अक्स.डी.र. टीबी या तपेदिक [XDR-TB] के रोगियों को उम्र भर के लिए अलग रखा जाएगा

अक्स.डी.र. टीबी या तपेदिक [XDR-TB] के रोगियों को उम्र भर के लिए अलग रखा जाएगा

एक्स्तेंसिवेली ड्रग रेसिस्तंत टीबी या तपेदिक के रोगियों में से आधों की मृत्यु शीघ्र ही हो जाती हैविज्ञान के पासअभी फिलहाल ऐसा कोई प्रावधान नही है कि मरीज को ठीक करना तो दूर उसका संक्रमण फैले ऐसी दवाएं भीउपलब्ध नही हैं
अमरीका के एक टीबी या तपेदिक विशेषज्ञ का कहना है कि पहले जैसे कि प्लेग, लेप्रसी या कुष्ठ रोग, और येलोफीवर में होता था कि मरीज को उम्र भर के लिए समाज से अलग रखा जाता था क्योकि कोई इलाज नही था औरकोई ऐसा प्रावधान नही था कि मरीज का संक्रमण और लोगों में फैलेयही अब एक्स्तेंसिवेली ड्रग रेसिस्तंतटीबी या तपेदिक के रोगियों के साथ किया जाएगा और उनको उम्र भर के लिया सबसे अलग रखना ही पड़ेगा
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रपट के अनुसार हर साल ४०,००० से अधिक एक्स्तेंसिवेली ड्रग रेसिस्तंत टीबी के रोगीदुनिया में बढ़ जाते हैंये एच.आई.वी से भी अधिक खतरनाक है क्योकि ये जानलेवा है और आधे से अधिक रोगीमृत्यु को प्राप्त होते हैं

अब जन स्वास्थ्य नीतियाँ और अन्य जन-कल्याण नीतियाँ भी परिवर्तित की जा रही हैं जिससे एक्स्तेंसिवेली ड्रगरेसिस्तंत टीबी या तपेदिक के रोगी को समाज के कल्याण में कानूनी रूप से उम्र भर के लिए सबसे अलग रखा जासकेऐसा करना सदियों पीछे जाने जैसा होगा क्योकि पहले जब एंटी-बिओटिक दवा नही इजात हुई थी, तबप्लेग, लेप्रसी, और येलो फीवर को नियंत्रित करने के लिए ऐसा करना पड़ा थाआज जब इतनी तमाम एंटी-बियोटिक दवा हैं उसके बावजूद हमें सदियों पहले वाले जन स्वास्थ्य के तरीकों को अपनाना पड़ रहा है.

नंदीग्राम: CPI (ऍम) के गुंडों ने राधारानी का दुबारा बलात्कार किया

नंदीग्राम: CPI (ऍम) के गुंडों ने राधारानी का दुबारा बलात्कार किया

शरम करो CPI (ऍम) के गुंडों जिन्होंने नंदीग्राम में राधारानी का दुबारा बलात्कार किया

[इसको अंग्रेज़ी में पढने के लिए यहाँ क्लिक्क करें]


नंदीग्राम में गोकुल्नगर छेत्र के एक गावं में छपी (ऍम) के गुंडों ने राधारानी आरी का दुबारा से बलात्कार किया और अन्य महिलाओं और पुरुषों पर आक्रमण किया. जो लोग घायल हुए हैं, वो नंदीग्राम सरकारी अस्पताल में भरती हैं.

जिन पुरुषों पर आक्रमण हुआ है वो 'गायब' हैं.

१८ अप्रैल २००८ की रात को, CPI (ऍम) के सदस्य और खेजुरी से हमद वाहिनी पार्टी के बंदूकों से लैस कार्यकर्ताओं ने राधा रानी और प्रताप आरी के घर पर आक्रमण किया, प्रताप को मार के पास के टैंक में फेक दिया और राधा रानी आरी का दुबारा से उसके अपने घर में ही बलात्कार किया गया.

नंदीग्राम में चल रहे संघर्ष में आगे बढ़ के शामिल हो के राधारानी आरी ने बहादुरी और सामाजिक संवेदनशीलता का परिचय दिया है. राधारानी एक दलित महिला हैं, जमीन-रहित परिवार से हैं, और उनके पति प्रताप आरी के सहयोग से नंदीग्राम संघर्ष में अनमोल योगदान देती आई हैं. राधारानी ने स्पेशल इकनॉमिक ज़ोन (SEZ) का जमकर विरोध किया है और वहा बनने वाले केमिकल हब प्रोजेक्ट से जो जमीन, घर-बार, प्रकृति और संस्कृति का नाश होगा, उसको उजागर किया है. राधारानी एक प्रभावकारी वक्ता और बहुदर महिला हैं जिन्होंने संवेदनशीलता का उदाहरण प्रस्तुत किया है. वो न केवल नंदीग्राम में बल्कि झारखण्ड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र आदि प्रदेशों में चल रहे जन-आन्दोलनों को भी सशक्त करती आई हैं. राधारानी नंदीग्राम-नर्मदा- गोरे जथा में भी शामिल हुई थी.

सोनाचुरा से एक और महिला, जिसका नाम नर्मदा शीत है, वो भी नंदीग्राम में चल रहे संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं. नर्मदा शीत पर भी हमला हुआ है. मोना प्रमाणिक नामक महिला पर भी उस रात हमला हुआ है. जब ये रपट लिखी जा रही थी, जिन पुरुषों पर हमला हुआ है, उनकी कोई ख़बर नही थी. राधारानी, प्रताप और नर्मदा शीत तो नंदीग्राम अस्पताल में भरती हैं और कुछ लोग तुम्लुक के अस्पताल में भरती हैं.

कम से कम २० घरों पर आक्रमण हुआ था और १०० लोग घायल हुए हैं, जानमाल का भरी नुकसान हुआ है और समान की लूटपाट भी. कई लोग बेघर हो गए हैं और भूमि उछेद प्रतिरोध कमिटी, नंदीग्राम, उनको सहयोग प्रदान कर रही है.

नाबकुमार समानता के नेतृत्व में और गरु पड़ा से अन्य लोगों के समर्थन से ये आक्रमण गोकुल नगर, सोनाचुरा, गढ़चाक्रबेडिया, में हुए. कुछ लोगों के घर में धमाके भी हुए थे, जिनमें कोखों शीत शामिल हैं, जो हाल ही में न्यायिक हिरासत से छूट कर आए थे.

लोकतंत्र पर नंदीग्राम एक धब्बे की तरह है. नंदीग्राम में इस तरह की त्रासिदियाँ CPI (ऍम) द्वारा स्थानिये, प्रादेशिक और राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व के समर्थन से होती आई हैं, जो निन्दाजनक और शर्मनाक बात है.

जिन लोगों पर पहले ऐसी त्रासिदियाँ हुई थीं, और जिनको अब तक मुआवजा तक नही मिल पाया है, बल्कि झूठे आरोपों में उनको फसाया गया है, ऐसे लोगों पर यदि दुबारा इस तरह की त्रासिदियाँ हो जाए तो ये उन लोगों के संवैधानिक अधिकारों पर घातक वार होगा.

नंदीग्राम में निरंतर होती हिंसा का भीषण खंडन करते हुए हमारी मांग है कि:

१. जिन लोगों ने ये सामुहिक बलात्कार, मार-पीट, डराना-धमकाना, लूट-पात, आदि किए थे, उनको बिना विलम्ब पहचाना जाए, आरूपित किया जाए और गिरफ्तार किया जाए.

