हर एचआईवी पॉज़िटिव व्यक्ति को एआरटी इलाज देने की नयी सरकारी नीति सराहनीय

हर एचआईवी पॉज़िटिव व्यक्ति को (बिना सीडी4 जांच के) अब सरकारी एड्स स्वास्थ्य सेवा केंद्रों से नि:शुल्क एंटिरेटरोवाइरल (एआरटी) दवा मिलेगी। अभी तक सिर्फ़ उन एचआईवी पॉज़िटिव लोगों को नि:शुल्क दवा मिलती थी जिनका सीडी4 जाँच 500 से कम होती थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने तो 2015 में ही वैज्ञानिक प्रमाण को देखते हुए यह निर्णय ले लिया था कि हर एचआईवी पॉज़िटिव व्यक्ति को एंटिरेटरोवाइरल दवा मिलनी चाहिए और एआरटी दवा मिलना सीडी4 जाँच पर निर्भर नहीं होना चाहिए।

[पॉडकास्ट] जन-स्वास्थ्य इस सप्ताह: टीबी और हार्ट अटैक पर नयी मार्गदर्शिकाएं, अस्थमा और तम्बाकू निषेध दिवस, और मेक्सिको में ट्रेकोमा उन्मूलन


[पॉडकास्ट सुने या डाउनलोड करें] जन स्वास्थ्य इस सप्ताह, सीएनएस की साप्ताहिक पॉडकास्ट सीरीज है जो पिछले सप्ताह से 5 मुख्य जन स्वास्थ्य सम्बन्धी न्यूज़ प्रस्तुत करती है. इस सप्ताह 5 मुख्य जन-स्वास्थ्य सम्बन्धी समाचार इस प्रकार हैं: मेक्सिको में trachoma उन्मूलन का सपना पूरा; हार्ट अटैक पर भारत की पहली राष्ट्रीय मार्गदर्शिका जारी; विश्व स्वास्थ्य संगठन की टीबी मार्गदर्शिका जारी; विश्व अस्थमा दिवस 2017; विश्व तम्बाकू निषेध दिवस 2017. [पॉडकास्ट सुने या डाउनलोड करें]

हर जरूरतमंद को जब तक दमा (अस्थमा) इलाज नहीं मिलेगा, तब तक कैसे पूरे होंगे राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के लक्ष्य?

[वर्ल्ड अस्थमा डे वेबिनार रिकॉर्डिंग] [सुने और डाउनलोड करें पॉडकास्ट] [English] भारत सरकार एवं अन्य 194 देशों की सरकारों ने 2030 तक, गैर-संक्रामक रोगों (जैसे कि दमा/ अस्थमा) से होने वाली असामयिक मृत्यु को एक-तिहाई कम करने का वादा किया है (सतत विकास लक्ष्य/ SDGs). भारत सरकार की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 (National Health Policy 2017) का भी एक लक्ष्य यह है कि भारत में दीर्घकालिक श्वास रोगों (जैसे कि दमा/ अस्थमा) से होने वाली असामयिक मृत्यु 2025 तक, 25% कम हों. पर बिना पक्की चिकित्सकीय जांच और सर्वगत प्रभावकारी इलाज के यह लक्ष्य कैसे पूरे होंगे?

अखिलेश शुक्ला जी की आकास्मक मृत्यु पर शोक

हम सभी के प्यारे मित्र अखिलेश शुक्ला जी का यूँ अचानक से चले जाना बहुत ही पीड़ादायक तथा विश्वास न कर पाने वाली घटना है. आप निश्चित तौर पर एक जीवन्त, खुशनुमा, सज्जन तथा प्रेरक व्यक्तित्व वाले इंसान थे.

आपकी अपूरणीय कमी हम लोगों को सैदाव याद दिलाएगी कि कैसे ह्रदय और रक्त-कोष्ठक रोग हमारी ज़िन्दगी को प्रभावित कर रहे हैं. अखिलेश, आपकी कर्तव्यनिष्ठा, कर्मठता और मूल्यवान जीवन हमें हमेशा प्रेरित करेगा.

