वरुण गाँधी के भड़काऊ भाषणों का आख़िर मतलब क्या है?

वरुण गाँधी के भड़काऊ भाषणों का आख़िर मतलब क्या है?

(नोट: यह लेख मौलिक रूप से अंग्रेज़ी में डॉ संदीप पाण्डेय द्वारा लिखा गया है, जिसको पढ़ने के लिए यहाँ पर क्लिक कीजिये . नीचे इस लेख के भाग का हिन्दी अनुवाद करने का प्रयास किया गया है, त्रुटियों के लिए छमा कीजियेगा)

प्रसिद्ध होने के लिए वरुण गाँधी ने छोटा रास्ता अपनाया है. भड़काऊ भाषण के पहले तक वोह भारतीय जनता पार्टी का मात्र एक मामूली सदस्य था. आज वोह राष्ट्रीय स्तर पर महत्व रखने वाला एल.के अडवाणी और नरेन्द्र मोदी के श्रेणी का राजनेता है जो सांप्रदायिक हिंसा को बढ़ावा देते हैं. किसी भी बी.जे.पी के नेता का ऐसा भड़काऊ भाषण देना चौकाने वाली बात नहीं है. बी.
जे.पी तो मुसलमानों के ख़िलाफ़ राजनीति करती ही है. यदि मुसलमानों के ख़िलाफ़ और पाकिस्तान के ख़िलाफ़ की राजनीति हटा दी जाए तो संघ परिवार के अस्तित्व पर बन आएगी. इस परिपेक्ष्य में हिंदुत्व संगठन मूलतः प्रतिक्रियावादी रहे हैं. उन्होंने हमेशा भड़काऊ भाषा का प्रयोग कर के ध्यान आकर्षित करने का प्रयास किया है और हिंसा के प्रयोग से अपने मौजूदगी का एहसास कराया है. गांधीजी की हत्या से ले कर, बाबरी मस्जिद के गिराने तक, परमाणु परीक्षण से ले कर गुजरात हत्याकांड तक, उड़ीसा और कर्नाटक में ईसाईयों के विरोध में हिंसा तक अनेकों ऐसे मामले इस बात की पुष्टि करने वाले उदाहरण मिल जायेंगे. पिछले लोक सभा चुनाव में तो बी.जे.पी ने 'इंडिया शाइनिंग' के स्लोगन के साथ चुनाव लड़ा जिसकी भारी कीमत चुनाव में उसको चुकानी पड़ी.

इस बात पर आश्चर्य होता है कि यह सांप्रदायिक भड़काऊ बातें वरुण गाँधी ने कहीं क्योंकि उसकी माँ एक सिख है और दादा पारसी, और वरुण के कट्टरपंथी हिंदुत्व वाली यह बातें नि:संदेह चौका देती हैं. उसने ऐसी भड़काऊ बातें क्यों कहीं? क्या उसको किसी ने पाठ पढ़ाया था? या बी.जे.पी के प्रति अपनी वफादारी दिखने के उत्साह में वोह ऐसा बोल गया? या फिर बी.जे.पी नए बारूद को पुरानी तोप में इस्तेमाल कर रही है?

बी.जे.पी, जो आगामी लोक सभा चुनाव से पहले अंदरूनी मतभेदों और निराशाजनक नेतृत्व के कारणवश दिशाहीन महसूस कर रही थी, एक दम से जी उठी है. एक लंबे अरसे से बी.जे.पी कोशिश कर रही थी कि कांग्रेस के विकल्प के रूप में वोह एक प्रगतिशील पार्टी के रूप में उभर कर आए, परन्तु वरुण गाँधी के भड़काऊ भाषण के बाद एक झटके में पार्टी वापस मुसलमान विरोधी राजनीति पर वापस आ गई है. नरेन्द्र मोदी ने भरसक प्रयास किया था कि गुजरात को विकास के मॉडल के रूप में पेश किया जाए और गुजरात में २००२ के नरसंघार को भुलाने की पूरी कोशिश की थी.

पिछले प्रदेश के चुनावों में बी.जे.पी के मुख्यमंत्रियों ने विकास के लिए अपने योगदान को आगे रखा, और मुंबई में आतंकवादी हमले को सँभालने में असफल रही कांग्रेस को मुद्दा बनाने का प्रयास नहीं किया था. परन्तु लगता है कि बी.जे.पी के कार्यकर्ताओं को नशेड़ी की तरह यदि कोई चीज़ प्रेरित करती है तो वोह मुस्लमान विरोधी जहर उगलना ही है.

आर.एस.एस को यह समझ में आ जाना चाहिए कि सांप्रदायिक हिंसा की राजनीति बार-बार नहीं उनको मनचाहे नतीजे दे सकती है. इंसान मूलतः समाज में शान्ति से मिलजुल कर रहना चाहता है. एक-आद बार वोह सांप्रदायिक जहर से बहकावे में आ सकता है पर जल्दी ही उसे समझ में आ जाता है कि सांप्रदायिक राजनीति से आख़िर में उसका नुक्सान ही है. उदाहरण के तौर पर एक बार बाबरी मस्जिद गिराने के लिए लोगों को एकजुट करना आसान है, परन्तु दुबारा उन्हें मन्दिर निर्माण के लिए अयोध्या लाना आसान नहीं है. अयोध्या के अधिकाँश साधू और महंत राम-मन्दिर निर्माण के विरोध में हैं क्योंकि इसकी वजह से उनकी शान्ति और आमदनी दोनों समाप्त हो गई है. नरेन्द्र मोदी अब दुबारा २००२ के नरसंघार को अंजाम नहीं दे सकते हैं. साध्वी रिथाम्भारा और ऊमा भारती के नफरत और वैमनस्य भरे जहरीले भाषण अब लोगों पर असर नहीं करते हैं. इसीलिए संभवत: बी.जे.पी एक नए नेता की तलाश कर रही है जो वही सांप्रदायिक भड़काऊ आग उगल सके. परन्तु बी.जे.पी को समझ में आ जाना चाहिए कि यदि वरुण गाँधी इसी तरह से बात करते रहेंगे तो अपने आप को राजनीति में अधिक अवधि तक नहीं रख पाएंगे और लोग उनकी सभाओं में जाना ही बंद कर देंगे.

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डॉ संदीप पाण्डेय

- लेखक, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय के राष्ट्रीय समन्वयक हैं, लोक राजनीति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्षीय मंडल के सदस्य हैं, और रामों मग्सय्सय पुरुस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता हैं। ईमेल: ashaashram@yahoo.com

(नोट: यह लेख मौलिक रूप से अंग्रेज़ी में डॉ संदीप पाण्डेय द्वारा लिखा गया है, जिसको पढ़ने के लिए यहाँपर क्लिक कीजिये . नीचे इस लेख के भाग का हिन्दी अनुवाद करने का प्रयास किया गया है, त्रुटियों के लिए छमा कीजियेगा)

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