२. नंदीग्राम में निरंतर हो रही हिंसा के समक्ष राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सख्त भूमिका इख्तियार करे और जो लोग इसके लिए जिम्मेदार हैं, उनपर इसकी जांच हो कि वो CPI (ऍम) से किस तरह से संबंधित थे, और उनपर कठोर करवाई की जाए.

३. राष्ट्रीय महिला आयोग तुरंत नंदीग्राम जा कर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को रपट पेश करे और जिन महिलाओं का बलात्कार हुआ है या जो घायल हुई हैं, उनको मुनासिब मुआवजा देने के लिए निर्देश जारी करे.

४. नंदीग्राम में निरंतर चलती हिंसा से त्रस्त लोगों के लिए विशेषकर महिलाओं के लिए नि:शुल्क न्यायिक, चिकित्सिक, सामाजिक, और अन्य प्रकार की सहायता और सहयोग प्रदान करने के लिए व्यवस्था की जाए

५. हाई कोर्ट के आदेश के तहत जिन लोगों को बलात्कार, यौनिक अत्याचार आदि झेलना पड़ा है और जिनको जान-माल का नुकसान उठाना पड़ा है, उनको बिना विलम्ब मुआवजा दिया जाए

देब्जीत श्रीकांत और मेधा पाटकर

नेशनल अलायंस ऑफ़ पीपुल'स मोवेमेंट्स (napm)
जन आन्दोलनों का राष्ट्रीय समन्वय
पश्चिम बंगाल, भारत


भूमि उछेद प्रतिरोध कमिटी, नंदीग्राम
(बी.उ.पर.क. नंदीग्राम)

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तपेदिक या टीबी समाचार

तपेदिक या टीबी समाचार
२१ अप्रैल २००८

अमरीका के स्टर्लिंग में जेल के एक कैदी को लैतैंट टीबी या तपेदिक हो गई और वहाँ की मीडिया में सनसनी फैली. लैतैंट टीबी या लैतैंट तपेदिक तब कहते हैं जब संक्रमण सक्रिय नही हुआ हो और उस व्यक्ति से किसी और को भी टीबी नही फ़ैल सकती जब तक उसकी टीबी सक्रिय संक्रमण का रूप न धारण कर ले।

स्वास्थ्य अधिकारियों ने भरसक प्रयास किया कि न तो जेल के अन्य कैदियों को परेशां होने की आवश्यकता हैऔर न ही स्टर्लिंग छेतरे के अन्य निवासियों को।

अमरीका में एक लैतैंट टीबी या तपेदिक से इतनी सनसनी मच सकती है, और भारत में जहाँ
१/३ जनता को लैतैंट टीबी या तपेदिक है, और कोई खलबली नही?

वही अमरीका में नॉर्थ लिंकांशिर में एक हाई स्कूल के छात्र को टीबी निकल आई थी (फरवरी २००८)। अन्य छात्रोंका शिक्षकों का और अभिभावकों का टीबी टेस्ट करने पर १४ अन्य लोगों को लैतैंट टीबी या तपेदिक या फिरएक्टिव या सक्रिय टीबी या तपेदिक निकल के आई है। सबका उपयुक्त इलाज हो रहा है। स्वास्थ्य अधिकारियों ने ये नही स्पष्ट किया कि कितने लोगों को लैतैंट टीबी या तपेदिक है और कितनों को एक्टिव या सक्रिय टीबी रोग।

ये भी गौर करने की बात है कि अमरीका में कैसे एक छात्र को टीबी हो जाने से सब स्कूली छात्र, शिक्षक और अभिभावक जो उन छात्रों के सम्पर्क में रहे हों, सबकी जांच होती है और समय रहते उपयुक्त इलाज होता है। ऐसा करना भारत में मुमकिन ही नही क्योकि १/३ जनता को तो लैतैंट टीबी है और स्वास्थ्य व्यवस्था पहले से ही जरुरत और छमता से कही अधिक लदी हुई है।

बजट घटने से घुटनों पर पैंट गिरा कर कोई टीबी नियंत्रण के लिए कैसे दौड़ सकता है?

बजट घटने से घुटनों पर पैंट गिरा कर कोई टीबी नियंत्रण के लिए कैसे दौड़ सकता है?

अमरीका के कैलिफोर्निया प्रदेश के गवर्नर अर्नोल्ड स्च्वाज़नेगेर ने बजट में कटौती कर दी है, जिसका प्रभाव टीबी नियंत्रण कार्यक्रम पर भी पड़ रहा है।

टीबी नियंत्रण अधिकारी डॉ रॉबर्ट बेंजामिन का कहना है कि घुटनों पर पैंट गिरा कर कोई टीबी नियंत्रण के लिए कैसे दौड़ सकता है?

कैलिफोर्निया में जब कंप्यूटर के छेत्र में बूम आया था तो कई देशों से लोगों का आवागमन बढ़ता चला गया था और हालांकि टीबी विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकांश टीबी उन्ही लोगों में पायी जाती है जो कम से कम ५ साल से अमरीका में ही निवास कर रहे हों, फिर भी अन्य देशों से आए लोगों में टीबी का अनुपात अधिक है।

इस लेख में कई दिल को हिला देने वाले विवरण हैं जैसे कि एक वरिष्ठ कंपनी के अधिकारी को जबरन अपने ग्राहकों को फ़ोन कर के ये सचेत करना पड़ा कि उनको भी टीबी होने का खतरा है क्योकि उसको टीबी निकल आई है।

उसी तरह एक महिला, जो पहली बार माँ बनने को है और उसको ड्रग रेसिस्तंत वाली टीबी या तपेदिक निकल आई है और उपयुक्त इलाज हो रहा है मगर इन दवाओं का प्रभाव टीबी के कीटाणु पर तो पड़ता ही है, बल्कि अन्य प्रभाव भी पड़ते हैं क्योकि ये दवाएं काफी तेज़ होती हैं। इस महिला को सुनने में कठिनाई होने लगी है, इसके पैरों की अंगुलियाँ सुन्न पड़ गई हैं, चेहरे पर रैय्श पड़ गए हैं और इसका वजन गिरता चला जा रहा है।

एक विशेषज्ञ का कहना है कि मालती ड्रग रेसिस्तंत टीबी या तपेदिक का अनुपात बढ़ता ही जाएगा क्योकि मात्र अमरीका में टीबी नियंत्रण कार्यक्रम चलने से टीबी नियंत्रित नही होगी और अमरीका का नियंत्रण दुनिया भर के टीबी नियंत्रण कार्यक्रम पर नही है। जर्जर स्वास्थ्य व्यवस्थाओं में, गरीबी और कठिन हालातों के रहते हुए, विकासशील देशों में टीबी या तपेदिक का अनुपात बढ़ता ही जाएगा, विशेषकर कि ड्रग रेसिस्तंत टीबी या तपेदिक का।

पोस्को दरियादिली से नही, धूर्त योजना-तहत विस्थापित लोगों को मुआवजा दे रहा है

पोस्को दरियादिली से नही, धूर्त योजना-तहत विस्थापित लोगों को मुआवजा दे रहा है

- एक और पनपता हुआ आर्थिक घोटाला -

संदीप दासवर्मा और डॉ सनत मोहंती

संदीप दासवर्मा और सनत मोहंती ने इसके पहले भी तीन गहन अध्यन के बाद उड़ीसा में पोस्को के स्टील से संबंधित लेख लिखे हैं। उनके पढने के लिए यहाँ क्लिक्क करें:

Orissa: An Economic Scam Coming?