सड़क-दुर्घटना-मृत्यु दर 2020 तक आधा करने के वादे के बावजूद थाईलैंड में 'सोंगक्रान' त्यौहार में दर बढ़ा!

थाईलैंड के सोंगक्रान त्यौहार में सड़क-दुर्घटनाएं और सम्बंधित मृत्यु दर, पिछले साल की तुलना में, बढ़ गए हैं (समाचार). यह बेहद चिंताजनक है क्योंकि थाईलैंड का सरकारी वादा तो है 2020 तक सड़क दुर्घटनाओं और मृत्यु दर को आधा करने का! थाईलैंड सरकार जब तक ठोस और कड़े कदम नहीं उठाएगी तब तक यह वादा कैसे पूरा होगा? सामाजिक न्याय की दृष्टि से भी यह अत्यंत पीड़ाजनक है क्योंकि सुरक्षित सड़क और यातायात व्यवस्था तो सभी नागरिकों को मिलनी ही चाहिए.

2025 तक टीबी मुक्त भारत के लिए जरुरी है स्वास्थ्य एवं गैर-स्वास्थ्य वर्गों में साझेदारी

अब इसमें कोई संदेह नहीं कि टीबी मुक्त भारत का सपना सिर्फ स्वास्थ्य कार्यक्रम के ज़रिए नहीं पूरा किया जा सकता है. टीबी होने का खतरा अनेक कारणों से बढ़ता है जिनमें से कुछ स्वास्थ्य विभाग की परिधि से बाहर हैं. उसी तरह टीबी के इलाज पूरा करने में जो बाधाएं हैं वे अक्सर सिर्फ स्वास्थ्य कार्यक्रमों से पूरी तरह दूर हो ही नहीं सकतीं - उदहारण के तौर पर - गरीबी, कुपोषण, आदि. इसीलिए टीबी मुक्त भारत का सपना, सभी स्वास्थ्य और ग़ैर-स्वास्थ्य वर्गों के एकजुट होने पर ही पूरा हो सकता है. इसी केंद्रीय विचार से प्रेरित हो कर, विश्व स्वास्थ्य दिवस 2017 के उपलक्ष्य में, हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला स्थित, हिमाचल प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन (एचपीसीए) के परिसर में, टीबी मुक्त भारत सम्मेलन का आयोजन हुआ.

"टीबी हारेगा, देश जीतेगा" जब हम सब एकजुट होकर टीबी उन्मूलन के लिए कार्य करेंगे!

[English] टीबी (ट्यूबरक्लोसिस या तपेदिक) रोग से बचाव मुमकिन है, दशकों से देश भर में पक्की जांच और पक्का इलाज सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में नि:शुल्क उपलब्ध है, पर इसके बावजूद टीबी जन स्वास्थ्य के लिए एक विकराल चुनौती बना हुआ है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की नवीनतम रिपोर्ट देखें तो भारत में 2015 में, 28 लाख नए टीबी रोगी रिपोर्ट हुए (2014 में 22 लाख थे), 4.8 लाख टीबी मृत्यु हुईं (2014 में 2.2 लाख मृत्यु हुईं थीं), और 79,000 दवा प्रतिरोधक टीबी (मल्टी-ड्रग रेसिस्टेंट टीबी या MDR-TB) के रोगी रिपोर्ट हुए (2015 में 11% वृद्धि). "टीबी उन्मूलन संभव है पर अभी 'लड़ाई' जटिल और लम्बी प्रतीत होती है" कहना है शोभा शुक्ला का जो सीएनएस (सिटीजन न्यूज़ सर्विस) का संपादन कर रही हैं और टीबी उन्मूलन आन्दोलन से दशकों से जुड़ीं हुई हैं.

यदि सतत विकास लक्ष्य हासिल करने हैं तो कार्यसधाकता जरुरी

वैश्विक स्तर पर भारत समेत 190 देशों ने 2030 तक सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करने का वादा तो किया है पर यदि राष्ट्रीय स्तर पर नीतियों, कार्यक्रमों और आँकड़ों को देखें तो संशय होना निश्चित है कि यह वादे कैसे होंगे पूरे? एक ओर सैन्य बजट में बढ़ोतरी तो दूसरी ओर सतत-विकास बजट में कटौती.

