच.आई.वी. सक्रंमित बच्चे अधिक संख्या में हो सकते हैं, जिसके अनुसार ही उनकी चिकित्सा-प्रणाली का चुनाव किया जाना चाहिए।

बालरोग तथा नवजात शिशु विशेषज्ञ एवं परामर्शदाता डॉ. एस.के. सेहता स्पष्ट करते हैं, ‘‘भारत सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू एच ओ) ने निमोनिया की पहचान हेतु सरल तरीके की संस्तुति की है, जिससे गाँवों में भी, जहाँ चिकित्सक की उपलब्धता नहीं हैं, एक अनपढ़ भी बीमारी की पहचान कर सके। डब्ल्यू एच ओ द्वारा मूलरूप से तीन प्रकार के निमोनिया को सूचीबद्ध किया गया है-
1. निमोनिया ना होना,
2. साधारण निमोनिया जिसका इलाज सेपट्रान है तथा
3. गम्भीर निमोनिया:- इस मामले में भारत सरकार द्वारा अनुमोदित किया गया है कि यदि व्यक्ति जानकार है तो मरीज को एम्पीसिलीन जेन्टामाइसिन दिया जाना चाहिये तथा मरीज को विशेषज्ञ के पास भेजना चाहिये।’’

लखनऊ के बाल-रोग तथा बाल-ह्रदय रोग विशेषज्ञ, डॉ. एस.एन. रस्तोगी का मत है- ‘‘ बीमारी का इलाज, कारक तत्व, जो जीवाणु हो सकता है अथवा जीवाणु नहीं भी हो सकता हैं, पर निर्भर करता है। इस प्रकार चिकित्सा में भिन्नता हो जाती है। भारत में सर्वाधिक होने वाला निमोनिया टयूबरकूलर (tubercular) निमोनिया है। निमोनिया की चिकित्सा के लिये स्ट्रैप्टोमाइसिन दिया जा सकता है।’’

डॉ. एस. के. सेहता, जिन्होंने कई वर्षों तक विख्यात चिकित्सालयों व लखनऊ एवं दिल्ली के गैर-सरकारी अस्पतालों में कार्य किया है, कहते हैं, ‘‘सरकारी चिकित्सालयों में भारत सरकार की सिफारिशों का पालन हो रहा है। भारत सरकार तथा डब्ल्यू एच ओ ने जनसाधारण पर अधिक ध्यान दिया है। इसलिये सेपट्रोन  निमोनिया के इलाज के लिए काफी अच्छी तथा सस्ती औषधि है तथा ग्रामीण क्षेत्रों में भारत सरकार द्वारा संस्तुत है। जो भी हो, प्राइवेट सेक्टर में व्यक्तिगत रूझान अधिक आवश्यक होता है और हम सेपट्रान के लिये उच्च प्रतिरोध देख रहे हैं। इसलिये हम तेज रोग प्रतिकारक दवा का चुनाव करते हैं।’’

सलाहकार प्रसूति विशेषज्ञ तथा स्त्री-रोग विशेषज्ञ, डॉ. नीलम सिंह, जो ‘वात्सल्य रीसोर्स सेन्टर आन हेल्थ’ की मुख्य कार्यदायी भी हैं, के अनुसार कई प्रदेशों में  बच्चों में गम्भीर “वसन-नली के संक्रमण की चिकित्सा व्यापक  बाल संरक्षण कार्यक्रम का अंग है। फिर भी निमोनिया के बचाव के लिये आवश्यक जागरूकता का अभाव है। अभी भी इस मामले काफी अनभिज्ञता है तथा जागरूकता हेतु विशेष कार्यक्रमों के प्रयोजन की आवश्यकता है। अतिसार के बाद बच्चों में निमोनिया सबसे घातक बीमारी है। सरकारी और गैर-सरकारी चिकित्सालयों में होने वाले इलाज के मध्य भिन्नता के लिये समय, सलाह, चिकित्सा, इलाज में होने वाला व्यय तथा अन्य कारण जिम्मेदार हैं। इस क्षेत्र में सरकार द्वारा काफी तरक्की की गयी है और अब ये इलाज सरकारी अस्पतालों में भी उपलब्ध हैं। फिर भी सार्वजनिक चिकित्सा व्यवस्था में मरीजों की अधिकता, विशेषज्ञों का अभाव, संसाधनों की कमी तथा दवाओं का उपलब्ध न होना आदि अनेक कारण हैं, जिस पर विचार होना चाहिये।’’

छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के बाल-रोग विभाग में स्वास्थ्य-लाभ कर रहे 3 वर्ष के अथर्व, जिससे मैं अक्टूबर 2011 के प्रथम सप्ताह में मिली थी, की कहानी बच्चों में निमोनिया के उचित उपचार न मिलने के कारण होने वाले घातक परिणाम का ज्वलन्त उदाहरण है। निमोनिया के पहले ही लक्षण में अथर्व के  अभिभावकों ने तुरन्त प्राइवेट सेक्टर में चिकित्सा प्राप्त करवायी, लेकिन अथर्व की दशा बिगड़ने पर वे एक नर्सिंग होम से दूसरे में दौड़ते रहे। उन्हें लगा कि चिकित्सक उनसे वित्तीय लाभ पाने में अधिक उत्सुक थे। अन्त में वे उसे छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय, जो एक सरकारी चिकित्सालय हैं, में चार अगस्त को लाये। अन्तत: बाजार में उपलब्ध नवीनतम रोग प्रतिकारक औषधि बच्चे को दी गयी और उसकी हालत काफी सुधर गयी।

भारत में हम लोग सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली को किस प्रकार कम कर आंकते हैं, इस तथ्य का यह एक उदाहरण है। संसाधनों की कमियों के बावजूद भी सरकारी स्वास्थ्य-तंत्र गम्भीर बीमारी के मरीजों को सर्वोत्तम उपचार देने में सक्षम है।

बच्चों में निमोनिया के बचाव व उपचार को बढ़ावा देने के उद्देश से 2009 में ‘द ग्लोबल एक्शन प्लान फॉर  द प्रीवेन्सन एण्ड कन्ट्रोल ऑफ़ निमोनिया’ (GAPP) की स्थापना की गयी। आइये, हम सब मिलकार प्रत्येक बीमार बच्चे की सही देखभाल तथा निमोनिया के उपचार की प्रतिबद्धता हेतु संकल्प करें।

सौम्या अरोरा - सी.एन.एस.
(अनुवाद: सुश्री माया जोशी, लखनऊ)

घातक निमोनिया से बचाव के लिये जीवन रक्षक टीके

निमोनिया जैसी बीमारी से हर वर्ष लाखों बच्चे काल ग्रसित होते हैं जबकि इनको उपलब्ध टीकों द्वारा रोका जा सकता है। निमोनिया 5 वर्ष तक की आयु के बच्चों की मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है, जिसके कारण लगभग 16 लाख बच्चों की प्रतिवर्ष मृत्यु हो जाती है। यद्यपि निमोनिया 5 वर्ष से कम आयु के २० प्रतिशत बच्चों की मृत्यु का कारण है, पर दुर्भाग्य से पूरे विश्व में स्वास्थ्य के कुल खर्च का मात्र 5 प्रतिशत ही निमोनिया के लिये व्यय किया जाता है।दो प्रमुख घातक प्रकार के निमोनिया -- 'स्ट्रैप्टोकोकस निमोनी और हीमोफीलस इन्फ्लूएंजी टाइप बी '-- की रोकथाम के लिये टीके उपलब्ध हैं, तथा कई देशों में उपयोग में  लाये जा रहे हैं, लेकिन तृतीय विश्व के भारत जैसे देश में (जो कि पूरे विश्व के बचपन में होने वाला निमोनिया के 40 प्रतिशत मामले के लिये जिम्मेदार हैं), उपर्यक्त टीकों का उपयोग बहुत कम हो रहा है। यदि ये टीके (वैक्सीन) उन्नतशील देशों में उपलब्ध हों और उपयोग में लाए जाएं तो एक अनुमान के अनुसार 5 वर्ष से कम आयु केलगभग 10 लाख बच्चों की जान प्रत्येक वर्ष बचाई जा सकती है।

टीकाकरण बच्चों को निमोनिया से बचाता है, जो दुर्बलता पैदा करने वाली बीमारी है जिसके चलते श्वास सम्बन्धी अनेक जटिल रोग तथा घातक परिणाम हो सकते हैं। सभी बच्चों को इससे बचने का अधिकार है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का नवजात शिशुओं का टीकाकरण कार्यक्रम शिशुओं की प्रथम 6 माह तक की अवधि तक हिब तथा निमोकोकल कन्जुगेट वैक्सीन (पी सी वी) की तीन खुराक दिये जाने की सिफारिश  करता है। इस समय पीसीवी कुछ ही देशों में उपलब्ध है जबकि हिब द्वारा टीकाकरण अनेक देशों के टीकाकरण कार्यक्रम का हिस्सा है।

निमोकोकल वैक्सीनस एक्सीलेरेट डेवलपमेंट एण्ड इंट्रोडक्शन प्लान, अनेक देशों  दाताओं, अंतरराष्ट्रीय संगठनों और उद्द्योगों की मिली जुली साझेदारी द्वारा अल्प आय वर्ग के देशों में निमोकोकल टीकाकरण को बढ़ावा देने के लिए ‘‘ग्लोबल एलांस फार वैक्सीन एण्ड इमूनाइजेशन (जीएवीआई)’’ द्वारा आर्थिक सहायता प्राप्त एक परियोजना है। इसको अभी कार्यान्वित किये जाने पर 2030 तक अनुमानित 54 लाख बच्चों के निधन को रोका जा सकता है।

हीमोफिलस इन्फ्लूंजी टाइप बी वैक्सीन खतरनाक निमोनिया के बचाव के लिये खोजी गई एक मिश्रित वैक्सीन है। यूनाइटेड स्टेट्स में 1980 से 1990 तक हिब वैक्सीन का नियमित इस्तेमाल किये जाने से, आक्रमक हिब बीमारी के मामलों की संख्या 40-100 प्रति 1,00,000 बच्चों से घटकर 1.3 प्रति 1,00,000 बच्चों तक हो गई। जीएवीआई द्वारा विकासशील देशों के लिए हिब टीके का कम दामों में दिये जाने का प्रस्ताव है। सीडीसी तथा डब्ल्यूएचओ द्वारा 6 सप्ताह की आयु से प्रारम्भ करते हुए, सभी शिशुओं का पोलिसचाराइड प्रोटीन कन्जूगेट द्वारा टीकाकरण करने की सिफारिश की गयी है।

डा. एस. के. सेहता, बाल रोग व नवजात रोग विशेषज्ञ उम्मीद करते हैं कि ‘‘यद्यपि ये टीके अभी काफी महंगे हैं, लेकिन भारत सरकार डब्ल्यूएचओ के साथ मिलकर हमारे जैसे विकासशील देशों में हिब वैक्सीन को उपलब्ध करवाने का प्रयास कर रही है। जो भी हो आम लोगों में इसकी उपलब्धता बहुत कम है। दूसरे टीके जैसे खसरा वैक्सीन, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिशों  का एक अंग है, भी काफी आवश्यक है क्योंकि खसरा, निमोनिया होने की सम्भावना को बढ़ाती है।"

इसी प्रकार, बाल रोग व स्त्री रोग विशेषज्ञ, डा. नीलम सिंह जो "वात्सल्य रिसोर्स सेंटर आन हेल्थ" की मुख्य कार्यकत्री भी हैं, का मत है, ‘‘तपेदिक (क्षय रोग) को रोकने के लिये प्रयोग में लायी जाने वाला बीसीजी टीका भी बहुत आवश्यक है। क्षय रोग के कारण बच्चों में बहुत से श्वसन सम्बंधी रोग और संक्रमण होते हैं। दूसरा टीका, डिपथीरिया और टिटनेस के लिये डीपीटी है, जिसमें प्रथम दो संक्रमण ऊपरी श्वसन नली से सम्बन्धित है। तीसरा नौ माह पर दिये जाने वाला, खसरा रोग का टीका भी आवश्यक है। यद्यपि यह टीका सीधे तौर पर निमोनिया को नही रोकता है किन्तु परोक्ष रूप से बचाव होता है। क्योंकि खसरा से पीडित बच्चा निमोनिया का संक्रमण पाने के नजदीक होता है। इसलिए पैदा होने से 12 वर्ष तक इस टीकाकरण कार्यक्रम का पालन करना चाहिये। हिब वैक्सीन का प्रयोग अभी हाल ही से प्रारम्भ किया गया है। यह हमारे देश में उपलब्ध है, परन्तु महंगी होने के कारण, शहर के लोग ही इसे ले सकते हैं और अपने बच्चों का टीकाकरण करवा सकते हैं।"