POSCO Project is not an unquestionable boon for Orissa

Who will gain from the POSCO Project in Orissa?


रीडिफ़ न्यूज़ ने हाल ही में रिपोर्ट किया कि पोस्को (POSCO) कंपनी, जो उड़ीसा प्रदेश में १२ बिलियुन अमरीकी डालर का स्टील प्लांट लगा रही है, वो इस प्लांट से विस्थापित होने वाले लोगों को बढ़ा के मुआवजा देने को राज़ी है.

ये निर्णय पोस्को का किसी दरियादिली से नही प्रेरित है और न ही किसी सामाजिक न्याय की भावना से, बल्कि ये एक सोची-समझी धूर्त योजना-तहत किया जा रहा है जिससे लोगों का ध्यान इस प्रोजेक्ट से संबंधित आर्थिक, मानवाधिकार से संबंधित घोटाले पर न जाए. पहले प्रकाशित रपट से ये स्थापित हो चुका है कि पोस्को को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार के मूल्य की तुलना में ०.५ प्रतिशत से भी कम दम में लोहे के ओर मिल रहे हैं!

पहले जो डील हुई थी उसके अनुसार पोस्को उड़ीसा सरकार को लोहे के ओर के लिए आधा (०.५) अमरीकी डालर प्रति टन का मूल्य दे रही थी. जब कि अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में लोहे के ओर का मूल्य १०० अमरीकी डालर प्रति टन है! इससे उड़ीसा सरकार को प्रोजेक्ट की अवधि में कुल मिलकर रुपया १,६२० करोड़ प्राप्त हुआ होता. यदि अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार के मूल्य पर पोस्को उड़ीसा सरकार से लोहे के ओर ख़रीदे, तो उड़ीसा सरकार को प्रोजेक्ट की अवधि में रुपया ,६२० करोड़ के बजे रुपया २८८,००० करोड़ प्राप्त होगा!!!

पोस्को का जो समझौता (मेमोरंदुम ओएफ उन्देर्स्तान्डिंग) उड़ीसा सरकार के साथ २००५ में हुआ था, तब से अब तक लोहे के और का मूल्य ७० प्रतिशत तक बढ़ चुका है!!!

इस प्रोजेक्ट की अप्रत्यक्ष कीमत उड़ीसा सरकार को देनी पड़ेगी, वो अलग! हजारों एकड़ जमीन, करोड़ों लीटर पानी जो लगभग मुफ्त में कंपनी जमीन के भीतर से दोहन करेगी, कोयला जो बेहद कम मूल्य पर दिया जा रहा है और जो कर में नुकसान होगा क्योकि पोस्को को स्पेशल इकनॉमिक ज़ोन (sez) का दर्जा प्राप्त है, इससे उड़ीसा सरकार का नुकसान और अधिक होने को है, और जिसका कु-परिणाम उड़ीसा के लोग भी झेलेंगे.

ताज्जुब की बात ये है कि उड़ीसा सरकार अब भी ये जिरह करती है कि पोस्को प्रोजेक्ट उसके लिए लाभदायक है!!! हालांकि जो लोग अच्छी तरह से समझ गए हैं कि पोस्को प्रोजेक्ट से उनको नुकसान होने वाला है, वो तमाम धमकियों के या पैसे/ नौकरी के लोभ को ठुकरा कर इसका भरसक विरोध कर रहे है.

पिछले तीन सालों से पोस्को उड़ीसा प्रदेश सरकार और भारत की केंद्रीय सरकार की मदद से ये कृषि योग्य जमीन को कब्जियाने का पूरा मगर अभी-तक-असफल प्रयास कर रही है. इसके विरोध में जब जन-आन्दोलन खड़ा होने लगा तो प्रदेश सरकार ने बर्बरता से इसको दबाने का प्रयास किया. पिछले ४ महीनों से १८ पोलीस के बतालियून इन गावं को घेरे बैठे है, और सरकारी स्कूल की इमारतों को कब्जा रखा है. एन गावं में प्रसाशन ने जरुरत के समान आदि का जाना भी बंद कर रखा है जिससे कि लोग विवश हों और गावं छोड़ने को राज़ी हों! ये प्रमाण काफ़ी ठोस है कि लोगों को इस प्रोजेक्ट से होने वाले कु-प्रभाव का अधिक ज्ञान है कि तमाम जोर, जबरदस्ती, कष्ट, लोभ और प्रलोभन के बावजूद भी जन-आन्दोलन मजबूती से पोस्को और सरकार को चुनौती दे रहा है. १३,००० नौकरी के प्रलोभन को भी अधिकांश लोगों ने दुत्कार दिया है. लोगों का ये विश्वास कि जितने रोज़गार के माध्यम खत्म हो जायेंगे, उसकी तुलना में बहुत कम रोज़गार के माध्यम उत्पन्न होंगे, लोगों की समझदारी की मिसाल है.

१ अप्रैल २००८ को पोस्को ने एक बड़े स्तर पर भूमि-पूजन कार्यक्रम का आयोजन करने का प्रयास किया था. हजारों की तादाद में लोगों ने जबरदस्त पोलीस की उपस्थिति के बावजूद भी रैली निकली. पोस्को ने भूमिपूजन के कार्यक्रम को रद्द कर दिया ये कहते हुए कि सरकारी मंजूरी नही आ पायी है.

ये इस सन्दर्भ में समझना जरूरी है कि पोस्को को कई कई गुणा अधिक मुनाफा इस डील से होने को है और इसीलिए वो आसानी से विस्थापित लोगों को बढ़ा चढा के मुआवजा देने को राज़ी है जिससे लोगों का ध्यान इस पनपते हुए आर्थिक घोटाले पर न जाए. ये भी स्पष्ट है कि उड़ीसा सरकार और पोस्को कंपनी दोनों इस डील में भीतर से मिले हुए हैं, क्योकि ये सम्भव है ही नही कि उड़ीसा सरकार को इस डील से होने वाले नुकसान का ज्ञान न हो. जो विस्थापन का मुआवजा आदि है, उसकी कीमत बहुत कम है यदि इस डील से होने वाले मुनाफे पर ध्यान दिया जाए और ये भी रोशन किया जाए कि किन औने-पौने दाम में पोस्को को और और अन्य संसाधन और व्यवस्था आदि उपलब्ध करायी जा रही है.

अब बहुत सीमित विकल्प हैं यदि सूरत-इ-हाल में कोई बदलाव लाना है तो. दुर्भाग्य से मीडिया ने इस पोस्को प्रोजेक्ट के विरोध में हो रहे प्रदर्शन को ‘विकास-में-अवरोध’ की तरह रिपोर्ट किया है और पोस्को प्रोजेक्ट की आर्थिक मूल्यांकन का खुलासा नही किया है. उड़ीसा प्रदेश में जो लोग पढे-लिखे हैं उनको ये लग रहा है कि ‘कम-से-कम कुछ करोड़ पैसा तो प्रदेश में आएगा’. यदि कोई उम्मीद है तो उड़ीसा के लोगों में यदि वो पोस्को को अहिंसक ढंग से ललकारें और सरकार को विवश करें कि वो प्रदेश के और लोगों के हित में निर्णय ले और इस तरह के घोटाले को होने से रोके.

संदीप दासवर्मा और सनत मोहंती

संदीप दासवर्मा और सनत मोहंती ने इसके पहले भी तीन गहन अध्यन के बाद उड़ीसा में पोस्को के स्टील से संबंधित लेख लिखे हैं। उनके पढने के लिए यहाँ क्लिक्क करें:

Orissa: An Economic Scam Coming?