सबके सतत विकास का सपना आखिर कब पूरा होगा?

संयुक्त राष्ट्र में, 190 से अधिक देशों की सरकारों ने 2030 तक सतत विकास लक्ष्य (Sustainable Development Goals/ SDGs) पूरे करने का वादा तो किया है पर विभिन्न देशों की आन्तरिक वास्तविकता देखें तो अक्सर सरकारें इन सतत विकास लक्ष्य के विपरीत निर्णय लेती हैं. उदहारण के तौर पर, कुछ देशों में आंतरिक संकट मंडरा रहा है तो कुछ देशों में शक्तिशाली देशों के हमले से प्रशासन-व्यवस्था तार-तार है. भारत समेत अनेक देशों की आर्थिक नीति ऐसी है कि गरीब अधिक गरीबी में धस रहा है और अमीर अधिक अमीर हो रहा है.

टीबी से बचाव और टीबी के इलाज में है सीधा नाता

टीबी फैलने से रोकना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2015 में 28 लाख टीबी के नए रोगी चिन्हित हुए, जो 2014 की तुलना में 6 लाख अधिक है. भारत में 2015 में 480000 टीबी मृत्यु हुईं जो 2014 की तुलना में लगभग दोगुनी हैं. टीबी का इलाज भी सभी जरुरतमंदों को नहीं मिल पा रहा है. एक ओर भारत सरकार का दावा है कि टीबी 2025 तक समाप्त हो जाएगी और दूसरी तरफ यह आकड़ें जो अत्यंत संगीन स्थिति का संकेत दे रहे हैं. हर टीबी रोगी को पक्की जांच और असरकारी दवा नहीं मिलेगी तो टीबी फैलने से कैसे रुकेगी?

[विश्व टीबी दिवस 2017] प्रभावकारी ढंग से टीबी कार्यक्रम क्रियान्वित करना ही सबसे श्रेष्ठ 'वैक्सीन' है

[वेबिनार रिकॉर्डिंग देखें] [वेबिनार ऑडियो पॉडकास्ट सुनें] 2017 विश्व टीबी दिवस से पूर्व यह मूल्यांकन करना लाज़मी है कि दशकों से राष्ट्रीय टीबी कार्यक्रम के सक्रिय होने के बावजूद क्यों भारत में अन्य देशों की तुलना में सबसे अधिक टीबी (तपेदिक) है? वर्तमान में भारत के लगभग हर जिले में अति-आधुनिक जीन-एक्स्पर्ट (Gene Xpert) 'मोलिक्योलर' जाँच विधि उपलब्ध है जो टीबी की पक्की जाँच और दवा प्रतिरोधक टीबी की ठोस जानकारी 2 घंटे के भीतर देती है। 5 लाख से अधिक डॉट्स सेवा केंद्र हैं और डॉट्स स्वास्थ्यकर्मी हैं जो रोगी की मदद करते हैं जिससे इलाज पक्का हो और सफलतापूर्वक पूरा हो सके. सभी जाँच और इलाज सरकारी केंद्रों में नि:शुल्क उपलब्ध है।

लोकतंत्र व गरीब के लिए उत्तर प्रदेश में भाजपा सरकार बनना कोई अच्छी खबर नहीं

डॉ संदीप पाण्डेय, सीएनएस वरिष्ठ स्तंभकार और मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता
उत्तर प्रदेश के 2017 के विधान सभा चुनावों में चौंकाने वाले परिणाम लाते हुए भारतीय जनता पार्टी ने 403 में से 325 सीटें हासिल कर ली हैं। भाजपा का नारा है ‘सबका साथ, सबका विकास,' किंतु न तो 2014 के संसद चुनाव में और न ही ताजा विधान सभा चुनाव में भाजपा ने किसी मुस्लिम को अपना उम्मीदवार बनाया। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी 19.3 प्रतिशत है। भाजपा ने मुस्लिम मतों को भी हासिल करने का कोई प्रयास नहीं किया। भाजपा और उसकी वैचारिक प्रेरणा स्रोत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि उनकी राजनीति में मुसलमानों का कोई स्थान नहीं है।