उक्त वर्णित टीके साधारण रोगों की तीव्र पकड़ द्वारा होने वाले घातक निमोनिया को रोकते हैं। हालांकि बच्चे का टीकाकरण निमोनिया से शत प्रतिशत बचाव नही करता है। अभिभावकों और देखभाल करने वालों को इस वास्तविकता को जानना आवश्यक है। टीकाकरण पूर्णरूपेण सफल नही होता है। अच्छे पोषण के साथ उचित स्वास्थ्य भी निमोनिया के बचाव कार्यक्रम का एक आवश्यक अंग है। इस संदर्भ में, बाल रोग एवं बाल हृदय रोग विशेषज्ञ  डा. एस.एन. रस्तोगी जिनका लखनऊ में अपना दवाखाना है, भी बताते हैं, ‘‘ स्ट्रैप्टोकोकस निमोनी या हीमोफिलस इन्फ्लूएन्जी अथवा माइकोप्लाज्मा जैसे अनेकों रोग कारकों द्वारा निमोनिया हो सकता है। अभिभावक सोचते हैं कि यदि उन्होंने एक बार बच्चे का टीकाकरण करवा दिया है तो वह कभी भी निमोनिया से प्रभावित नही होगा/होगी। परन्तु निमोनिया सेकेंडरी इन्फेक्शन द्वारा भी हो सकता है। ’’

लोगों में जागरूकता के अभाव तथा इन जीवन रक्षक टीकों के उच्च मूल्य के कारण, भारत में अनेकों बच्चे इसका लाभ नही उठा पाते हैं। अक्टूबर, 2011 के प्रथम सप्ताह में ‘छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के बाल रोग विभाग के आई.सी.यू. में अपने जीवन से लड़ने वाले, तीन वर्ष के बच्चे अथर्व से मिलकर मैने देखा कि वह उनमें से एक बच्चा है जो हिब वैक्सीन का लाभ नही उठा सका था। उसकी मां श्रीमती रेनू बाला शर्मा ने  बताया, "हमने सुना था कि निमोनिया बच्चों में होने वाली साधारण बीमारी है और बच्चे कभी-कभी इससे संक्रमित हो जाते हैं, लेकिन हमने यह कभी नही सोचा था कि यह इतनी गम्भीर होगी। हमने बच्चे का प्रत्येक रोग के प्रति टीकाकरण करवाया था। टीकाकरण सम्बन्धी कार्ड के  हिसाब से सारे टीके लगवाये। हमें यह नहीं मालूम था कि  इसमें निमोनिया का टीका नहीं था। यदि हमें ज्ञात होता इसका भी टीकाकरण करवा लेते। धन, बच्चे से अधिक मूल्यवान नही  है। इसके उपचार हेतु हमने लाखों रूपये व्यय कर दिये है। हम एक नर्सिंगहोम से दूसरे में भागते रहे, जब तक इस चिकित्सालय में नही पहुंचे। अब हमें इसके ठीक होने की कुछ उम्मीद है।’’

भारत और कुछ अन्य विकासशील देशों में अभी भी निमोनिया का टीका, सरकारी टीकाकरण कार्यक्रम का हिस्सा नही है। वास्तव में इन्हीं देशों में निमोनिया होने की सम्भावना भी सबसे अधिक है। भारतीय समाज की सुशिक्षित माताएं ही सुनिश्चित  करती है कि प्रत्येक घातक बीमारी के प्रति उनके बच्चे का टीकाकरण किया गया है। लखनऊ के प्राइवेट सिटी हास्पिटल में एक अक्टूबर को अपने दूसरे बच्चे को जन्म देने वाली, श्रीमती अल्पना सिंह कहती हैं कि ‘‘मैने सुना है कि निमोनिया सबसे खतरनाक बीमारियों में से एक है। मैं टीके का नाम नही बता सकती, लेकिन मेरे डाक्टर ने मुझे इसके बारे में बताया और मैने अपने पहले बच्चे को, जो अब तीन वर्ष का है, यह टीका लगवाया। किन्तु यह टीका सरकार द्वारा प्रस्तावित टीकाकरण की सूची में नहीं दर्शाया गया है।’’

टीकाकरण क्यों आवश्यक है, संस्तुत टीकाकरण कार्यक्रम तथा बच्चों को टीका कहाँ लगवाया जा सकता है, इस सम्बन्ध में अभिभावकों तथा देखरेख करने वालों को जागरूक करने के लिये विश्व स्वास्थ्य संगठन सक्रिय भूमिका निभाता है। निमोनिया के टीकों के विकास के लिए अन्वेषण व विकास के प्रयासों की अतिआवश्यकता है। अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के प्रयासों और वित्तीय सहायता से विकासशील देशों में यह टीके उचित मूल्यों पर अविलम्ब उपलब्ध करवाने चाहिये।

सौम्या अरोरा - सी.एन.एस.
(अनुवाद: सुश्री माया जोशी, लखनऊ)

निमोनिया से बचाव और धूम्रपानरहित वातावरण

प्रत्येक 20 सेकण्ड में निमोनिया के कारण कहीं न कहीं किसी बच्चे की मुत्यु होती है। पांच वर्ष से कम आयु के 20 प्रतिशत बच्चों की मृत्यु का कारण निमोनिया ही है। यह प्रतिवर्ष 1.3 मिलियन बच्चों का काल है। ज़िन्दगी की यह हानि अधिक दुखदायी इसलिए है क्योंकि इस मृत्यु को पर्याप्त साधनों द्वारा रोका जा सकता है।

विश्व  स्वास्थ्य संगठन द्वारा बच्चों में निमोनिया होने के कारणों को बढ़ावा देने वाले विभिन्न वातावरण सम्बन्धी तथ्यों को सूचिबद्ध किया गया है। ये कारण है:
(1) खाना बनाने तथा गर्म करने हेतु बायोमास ईंधन(ठोस ईंधन) जैसे लकड़ी या गोबर के कारण घर में होने वाला वायूमंडल का प्रदूषण, 
(2) भीड़भरे घरों में निवास करना तथा 
(3) माता-पिता द्वारा धूम्रपान किया जाना। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन भी यही सलाह देता है कि घर के अन्दर होने वाले वायुमंडल के प्रदूषण को उपलब्ध साफ स्टोव और भीड़भाड़ वाले घरों में अच्छे स्वास्थ्य विज्ञान को बढ़ावा देकर निमोनिया से बीमार होने वाले बच्चों की संख्या को कम किया जा सकता है।

निमोनिया कई प्रकार से फैलता है। साधारणतय: बच्चों की नाक या गले में पाये जाने वाले जीवाणु और विषाणु को सांस द्वारा लिये जाने पर फेफड़ों मे संक्रमण हो सकता है। खांसने या छींकने से दूषित हवा द्वारा भी यह फैल सकता है। अतः जीवाणु के फैलने को कम करने के लिए रहन सहन के वातावरण में सुधार, निमोनिया के नियंत्रण में एक अहम भूमिका निभाता है।

बच्चों में निमोनिया के नियंत्रण, बचाव और चिकित्सा (उपचार) हेतु, 2009 में विश्व स्वास्थ्य संगठन तथा यूनिसेफ द्वारा ‘‘ग्लोबल एक्शन प्लान फॉर दि प्रेवेंशन एण्ड कंट्रोल ऑफ निमोनिया’’ का आरम्भ किया गया।
विशेषत: स्तनपान और हाथों की स्वच्छता को बढ़ावा देकर तथा घरों के अन्दर वायु प्रदूषण कम करके बच्चों को निमोनिया से बचाया जा सकता है। नवीन तकनीकि जानकारियां घरों का प्रदूषण कम कर सकती हैं। परम्परागत खाना बनाने के लिये प्रयुक्त लकड़ी, कंडे और कोयले (जिनका प्रयोग अभी भी कुछ अविकसित/विकासशील  देशों में किया जाता है) के स्थान पर तरल ईंधन जैसे मिट्टी का तेल, प्राकृतिक गैस, एलपीजी इत्यादि का इस्तेमाल किया जा सकता है। तरल ईंधन के लिये प्रयुक्त होने वाले चूल्हों तथा ठोस ईंधन के उपयोग में प्रयुक्त होने वाले चूल्हों में सुधारोपरान्त प्रयोग करने पर जोखिम में कमी देखी गयी है।

दूसरों के द्वारा प्रयुक्त तम्बाकू के धुंए में सांस लेने की प्रक्रिया परोक्ष धूम्रपान होती है। इसे सेकण्ड हैण्ड स्मोक भी कहते हैं। निष्क्रीय धूम्रपान में सांस लेना बीमारी, अपंगता तथा मृत्यु का कारण है। यह श्वसन क्रिया को प्रभावित करता है और फेफड़ों की शक्ति को कम कर देता है। अमेरिका में, नवजात शिशुओं और 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों में निचली श्वसन नली के संक्रमण के अनुमानित 150,000-300,000 मामले परोक्ष धूम्रपान से प्रभावी हैं, जिसके परिणाम स्वरूप हर वर्ष अस्पतालों में 7,500-15,000 मरीज़ भर्ती किये जाते हैं।

डा. एस.एन. रस्तोगी, प्रख्यात बाल-हृदय रोग विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि ‘‘बच्चे के लिए घर में हुक्का, बीड़ी और सिगरेट का प्रयोग काफी नुकसानदायक होता है। यह परोक्ष धूम्रपान है क्योंकि इसमें बच्चा कमरे में विद्यमान निकोटीन में सांस लेता है जो निमोनिया का खतरा बढ़ा देता है। बच्चे के कक्ष में पिता/परिवार के अन्य सदस्यों को धूम्रपान नहीं करना चाहिये। नवजात शिशु को पृथक कमरे में रखना चाहिये तथा कम से कम संख्या में लोगों उसके पास जाना/स्पर्श करना चाहिये। लेकिन भारत में सामाजिक प्रथा के कारण इस आदत को बन्द करना काफी कठिन है। बच्चे के पैदा होने के प्रथम दिन से ही अनेकों लोग शिशु के साथ खेलते हैं। यह अच्छी आदत नहीं है। यह सामाजिक प्रथा जो कि अच्छे शिक्षित परिवारों में भी है, बन्द होनी चाहिये। कम से कम पहले छः माह तक बच्चे के पास केवल मां एवं उसकी देखरेख करने वाले को ही जाने देना चाहिये।’’

किसी बच्चे के चारों ओर का वातावरण और रहने वाला प्रदूषण बच्चे में अनेकों बीमारियों के होने की  सम्भावना का एक बड़ा कारण है। लखनऊ के बाल रोग विशेषज्ञ डा. एस. के. सेहता का कहना है कि ‘‘यदि घर में हवा और धूप के आने का उचित प्रबन्ध हो, और घर में रहने वालों की संख्या कम हो अर्थात अधिक भीड़भाड़ न हो, जिससे बच्चे के रहने के लिये पर्याप्त तथा पृथक स्थान रहे, तो बच्चे को संक्रमण के अवसर कम रहते हैं। लेकिन, यदि बच्चे के चारों ओर का वातावरण इस प्रकार का हो कि उसमें थोड़े स्थान में रहने वालों की संख्या अधिक हो तथा वातावरण खाना बनाने के ईंधन या तम्बाकू के धुंए से प्रदूषित हो, तो बच्चे में संक्रमण की सम्भावना अधिक हो जाती है। इस प्रकार के परिवारों में तीव्र दमा और क्षयरोग के होने की अधिक सम्भावना रहती है तथा ये रोग बच्चे को भी हो सकते हैं।’’

तम्बाकू के प्रयोग और इससे निमोनिया के बढ़ते मामलों के मध्य सम्बन्ध को मानते हुए बाल रोग एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डा. नीलम सिंह, जो ‘‘वात्सल्य रिसोर्स सेंटर ऑफ हेल्थ’’ की मुख्य कार्यकारी भी हैं, कहती हैं कि ‘‘घरों के अन्दर की दूषित हवा वास्तव में निमोनिया को बढ़ावा देती है। ग्रामीण क्षेत्रों में चूल्हे मे भोजन बनाने के कारण काफी धुआं होता है। तम्बाकू का धुआं भी बच्चों में निमोनिया और अन्य श्वसन सम्बन्धी रोगों का कारण है। तम्बाकू पीने वाले अभिभावकों के कारण घरों के अन्दर अधिक प्रदूषण होता है, और ऐसे दूषित वातावरण में रहने वाले बच्चों में रोगों का अधिक खतरा होता है। जहां तक सम्भव हो, बच्चों को स्वच्छ तथा प्रदूषण रहित वातावरण में रखना चाहिये।’’

