विश्व स्वास्थ्य संगठन के आँकड़ों के अनुसार दुनिया में सबसे अधिक टीबी भारत में है और दवा प्रतिरोधक टीबी का दर भी सर्वाधिक है। हालाँकि पिछले सालों में निरंतर टीबी दर में 1% से अधिक गिरावट आ रही थी पर 2015 में भारत में न केवल टीबी दर बढ़ गया बल्कि टीबी मृत्यु दर में भी बढ़ोतरी हो गयी. एक जरुरी सवाल यह भी है कि क्या टीबी का इलाज असरकारी दवाओं से हो रहा है?
साफ़ राजनीति की आशा न छोड़ें: उत्तर प्रदेश में 7.57 लाख लोगों ने 'इनमें से कोई नहीं' (नोटा) वोट दिया
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| हिंदुस्तान टाइम्स, 12 मार्च 2017 |
[विश्व टीबी दिवस 2017] टीबी उन्मूलन मुश्किल है पर असंभव नहीं!
[English] [विडियो साक्षात्कार देखें] [पॉडकास्ट सुनने या डाउनलोड करने के लिए यहाँ क्लिक करें]
टीबी नियंत्रण कार्यक्रम अनेक दशकों से चल रहे हैं पर जिस अति-धीमी गति से टीबी दरों में गिरावट साल-दर-साल आ रही है उस गति से 2184 साल तक टीबी उन्मूलन हो सकेगा. विश्व स्वास्थ्य संगठन की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, 2015 में तो भारत में टीबी दर में गिरावट के बजाय बढ़ोतरी हो गयी और टीबी मृत्यु दर में भी इजाफा हुआ. भारत सरकार समेत 190 देशों से अधिक की सरकारों ने 2030 तक टीबी उन्मूलन का वादा किया है. पर यह सपना कैसा पूरा हो? यह जानने के लिए सीएनएस (सिटीजन न्यूज़ सर्विस) ने डॉ केके चोपड़ा, निदेशक, नई दिल्ली टीबी सेंटर से मुलाकात की. डॉ केके चोपड़ा, पिछले 33 सालों से टीबी नियंत्रण कार्यों के लिए समर्पित रहे हैं.
| डॉ केके चोपड़ा, निदेशक, नयी दिल्ली टीबी सेंटर |
[अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2017] गैर-बराबरी और महिला हिंसा पर पर्दा न डालें, उसको समाप्त करें!
डॉ संदीप पाण्डेय, सीएनएस वरिष्ठ स्तंभकार और मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता
महिला दिवस के पहले भारत ने एक उपलब्धि हासिल की। पहली बार सिर्फ महिला कर्मियों द्वारा संचालित एक एअर-इण्डिया वायुयान यात्रियों को दिल्ली से अमरीका के सैन-फ्रांसिसको तक ले गया और फिर वापस लाया। इसमें वायुयान के अंदर ही नहीं बाहर भी अभियंता आदि कर्मी सभी महिलाएं थीं। क्या ये भारत में महिला सशक्तिकरण का प्रतीक है?
एअर-इण्डिया खुद ही अब कुछ सीटें महिलाओं के लिए अलग से रखता है क्यों कि वर्ष के शुरू में महिलाओं के साथ हवाई यात्रा के दौरान छेड़-छाड़ की घटनाएं सामने आईं थीं। देखा जाए तो महिलाओं के खिलाफ हिंसा की जो घटनाएं देश में घटती हैं उसके आधार पर हम नहीं कह सकते कि देश में महिलाएं सुरक्षित हैं।
भारत में हरेक 3 मिनट में किसी महिला के साथ हिंसा की घटना होती है औा हरेक 9 मिनट में हिंसा करने वाला पति या पति के परिवार का ही कोई व्यक्ति होता है। दहेज के कारण मारी जाने वाली महिलाओं की संख्या प्रति वर्ष आठ हजार से ऊपर होती है। प्रति वर्ष करीब पच्चीस हजार बलात्कार की घटनाएं होती हैं जबकि बलात्कार की सारी घटनाएं दर्ज नहीं की जाती हैं। बलात्कार के इरादे से किए गए हमले तो इसके करीब दोगुने होते हैं। बलात्कार के जो मामले पुलिस दर्ज करती भी है तो उनमें से आरोपियों को सजा बहुत कम मामलों में मिल पाती है। पति या पति के परिवार द्वारा महिला के खिलाफ हिंसा के एक लाख से ज्यादा मामले होते हैं। चालीस हजार के करीब महिलाओं का प्रति वर्ष अपहरण हो जाता है।
महिला दिवस के पहले भारत ने एक उपलब्धि हासिल की। पहली बार सिर्फ महिला कर्मियों द्वारा संचालित एक एअर-इण्डिया वायुयान यात्रियों को दिल्ली से अमरीका के सैन-फ्रांसिसको तक ले गया और फिर वापस लाया। इसमें वायुयान के अंदर ही नहीं बाहर भी अभियंता आदि कर्मी सभी महिलाएं थीं। क्या ये भारत में महिला सशक्तिकरण का प्रतीक है? एअर-इण्डिया खुद ही अब कुछ सीटें महिलाओं के लिए अलग से रखता है क्यों कि वर्ष के शुरू में महिलाओं के साथ हवाई यात्रा के दौरान छेड़-छाड़ की घटनाएं सामने आईं थीं। देखा जाए तो महिलाओं के खिलाफ हिंसा की जो घटनाएं देश में घटती हैं उसके आधार पर हम नहीं कह सकते कि देश में महिलाएं सुरक्षित हैं।
भारत में हरेक 3 मिनट में किसी महिला के साथ हिंसा की घटना होती है औा हरेक 9 मिनट में हिंसा करने वाला पति या पति के परिवार का ही कोई व्यक्ति होता है। दहेज के कारण मारी जाने वाली महिलाओं की संख्या प्रति वर्ष आठ हजार से ऊपर होती है। प्रति वर्ष करीब पच्चीस हजार बलात्कार की घटनाएं होती हैं जबकि बलात्कार की सारी घटनाएं दर्ज नहीं की जाती हैं। बलात्कार के इरादे से किए गए हमले तो इसके करीब दोगुने होते हैं। बलात्कार के जो मामले पुलिस दर्ज करती भी है तो उनमें से आरोपियों को सजा बहुत कम मामलों में मिल पाती है। पति या पति के परिवार द्वारा महिला के खिलाफ हिंसा के एक लाख से ज्यादा मामले होते हैं। चालीस हजार के करीब महिलाओं का प्रति वर्ष अपहरण हो जाता है।
"नोटा" का चुनाव-नतीजे पर सीधा असर क्यों नहीं?