[विश्व टीबी दिवस 2017] टीबी के पक्के इलाज के लिए जरुरी हैं असरकारी दवाएं

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आँकड़ों के अनुसार दुनिया में सबसे अधिक टीबी भारत में है और दवा प्रतिरोधक टीबी का दर भी सर्वाधिक है। हालाँकि पिछले सालों में निरंतर टीबी दर में 1% से अधिक गिरावट आ रही थी पर 2015 में भारत में न केवल टीबी दर बढ़ गया बल्कि टीबी मृत्यु दर में भी बढ़ोतरी हो गयी. एक जरुरी सवाल यह भी है कि क्या टीबी का इलाज असरकारी दवाओं से हो रहा है?

साफ़ राजनीति की आशा न छोड़ें: उत्तर प्रदेश में 7.57 लाख लोगों ने 'इनमें से कोई नहीं' (नोटा) वोट दिया

हिंदुस्तान टाइम्स, 12 मार्च 2017
2017 उत्तर प्रदेश चुनाव में, लगभग 8 लाख लोगों ने 'इनमें से कोई नहीं' (None Of The Above/ NOTA/ 'नोटा') वोट दिया. 757,643 'नोटा' वोटों की संख्या इस चुनाव में कुल पड़े वोटों में करीब 1% रही. बहराइच के 7 चुनाव क्षेत्रों में सर्वाधिक 'नोटा' वोट पड़े: 21187. सीतापुर में भी लगभग 20,000 'नोटा' वोट पड़े. जाहिर है कि साफ़ सुथरी और इमानदार राजनीति की आशा करने वाले लोगों की संख्या बढ़ रही है. यदि 'नोटा' वोट का सीधा असर चुनाव नतीजे पर पड़ता तो संभवत: चुनाव की सूरत ही अलग होती. गौर करें कि उत्तर प्रदेश में चुनाव मतदान 61% के करीब रहा है जो पिछले चुनावों में हुए मतदान के मुकाबले अधिकतम है.  

[विश्व टीबी दिवस 2017] टीबी उन्मूलन मुश्किल है पर असंभव नहीं!

[English] [विडियो साक्षात्कार देखें] [पॉडकास्ट सुनने या डाउनलोड करने के लिए यहाँ क्लिक करें]
डॉ केके चोपड़ा, निदेशक, नयी दिल्ली टीबी सेंटर
टीबी नियंत्रण कार्यक्रम अनेक दशकों से चल रहे हैं पर जिस अति-धीमी गति से टीबी दरों में गिरावट साल-दर-साल आ रही है उस गति से 2184 साल तक टीबी उन्मूलन हो सकेगा. विश्व स्वास्थ्य संगठन की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, 2015 में तो भारत में टीबी दर में गिरावट के बजाय बढ़ोतरी हो गयी और टीबी मृत्यु दर में भी इजाफा हुआ. भारत सरकार समेत 190 देशों से अधिक की सरकारों ने 2030 तक टीबी उन्मूलन का वादा किया है. पर यह सपना कैसा पूरा हो? यह जानने के लिए सीएनएस (सिटीजन न्यूज़ सर्विस) ने डॉ केके चोपड़ा, निदेशक, नई दिल्ली टीबी सेंटर से मुलाकात की. डॉ केके चोपड़ा, पिछले 33 सालों से टीबी नियंत्रण कार्यों के लिए समर्पित रहे हैं.

[अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2017] गैर-बराबरी और महिला हिंसा पर पर्दा न डालें, उसको समाप्त करें!

डॉ संदीप पाण्डेय, सीएनएस वरिष्ठ स्तंभकार और मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता
महिला दिवस के पहले भारत ने एक उपलब्धि हासिल की। पहली बार सिर्फ महिला कर्मियों द्वारा संचालित एक एअर-इण्डिया वायुयान यात्रियों को दिल्ली से अमरीका के सैन-फ्रांसिसको तक ले गया और फिर वापस लाया। इसमें वायुयान के अंदर ही नहीं बाहर भी अभियंता आदि कर्मी सभी महिलाएं थीं। क्या ये भारत में महिला सशक्तिकरण का प्रतीक है? 