डा. रस्तोगी भी मानते हैं कि शहरों में अधिकतर लोग गैस के चूल्हों का प्रयोग करते हैं जिससे तुलनात्मक रूप से वातावरण कम प्रदूषित होता है। लेकिन अभी भी गांवों में लोग भोजन बनाने के लिये लकड़ी और कोयले का इस्तेमाल करते हैं जिससे घरों में हवा अधिक दूषित हो जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में सफाई और स्वास्थ्य विज्ञान सम्बन्धी ज्ञान की कमी है। लेकिन शहरों में लोग कुछ अधिक जागरूक हैं जिससे वे सतर्क रहते हैं।

डा. एस. के. सेहता का मत है कि ‘‘सरकार घरों के प्रदूषण को कम करने के लिये खाना बनाने के लिये गैस के प्रयोग को बढ़ावा दे रही है। यह घरों के अन्दर की हवा को कम दूषित करेगा। तम्बाकू के प्रयोग के विरोध में पहले से ही नियम है, जो सार्वजनिक स्थलों पर जहां लोग एकत्र होते हैं। तम्बाकू पीने का निषेध करता है। अभिभावकों को यह समझना चाहिये कि जब वे घरों में धूम्रपान करते हैं तो उनके बच्चे परोक्ष रूप से धूम्रपान के सम्पर्क में आ जाते हैं। इसलिये यदि वे धूम्रपान बिल्कुल न करें तो सर्वोत्तम होगा, लकिन कम से कम उन्हें बच्चों के समक्ष धूम्रपान नहीं करना चाहिये।

इस सम्बन्ध में सभी चिकित्सकों का एक मत है कि धुआंरहित वातावरण और बच्चे के समक्ष धूम्रपान न करने से काफी हद तक हवा को स्वच्छ बनाया जा सकता है। अन्य किसी भी प्रकार के प्रदूषण से बचाव भी जरुरी है क्योंकि संक्रमण के लिये यही किसी न किसी प्रकार से जिम्मेदार है। अतः घरों के भीतर के वातावरण की स्वच्छता के लिये उपाय किये जाने चाहिये, क्योंकि इसी के द्वारा निमोनिया से बचाव और इसे रोका भी जा सकता है।

सौम्या अरोरा - सी.एन.एस.
(अनुवाद: सुश्री माया जोशी)

बच्चों का सुपोषण और निमोनया से बचाव

विशेषतः उन्नतशील देशों में कुपोषण तथा अल्प-पोषण एक बहुत बड़ी समस्या है। बच्चों में निमोनिया व अन्य बीमारियों के लिए, अपर्याप्त स्वच्छता के साथ साथ कुपोषण भी काफी जिम्मेदार है। पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु का प्रमुख कारण निमोनिया है, जिससे प्रतिवर्ष 15 लाख बच्चे मृत्यु को प्राप्त होते हैं। निमोनिया से मरने वाले 98 प्रतिशत बच्चे उन्नतशील देशों के होते हैं। स्वच्छ वातावरण में, बच्चों को  सही मात्रा तथा उचित समय में सही आहार देकर इनमें से अनुमानित दो तिहाई बच्चों की जान बचाई जा सकती है।

गरीबी के कारण अल्प पोषण तथा अत्याधिक पोषण के कारण बच्चों में मोटापे का होना, दोनो ही परिस्थितियां  कुपोषण के अन्तर्गत आती हैं। चिकित्सीय आधार से भोजन में प्रोटीन, ऊर्जा तथा  माइक्रो न्यूट्रिएन्ट, जैसे विटामिन आदि की कमी या अधिकता, कुपोषण ही होता है, और बच्चों में बारबार संक्रमण व अन्य बीमारियों को बढ़ाता है। कुपोषित बच्चों की कमज़ोर रोग प्रतिरोधक क्षमता के कारण, अनेकों संक्रमण हो सकते हैं जिसके कारण रोग होने व रोगों से मृत्यु की सम्भावना बढ़ जाती है। कुपोषण, जन्म के समय कम वजन का होना, खसरा, विटामिन ‘ए’ की कमी, क्षयरोग (टी.बी.) इत्यादि निमोनिया के होने को बढ़ावा देते हैं। तथा निमोनिया बच्चे में श्वसन सम्बन्धी रोगों जैसे अस्थमा (दमा) आदि के होने का एक बड़ा कारक होता है।
उचित पोषण बच्चे की प्रतिरक्षक क्षमता बढ़ाता है जिससे बच्चे में संक्रमण होने की सम्भावनाओं में कमी के साथ साथ बीमारी से लड़ने व उससे उबरने की क्षमता में वृद्धि होती है।

 प्रसूति एवं स्त्री रोग विषेषज्ञ डा. नीलम सिंह, जो ‘‘वात्सल्य रिसोर्स सेंटर ऑन हेल्थ’’ की मुख्य कार्यकत्री भी हैं, का कहना है, ‘‘शिशुओं के लिये अच्छा खानपान अति आवश्यक होता है क्योंकि इस अवधि में शरीर व मस्तिष्क के तेज विकास के कारण पोषक तत्वों की जरूरत काफी अधिक रहती है। इसलिये हमें यह जानना जरूरी है कि बढ़ते बच्चों के लिये ‘‘कौन सा और कितना’’ भोज्य पदार्थ आवश्यक है। क्योंकि अलग अलग उम्र के बच्चों के लिये पोषक तत्वों की भिन्न भिन्न मात्रा आवश्यक होती है। हमें यह भी याद रखना चाहिये कि अक्सर कुपोषित माताएं कम वजन के शिशुओं को जन्म देती हैं। इसलिये, माताओं का आहार गर्भावस्था से ही  अच्छा होना चाहिये, जिससे वे स्वस्थ बच्चों को जन्म दें सकें।

 लखनऊ के शिशु एवं बाल रोग विषेषज्ञ, डा. एस.के. सेहता का कथन है, ‘‘आजकल, महानगरों में बच्चे फास्ड फूड, रेडीमेड फूड तथा अधिक तैलीय व मसालेदार पदार्थों का सेवन कर रहे हैं। इस प्रकार का आहार उन्हें अधिक मोटा बनाता है। तथा भविष्य में डायबिटीज व हृदय रोगों की सम्भावना भी बढ़ाता है।’’

डा. नीलम सिंह के विचारानुसार, ‘‘हमारे देश में निमोनिया एवं अतिसार से होने वाली अधिकांश मृत्यु का कारण कुपोषण ही है। हमारे उत्तर प्रदेश में पांच वर्ष से कम आयु के लगभग 46 प्रतिशत बच्चे अल्प पोषण के शिकार हैं। हाल ही में किये गए एक सर्वे के अनुसार हमने कई नवजात शिशुओं को चाय तथा कोल्ड ड्रिंक तक पीते हुए देखा। शिशुओं को घुट्टी (ग्राइप वाटर) तक दी जाती है, और बच्चों को दिये जाने वाले बाहर के दूध को या तो मात्रा बढ़ाने के लिये अथवा यह सोचकर कि शिशु शुद्ध दूध को पचा नहीं सकेगा, अधिक पानी मिलाकर पतला किया जाता है। इसी प्रकार के कारणों से बच्चे को उच्च ऊर्जा का भोज्य पदार्थ नहीं मिल पाता है। कई बार, बच्चों की आवश्यकताओं को न देखकर अग्रजों (घर के बड़ों) की पसंद का भोजन बनाया जाता है।’’

शहर के प्रख्यात बाल रोग विषेषज्ञ डा. एस.एन. रस्तोगी ने कुपोषण के सम्बन्ध में टिप्पणी करते हुए बताया कि, ‘‘यह एक प्रचलित भ्रांति है बच्चों को शुद्ध मां का दूध नहीं देने चाहिये, बल्कि इसमें बराबर मात्रा में पानी मिलाना चाहिये, नही तो यह अतिसार का कारण हो जायेगा। अधिकांश बच्चों के अल्प पोषण का कारण दूध को तरल करना है। कम वज़न के शिशुओं को उच्च प्रोटीन वाले सप्लीमेंट दिये जाने चाहिये।’’

डा. नीलम सिंह स्पष्ट करती हैं कि, ‘‘अच्छे पोषण का तात्पर्य महंगे भोज्य पदार्थ नहीं हैं। अधिकतर अधिक मूल्य की वस्तुओं में ही आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध नही होते हैं बल्कि सस्ते व स्थानीय उपलब्धता वाले घर में बनाये भोजन में भी वही पोषक पदार्थ उपलब्ध हो सकते हैं। इस संदर्भ में, मैं एक उदाहरण का उल्लेख करना चाहूंगी कि यद्यपि आजकल टीवी पर ऐसे ब्रांड शिशु-भोजन का विज्ञापन दिखाया नही जाता है, फिर भी यह एक अति प्रचलित फूड सप्लीमेंट है। यहां तक कि घरों में काम करने वाली परिचारिका अपने धनी मालिकों की नकल करके अपने बच्चों को यही खिलाती हैं। यह सप्लीमेंट फ़ूड बच्चे को रवा/सूजी की खीर, दलिया और दाल जितना ही पोषण देता है। गांवों की अशिक्षित माताओं के बच्चों के अलावा शहरों की शिक्षित माताओं के शिशु भी कुपोषण के शिकार होते है।’’

साफ और स्वच्छ पानी का अभाव व स्वास्थ्य के अपर्याप्त साधन निमोनिया के होने के कारण हैं। रोगों को नियंत्रित करने में स्वच्छता के साधनो पर अधिक जोर देने के लिये हम ‘वर्ल्ड हैण्ड वाशिंग डे’ मनाते हैं। डा. एस.के. सेहता के अनुसार, ‘‘स्वच्छता संबन्धी विज्ञान की जानकारी किसी बीमारी, विशेषकर गैस्ट्रिक संक्रमण के होने के कारकों के लिए आवश्यक है। निमोनिया के संदर्भ में भी बच्चे को छूने से पूर्व हाथ धोने से बच्चे को संक्रमण का खतरा कम हो जाता है।’’

डा. नीलम सिंह इस बात पर जोर देती हैं कि, ‘‘बच्चे की देखरेख करने वाले को सफाई व स्वच्छता के विषय में जागरूक रहना चाहिये। बच्चे के मल/मूत्र को साफ करने के पश्चात्  हर बार हाथ साबुन व पानी से भली भांति धोना चाहिये। इसी प्रकार बच्चे को दूध देने के पूर्व व बाद में भी हाथों को साफ करना चाहिये। बच्चे को पीने के लिये साफ पानी और खाने के लिये ताजा व स्वच्छ भोजन ही देना चाहिये। भोजन ढँक कर रखना चाहिये व प्रदूषित होने से रोकना चाहिये। बच्चे के आस-पास के वातावरण को स्वच्छ व साफ रखना चाहिये, पानी को इकठ्ठा नहीं होने देना चाहिये, तथा बच्चे को प्रतिदिन नहला कर साफ कपड़े पहनाने चाहिए। संक्रमण से होने वाले रोगों, जैसे निमोनिया व अतिसार से बचाव के लिये ये सरल व साधारण स्वच्छता के उपाय हैं।

डा. एस.एन. रस्तोगी, शिशु को दूध पिलाने से पूर्व स्तनों को साफ करने पर जोर देते हैं। उनकी सलाह है कि बच्चे को यदि बोतल से दूध देना अति आवश्यक हो, तो कम से कम 4 बोतल व 4-5 निप्पल जरूर होने चाहिये। बोतलों और निप्पलों को प्रयोग मे लाने से पूर्व भली भांति उबालना चाहिये। बच्चे को साफ कपड़े पहनाने चाहिये। एक प्रचलन के अनुसार बच्चे को प्रथम माह तक पुराने कपड़े पहनाये जाते हैं। यह उचित नही है।

गरीबी उन्मूलन, कुपोषण की समस्या को दूर करने में अन्तर्राष्ट्रीय प्रयासों के अलावा लोगों को अच्छे पोषण की महत्ता के सम्बन्ध में भी जागरूक करना चाहिये। डा. नीलम सिंह की सलाह है, ‘‘अलग-अलग उम्र के बच्चों की अलग-अलग पोषक तत्वों की जरूरत के सम्बन्ध में आम लोगों के साथ वार्ता करनी चाहिये। व्यवसायिक आधार पर केवल राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय अधिवेषनों में ही इन वार्तालापों को नहीं करना चाहिये, अपितु हर जनता तक इस संवाद को प्रसारित करने की आवश्यकता हैं."