क्या उड़ीसा में आर्थिक घोटाला पनप रहा है?

POSCO Project is not an unquestionable boon for उड़ीसा

पोस्को प्रोजेक्ट उड़ीसा के लिए अभिशाप तो नही?

तपेदिक या टीबी समाचार, १९ अप्रैल 2008

तपेदिक या टीबी समाचार
19 अप्रैल
२००८


नई दिल्ली से अमरीका तक की यात्रा में हवाई-जहाज में सवार एक महिला जो अमरीकी है और जिसकोमुल्टी-ड्रग रेसिस्तंत टीबी या
ऍम.डी.आर. टीबी थी, ने खलबली मचा दी थी। जब ये ज्ञात हुआ कि ऍम.डी.आर. टीबी से ग्रसित ये महिला हवाई यात्रा कर के आई है, तो अमरीका में अन्य हवाई-जहाज के यात्रियों को सम्पर्क किया गया और स्वास्थ्य विभाग और कोर्ट के आदेश से जबरन टीबी की आंच की गई। इनमे से एक को टीबी निकल आई है।
जरा सोचें कि अमरीका टीबी नियंत्रण के लिए जो करता है और बाकि विकसित देश भी जिस तरह से गंभीरता से रोक्द्हम का प्रयास कर रहे हैं, वो विकासशील देशों में मुमकिन है ही नही। विकासशील देशों में भीड़-भाड़ से बचना मुमकिन है ही नही और इस तरह सब यात्रियों को खोज खोज के जांच करना आदि भी मुमकिन नही। नि:संदेह ये समाधान नही है टी.बी नियंत्रण का।

अमरीका के न्यू मेक्सिको में एक स्वास्थ्य कर्मचारी को टीबी निकल आई। अब २५० से अधिक मरीज और अन्य स्वास्थ्य कर्मचारी जो इस टीबी संक्रमित कर्मचारी के सम्पर्क में थे, उन सब की जांच हो रही है।

कुवैत ने ग्लोबल फंड टू फाइट एड्स, टीबी और मलेरिया को ५००,०० अमरीकी डालर अनुदान दे के एक मिसाल कायम की है। अन्य विक्सित और विकासशील देशों को अपने बजट से मुनासिब धनराशी एड्स, टीबी और मलेरिया की रोक्धाम के लिए समर्पित करनी चाहिए तभी ये कार्यक्रम स्थायी होंगे और कुछ नतीजे निकल के आयेंगे।

तपेदिक या टी.बी समाचार, १९ अप्रैल २००८

तपेदिक या टी.बी समाचार, १९ अप्रैल २००८
अमरीका में गाय-भैसों में तपेदिक या टीबी नियंतरण के लिए हाल ही में १६ मिलियुन अमरीकी डालर तीन प्रदेशों को दिए गए थे (मिन्नेसोता, कैलिफोर्निया और मिचिगन)।

मिन्नेसोता प्रदेश में गाय या भैसों में टीबी या तपेदिक की रोकधाम के लिए प्रदेश संसद ने ये फ़ैसला लिया है कि टीबी से ग्रसित गाय-भैसों को मार दिया जाएगा, गाय-भैसों को बंद जगह में रखा जाएगा और जिन किसानों या लोगों के पशुओं को मारा जाएगा उनको ५०० अमरीकी डालर हर्जाना दिया जाएगा। ऐसा तब तक चलेगा जब तक मिन्नेसोता में गाय-भैसों में टीबी खत्म नही हो जाती।

गाय-भैसों में टीबी को बोवीन टी.बी कहते हैं। बोवीन टीबी पशुओं से मनुष्य को संक्रमित पशु से सम्पर्क से और कच्चा दूध पीने से टीबी हो सकती है परन्तु पस्तुएरिज़ेद् दूध पीने से कोई खतरा नही है।


अंग्रेज़ी के कवि और डॉक्टर जॉन कीट्स २५ साल की उम्र में तपेदिक या टीबी से मरे थे। हालांकि विश्व में टीबी या तपेदिक के नए संक्रमण का दर कम हो रहा है परन्तु ड्रुग रेसिस्तंत टीबी का दर बढ़ रहा है।

अज़रबैजान नामक राष्ट्र में जो पहले रूस का भाग था, वहाँ टीबी का दर भायावाही स्थिति पैदा कर रहा है। कुछ जगह तो ५६ प्रतिशत टीबी के केस ड्रुग रेसिस्तंत हैं। वहाँ ९०० जेल के कैदियों में से लग्भाघ १५०-२०० को टीबी होती थी। इस साल ये दर नीचे आ रहा है और इस वर्ष सिर्फ़ ६० लोगों को ही टीबी है। परन्तु इन ६० में से २ लोग एच.आई.वी के साथ भी संक्रमित हैं।



क्या कोका-कोला के बोतलबंद पानी में गरम हवा भरी है?

क्या कोका-कोला के बोतलबंद पानी में गरम हवा भरी है?
शेयरहोल्डर और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कोका कोला कीहरीछवि को चुनौती दी

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१६ अप्रैल २००८ को कोका कोला की शेयरहोल्डर बैठक में जब कोका कोला ये प्रयास कर रहा था कि वो दुनिया की पानी की समस्या का समाधान कर रहा है और एक ‘जिम्मेदार’ उद्योग है, कई सामाजिक कार्यकर्ता औरशेयरहोल्डर ने ये सवाल खड़ा कर दिया कि: क्या कोका कोला के बोतलबंद पानी में सिर्फ गरम हवा भरी है?

इस वार्षिक बैठक से पहले कोका कोला ने हर बोतल पर पानी की गुनात्मकता के बारे में जानकारी छापने के सुझाव को खारिज कर दिया था. पिछले साल भी कोका कोला की शेयरहोल्डर बैठक में ये सुझाव आया था और क्योकि इसको दुगने वोट मिले थे, इस सुझाव पर कोका कोला को पुन: विचार करना पड़ा.

कोका कोला के उत्पादनों, जिनमे बोतलबंद पानी भी शामिल है, की गुनात्मकता कीजांच से संबंधित सवालों को कोका कोला नज़रंदाज़ करता रहा है, जबकि कोका कोला अपने उत्पादनों की गुनात्मकता के बारे में इतनी बढ़-चढ़ के बात करता है कहना है गिगी केल्लेत्त का, जो Corporate Accountability International (उद्योगों को जवाबदेह ठहराने के लिए अंतर्राष्ट्रीय संगठन) के राष्ट्रीय निदेशक हैं. “लोग इस दुविधा में हैं कि आख़िर कोका कोला क्या छुपा रहा है!” कहा गिगी केल्लेत्त ने.

कोका कोला ने अपने उपभोगताओं को ये भी बताने से मना कर दिया है कि वो अपने बोतलबंद पानी के लिए पानी कहा से लाता है! हालांकि एक दूसरी कंपनी जो बोतलबंद पानी (अकुँफिना) बनाती है, पेप्सी, उसने ये मान लिया है कि वो अपने उपभोगताओं को ये बताएगा कि पेप्सी पानी कहा से लाता है. दक्षिण-पूर्वी अमरीका से भारत तक के उन छेत्रों में जहाँ सूखा पड़ने का खतरा अधिक है, कोका कोला भू-जल निकालता आ रहा है.