एअर-इण्डिया खुद ही अब कुछ सीटें महिलाओं के लिए अलग से रखता है क्यों कि वर्ष के शुरू में महिलाओं के साथ हवाई यात्रा के दौरान छेड़-छाड़ की घटनाएं सामने आईं थीं। देखा जाए तो महिलाओं के खिलाफ हिंसा की जो घटनाएं देश में घटती हैं उसके आधार पर हम नहीं कह सकते कि देश में महिलाएं सुरक्षित हैं।

भारत में हरेक 3 मिनट में किसी महिला के साथ हिंसा की घटना होती है औा हरेक 9 मिनट में हिंसा करने वाला पति या पति के परिवार का ही कोई व्यक्ति होता है। दहेज के कारण मारी जाने वाली महिलाओं की संख्या प्रति वर्ष आठ हजार से ऊपर होती है। प्रति वर्ष करीब पच्चीस हजार बलात्कार की घटनाएं होती हैं जबकि बलात्कार की सारी घटनाएं दर्ज नहीं की जाती हैं। बलात्कार के इरादे से किए गए हमले तो इसके करीब दोगुने होते हैं। बलात्कार के जो मामले पुलिस दर्ज करती भी है तो उनमें से आरोपियों को सजा बहुत कम मामलों में मिल पाती है। पति या पति के परिवार द्वारा महिला के खिलाफ हिंसा के एक लाख से ज्यादा मामले होते हैं। चालीस हजार के करीब महिलाओं का प्रति वर्ष अपहरण हो जाता है। 

"नोटा" का चुनाव-नतीजे पर सीधा असर क्यों नहीं?

[English] सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब "नोटा" (None Of The Above/ 'नन ऑफ द एबव', यानि 'इनमें से कोई नहीं') का बटन इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर होता है पर चाहे "नोटा" वोटों की संख्या कितनी भी अधिक हो इसका चुनाव नतीजे पर कोई सीधा प्रभाव नहीं पड़ता. एक तरफ चुनाव आयोग का कार्य प्रशंसनीय है कि चुनाव प्रणाली पिछले सालों में निरंतर दुरुस्त हो रही है, अलबत्ता धीरे धीरे. दूसरी ओर लोकतंत्र में "नोटा" अभी भी मात्र 'कागज़ी शेर' जैसा ही है जो चिंताजनक है.

वादा है सड़क दुर्घटनाएं 2020 तक आधी करने का पर उत्तर प्रदेश में 27% वृद्धि!

हिंदुस्तान टाइम्स, 14 फरवरी 2017
उत्तर प्रदेश में सड़क दुर्घटनाओं में 27% वृद्धि हो गयी जो बेहद चिंताजनक है क्योंकि सरकारी वादा तो है 2020 तक सड़क दुर्घटनाओं और मृत्यु दर को आधा करने का! सरकार जब तक ठोस और कड़े कदम नहीं उठाएगी तब तक यह वादा कैसे पूरा होगा? सामाजिक न्याय की दृष्टि से भी यह अत्यंत पीड़ाजनक है क्योंकि सुरक्षित सड़क और यातायात व्यवस्था तो सभी नागरिकों को मिलनी ही चाहिए.

साइकल ट्रैक बड़ी उपलब्धि है या फिर सुपर-ऐक्स्प्रेसवे?

एक्सप्रेसवे से नज़ारा कुछ और पर नाले पर
रहने वालों की हकीकत कुछ और (सीएनएस फोटो)
वर्त्तमान में अधिकांश आबादी साइकल, पैदल और सार्वजनिक यातायात साधन से चलती है, पर हमारे नेता हमें बताते हैं कि बड़ी चौड़ी सड़कें इक्स्प्रेसवे जिसपर मोटोरगाड़ी दौड़ेंगी वो बड़ी उपलब्धि है. पैदल चलने वालों और साइकिल आदि चलाने वालों के लिए यह बड़ी-चौड़ी सड़कें खतरनाक और असुरक्षित भी हो रही हैं. हो सकता है यही हमें भी लगने लगा हो कि बड़ी चौड़ी सड़कें ही विकास का मापक हैं. पर सच्चा सतत विकास उसे ही कहा जाएगा जिसमें सभी लोग सम्मान से समानता के साथ जीवन यापन कर सकें. हमारी सरकार की नीतियों को अधिकांश आबादी की ज़रूरतों को प्राथमिकता के साथ पूरा करना चाहिए.