सौम्या अरोरा - सी.एन.एस.
(अनुवाद: सुश्री माया जोशी, लखनऊ)

माँ का दूध - नवजात शिशु का प्रथम टीका

माँ का दूध नवजात-शिशुओं एवं बच्चों के लिये एक आदर्श पौष्टिक आहार है। यह शिशु के लिये ग्रास के समान है एवं इसे शिशु को दिये जाना वाला प्रथम टीका (वैक्सीन) भी कहा जा सकता है। माँ के दूध में बच्चों को पोषित करने की अद्वितीय क्षमता होती है। इसके अतिरिक्त माँ के दूध में अनेकों रोग प्रतिकारक (इम्यून ग्लोबिन) पाये जाते है जो शिशुओं को बचपन की आम बीमारियों से, जिनमें निमोनिया एक बीमारी है, रक्षा प्रदान करते है। निमोनिया से विश्व भर में प्रतिदिन 4,300 से अधिक शिशुओं की मृत्यु होती है। माँ का दूध पूर्णतया से सुरक्षित, पचने में आसानी से उपलब्ध होता है।

 स्तन-पान शिशु के स्वास्थ्य एवं जीवन के लिये सबसे सस्ता एवं प्रभावकारी उपाय है। जन्म के प्रथम छ: महीनों तक शिशुओं को स्तन-पान से वंचित रखने के कारण विश्व में लाखों शिशुओं की प्रतिवर्ष मृत्यु होती है जो रोकी जा सकती है। स्तन-पान शिशुओं को तात्कालिक लाभ देने के अतिरिक्त उन्हें जीवन भर शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ रहने की क्षमता भी देता है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि विश्व स्वास्थय संगठन शिशु जन्म के प्रथम 6 महीनों तक केवल स्तन-पान को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित करता है।

प्रसूति व स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. नीलम सिंह, जो ‘वात्सल्य रिसोर्स सेन्टर फॉर हेल्थ' की मुख्य कार्यवाहक भी हैं, के अनुसार, "पूर्ण रूप से स्तन-पान का तात्पर्य है कि शिशु को मात्र केवल माँ का दूध ही देना चाहिये, माँ के दूध के अतिरिक्त कोई भी और चीज जैसे पानी, ग्राइप वाटर अथवा शहद आदि नहीं देना चाहिये। माँ के दूध में रोग प्रतिरोधक तत्व पाये जाते है जो शिशुओं को अनेक प्रकार की बीमारियों, विशेष कर निमोनिया व अतिसार की प्रतिरोधकता प्रदान करते हैं।"

इसके अतिरिक्त माँ का दूध, शिशुओं की मानसिक क्षमता का विकास करने में भी सहायता प्रदान करता है। यह पाया गया है कि स्तन-पान करने वाले बच्चों का बौद्धिक स्तर ऊपर का दूध पीने वाले बच्चों की अपेक्षा 10 गुना अधिक होता है। स्तन-पान करने वाले बच्चों में जीवन में आगे चलकर चर्म रोग, अस्थमा एवं ह्रदय सम्बन्धित रोग  भी कम होते हैं।

अपना एक निजी क्लीनिक चलाने वाले प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. एस.एन. रस्तोगी के अनुसार केवल माँ का दूध ही नवजात शिशुओं का सबसे उत्तम भोजन है।

डॉ. एस. के. सेहता, जो लखनऊ की एक प्रसिद्ध बाल एवं नवजात शिशु विशेषज्ञ है, के अनुसार स्तनपान माँ एवं बच्चे के बीच एक भावनात्मक संबंध स्थापित करता है जिससे माँ व बच्चे के संबंध और मजबूत हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त माँ के दूध में कुछ विशेष हारमोन्स पाये जाते हैं जो गाय या भैंस के दूध में नहीं होते है। ये हारमोन्स बच्चें में अनेक बीमारियों के प्रति प्रतिरोधकता प्रदान करते हैं, जिनमें से निमोनिया एक है।

चिकित्सकों द्वारा माँ के दूध की गुणवत्ता को प्रमाणित करने के बाद भी 40 प्रतिशत से कम नवजात शिशुओं को केवल माँ का दूध पिलाया जाता है। डॉ. नीलम सिंह की क्लीनिक में आने वाली माताओं में से केवल 15 प्रतिशत या 20 प्रतिशत मातायें ही इस नियम का पालन करती पायी गयी। इस विषय में माताओं को प्रोत्साहित करने की अत्यन्त आवश्यकता है क्योंकि स्तन-पान कराने के संबंध में उन्हें अनेक प्रकार के भ्रम हैं, जैसे स्तन के 'निपुल' में दर्द होना, या पर्याप्त मात्रा में बच्चें के लिये दूध का न होना, स्तन-पान संबंधी उचित जानकारी न होना या कुछ सामाजिक एवं सांस्कृतिक भ्रांतियां इत्यादि।

डॉ. नीलम सिंह के कथनानुसार नवजात शिशु की माँ को स्तन-पान प्रोत्साहित करने के लिये न केवल डॉक्टर वरन नर्स, परिचारिका तथा अन्य लोगों का भी सहयोग आवश्यक है। डॉक्टर को माँ को इस बात का विश्वास दिलाना चाहिये कि केवल स्तन-पान द्वारा ही नवजात शिशु को उचित आहार प्राप्त होता है। डॉक्टर को माँ को शिशु के जन्म के बाद ही स्तन-पान आरम्भ करने की सलाह देनी चाहिये। चिकित्सीय कर्मचारियों (पैरामेडिकल स्टाफ) का कर्तव्य है कि वे भी माँ को नवजात शिशु को केवल स्तन-पान करने के लिये प्रोत्साहित करें। परिवार के सदस्यों का भी कर्तव्य है कि वे माँ को स्तन-पान की महत्ता बतायें व माँ के खानपान व पोषण का भी ध्यान रखें।

कार्यरत माताओं के लिये उनके काम करने के स्थान का वातावरण, एवं कार्य करने की सुविधायें नवजात शिशुओं के अनुकूल होनी चाहिये। कार्यरत माताओं को अपने नवजात शिशुओं को स्तन-पान कराने की सुविधा मिलनी चाहिये - दफ्तर में उन्हें एक एकान्त स्थान मिलना चाहिये जहाँ वे स्तन-पान करा सकें।  कार्यरत महिलाओं को 6 महीनों का मातृ अवकाश मिलना चाहिये। संसार के अनेक राष्ट्रों ने इस प्रकार के ठोस कदम उठाये हैं किन्तु हमारे देश भारत में अभी इस विषय पर बहुत काम होना बाकी है।

डॉ. एस. एन. रस्तोगी का कहना है कि ‘‘कुछ महिलायें अपने शारीरिक सौंदर्य पर अत्यधिक ध्यान देती हैं। वे सोचती हैं कि स्तन-पान कराने से उनकी शारीरिक सुन्दरता कम हो जायेगी । परन्तु ऐसा सोचना बिल्कुल गलत है। इसके अतिरिक्त कुछ गर्भवती महिलायें स्वयं इतनी अल्प पोषित होती है कि उन्हें इस बात का डर बना रहता है कि वे अपने नवजात शिशुओं को उचित मात्रा में अपना दूध नहीं पिला पायेंगी।"

डॉ. एस. के. सेहता का कहना है कि ‘‘भारतवर्ष में अधिकतर गर्भवती महिलायें अल्प-पोषित है और उन्हें इस बात का डर बना रहता है कि वे उचित मात्रा में नवजात शिशुओं को अपना दूध नहीं दे पायेगी। अत: वे डिब्बे का व अन्य प्रकार का ऊपर का दूध शिशुओं को पिलाना आरम्भ कर देती है। माँ के दूध के अतिरिक्त अन्य सभी प्रकार के दूध नवजात शिशु के लिये अत्यन्त हानिकारक होते हैं। यदि नवजात शिशु को प्रथम 6 महीनों तक केवल और केवल स्तन-पान कराया जाये तो उसे अनेक प्रकार के संक्रामक रोगों के होने की संभावना कम हो जाती है। केवल लगभग 1 प्रतिशत उदाहरणों में  पाया गया है कि माँ का दूध उचित मात्रा में नहीं होता है, या गर्भवती महिला किसी गंभीर रोग से पीड़ित है। इन्हीं दशाओं में डाक्टर शिशु को केवल उसके उपयोग के लिये बनाया गया डिब्बे का दूध जो बाजार में उपलब्ध होता है व जिसे माँ-बाप खरीद सकते है, नवजात शिशु को पिलाने की सलाह देते हैं।
परन्तु डिब्बे के दूध व बोतल से दूध पिलाने में अनेक खराबियाँ है। बोतल से दूध पिलाने में स्वच्छता का अत्यधिक ध्यान रखना चाहिये, अन्यथा शिशु को अनेक प्रकार के संक्रमण होने की संभावना रहती है। इसके अतिरिक्त बोतल से दूध पिलाते समय मातायें बहुधा उसमें पानी मिला देती हैं। ऐसा दूध पीने वाला शिशु कुपोषित रहता है।

डॉ. नीलम सिंह का यह भी कहना है कि शिशु के लिये बनाया गया डिब्बें का दूध शिशु को पोषक तत्व तो दे सकता है परन्तु डिब्बे के  दूध में ‘इम्यून ग्लोबिन' नहीं पाये जाते हैं। साथ ही बोतल से दूध पिलाने में अत्यधिक स्वच्छता का ध्यान रखना आवश्यक है जो हमारे देश में संभव नहीं है। भारत एक उष्ण  कटिबन्ध देश है। यहाँ का उच्च तापमान अनेक प्रकार के संक्रामक रोगों को फैलाने में सहायक होता है। डिब्बे का दूध शिशुओं को बीमारियों से लड़ने की क्षमता नहीं प्रदान करता है।

स्तन पान के लाभों के प्रति घोर अज्ञानता के वातावरण में भी, श्रीमती अल्पना सिंह ऐसी कुछ माताओं के विचार उदाहरणीय हैं। श्रीमती अल्पना ने अपने दूसरे शिशु को शहर के प्राइवेट नर्सिग होम (सिटी अस्पताल) में आपरेशन द्वारा जन्म दिया। वे कहती है, ‘‘मैंने आपरेशन द्वारा जन्मे शिशु को जन्म के तुरंत बाद से ही स्तन-पान कराना प्रारम्भ कर दिया तथा 6 महीनों तक मैंने अपने शिशु को पानी या ऊपर का दूध नहीं दिया। मुझे 3 महीनों के मातृत्व अवकाश के बाद अपना कार्यभार संभालना पड़ा। मैं स्तन-पंप की सहायता से अपना दूध 3,4 घंटे तक के लिए संग्रहित कर लेती थी। इस प्रकार मैंने अपने शिशु को कम से कम एक वर्ष तक अपना दुग्ध ही पिलाया।"

स्तन-पान को प्रोत्साहित करने के लिये स्वास्थ्य संबंधी सुविधायें उपलब्ध होनी चाहिये-उदाहरण के लिये नवजात शिशुओं की माताओं को स्तन-पान के विषय के सलाहकार उपलब्ध होने चाहिये। स्तन-पान को अधिक से अधिक प्रोत्साहित करना चाहिये। माताओं एवं शिशुओं को इस प्रकार की सुविधायें उपलब्ध कराने के लिये 150 देशों में 20,000 से अधिक शिशु कल्याणकारी सुविधायें उपलब्ध हैं। इसके लिये हम विश्व स्वास्थ्य संगठन-यूनीसेफ (WHO-UNICEF)  के बहुत आभारी है. स्तनपान संबंधी अनेक प्रकार की अफवाहों एवं सामाजिक सांस्कृतिक अवधारणाओं को दूर करने के लिये जन स्वास्थ्य कल्याण के कार्यकर्ताओं की अत्यन्त आवश्यकता है। हमें केवल माताओं को नहीं अपितु उनके पारिवारिक सदस्यों को भी स्तन-पान के गुणवत्ताओं के प्रति जागरूक करने की आवश्यकता है। स्तन-पान को प्रोत्साहित करने के लिये सम्पूर्ण समाज के सहयोग की आवश्यकता है।


सौम्या अरोरा - सी.एन.एस.
(अनुवाद: श्रीमती विमला मिश्र, लखनऊ)

केवल स्तन-पान है नवजात शिशु का सर्वोत्तम आहार: ऊपर का दूध नहीं

बाल्यावस्था में  होने वाली निमोनिया बीमारी को रोकने में माँ के दूध का बहुत महत्वपूर्ण योगदान है। विश्व भर में प्रति 20 सेकेंड में 1 बच्चे की मृत्यु निमोनिया से हो रही है। प्रतिवर्ष 1.6 करोड़ बच्चों की मृत्यु निमोनिया रोग से होती है। मृत्यु का यह आंकड़ा विश्व भर में होने वाली शिशुओं की मृत्यु का लगभग 20 प्रतिशत है। इनमें से लगभग 98 प्रतिशत बच्चे जिनकी मृत्यु निमोनिया से होती है विकासशील देशों के हैं। भारत वर्ष में प्रति वर्ष 40,000 से अधिक 5 वर्ष की आयु से कम के बच्चों की मृत्यु निमोनिया रोग से पीड़ित होकर होती है। केवल स्तन-पान ही बच्चों को अनेक प्रकार के रोगों, विशेषकर निमोनिया, से लड़ने की क्षमता प्रदान करता है। माँ का दूध ही शिशु को अनेक पोषक तत्व देता है साथ ही इम्यूनोग्लोबिन, प्रतिरोधक तत्व भी प्रदान करता है। इन तत्वों से शिशुओं को "वसननली" संबंधित रोगों से लड़ने की क्षमता मिलती है। तथा इनके द्वारा बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