इसके बजाय कि कोका कोला पानी की गुनात्मकता पर जानकारी दे, बोतलबंद पानी पर लेबल लगाये कि पानी कहा से निकाला गया है और जिन छेत्रों में सूखा पड़ने का खतरा रहता है, वहा से भू-जल का दोहन बंद करे, कोका कोला अपनी जिम्मेदार उद्योग की छवि का गुणगान करने में व्यस्त है:

TERI रपट: The Energy and Resource Institute (TERI), या उर्जा और संसाधन संस्थान की रपट जिसको कोका कोला बहुचर्चित करने में लगा हुआ है और अपनी ‘पर्यावरण-के-लिए-समर्पित’ छवि को बनाने में व्यस्त है, परन्तु ये ५०० पेज की रपट गंभीर सवाल उठती है जैसे कि जिन छेत्रों में कोका कोला के बोतलबंद पानी के प्लांट हैं, वहा पर जल-स्तर नीचे चला गया है. इस रपट में ६ ऐसे प्लांट का सर्वे हुआ है और ६ में से ३ प्लांट ऐसे छेत्रों में हैं जहाँ जल-दोहन पहले से ही काफ़ी अधिक है, यानी कि जल स्तर सामान्य से कही अधिक नीचे है.

इस रपट के अनुसार, ‘कोका कोला के जल संग्रक्षण कार्यक्रम सिर्फ उद्योगपतियों के लिए महत्त्व रखता है और न कि लोगों के लिए, विशेषकर वो लोग जो हाशिये पर रहते हैं और जो सबसे बुरी तरह से प्रभावित होते हैं.

यही बात भारत के जन-संगठन कितने बरसों से कह रहे हैं. “इस रपट के जरिये कोका कोला अपनी काली करतूतों को सफ़ेद-पोश करना चाहता था” कहना है र अजयन का जो प्लाचीमाडा सोलिदारिटी कमिटी का प्रतिनिधित्व करते हैं. “कोका कोला अपनी छवि को साफ करने में एक बार फिर नकामयाब रहा है” कहा अजयन ने.

The CEO Water mandate: ये एक स्वयं सेवी कार्यक्रम है जिसको संयुक्त राष्ट्रों ने समर्थन दिया है कि कैसे उद्योग पानी के संसाधनों के संग्रक्षण में भूमिका निभा सकते हैं. परन्तु ३५ देशों से १२५ से अधिक लोगों का मानना है कि इस रपट में जो सुझाव दिए गए हैं उनपर अमल करने की योजना नही दी हुई है और संयुक्त राष्ट्र पर उद्योगों की काली करतूतों को सफेदपोश करने का आरोप लग सकता है. इसीलिए इस रपट को ‘अपनी छवि सुधारने का प्रयास’ की तरह देखा जा रहा है.

कोका कोला के पर्यावरण गठबंधन: कोका कोला ने वर्ल्ड विल्ड-लाइफ फंड से गठबंधन किया है जिसके अनुसार कोका कोला ने अमरीकी डालर २० मिलियोन का आर्थिक सहयोग वर्ल्ड विल्ड-लाइफ फंड को दिया है, जो जल संग्रक्षण के सात कार्यक्रमों को विकसित करेगा. परन्तु लोगों का कहना है कि: “कोका कोला जब दुनिया भर में अपने बोतलबंद पानी के प्लांटों में जल का दोहन करता आ रहा है, और स्थानिये लोगों कि पहुच से पानी को दूर कर रहा है. ऐसी स्थिति में इसका वर्ल्ड विल्ड-लाइफ फंड के साथ जल संग्रक्षण के कार्यक्रम समझ से परे हैं. जल संग्रक्षण करना है तो पानी का दोहन बंद होना चाहिए”

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पैटी लीन
काम्पैग्न निदेशक
कार्पोरेट अच्कोउन्ताबिलिटी इंटरनेशनल
(उद्योगों कि जवाबदेही बढ़ने के लिए समर्पित अंतर्राष्ट्रीय संगठन)
www.stopcorporateabuse.org
फ़ोन: ६१७-६९५-२५२५
फैक्स: ६१७-६९५-२६२६
ईमेल: plynn@stopcorporateabuse.ओआरजी

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अमिताभ बच्चन के फिल्मों में तम्बाकू सेवन करने के विरोध में हाई-कोर्ट में केस

अमिताभ बच्चन के फिल्मों में तम्बाकू सेवन करने के विरोध में हाई-कोर्ट में केस

"हम लोग इन्साफ के लिए बोम्बे के मान्निये हाई कोर्ट या उच्च न्यायालय में जायेंगे" कहा है डॉ शेखर सालकर ने, जो NOTE के महा-सचिव हैं.

"ये साफ दिखाई देता है कि श्री अमिताभ बच्चन, फैमिली फ़िल्म में सिगार पी रहे थे, जिसके पोस्टर हर जगह लगाये गए थे. ये न केवल गोया प्रदेश के अधिनियम का खुला उलंघन है बल्कि भारत के राष्ट्रीय सिगरेट और अन्य तम्बाकू उत्पाद अधिनियम का भी खुला उलंघन है. Session कोर्ट ने पिछले महीने मार्च में अमिताभ बच्चन के ख़िलाफ़ सारे चार्ज खारिज कर दिए थे" डॉ सालकर ने कहा.

मार्च २००८ में नॉर्थ गोया के जज यू.वी.बकरे ने अमिताभ बच्चन जो अमिताभ बच्चन कॉर्पोरेशन लिमिटेड के अध्यक्ष हैं, उनके ख़िलाफ़ सारे दावे खारिज कर दिए थे.

सिगरेट एवं अन्य तम्बाकू उत्पादन अधिनियम (२००३) के अनुसार फिल्मों में तम्बाकू सेवन को प्रदर्शित नही करना चाहिए क्योकि देश में और विदेशों में भी हुए शोध के अनुसार बच्चों और युवाओं में तम्बाकू सेवन आरंभ करने के लिए जिम्मेदार सबसे बड़ा कारण है फिल्मों में तम्बाकू सेवन को प्रदर्शित करना.

भारत के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री अंबुमणि रामादोस ने अंतर्राष्ट्रीय तम्बाकू नियांतरण कांफेरेंस २००६ में दुनिया का प्रतिष्ठित पुरुस्कार, लुथेर तेर्री पुरुस्कार लेते हुए कहा था कि:

"शोधों से ये स्थापित हो चुका है कि बच्चों और युवाओं के तम्बाकू सेवन आरंभ करने के लिए सबसे बड़ा कारण है फिल्मों में तम्बाकू सेवन का प्रदर्शन. जब से सिगरेट एवं अन्य तम्बाकू उत्पादनअधिनियम २००३ लागु हुआ है तबसे फिल्मों में तम्बाकू के ब्रांड भी दिखाए जाने लगे हैं"

जनवरी २००६ में जब अमिताभ बच्चन ने फैमिली फ़िल्म में सिगार पिया था तो इस फ़िल्म के पोस्टर जिनपर अमिताभ सिगार पी रहे थे, देश भर में लग गए थे. गोया में NOTE ने और लखनऊ में Indian Society Against Smoking (या भारतीय तम्बाकू विरोधी संगठन ISAS) ने अमिताभ को कानूनी नोटिस जारी किए थे. NOTE इस केस को आगे ले के गई और अमिताभ पर गोवा कोर्ट में केस कर दिया.