पुरुष की गैरजिम्मेदारी और असंवेदनशीलता का नतीजा है अनचाहा गर्भ और असुरक्षित गर्भपात

गर्भपात और अनचाहे गर्भ पर नेपाल के पहले राष्ट्रीय शोध ने गंभीर सवाल उठाये हैं. नेपाल में गर्भपात पर 2002 से कोई कानूनी रोक नहीं है और पिछले सालों में प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता भी बहुत बढ़ी है. पर इसके बावजूद अनेक महिलाएं (58%) असुरक्षित गर्भपात करवा रही हैं. नेपाल और अन्य 190 देशों ने संयुक्त राष्ट्र 2015 महासभा में सतत विकास लक्ष्य (Sustainable Development Goals/ SDGs) हासिल करने का वादा किया है जिनमें लिंग-जनित असमानता समाप्त करने और सभी लड़कियों/ महिलाओं तक प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएँ पहुचाने के लक्ष्य शामिल हैं.

क्या इन्टरनेट पर उपलब्ध 'पोर्न' (अश्लील विडियो, फोटो) हमारी मानसिकता विकृत कर रहा है?

नव भारत टाइम्स, 9 फरवरी 2017
चंद महीनों की बच्चियों तक के साथ क्रूरतम दरिन्दिगी के समाचार हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि ऐसा कौन सा कारण है जो मनुष्य को यह घिनोना कृत करने को उकसाता है? इस चरम दरिन्दिगी को सिर्फ यौनिक अपराध कह देना पर्याप्त नहीं है. क्या इसके लिए कुछ हद तक इन्टरनेट पर उपलब्ध 'पोर्न' या अश्लील विडियो और तस्वीरें जिम्मेदार हो सकती हैं?

"कोई नवजात शिशु एचआईवी पोसिटिव न हो" इस सपने को एड्स कार्यक्रम साकार करे

थाइलैंड और श्री लंका जैसे कुछ देशों ने एचआईवी पॉज़िटिव मातापिता से बच्चे को होने वाले एचआईवी संक्रमण को पूर्ण रूप से समाप्त कर दिया है। सभी गर्भवती महिलाओं को एचआईवी जाँच प्रदान करना, जो एचआईवी के साथ जीवित हों उन्हें नेविरापीन-वाली दवा का इलाज आदि नि:शुल्क प्रदान करवाना और बच्चे के जन्मोपरांत पहले 6 माह सिर्फ़ माँ का स्तनपान करवाना (और कोई आहार नहीं) जैसे प्रमाणित कार्यक्रमों के ज़रिए इन देशों ने यह जन स्वास्थ्य के लिए बड़ी उपलब्धि हासिल की है. इसके साथ ही इन देशों में जो महिलाएँ गर्भावस्था के दौरान एचआईवी पॉज़िटिव पायी गयीं थीं उनको पूरी उम्र नि:शुल्क अंतिरेट्रोविरल दवा मिलती है जिससे कि वे सामान्य ज़िंदगी जी सकें।

कैंसर मृत्यु दर में तेज़ी से गिरावट के बगैर 2030 के वायदे पूरे करना संभव नहीं

(वेबिनार रिकॉर्डिंग, पॉडकास्ट) विश्व कैंसर दिवस 2017 पर सरकार को यह मूल्यांकन करना जरुरी है कि विभिन्न प्रकार के कैंसर की दर कितनी तेज़ी से कम हो रही है ताकि भारत सरकार अपने वायदे अनुसार, 2030 तक कैंसर मृत्यु दर में एक-तिहाई गिरावट ला सके (सतत विकास लक्ष्य या एस.डी.जी.).