स्तन-पान न करने वाले बच्चे स्तन-पान करने वाले बच्चों की अपेक्षा पाँच गुना अधिक संख्या में निमोनिया रोग से पीड़ित होकर मृत्यु को प्राप्त करते हैं. हमें याद रखना चाहिये कि निमोनिया फेफड़ों के संक्रमित होने पर होता है। निमोनिया होने पर फेफड़ों में मवाद व द्रव भर जाता है जिसके कारण फेफड़ों में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है एवं श्वास लेने में कष्ट होता है। इस सबका मूल कारण जीवाणु संबंधित संक्रमण होता है, यद्यपि विषाणु एवं फन्गस भी निमोनिया रोग के कारण हो सकते है। यह रोग बच्चों की विकसित होती हुई रोग प्रतिरोधक क्षमता के चलते कुपोषण के कारण, प्रदूषित वातावरण के कारण, एच. आई. वी. से संक्रमित होने के कारण, तपेदिक के कारण, इन्फ्लुयनजा एवं खसरा रोग के कारण एवं जन्म के समय दुर्बलता के कारण से होता है।

वर्तमान समय में संसार में केवल 38 प्रतिशत बच्चे ही स्तन-पान करते हैं. स्तन-पान कराने में अनेक बाधायें हैं जैसे माता के पास समय की कमी, सामाजिक व सांस्कृतिक रूढ़िवादितायें, जल्दी जल्दी प्रसव होना, ऊपर का डिब्बे का दूध आसानी से उपलब्ध होना तथा स्तन-पान संबंधी ज्ञान की कमी होना। नेल्सन अस्पताल के बाल-रोग विशेषज्ञ डॉ. दिनेश पांडे का कहना है कि "आजकल की माताओ में 'काकटेल फीडिंग' अर्थात बच्चे को  बोतल का दूध पिलाना बहुत प्रचलित हैं, विशेषकर कार्यरत महिलाओं में। अत: उनके बच्चे ऊपर का दूध अथवा डिब्बे का दूध पीते हैं।"

नेलसन अस्पताल लखनऊ के निदेशक डॉ. अजय मिश्रा ने पिछले 6 महीनों में गंभीर निमोनिया से पीड़ित 30 शिशुओं का इलाज किया है। जब मैं सितम्बर 2011 में उनके अस्पताल गई तो पाया कि 10 दिन से कम उम्र के अनेक नवजात शिशुओं को निमोनिया से उपचार के लिये भर्ती किया गया था। उन नवजात शिशुओं के अतिरिक्त कुछ बड़ी आयु के शिशु भी निमोनिया के उपचार के लिये भर्ती थे।

डॉ. अमिता पाण्डे (जो छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय में प्रसूति एवं स्त्री-रोग विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं) भी इस बात की पुष्टि करती हैं कि उनके अस्पताल में बाल निमोनिया से पीड़ित बड़ी संख्या में बच्चों का उपचार होता है। उनका कहना है कि "हम स्त्री-रोग विशेषज्ञों को मात्र 48 घंटे या 7 दिन के जन्मे एवं नियोनेटल निमोनिया से पीड़ित नवजात शिशुओं का उपचार करना पड़ता हैं। बाल्यवस्था में निमोनिया से पीड़ित बच्चें में 50 प्रतिशत की मृत्यु ‘नियोनेटल निमोनिया’ से पीड़ित नवजात शिशुओं की होती है। सर्वेक्षण करने पर पाया गया है कि मृत जन्मे शिशुओं में 30 प्रतिशत से 60 प्रतिशत तक एवं जन्म के 1 या 2 दिन बाद मर जाने वाले शिशुओं में 50 प्रतिशत से 60 प्रतिशत तक ‘बाल निमोनिया’ से पीड़ित थे। यह उन शिशुओं की 'अटोप्सी'  (मृत्युप्रान्त चीर-फाड़) द्वारा मालूम पड़ा।"

स्तन-पान से लाभों की महत्व को बताते हुये डॉ. अमिता पाण्डे ने बताया कि, "मैं एक सरकारी अस्पताल में कार्यरत हूँ। यहाँ हम लोग केवल माँ के दुग्ध को ही नवजात शिशुओं का पूर्ण आहार मानते है और इसी बात का प्रचार करते हैं कि प्रथम 6 महीनों तक नवजात शिशुओं को केवल माँ का ही दूध ही दिया जाना चाहिये। इसके अतिरिक्त उन्हें शक्कर, ग्राइप वाटर, शहद, नारियल पानी इत्यादि कुछ भी नहीं देना चाहिये । हम डॉक्टर प्रसव कराने के 10 मिनिट बाद ही नवजात शिशु को स्तन-पान कराते हैं। हम शिशु को उसकी ‘नार’ समेत मां के पेट पर लिटा देते है। शिशु के इतनी जल्दी स्तन-पान करने से मां के पेट से प्लेसेंटा एवं झिल्ली बाहर निकल आने में भी सहायता मिलती है।"

डॉ. अजय मिश्रा का मानना है कि, "यद्यपि मातायें नवजात शिशुओं को केवल स्तन-पान कराने के लाभों को भली-भांति समझती है, किन्तु वे अपनी शारीरिक सुंदरता को इतना अधिक महत्त्व देती हैं कि वे स्तन-पान कराने में संकोच करती हैं। गाँवों में मातायें बार-बार गर्भवती होने के कारण शिशुओं को गाय का दूध पिलाती हैं।"

डॉ. अमिता पाण्डे के अनुसार "आर्थिक रूप से समर्थ उच्चवर्गीय समाज की माताओं की अपेक्षा गरीब मातायें स्तन-पान को अधिक प्राथमिकता देती है। आर्थिक रूप से सम्पन्न परिवार की लड़कियों को स्तन-पान उचित अवधि तक कराने में अनेक समस्यायें दिखायी पड़ती हैं। अनेक कार्यरत माताओं को प्रसव के कुछ ही सप्ताह बाद अपने नवजात शिशुओं को घर पर कई घंटों तक छोड़ कर काम पर जाना पड़ता है। अत: वे या तो बहुत ही शीघ्र अपने शिशु को स्तन-पान कराना बंद कर देती हैं,  या शिशु को कम से कम एक बार ऊपर का दूध पिलाना आरम्भ कर देती हैं। उनका मानना है कि यदि शिशु को आरम्भ से ही ऊपर का दूध पीने की आदत नहीं डाली जायेगी तो वह बाद में ऊपर का दूध नहीं पीना चाहेगा- ऐसी दशा में माताओं को बड़ी समस्या हो जायेगी।"

प्रथम बार बनी माताओं का मानना है कि उनके स्तनों में प्रसव के कुछ दिनों बाद तक पर्याप्त मात्रा में दूध नहीं उतरता है। अत: उन्हें शिशुओं को ऊपर का दूध देना पड़ता है। परन्तु डॉ. अमिता पाण्डे इस बात को दृढ़ विश्वास से कहती है कि माता के स्तन से, प्रसव के बाद से कुछ दिनों तक जो भी द्रव पदार्थ (क्लोरोस्ट्रम) निकलते हैं वे नवजात शिशु के पोषण के लिये पर्याप्त होते हैं। गर्भ की पूर्ण अवधि पर जन्म लेने वाले शिशु में पर्याप्त मात्रा में 'ग्लाइकोजेन' पाया जाता है जो उसके लिये प्रारम्भ के 2 दिनों तक पर्याप्त आहार का काम करता है। इसके अतिरिक्त यदि शिशु को जन्म लेने कुछ समय के बाद माँ के स्तन पर लगा दिया जांता है तो माँ के स्तन से द्रव व दूध अपने आप निकलने लगता है। यह एक प्रकार की चक्रीय  प्रक्रिया होती है - यदि शिशु को माँ के स्तन पर लगा दिया जाता है तो चक्रिय क्रिया से हारमोन्स निकलने लगते है व माँ के स्तन में दूध की मात्रा स्वयं बढ़ने लगती है। शिशु जितना अधिक  माँ का स्तन-पान करता है उतना ही अधिक दूध माँ के  स्तन में आता रहता है।

श्रीमती अनुराधा, जिन्होंने ने हाल ही में एक शिशु को आपरेशन द्वारा एक निजी नसिंग होम में जन्म दिया है, बताया कि प्रसव के बाद उनके स्तनों से दूध नहीं निकला। अत: डॉक्टर ने उन्हें अपने नवजात शिशु को ऊपर का दूध 2 दिनों के लिये स्वच्छ कप व चम्मच से पिलाने की आज्ञा दी। बाद में उन्होंने अपने शिशु को स्तन-पान कराना प्रारम्भ कर दिया। इसी प्रकार एक और युवती माँ, श्रीमती बीना ने बताया कि उन्होंने अपनी नवजन्मी पुत्री को जन्म देने के बाद स्तन पान के साथ पानी भी पिलाया क्योंकि उसे अतिसार रोग के लिये दवा खिलाने के लिए पानी पिलाना ज़रूरी था। वे शिशु को दूध के साथ पानी पिलाने के कारण होने वाले दुष्परिणामों से अनभिज्ञ थी।

अत: युवती लड़कियों को नवजात शिशु को केवल स्तन-पान कराने की आवश्यकता को समझने के लिये व जागरूक बनाने के लिये सामजिक एवं अस्पताल स्तर पर अधिक से अधिक इस विषय पर कार्यक्रम होने की नितांत आवश्यकता है। डॉक्टरों को उन्हें नवजात शिशुओं को स्तनपान कराने के लाभों से अवगत कराना चाहिये। विश्व स्वास्थ्य संगठन इस बात की पुष्टि करता है कि 6 महीने की उम्र तक शिशु का पूर्ण आहार केवल, और केवल, स्तनपान ही है, तथा 2 वर्ष की आयु तक माँ के दूध के साथ साथ अन्य सहायक पौष्टिक आहार भी बच्चे को देना चाहिये। गर्भवती माताओं को याद रखना चाहिये कि उनका दूध ही बच्चों के लिये निमोनिया व अन्य बीमारियों से लड़ने के लिये सबसे सशस्त्र हथियार के समान होता हैं। उन्हें समाज में स्तनपान से संबंधित फैले हुये भ्रामक प्रचारों के विपरीत इस बात को समझना चाहिये कि प्रथम 6 महीनों तक नवजात शिशुओं को केवल माँ के दूध की ही आवश्यकता होती है। प्रथम 6 महीनों तक माँ का दूध ही उनका पौष्टिक आहार होता है।


शोभा शुक्ला - सी.एन.एस.
(अनुवाद: श्रीमती विमला मिश्र)

स्तनपान से निमोनिया से बचाव मुमकिन

5 वर्ष की आयु से कम बच्चों के लिये विश्व भर में निमोनिया नामक रोग प्राण घातक हो सकता  है। प्रतिवर्ष लगभग 1.6 लाख बच्चों की मृत्यु इस रोग से होती है। यह आंकड़ा विश्वभर में होने वाली शिशु-मृत्यु का लगभग १/५  भाग है। अन्य घातक श्वास संबंधी संक्रमण के समान निमोनिया संसार के उन बच्चों को, जो गरीब व कुपोषित, अल्पपोषित है, अपना घातक शिकार बनाता है। विकसित देशों की अपेक्षा विकासशील देशों के बच्चे 10 गुना अधिक संख्या में इस रोग के शिकार होते हैं। गरीब देशों में निमोनिया रोग 100,000 बच्चों में से 7,320 बच्चों के लिये प्राण लेवा पाया गया है। दक्षिणी एशिया एवं सब-सहारा अफ्रीका क्षेत्र में 21 प्रतिशत बच्चों की मृत्यु निमोनिया से होती है। 'घातक श्वसन संबंधी संक्रमण 2010 एटलस' के अनुसार पोषक तत्वों की कमी के कारण विश्व भर में 44 प्रतिशत बाल - मृत्यु निमोनिया से होती है।