तपेदिक या टी.बी नियंतरण के लिए आया पैसा इस्तिमाल नही हुआ पश्चिम बंगाल में

तपेदिक या टी.बी नियंतरण के लिए आया पैसा इस्तिमाल नही हुआ पश्चिम बंगाल में

भारत में तपेदिक या टी.बी का दर पश्चिम बंगाल में काफी अधिक है। RNTCP या राष्ट्रीय तपेदिक या टी.बी नियंतरण कार्यक्रम के तहत जो धनराशी पश्चिम बंगाल में तपेदिक या टी.बी के लिए आई थी, वो खर्च नही हो पायी है क्योकि काफी अधिक संख्या में जो लोग तपेदिक या टी.बी से ग्रसित हैं उनको चिन्हित नही किया गया है।

मुख्य चिकित्सा अधिकारियों की बैठक में ये स्पष्ट किया गया कि पश्चिम बंगाल में हर सम्भव प्रयास करना चाहिए कि जिन लोगों को टी.बी है खासकर कि दृग-रेसिस्तंत टी.बी या ऐसी टी.बी जिसपर अधिकांश दवा कारगर नही रहती, उनको चिन्हित करना जरुरी है, उनके लिए हर सम्भव इलाज उपलब्ध करना जरुरी है, और इसके लिए आई धनराशी को इस्तिमाल करना चाहिए।

कल अमरीका में ओमाहा में हाई स्कूल के छात्र को टी.बी हो जाने से खलबली मच गई। स्कूल के बाकि छात्रों के अभिभावकों को बुलाया गया और तपेदिक या टी.बी से संबंधित जानकारी दी गई। इस सत्र के पश्चात सभी अभिभावक संतुष्ट थे। ये एक अच्छा उदाहरण है क्योकि अमरीका में पहले कई स्थानों पर एक बच्चे को टी.बी हो जाने पर जिस तरह से हर बच्चे, हर शिक्षक, अभिभावक आदि को जबरन कोर्ट के आदेश पर टी.बी की जांच के लिए ले जाया गया और अधिकांश ऐसे हादसों में किसी को भी टी.बी या तपेदिक नही निकली थी। ये जरुरी है कि समाज में हड़कंप नही तपेदिक या टी.बी की रोक्धाम के लिए समझ पनपे!

वही अमरीका के कैलिफोर्निया में जहाँ तपेदिक या टी.बी का दर बढ़ रहा है, वह के गोवेर्नोर और फ़िल्म-अभिनेता अर्नोल्ड श्वाजंगर ने १०% बजट कम कर दिया है। इससे तपेदिक या टी.बी के कार्यक्रम के प्रभावित होने की सम्भावना है।

अमरीका और इंग्लैंड की गाय-भैसों में बढ़ती टी.बी. से प्रशासन हरकत में

अमरीका और इंग्लैंड की गाय-भैसों में बढ़ती टी.बी. से प्रशासन हरकत में

बोवीन टी.बी या तपेदिक गाय-भैसों में होती है और जिन गाय-भैसों को ऐसा संक्रमण हो, या तो पशु से सम्पर्क परया उसका कच्चा दूध पीने पर मनुष्य को भी टी.बी या तपेदिक हो सकती है. इस टी.बी की रोकधाम के लिए ऐसे संक्रमित गाय-भैसों को मार दिया जाता है.

अमरीका में पहले ही कैलिफोर्निया प्रदेश में गाय-भैसों में बढ़ती टी.बी पर प्रदेश सरकार काफ़ी चिंतित थी, हाल ही में अन्य प्रदेश जैसे की मिन्नेसोता में भी गाय-भैसों में बढ़ती टी.बी या तपेदिक से मिन्नेसोता प्रदेश सरकार चौकन्ना हो उठी और संक्रमण की रोकधाम के लिए गाय-भैसों का मिन्नेसोता प्रदेश की सरहद लांघना तक मुश्किल हो गया है.

उसी तरह मिचिगन प्रदेश सरकार ने भी चिंता जाहिर की है की गाय-भैसों में टी.बी या तपेदिक का अनुपात बढ़ता जा रहा है.

अमरीका की केंद्रीय सरकार ने अमरीकी डालर १६ मिलियुन मिचिगन, कैलिफोर्निया और मिन्नेसोता प्रदेश में गाय-भैसों में टी.बी या तपेदिक की रोकधाम के लिए प्रदान किए हैं.

इंग्लैंड या ग्रेट ब्रिटेन या यू.के. में भी गाय-भैसों में तपेदिक या टी.बी से सरकार काफ़ी चिंतित है. इंग्लैंडमें १९५० में बोवीन टी.बी या गाय-भैसों में तपेदिक का अनुपात १ प्रतिशत से भी कम हो गया था (यानिकी बोवीन टी.बी या गाय-भैसों में टी.बी खत्म हो गई थी). परन्तु १९७० के दशक में, ये फिर से बढ़ने लगीऔर इस समय इंग्लैंड में काफ़ी संगीन स्थिति है. जिन गाय-भैसों को ऐसी टी.बी होती है, उनको मारदिया जाता है और किसानों को मुआवजा दिया जाता है. सरकार का कहना है की कहाँ तक वो किसानोंको मुआवजा दे क्योकि बोवीन टी.बी का अनुपात इतना अधिक है.

जेल में तम्बाकू नियंत्रण है एक गंभीर चुनौती: IG prisons

जेल में तम्बाकू नियंत्रण है एक गंभीर चुनौती: IG prisons

कर्नाटक के अद्दिशनल महा-निदेशक पुलिस और इंसपेक्टर-जनरल (कारागार) अस.टी.रमेश के अनुसा जेलपरिसर में तम्बाकू नियंत्रण या तम्बाकू नशा उन्मूलन एक गंभीर चुनौती है

डेकन हेराल्ड में प्रकाशित उनके लेख जेल के इतिहास से संबंधित एक रोचक जानकारी प्रस्तुत करता है२६ अप्रैल१९४८ में एक वरिष्ट अधिकारी जो जेल का दौरा कर रहे थे, उनके अनुसार कुछ कम्युनिस्ट कैदियों को उनकी मांगके अनुरूप बीडी मिलनी चाहिएजेल परिसर में तम्बाकू सेवन कानूनन ग़लत नही है क्योकि तम्बाकू की बिक्रीजेल की कैंटीन में कानूनन रूप से होती हैजेल मानुअल के अनुसार जेल की कैंटीन में तम्बाकू उत्पादन का विक्रयहो सकता है

हाल ही में नागपुर जेल में कुछ संवेदनशील अधिकारियों की वजह से जेल परिसर को तम्बाकू मुक्त जेल बनाने काप्रयास हो रहा हैहालांकि जेल मानुअल में ये लिखा हुआ है कि जेल की कैंटीन में तम्बाकू विक्रय हो सकता है, इसके बावजूद भी नागपुर जेल के संवेदनशील अधिकारियों ने जन-स्वास्थ्य और अंतर्राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण केअनुकूल जेल को तम्बाकू मुक्त परिसर बनाने की ठान ली हैये नि:संदेह प्रशंसनिये प्रयास है और अन्य जेलप्रसाशन को भी इस पर अमल करना चाहिए और जेल मानुअल को परिवर्तित करना चाहिए

ये इसलिए भी जरुरी है क्योकि सिर्फ़ धूम्र्पानी के अधिकार की बात नही है, बल्कि जेल के अन्य कैदियों और कराम्चारियों आदि के स्वास्थ्य और अधिकारों की बात है। परोक्ष धूम्रपान से अनेकों लोग जो स्वयं धूम्रपान नही करते बल्कि बंद कमरे में या बंद परिसर में अन्य कोई धूम्रपान कर रहा हो तो जलती तम्बाकू से निकलते हुए धुए को सभी उपस्थित लोग उसको श्वास द्वारा अन्दर फेफडे में लेते हैं, और तम्बाकू जनित बीमारियों का खतरा सबके लिए बढ़ जाता है - जो लोग धूम्रपान कर रहे हों और जो लोग धूम्रपान न कर रहे हों परन्तु उस बंद परिसर में उपस्थित हों जहा धूम्रपान हो रहा हो।

तम्बाकू उत्पादनों पर निकोटीन और टार की मात्र कब देखने को मिलेगी डॉ रामादोस?