भारत में बाल्यावस्था निमोनिया का रोग बहुत अधिक संख्या में पाया जाता है। शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता के लिये एक बार बीमारी होने पर उसके दुष्प्रभाव को कम करने के लिये उचित पौष्टिक आहार बच्चों के लिये अति आवश्यक है। सभी डॉक्टर इस बात से सहमत हैं कि कुपोषण बच्चों की रोगों से लड़ने की क्षमताओं को कम करता है, जिसके कारण बच्चे अनेक रोगों, जिनमें से निमोनिया भी एक है, के शिकार बन जाते हैं।

यद्यपि अल्पपोषण का एक कारण निर्धनता भी है, परन्तु प्राय:  सस्ता परन्तु पोषक भोज्य पदार्थों के विषय की अनभिज्ञता ही गरीब परिवारों को अपने बच्चों को उचित आहार मिलने से वंचित रखता है। यह बात विशेषकर सत्य है कि शहरों में रहने वाले परिवारों के बच्चों का दैनिक भोजन 'प्रोसेस्ड' एवं 'फास्ट फूड' ही होता जाता है। शहर की झोपड़पट्टी में रहने वाले लोग भी साधारण एवं  पौष्टिक खाना जैसे की दाल-रोटी के बजाय चिकनाई एवं चर्बीयुक्त खाना अधिक पसंद करते हैं।

लखनऊ के प्रसिद्ध अस्पताल संजय गाँधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान के गैस्ट्रोएन्टरालजी विभाग के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. गौड़दास चौधरी भी इस बात से सहमत हैं कि अल्पपोषित बच्चे आसानी से निमोनिया रोग से पीड़ित हो जाते हैं। डॉ. चौधरी बच्चों के स्वास्थ्य के बहुत बड़े समर्थक हैं। उनका कहना है कि, "निमोनिया जैसी अनेक बीमारियों का एक महत्वपूर्ण कारण है अव्यवस्थित जीवन शैली। गरीब परिवारों के भूक से पीड़ित बच्चे एवं धनी परिवारों के स्थूल काय बच्चें--दोनों ही कुपोषित होते है। अत: उनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। अत: इस बात को सुनिश्चित करना अति आवश्यक है कि बच्चों का शरीर भार आदर्श  भार होना चाहिये, तथा उन्हें खेलों में पर्याप्त रूचि रखनी चाहिये। उन्हें शारीरिक व्यायाम पर्याप्त मात्रा में करना चाहियें ताकि उनके फेफड़े, और सम्पूर्ण शरीर स्वस्थ रहें। जिससे वे निमोनिया तथा अन्य श्वास संबंधी रोगों से न पीड़ित हों।’’

नेलसन अस्पताल के बाल-रोग विशेषज्ञ डॉ. दिनेश पांडे ने बताया कि कुछ वर्षों पहले गरीब परिवारों की अपेक्षा सम्पन्न परिवारों के बच्चों को निमोनिया रोग कम होता था। परन्तु प्रोटीन तत्व संबंधी कुपोषित आहार,  अत्यधिक भीड़-भाड़, घर के भीतर व बाहर का दूषित वातावरण एवं जीवन शैली में अनेकों परिवर्तन के कारण समाज के उच्च वर्गीय परिवारों में भी इस रोग का प्रभाव देखा जाता है, तथा निमोनिया एवं अतिसार रोगों से पीड़ित बच्चों की संख्या बढ़ रही है। उन्होंने दु:ख प्रकट करते हुये कहा कि फास्ट-फूड (जो कदापि पौष्टिक नहीं होता है) की बढ़ती हुई लोकप्रियता के कारण, बच्चें कुपोषित रहते हैं तथा उनकी रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता भी कम हो जाती है। अत: निमोनिया रोग केवल निर्धन परिवारों तक ही सीमित नहीं रह गया है। यद्यपि विकासशील देशों, जैसे भारत, में निमोनिया का रोग अल्प आय वाले परिवारों में अधिक पाया जाता है।

डॉ. दिनेश पांडे के विचार से "अच्छा पौष्टिक आहार मंहगा नहीं होता है। कुछ गाँवों में बच्चों को अच्छा पौष्टिक भोजन जैसे नदी से निकाली गयी ताजी मछली एवं शुद्ध गाय या भैंस का दूध आसानी से प्राप्त हो जाता है। गाँवों के बच्चों को हरी सब्जियाँ एवं दाल सस्ते व आसानी से मिल जाते हैं। शहरों में रहने वाले परिवार आहार पर बहुत अधिक धन व्यय करते हैं किन्तु वे आहार की पौष्टिकता को अधिक महत्व नहीं देते हैं। मैं इस बात को अधिक महत्व देता हूँ कि आहार की पौष्टिकता, मात्रा एवं गुण के अनुसार संतुलित होनी चाहिये। आहार बच्चों की आवश्यकता अनुसार होना चाहिये। व्यवसायिक आधार पर प्राप्त भोज्य पदार्थ जैसे ‘फास्ट फूड’ जिनका लुभावने विज्ञापनों के ज़रिये से अत्याधिक प्रचार किया जाता है, नहीं खाने चाहिये।  घर का सादा बना हुआ आहार ही बच्चों के लिये लाभदायक होता है।"

नेलसन अस्पताल के निदेशक डॉ. अजय मिश्रा इस बात पर विशेष जोर देते हैं कि सर्वसाधारण जनता को इस बात के लिये शिक्षित करना आवश्यक है कि अच्छा आहार निमोनिया एवं अन्य बीमारियों से बच्चों की रक्षा करता है। उनके विचार से, "माँ-बाप को अपने बच्चों की कैलोरी की आवश्यकताएँ जाननी चाहिये। उन्हें अपने बच्चों के लिये एक संतुलित भोजन सुरक्षित करना चाहिये जिसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, लौह व कैल्शियम उचित मात्रा में पाये जाते हैं। मैं रेशेदार भोज्य पदार्थ को-- जैसे हरी सब्जियाँ, दालें, साधारण रोटी या चपाती जो सस्ती व स्वास्थ्य के लिये गुणकारी है -- बच्चों को दिये जाने का आग्रह करूंगा। माँ-बाप को चाहिये कि वे अपने बच्चों को ‘फास्ट-फूड’ जैसे पीजा, बर्गरस, पेस्ट्रीज और कोल्ड-ड्रिंक्स लेने के लिये उत्साहित न करें क्योंकि ये सब पदार्थ बहुत हानिकारक होते हैं तथा कभी कभी ही लिये जाने चाहिये। मैं फलों को अधिक महत्व दूँगा, उनके रसों को नहीं, क्योंकि फलों  में रेशों के साथ-साथ खनिज तत्व भी पाये जाते हैं।"

गर्भाशय जीवन की प्रारम्भिक अवस्था से, वाल्यवस्था तक दिए गए अपर्याप्त पौष्टिक आहार, शिशुओं की सदा के लिये अपर्याप्त रोग निरोधक क्षमता एवं भयानक श्वसन संबंधी संक्रमण जैसे निमोनिया से संबंधित है। माता से प्राय: पाये जाने वाले पौष्टिक आहार की अनुचित मात्रा बाद में बच्चों की निमोनिया का एक बड़ा कारण होता हैं, क्योंकि यह जन्म के समय शिशु के अल्प भार के कारण होता है। स्तनपान की गुणवत्ता को कम समझने के कारण शिशु में कुपोषण एवं विटामिन की कमी की आशंका बढ़ जाती है।

डॉ. अमिता पाण्डे, जो छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के प्रसूति एवं स्त्री-रोग विभाग में  सहायक प्रोफेसर हैं, कहती है कि, "यद्यपि निमोनिया रोग धनी एवं गरीब सभी बच्चों को होता है पर अध्ययन  करने से पता चला है कि कुपोषित बच्चों को निमोनिया अधिक होता है। जो संक्रमण पौष्टिक आहार पाने वाले  बच्चों में केवल श्वसननली के ऊपरी भाग को संक्रमित करके समाप्त हो जाता है, वही संक्रमण कुपोषित बच्चों में अत्यन्त दुर्बलता प्रदान करने वाले निमोनिया रोग का कारण बन जाता है। मैं यह भी कहना चाहूँगी कि सम्पन्न परिवारों के बच्चे, जिन्हें पर्याप्त मात्रा में भोजन मिलता है, भी कुपोषित होते हैं। इसके कई कारण हैं-उन्हें स्तनपान नहीं कराया गया होता है, उन्हें ऊपर का दूध दिया जाता है जिसमें पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन नहीं पाये जाते है, या ऊपर के दूध में पानी मिलाकर पिलाया जाता है। माताओं में यह गलत धारणा होती है कि पानी मिला दूध आसानी से पच जाता है। जैसे जैसे बच्चा बढ़ता है उसे दूध के अतिरिक्त और भी भोज्य पदार्थ जैसे चाकलेट फ्राईज, वरगर, पीजा, इत्यादि दिये जाने लगते है, जो उचित नहीं है । जब बच्चा बड़ा होने लगता है तो उसे माँ के दूध के साथ साथ प्रोटीन युक्त आहार जिसमें फल आदि सम्मिलित हैं, उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता  बढ़ाने के लिये दिए जाने चाहिए।"

उचित स्वास्थ्य एवं पौष्टिक आहार निमोनिया रोग को कम करने में सहायक होते हैं। 'अक्यूट रिसपेरेटरी इन्फेक्शन एटलस २०१०' के अनुसार इस रोग की सही रोकथाम के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय सम्मिलित रूप से प्रतिबद्ध हैं। निमोनिया तथा अन्य बीमारियों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिये विश्व स्वास्थ्य संगठन 6 महीनों तक शिशु को केवल स्तनपान कराने को महत्व देता है, तथा 2 वर्ष तक स्तनपान एवं अन्य पौष्टिक आहार देने पर जोर देता है। इसके बाद बच्चे को अन्य पौष्टिक एवं स्वस्थ आहार देना चाहिये। गत कुछ वर्षों में भोज्य पदार्थों की बढ़ती हुयी कीमतों के कारण कुपोषणता की आशंकाए और बढ़ गयी हैं। हालाँकि हमारी सरकारें कुपोषण को सामुदायिक स्तर पर रोकने के लिये वचनबद्ध हैं, फिर भी इस लेख को लिखते समय ‘भोज्य पदार्थों’ की कीमतों में 9.13 प्रतिशत वृद्धि हुयी है।


शोभा शुक्ला - सी.एन.एस.
(अनुवाद: श्रीमती विमला मिश्र, लखनऊ)

बच्चों में निमोनिया के खतरे को बढ़ाता है घर के भीतर का प्रदूषण

बच्चों में निमोनिया के खतरे को बढ़ाने में घर के भीतर का प्रदूषण जैसे धूम्रपान,घर में लकड़ी जलाकर या गाय के गोबर को गरम करके खाना पकाना आदि अहम भूमिका निभाते है. एक अध्ययन के अनुसार प्रतिवर्ष ८७१५०० बच्चे घर के अन्दर के प्रदूषण से होने वाले निमोनिया के कारण मरते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार “वातावरण सम्बन्धी प्रदूषण, जैसे कि लकड़ी व गोबर के कंडे पर खाना पकाना, अथवा अन्य जैविक ईंधन का प्रयोग करना, घर में धूम्रपान करना और भीड़ भरे स्थान पर रहना भी बच्चों में निमोनिया के खतरे को बढ़ाता है”. अतः बच्चों को साफ़-सुथरे और अच्छे वातावरण में रखना चाहिए ताकि उनमें निमोनिया तथा अन्य बीमारियाँ होने का जोखिम कम से कम हो.

बहराइच जिला अस्पताल के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ.  के. के. वर्मा के अनुसार "घर के भीतर का प्रदूषण, जैसे बीड़ी पीना, चूल्हे पर खाना पकाना आदि, बाल निमोनिया के खतरे को बढ़ा देता है. ग्रामीण क्षेत्र में संक्रमण फैलने  के और भी बहुत से कारण हैं, जैसे गाँव में मलखाना घर के अन्दर ही कच्ची दीवारों का बना होता है जिसके कारण संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाता है. अतः मलखाना घर के बाहर बनना चाहिए और पक्की दीवारों का बनना चाहिए. भारत सरकार द्वारा मलखाना बनाने का जो कार्यक्रम चलाया गया है उसे लोगों को अपनाना चाहिए. ग्रामीण घरों के बच्चे प्रायः जमीन पर बैठकर खाना खाते हैं. ऐसा नहीं करना चाहिए. घर की लिपाई-पुताई होनी चाहिए. घर पक्के ईंट का बना  होना चाहिए. जो शहरी  क्षेत्र के लोग हैं उनमें संक्रमण फैलने का खतरा कम होता है क्योंकि उन्हें शुद्ध पानी मिलता है जबकि ग्रामीण क्षेत्र में शुद्ध पानी उपलब्ध नहीं होता जिसके कारण उनमें संक्रमण फैलने का खतरा और भी ज्यादा बढ़ जाता है".