तम्बाकू उत्पादनों पर निकोटीन और टार की मात्र कब देखने को मिलेगी डॉ रामादोस?

भारत के केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री डॉ अंबुमणि रामादोस ने कहा कि:

"अब बिना विलम्ब आकास्मक स्तर पर ६० करोड़ भारतीयों को, जिनकी उमर ३० साल से कम है, उनको तम्बाकू, शराब, और फास्ट-फ़ूड से बचाने की आवश्यकता है"

डॉ रामादोस ने फ़िल्म और खेल जगत के सितारों से अपील की कि वे लोग विज्ञापनों के जरिये शराब, तम्बाकू और फास्ट-फ़ूड आदि को समर्थन देना बंद करे. डॉ रामादोस ने कहा कि युवाओं की उमर ऐसी होती है कि वह आकर्षक जीवनशैली फैशन को देख के वो अक्सर भ्रमित हो जाते हैं.

डॉ रामादोस ने ये भी कहा कि:
"शराब के मसले पर तवज्जो देने की जरुरत है: मात्र ४ प्रदेशों में शराब प्रतिबंधित है – जम्मू कश्मीर, मिजोरम, मणिपुर और गुजरात"

स्वास्थ्य मंत्रालय के कुछ संभावित प्रयासों के बारे में डॉ रामादोस ने कहा कि सरकार सब खाद्य-पदार्थों के लिए ये जरुरी कर देगी कि वो अपनी पोषण तत्वों की जानकारी लेबल में दे. ऐसा ‘२ महीनों’ में होने की सम्भावना है. सब खाद्य-पदार्थों के पैकेट को फट, प्रोटीन, अन्य पोषण तत्त्व और कैलोरी भी दिखानी आवश्यक हो जायेगी.

परन्तु The Cigarette and Other Tobacco Products Act (2003) या सिगरेट एवं अन्य तम्बाकू उत्पादन अधिनियम (२००३) के अनुसार, हर सिगरेट या तम्बाकू उत्पादनों पर निकोटीन और टार की मात्र दिखाना अनिवार्य होना चाहिए. परन्तु भारत में २००३ के इस जन-स्वास्थ्य अधिनियम को लागु करने में बहुत वक्त लगेगा.

सिगरेट एवं अन्य तम्बाकू उत्पादन अधिनियम (२००३) के अनुसार:

"कोई भी व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से, न तो ऐसा तम्बाकू उत्पादन बनाये, या supply करे, या विक्रय करे जिसके लेबल पर ये न लिखा हो कि इसमे कितनी निकोटीन या टार है, और ये निकोटीन और तर की मात्र इस अधिनियम के तहत बनने वाले रूल्स के तहत ‘अधिकतम निकोटीन और तर की मात्र’ से कम होनी चाहिए"

भारत नि:संदेह अभी बहुत दूर है ऐसे जन-स्वास्थ्य के प्रति सचेत अधिनियमों को लागु करने में. अभी हाल ये है कि तम्बाकू उत्पादनों पर फोटो वाली चेतावनी के ऊपर चुने हुए प्रतिनिधियों की सहमति तक नही बन पा रही है, और पश्चिम बंगाल के मुख्य मंत्री बुद्धदेब साहिब ने डॉ रामादोस की अपील और भारतीय कानून की खुली अवहेलना करने का हौसला भरा कि वो अपने कार्यालय में ही (जो सरकारी कार्यालय है) धूम्रपान करेंगे.

शराब शुक्र है कि कम से कम ४ प्रदेशों में प्रतिबंधित है परन्तु तम्बाकू एक भी शहर में प्रतिबंधित नही है जब कि ये हम भली-भाँती जानते हैं कि तम्बाकू किस कदर जन-लेवा नशा है.

पोस्को (POSCO) स्टील प्रोजेक्ट से उड़ीसा में कौन लाभान्वित होगा?

पोस्को (POSCO) स्टील प्रोजेक्ट से उड़ीसा में कौन लाभान्वित होगा?

डॉ सनत मोहंती और संदीप दास्वेर्मा

ये लेख सनत और संदीप द्वारा लिखा गया तीन-भाग के लेख-क्रम की आखरी कड़ी है जो उड़ीसा प्रदेश में पोस्को स्टील प्लांट का गहन मूल्यांकन प्रस्तुत करती है. इस लेख का पहला भाग, क्या उड़ीसा में आर्थिक घोटाला होने को है?, पढने के लिए यहा क्लिक्क करें (अंग्रेज़ी, हिन्दी), और दूसरा भाग, पोस्को प्रोजेक्ट उड़ीसा के लिए अभिशाप तो नही?, पढने के लिए यहा क्लिक्क करें (अंग्रेज़ी, हिन्दी).


जैसा कि पहले दो लेखों की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष आर्थिक मूल्यांकन से जाहिर है कि पोस्को प्रोजेक्ट लोगों के हित को ध्यान में रख कर तो नही रचा गया है, सवाल ये उठता है कि आख़िर इससे किसको लाभ होगा और उड़ीसा के लोग इससे किस तरह से प्रभावित होंगे.

बस एक उम्मीद ये है कि सतर्क जन-संगठन और लोकतांत्रिक व्यवस्था जिसमे लोग भी शामिल होते हैं, वो पारदर्शिता बढ़ा सकती है और सबको जवाबदेह भी ठहरा सकती है. उदाहरण के लिए इसी लोकतांत्रिक व्यवस्था और जन-संगठनों के कारण उड़ीसा सरकार अन्य राज्यों के साथ एक संगठन के रूप में भारत सरकार से और पोस्को से बेहतर दाम के लिए मांग करने पर विवश हो गई थी. जो समझौता हुआ है (memorandum ofunderstanding ) उसमें उड़ीसा सरकार दावा करती है कि वो इस प्रोजेक्ट को रफ़्तार से आगे बढ़ाएगी परन्तु लोगों के जीवन पर इस प्रोजेक्ट का क्या प्रभाव पड़ेगा, इस बारे में कोई विचार नही रखती.

उड़ीसा प्रदेश सरकार को जवाबदेह ठहराना

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उड़ीसा के लोगों को उड़ीसा सरकार से अधिक पारदर्शी होने की मांग करनी चाहिए, और पोस्को प्रोजेक्ट की योजना की समस्त जानकारी लोगों को उपलब्ध होनी चाहिए. क्या इस योजना में ये विचार किया गया है कि इस प्रोजेक्ट से जो अवसर उड़ीसा के लोग और प्रदेश खोयेगा, उसकी कीमत क्या है? जो भू-जल या जमीन के भीतर से भारी मात्र में पोस्को स्टील प्लांट पानी निकालेगा, उसकी कीमत क्या है और उसका क्या प्रभाव पड़ेगा वहा की स्थानिये लोगों पर? जो लोग इस प्रोजेक्ट से विस्थापित हो रहे हैं, उनके पुनर्स्थापन की क्या कीमत है? ये साफ ज़ाहिर है कि प्रोजेक्ट के आस-पास कृषि कर रहे लोगों पर इसका कु-प्रभाव पड़ेगा. इस कु-प्रभाव की क्या कीमत है? लाखों लोगों की आजीविका कुंठित होगी, उसकी क्या कीमत है? ये स्पष्ट ज़ाहिर है कि इस प्रोजेक्ट से लाखों लोगों को नौकरी नही मिलेगी. कृषि में जो नुकसान होगा उसका अनुमान लगाया जा सकता है - रुपया १०० करोड़ प्रति वर्ष जो इस प्रोजेक्ट से साल भर में लोगों को प्राप्त होने वाली कुल तनख्वाह के बराबर है. इससे कई सवाल उठते हैं जिनका जवाब उड़ीसा सरकार को देना चाहिए और उड़ीसा के लोगों को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि उड़ीसा सरकार जवाब दे:

* इस प्रोजेक्ट से कृषि में नुकसान का मूल्य सरकारी आक्डें क्या बताते हैं? (नि: संदेह उड़ीसा सरकार ने इसका मूल्यांकन किया होगा यदि वो बिल्कुल ही व्यर्थ नही है तो!)

* इस प्रोजेक्ट से भूजल दोहन की और प्लांट से निकलने वाले गंदे दूषित पानी का कैसे उपचार होना चाहिए, इसकी उड़ीसा सरकार ने क्या कीमत लगाई है?

* उड़ीसा सरकार इन सब चुनौतियों से निबटने के लिए क्या योजना बना रही है? इस प्रोजेक्ट से प्राप्त धनराशी से क्या वो कृषि से होने वाली हानि की भरपाई करेगी, और लोगों के लिए बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था बनाएगी, शिक्षा के केन्द्र बनाएगी? या वो इस धन से लोगों के लिए लघु-उद्योग स्थापित करेगी? उड़ीसा सरकार के पास इस प्रकार की ठोस योजना होनी चाहिए और लोगों तक ये योजना पहुचनी भी चाहिए.

कुल मिलकर उड़ीसा के लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से इस प्रोजेक्ट से मिलने वाला लाभ रुपया १२० करोड़ का होगा जो वार्षिक वेतन के रूप में इस प्रोजेक्ट में रोज़गार प्राप्त लोगों को मिलेगा, इस पैसे से स्थानिये अर्थ-व्यवस्था मजबूत होगी. वही दूसरी ओर उड़ीसा के लोगों को रुपया १८० करोड़ का नुकसान हो रहा है इस प्रोजेक्ट को जमीन उपलब्ध करा के, रुपया ७५ करोड़ प्रति वर्ष की मूल्य का पानी जो इस प्रोजेक्ट में इस्तिमाल होगा, रुपया १०० करोड़ प्रति वर्ष का नुकसान कृषि को होगा, और रुपया ,४०० - ,६०० करोड़ के मूल्य का कर का नुकसान इस प्रोजेक्ट की पूरी अवधि में उड़ीसा सरकार को होगा.

इसके अलावा उड़ीसा सरकार जो कोयला, १२ मेगा टन प्रति वर्ष की स्टील बनाने में लगेगा, उसकी कीमत पर और उससे संबंधित कर का नुकसान भी उठाएगी.

उड़ीसा सरकार और पोस्को के मध्य इस प्रोजेक्ट से लोगों को भारी नुकसान होगा, और इस प्रोजेक्ट से जो लाभ मिल रहा है वो नि:संदेह अत्यन्त कम है. क्या उड़ीसा सरकार ये बताएगी कि ये डील उड़ीसा प्रदेश के लिए और लोगों के लिए क्यो और कैसे लाभकारी है?

भारत में लोहे के ओर की खदानों में ओर की मात्रा लगभग १८ अरब टन है जिसमे से उड़ीसा प्रदेश में . अरब टन है. उड़ीसा सरकार पोस्को को अरब टन लोहे का ओर देने को तैयार है, जिसमे से ४०० मेगा टन कोरिया को निर्यात हो जाएगा.

उड़ीसा सरकार इस आर्थिक घोटाले की बात करने को राज़ी नही है और ही इस प्रोजेक्ट की अप्रत्यक्ष कीमत से संबंधित चर्चा पर. जो भी ऐसे सवाल उठा रहे हैं उनको उड़ीसा-प्रदेश के ख़िलाफ़ समझा जा रहा है. प्रदेश के अफसर और राजनीतिज्ञ उन लोगों को डरा धमका रहे है जो इस प्रकार के सवाल उठाने का दम रखते हैं.

ये स्पष्ट है कि ये डील उड़ीसा प्रदेश के लिए - 'जीत-जीत-हार' वाली डील है. पोस्को 'जीत' रहा है, उड़ीसा प्रदेश सरकार के राजनीतिज्ञों और अफसरों के लिए ये 'जीत' है और उड़ीसा के लोगों के लिए ये एक 'हार' का सौदा है.

कोई भी तर्क या कारण समझ से परे है जो ये सफ़ाई दे सके कि इस प्रोजेक्ट से क्यो लोहे के ओर इतनी कम मूल्य पर और किन शर्तों पर बेचे जा रहे है! परन्तु ये डील अभी हुई नही है, और जागरूक सतर्क और सचेत उड़ीसा के लोग ही उड़ीसा सरकार को आर्थिक और विकास के लिए जिम्मेदार और जवाबदेह ठहरा सकते हैं.

हमारा ये भी मानना है कि इस प्रोजेक्ट में विस्थापन और पुनर्स्थापन का मुद्दा भी लोगों का ध्यान बाटने का प्रयास है. इस डील से रुपया २५०,००० करोड़ जो पोस्को को सब्सिडी आदि के जरिये प्राप्त होगा, उसपर लोगों का ध्यान ही नही है.

ये एक कारण हो सकता है कि क्यो पोस्को के प्रतिद्वंदी कम्पनियाँ जैसे कि टाटा, मित्ताल्स एंड जिन्दल्स आदि खामोश है, क्योकि सम्भावता उनको भी कुछ इसी तरह से मगर छोटे स्तर पर उड़ीसा सरकार ने जायज़-नाजायज़ लाभ दिए होंगे.

पोस्को स्टील प्रोजेक्ट में आर्थिक मुद्दे को केंद्रीय मुद्दा मानना चाहिए, ऐसा हमारा मानना है, और सरकार को जिम्मेदार और जवाबदेह ठहराना चाहिए.

उड़ीसा सरकार की भ्रष्टाचार की ओर झुकाव को देख कर ये लगता है कि इस प्रोजेक्ट के मूल्यांकन में और हर कदम पर लोगों की भागीदारी अति-आवश्यक है जिससे कि एक पारदर्शी प्रक्रिया कायम हो सके और लोगों को ये पता रहे कि जो पैसा इस प्रोजेक्ट से प्राप्त हो रहा है, वो कहाँ खर्च किया जा रहा है और उससे लोग सही मायने में कहा तक लाभान्वित हो रहे हैं? और ऐसी प्रक्रिया के लिए संघर्ष में मुख्य भूमिका उड़ीसा के ही लोगों को निभानी चाहिए.

डॉ सनत मोहंती और संदीप दासवर्मा

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ये लेख सनत और संदीप द्वारा लिखा गया तीन-भाग के लेख-क्रम की आखरी कड़ी है जो उड़ीसा प्रदेश में पोस्को स्टील प्लांट का गहन मूल्यांकन प्रस्तुत करती है. इस लेख का पहला भाग, क्या उड़ीसा में आर्थिक घोटाला होने को है?, पढने के लिए यहा क्लिक्ककरें (अंग्रेज़ी, हिन्दी), और दूसरा भाग, पोस्को प्रोजेक्ट उड़ीसा के लिए अभिशाप तो नही?, पढने के लिए यहा क्लिक्क करें (अंग्रेज़ी, हिन्दी).