लखनऊ में अपना निजी क्लीनिक चलाने वाली बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. कुमुद अनूप प्रदूषण के लिए धूम्रपान को दोषी मानती हैं. उनका कहना है कि "शहरी परिपेक्ष में धूम्रपान घर के भीतर के प्रदूषण का एक बड़ा कारण है. बच्चे जो परोक्ष रूप से धूम्रपान के शिकार हो जाते हैं वह उनके लिए बहुत ही हानिकारक होता है और उनमें निमोनिया होने का खतरा बढ़ जाता है. धूम्रपान न केवल निमोनिया बल्कि अस्थमा तथा अन्य कई प्रकार के संक्रमणों को दावत देता है. अतः बच्चों को परोक्ष धूम्रपान के कुप्रभावों से बचाने के लिए घर के भीतर धूम्रपान वर्चित होना चाहिए. तभी हम बच्चों में निमोनिया तथा अन्य स्वास्थ सम्बन्धी बीमारियों के खतरे को कम कर पायेंगे". 

डॉक्टर में भी घर के भीतर होने वाले प्रदूषण से जन्मे संक्रमण के बारे में जानकारी का अभाव है. जिसका अन्दाजा हम इस बात से ही लगा सकते हैं कि बहराइच जिला अस्पताल के स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. पी. के मिश्र घर के भीतर के प्रदूषण को निमोनिया का कारण नहीं मानते हैं. उनके अनुसार "धूम्रपान, तम्बाकू के प्रयोग से या फिर घर में खाना पकाने के लिए अंगीठी के उपयोग से सीधे तौर पर निमोनिया के होने का खतरा नहीं होता है. पर बच्चे को धुएं में रखने से घुटन हो सकती है पर इससे सीधे तौर पर कोई बीमारी होने का खतरा नहीं होता है".

धूम्रपान से निमोनिया के होने का खतरा बढ़ जाता है. जिसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि बहराइच जिला अस्पताल में दिखाने आयी निमोनिया से पीड़ित ढाई साल के एक बच्चे की माता ने बताया कि उसके घर में कई लोग धूम्रपान और तम्बाकू का सेवन करते हैं और घर में खाना भी चूल्हे पर पकाया जाता है. एक और माता, जिसका तीन दिनों का बच्चा जो निमोनिया से पीड़ित था, ने बताया कि उसके घर में भी चूल्हे पर खाना पकाया जाता है और बच्चे के पिता बीड़ी, सिगरेट और गुटके का सेवन करते हैं .

बेहतर स्वास्थ्य देखभाल, उचित पोषण और पर्यावरण में सुधार स्वतंत्र कारक हैं जो बाल निमोनिया के घटनाओं को कम कर सकते हैं. अतः  समाज में लोगों के जीवन स्तर में परिवर्तन लाने के लिए इन कारकों की भूमिका प्रमुख है. सरकार को भी इन कारकों को ध्यान में रख कर ही स्वास्थ्य कार्यक्रमों को क्रियान्वित करना चाहिए. जब लोगों का जीवन स्तर बेहतर होगा तथा लोग अच्छे जीवन स्तर की विधि अपनायेंगें तभी निमोनिया तथा अन्य संक्रमणों से बचाव सम्भव हो पायेगा.

राहुल कुमार द्विवेदी - सी.एन.एस.
(लेखक सी.एन.एस. www.citizen-news.org ऑनलाइन पोर्टल के लिये लिखते हैं)

अच्छा पोषण बच्चों को निमोनिया से बचाता है

बच्चे जो कुपोषित या अल्पपोषित और जन्म से शुरूआती छः माह तक सिर्फ माँ का दूध नहीं पीते हैं, उनमें रोगप्रतिरोधक क्षमता कम होती है जिससे कारण उनमें निमोनिया के होने का खतरा बढ़ जाता है. अतः बच्चों को निमोनिया से बचाने में उचित पोषण और माँ के दूध का महत्वपूर्ण योगदान है. सम्पूर्ण विश्व में बच्चों में निमोनिया से होने वाली कुल मौतों में से ४४% मौतें कुपोषण के कारण होती हैं.  

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पूरे विश्व में  प्रतिवर्ष पांच वर्ष से कम आयु के १८ लाख बच्चों की मृत्यु निमोनिया  से होती हैं.  यह संख्या बच्चों में अन्य बीमारियों से होने वाली मृत्यु से कहीं अधिक है.   निमोनिया एक प्रकार का तीव्र श्वास सम्बन्धी संक्रमण है जो फेफड़ों की वायुकोष्टिकाओं को प्रभावित करता है. जब कोई स्वस्थ मनुष्य साँस लेता है तो यें वायुकोष्टिकाएं हवा से भर जाती  हैं. परन्तु निमोनिया से पीड़ित व्यक्ति  में ये  कोष्टिकाएं मवाद और तरल पदार्थ से भर जाती हैं जिसके कारण श्वास लेने की प्रक्रिया  कठिन और दुःखदायी हो जाती है तथा शरीर में ऑक्सीजन सीमित मात्रा में पहुँच पाती है.

बहराइच जिला अस्पताल के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ के. के. वर्मा के अनुसार "बच्चों को निमोनिया से बचाने के लिए सम्पूर्ण पोषण बहुत आवश्यक है. इससे बच्चों  के शरीर को पूर्ण रूप से सभी प्रकार के विटामिन मिलते रहते हैं फलस्वरूप बच्चों का निमोनिया से बचाव होता रहता है. पूर्ण पोषण के लिए बच्चों को दाल, चावल और रोटी दें, बाहर का 'रेडीमेड बेबी फ़ूड' जहां तक संभव हो नहीं देना चाहिए. बाहरी ' रेडीमेड बेबी फ़ूड' बच्चे के स्वास्थ्य के लिए एक ख़राब पोषण है" 

बहराइच जिला अस्पताल के स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. पी. के मिश्र का मानना है कि "शिशु के लिए जीवन के पहले छः माह तक माँ का दूध सबसे उचित पोषण है और जब बच्चा  छः माह से अधिक का हो जाए तो दलिया वगैरा दिया जा सकता है. बोतल का दूध बिल्कुल ही नहीं पिलायें यह बच्चों के लिए सही पोषण नहीं है. महिलाओं में जानकारी की कमी है अतः आवश्यक है कि उन्हें जानकारी दी जाए यदि वे जानकार होंगी तो अच्छे पोषण कि विधि अपने-आप अपना लेंगी".

लखनऊ में एक निजी चिकित्सालय चलाने वाली बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. कुमुद अनूप जी के अनुसार "हाथ कि स्वच्छता बहुत महत्वपूर्ण है, जिससे निमोनिया तथा अन्य अनेक बीमारियों से बच्चों को बचाया जा सकता है. अतः,  उचित पोषण और स्वच्छता न केवल बच्चे को निमोनिया तथा अन्य रोगों से बचाने में सहायक है बल्कि बच्चे के शारीरिक विकास और रोगप्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाने में कारगर  है. दाल, चावल, रोटी  और सब्जी सबसे अच्छा और सस्ता पौष्टिक आहार है जो किसी भी प्रकार से हानिकारक नहीं है".

डॉ वर्मा के अनुसार भी बच्चों को निमोनिया से बचाने के लिए सफाई बहुत महत्वपूर्ण है. अतः बच्चे को ठीक प्रकार से हाथ को धोने के बाद ही स्पर्श करना चाहिए. बच्चों को कपड़े धुले व साफ़-सुथरे पहनाने चाहिए. बेहतर होगा कि कई कपड़ों का प्रयोग पहनाने के लिए करें यदि एक-दो  कपड़े ही हैं तो हर बार कपड़े धुल कर ही पहनायें.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार बच्चों को निमोनिया से बचाने में पर्याप्त मात्रा में पोषण बहुत ही अहम भूमिका निभाता है. बच्चों को आरम्भ के छः महीने तक समुचित मात्रा में पोषण देने के लिए माँ का दूध पर्याप्त है. यह बच्चों के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा है जो कि बच्चों को न केवल पूर्ण पोषण प्रदान करता है बल्कि उनमे रोगप्रतिरोधक क्षमता का विकास भी करता है. 

अतः बच्चों को समुचित पोषण और उचित वातावरण प्रदान करके हम उसे न केवल निमोनिया वरन  अन्य कई प्रकार के भ्रामक बीमारियों से बचा सकते हैं. बच्चों को उचित पोषण देने के लिए उसके जीवन के पहले छः माह तक केवल माँ का दूध पर्याप्त है तथा ६ से २४ माह तक के लिए माँ के दूध के साथ-२ दाल, चावल, रोटी, सब्जी, दलिया और अन्य पूरक आहार दिया जा सकता है. लोगों में जानकारी का अभाव है. समाज में बहुत बड़ी जागरूकता की जरूरत है. तभी समाज में लोग विभिन्न प्रकार के स्वास्थवर्धक विधियों को अपनाकर, बच्चों को निमोनिया तथा अन्य बीमारियों से बचाने में सफल हो पायेंगें.

राहुल कुमार द्विवेदी - सी.एन.एस.
(लेखक सी.एन.एस. www.citizen-news.org ऑनलाइन पोर्टल के लिये लिखते हैं)

बच्चे को निमोनिया से बचाने में सबसे कारगर "माँ का दूध"

उत्तर प्रदेश के विभिन्न स्वास्थ्य चिकित्सकों का मानना है कि शिशु के जीवन के पहले छः महीने तक केवल माँ का दूध अति आवश्यक है. यह शिशु को न केवल निमोनिया बल्कि अन्य बहुत सारे शारीरिक संक्रमण जैसे अतिसार दस्त, कुपोषण आदि से भी बचाता है. और बच्चे को स्वस्थ रखने में सबसे कारगर है. बच्चे को, जीवन के शुरुआती छ: महीने में, ऊपर से किसी भी प्रकार का दूध 'सप्लीमेंट' या फिर बोतल का दूध नहीं देना चाहिए. एक अध्ययन के अनुसार जीवन के शुरुआती छः महीने तक केवल माँ का दूध पीने वाले बच्चों की तुलना में बच्चे, जो अपने जीवन के पहले छः महीने तक केवल माँ का दूध नहीं पीते हैं, उनमें निमोनिया से मरने का ५ गुना अधिक खतरा होता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी बताया है कि शिशु जीवन के पहले छः माह तक केवल स्तनपान ही उसके आहार का एकमात्र स्रोत है. एक माह से कम आयु के बच्चों में, श्वास सम्बन्धी बीमारियों से होने वाली कुल मौत में से, ४४% मौतें कम स्तनपान के कारण होती हैं. बहराइच जिला अस्पताल के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ.  के. के. वर्मा  के अनुसार "माँ के दूध में विटामिन तथा कोलेस्ट्रम (नवदुग्ध) होता है. जो बच्चे को स्वस्थ रखने में और निमोनिया तथा अन्य शारीरिक संक्रमण से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. अतः यह बहुत आवश्यक होता है कि हर माता शिशु के जीवन के पहले छः माह तक बच्चे को केवल अपना ही दूध पिलाये. बच्चे को ऊपर से बोतल का दूध नहीं देना चाहिए क्योकिं जो गुण माँ के दूध में है वह और किसी भी चीज़ में नहीं है".
     
बहराइच जिला अस्पताल के स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. पी. के मिश्र का भी मानना है कि  "माँ का दूध बहुत सारी बीमारियों और संक्रमणों से बचाता है. इसीलिए माँ का दूध बच्चे के लिए सबसे अच्छा पोषण है. और इससे अच्छा पोषण और कुछ  नहीं हो सकता है. अतः जो भी गर्भवती महिलाएं यहाँ पर आती हैं. हम उन्हें अच्छी तरह से बताते हैं कि वे शिशु के जीवन के पहले छः महीने तक उसे केवल माँ का दूध पिलायें और ऊपर से कोई भी अन्य दूध या फिर बोतल का दूध न पिलायें".

लखनऊ शहर के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ कुमुद अनूप के अनुसार "माँ का दूध सबसे सर्वोतम है. यह न केवल  बच्चे को संक्रमित बीमारी जैसे दस्त और गैस्ट्रोएन्टराइटिस (आँत या पेट में जलन) से बचाता है वरन बच्चे के शारीरिक विकास में भी सहायक होता है, तथा उसके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाकर उसे अन्य बीमारियों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है. अतः माँ का दूध बच्चे के जीवन के पहले छः महीने तक के लिए अपने आप में एक सम्पूर्ण पोषण है. इसके अतिरिक्त बच्चे को ऊपर से कोई अन्य दूध सप्लीमेंट देने की आवश्यकता नहीं होती है".

बहराइच जिला अस्पताल के डॉ. मिश्र तथा डॉ.वर्मा का मानना है कि उनके अस्पताल में आने वाली महिलाओं में से लगभग ९० प्रतिशत महिलाएं बच्चों को स्तनपान कराती हैं.  और डॉ. मिश्र का यह भी कहना है कि "शहरी महिलाएं बच्चों को स्तनपान कम करा पाती हैं जिसके कई कारण हैं. कुछ महिलायें हैं जो कहीं पर कार्यरत हैं उनके लिए बच्चे को समय से स्तनपान करा पाना बहुत कठिन हो जाता है. कुछ महिलाएं बच्चों को या तो कम स्तनपान कराती हैं या फिर स्तनपान कराना ही नहीं चाहती हैं. अतः इस विषय पर जन साधारण को शिक्षा और जागरूकता की आवश्यकता है. प्रायः देखा गया है कि जब डॉक्टर गर्भवती महिलायें को उचित परामर्श देते हैं तो वे अपने बच्चे को अपना स्तनपान कराती हैं".

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नवजात शिशुओं के लिये सर्वश्रेस्थ माँ-का-दूध, परन्तु समाज में व्याप्त मान्यताओं के कारण जन्म के पश्चात् उन्हें मिलता है बकरी का दूध, शहद, पानी आदि
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जहाँ एक तरफ सरकारी जिला अस्पताल के डाक्टरों का यह मानना है कि अधिकतर महिलाएं बच्चों को स्तनपान कराती है वहीं दूसरी तरफ समाज में कुछ ऐसी मान्यताएं हैं जिनके अनुसार नवजात शिशु के जन्म के पश्चात् बकरी का दूध, शहद, पानी या फिर अन्य कोई चीज माँ के दूध से पहले पिलाई जाती है. जिसका आंकलन इससे लगाया जा सकता है कि बहराइच जिला अस्पताल में निमोनिया से पीड़ित अपने तीन दिनों के बच्चे को दिखाने आयीं माता का कहना है कि "हम बच्चे को बकरी का दूध पिला रहें है क्योकिं यह हमारे घर कि पुरानी परंपरा है कि नवजात शिशु को सबसे पहले बकरी का दूध पिलाया जाता है". निमोनिया से ही पीड़ित एक और ढाई साल के बच्चे की माता जी का कहना है कि वह भी बच्चे को अपना दूध नहीं पिला पायी थीं क्योकिं उस वक्त उनका दूध नहीं आ रहा था.
 
समाज में फैले इस प्रकार के प्रचलन न केवल बच्चों के विकास में बाधक है बल्कि समाज में एक अभिशाप के रूप में व्याप्त हैं जिसको इन चिकित्सकों को भी समझना होगा और माताओं को  ऐसा न करने का परामर्श देना होगा. क्योंकि अक्सर ऐसा देखा गया है कि जब चिकित्सक गर्भवती महिलायों को पूरी तरीके से समझाते हैं तो वें उनकी बातों का अनुसरण करती हैं और अपने बच्चे को स्तनपान कराती हैं. समाज में जागरूकता की कमी है अतः महिलायों को जानकार और जागरूक बनाना आवश्यक है तभी समाज में पूर्ण रूप से बदलाव आयेगा"

राहुल कुमार द्विवेदी - सी.एन.एस.
(लेखक, ऑनलाइन पोर्टल सी.एन.एस. www.citizen-news.org के लिये लिखते हैं)

बालश्रमिक और 'पीतल नगरी' मुरादाबाद के स्लम

एक स्लम है शिवनगर, आत्मसंतुष्टि के लिए निवासी जिसे मोहल्ला कहते हैं!
’अंकल, अंकल....सर’ की आवाज।
’सर...सर’ एक और आवाज।
मुड़कर देखा तो गीता, दीपाली अपनी 2-3 सहेलियों के साथ लगभग दौड़ते हुए आ रही थी और रुकने का इशारा कर रहीं थी। मैं रुका। पास आकर उन्होंने कहा-'सर, हैप्पी दीवाली, अंकल दीवाली की बधाई।’ मैं अवाक-गद्गद हो गया। तुरन्त उन्हें भी बधाई, शुभकामनाएं दीं व ढेरों आशीर्वाद कहा। कुछ भावुक भी हो उठा इन बच्चों के उत्साह से!
स्थान-शिवनगर मलिन बस्ती (स्लम) 
वार्ड-शिवनगर वार्ड
जनपद-मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश 
तिथि-18 अक्टूबर 2011 
विश्वप्रसिद्ध 'पीतल नगरी’ के कारीगरों के कौशल ने न केवल मुरादाबाद को गौरवपूर्ण नाम दिया है बल्कि वित्तीय लाभ से भी नवाजा है जिसमें विदेशी मुद्रा अर्जन शामिल है। इन कारीगरों की वजह से अनेक व्यवसायी करोड़पति बन चुके हैं और भारत सरकार को भी विशाल विदेशी मुद्रा लाभ मिलता है परन्तु इन कुशल कारीगरों व उनके परिवाजनों को क्या मिला? स्थिति वही बदहाली की है आज भी। परिवार  जैसे-तैसे रोटी-कपड़ा की व्यवस्था कर पाता है। मकान? मलिन बस्तियों में जैसे मकान हो सकते हैं उसी तरह के यहां भी हैं। संकरी गलियों में दोनों ओर मकान बने हैं जिनमें परिवार के रहने का स्थान कम और धातुकर्म के लिए फैक्ट्री की जगह ज्यादा है। लगभग पूरा परिवार अथक परिश्रम करके पीतल को वर्तन या आकर्षक सजावटी वस्तुओं का रूप देने में जुटा रहता है। स्वाभाविक है इसमें ऐसे बच्चें भी शामिल होते हैं जिन्हें ’बालश्रमिक’ की संज्ञा दी जाती है। यानि, 06-14 आयुवर्ग के लड़के-लड़कियां।

सन् 2011 की जनगणना के अनुसार मुरादाबाद जनपद की जनसंख्या पौने अड़तालीस लाख (4.78 मिलियन) है। शिवनगर सौ में शहर स्थित एक स्लम है जिसे राज्य सरकार द्वारा अधिकृत माना गया है। यहां के निवासी इसे स्लम नहीं ’मोहल्ला’ कहकर आत्मसंतुष्टि पाते हैं। इसकी कुल आवादी 3532 है जिसमें 1900 पुरूष तथा 1632 महिलाएं शामिल हैं। 06-14 आयु के बच्चों की संख्या 729 है जिनमें 163 बालश्रमिक की श्रेणी में आते हैं। ये बच्चे स्कूल नहीं जाते और घरों में चल रही ’धातुकर्म फैक्ट्री’ में भट्टी को यंत्र द्वारा हवा देना, पानी-मिट्टी की व्यवस्था करना ताकि मोल्ड बनाये जा सकें जैसे कामों को अंजाम देते हैं। पहले अनेक बच्चे विधिवत चलने वाली फैक्ट्रियों में काम करते थे। कुछ सरकारी व गैर सरकारी प्रयासों के फलस्वरूप वहां से हटाये गये परन्तु कुटीर उद्योग के रूप में चलने वाली घरेलू फैक्ट्रियों में अभी भी कार्यरत है। जाहिर है कि ये सभी अवैध रूप से चल रही हैं परन्तु श्रम विभाग शायद अनजान है।

शिवनगर की ऐसी ही एक ’फैक्ट्री’ में मुहम्मद सुहेल भी काम करता है। बड़ी चतुरायी से अपनी उम्र 14 वर्ष बताता है परन्तु काम क्या करता है नहीं बताता है। स्कूल क्यों नहीं गये पूछने पर कहता है अभी समय नहीं हुआ है। शायद उसे यही कहने को कहा गया होगा! मोहल्ले में सरकारी स्कूल होता तो शायद जाता। ऐसी ही स्थिति अन्य बाल श्रमिकों की भी है। प्राइवेट स्कूल 12 हैं परन्तु 0-6 आयुवर्ग के 103 में 98 बच्चों के पास जन्म प्रमाण-पत्र नहीं हैं जिससे स्कूलों में दाखिला मिलना भी मुश्किल होगा।

बच्चों में स्कूल जाने वाले भी हैं जिनमें गीता, दीपाली, रितू, शिखा, नीराज, आसमा तो कक्षा 12 की छात्राएं हैं और मोहल्ले से दूर फूलवती कन्या इन्टर कालेज में जाती हैं। वह भी खुशी-खुशी। छटी में पढ़ने वाली नाजिय, आठवीं की सादिया भी खुश हैं पढ़ाई से। कुछ बनेंगी आगे चलकर ऐसा बताती है। परन्तु गुलक्शा चौथी के आगे नहीं पढ़ सकी है। आर्थिक समस्या उसके सामने रही हैं। दो-तीन साल से स्कूल नहीं जा सकी है। आगे क्या होगा यह भी नहीं बता पा रही है।

एनीमेटर हिना गुप्ता तथा भारती सक्सेना स्कूल न जाने वाली बच्चों की पढ़ाई के लिए  अभिभावकों से सम्पर्क सादे हैं। इनकी लगन काम भी आ रही है तभी तो नटखट शबाब आलम, अनस, सीमा, माहजबीं, आदिल, नाजनीन, आफरीन, सहनूर बालश्रम केन्द्र-71 में पहली कक्षा में भरती हुए हैं और नियमित रूप से स्कूल जा रहे हैं यह पूछने पर कि आज (18 अक्टूबर) क्यों नहीं गये स्कूल सबाब बताता है कि यहां इकठ्ठा होना था ना! स्कूल में उसे मजा आता है। कैसे? नहीं बता पाता।

सीमा के हाथ काले दिखे तो पूछने पर बताती है कि पहले वह चूड़ी बनाने का काम करती थी जिससे ऐसा हुआ। अभी साफ नहीं हो सके हैं बच्ची के हाथ। हिना व भारती बताती हैं कि 7 अक्टबर से 17 अक्टूबर के बीच ही इन बच्चों को स्कूल में भरती कराया गया है और वे रोज जाते हैं। शिक्षा निःशुल्क है।

शिवनगर की कुछ महिलाओं की जागरूकता देख आशा की किरण जागी। उन्होंने ’आशा समूह’ बनाया है जिसमें ’मोहल्ले’ की अनेक महिलाएं (10 से अधिक) शामिल हैं। 15 दिन एक मीटिंग होती है जिसमें काम की समीक्षा और आगे का कार्यक्रम बनता है। इसमें 10-सूत्रीय कार्यक्रम के अन्तर्गत बच्चों व उनकी माताओं के स्वास्थ्य संबंधी विषयों के अलावा शिक्षा, गलियों की सफाई, कूड़े का निस्तारण आदि समस्याओं के निराकरण पर चर्चा होती है। आवश्यकता पढ़ने पर अधिकारियों से मिलकर सफाई आदि करायी जाती है। आरती अग्रवाल अभी 6-7 महीने से ही समूह से जुड़ी हैं परन्तु सक्रिय हैं। बीना भटनागर समूह की सचिव तथा ममता ठाकुर कोषाध्यक्ष हैं। फख्र से बताती हैं कि इने फंड में लगभग दो हजार रुपये हैं जो मात्र 10 महीने के अन्दर ही जमा किए गये हैं। अप्सा का योगदान भी सराहनीय हेै। गली आदि की सफाई में बच्चें भी उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं।

मुरादाबाद में जुलाई 2009 से 'धातु उद्योग नगरी मुरादाबाद में बाल अधिकार संरक्षण’ परियोजना कार्यशील है। इस वर्ष जनवरी माह तक 9753 बालश्रमिक यहां चिन्ह्ति किये जा चुके हैं जिन्हें काम से मुक्ति दिलाकर शिक्षा दिलाने के प्रयास जारी हैं। शिक्षित बेरोजगार युवकों को भी संस्थान से  शिक्षण-ज्ञान अर्जन सामग्री देकर समाजोपयोगी बनाने का कार्यक्रम चल रहा हैं

ऐसा लगता है कि यूनीसेफ, राज्य श्रम विभाग और जिला प्रशासन के साथ-साथ गैर सरकार संगठनों के समन्वय से बच्चों-महिलाओं से संबंधित अनेक हितकारी योजनाओं की पूर्ति में सफलता शीघ्र मिलेगी और गीता, दीपाली आदि के साथ अन्य सभी बच्चे, महिलाएं व अन्य नागरकि गरीबी, अज्ञानता के अंधकार को शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, बाल एवं मानवाधिकार आदि के जरिये मिटाकर सुखद दीपावली मनाने का सुअवसर प्राप्त कर सकेंगें

दुर्गेश नारायण शुक्ल