[English] सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब "नोटा" (None Of The Above/ 'नन ऑफ द एबव', यानि 'इनमें से कोई नहीं') का बटन इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर होता है पर चाहे "नोटा" वोटों की संख्या कितनी भी अधिक हो इसका चुनाव नतीजे पर कोई सीधा प्रभाव नहीं पड़ता. एक तरफ चुनाव आयोग का कार्य प्रशंसनीय है कि चुनाव प्रणाली पिछले सालों में निरंतर दुरुस्त हो रही है, अलबत्ता धीरे धीरे. दूसरी ओर लोकतंत्र में "नोटा" अभी भी मात्र 'कागज़ी शेर' जैसा ही है जो चिंताजनक है.वादा है सड़क दुर्घटनाएं 2020 तक आधी करने का पर उत्तर प्रदेश में 27% वृद्धि!
| हिंदुस्तान टाइम्स, 14 फरवरी 2017 |
साइकल ट्रैक बड़ी उपलब्धि है या फिर सुपर-ऐक्स्प्रेसवे?
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| एक्सप्रेसवे से नज़ारा कुछ और पर नाले पर रहने वालों की हकीकत कुछ और (सीएनएस फोटो) |
पुरुष की गैरजिम्मेदारी और असंवेदनशीलता का नतीजा है अनचाहा गर्भ और असुरक्षित गर्भपात
गर्भपात और अनचाहे गर्भ पर नेपाल के पहले राष्ट्रीय शोध ने गंभीर सवाल उठाये हैं. नेपाल में गर्भपात पर 2002 से कोई कानूनी रोक नहीं है और पिछले सालों में प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता भी बहुत बढ़ी है. पर इसके बावजूद अनेक महिलाएं (58%) असुरक्षित गर्भपात करवा रही हैं. नेपाल और अन्य 190 देशों ने संयुक्त राष्ट्र 2015 महासभा में सतत विकास लक्ष्य (Sustainable Development Goals/ SDGs) हासिल करने का वादा किया है जिनमें लिंग-जनित असमानता समाप्त करने और सभी लड़कियों/ महिलाओं तक प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएँ पहुचाने के लक्ष्य शामिल हैं.
क्या इन्टरनेट पर उपलब्ध 'पोर्न' (अश्लील विडियो, फोटो) हमारी मानसिकता विकृत कर रहा है?
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| नव भारत टाइम्स, 9 फरवरी 2017 |
"कोई नवजात शिशु एचआईवी पोसिटिव न हो" इस सपने को एड्स कार्यक्रम साकार करे
कैंसर मृत्यु दर में तेज़ी से गिरावट के बगैर 2030 के वायदे पूरे करना संभव नहीं
(वेबिनार रिकॉर्डिंग, पॉडकास्ट) विश्व कैंसर दिवस 2017 पर सरकार को यह मूल्यांकन करना जरुरी है कि विभिन्न प्रकार के कैंसर की दर कितनी तेज़ी से कम हो रही है ताकि भारत सरकार अपने वायदे अनुसार, 2030 तक कैंसर मृत्यु दर में एक-तिहाई गिरावट ला सके (सतत विकास लक्ष्य या एस.डी.जी.).
संविधान की मौलिक भावना व उसके मूल्यों को खतरा
डॉ संदीप पाण्डेय, सीएनएस स्तंभकार और मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित कार्यकर्ता 
वैसे तो हमारा लोकतंत्र धीरे-धीरे संविधान की भावना और उसमें निहित मूल्यों से दूर जा ही रहा था, नरेन्द्र मोदी की सरकार ने उस गति को और तेज कर दिया है। संविधान के पहले वाक्य में ही भारतीय गणराज्य के जो चार आधार स्तंम्भ बताए गए हैं - सम्प्रभुता, समाजवाद, धर्मनिर्पेक्षता व लोकतंत्र - वे ही डगमगाने लगे हैं। सम्प्रभुता का अर्थ है हम अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं या हम स्वायत्त हैं। लेकिन कितने ऐसे आर्थिक नीतियों से सम्बंधित निर्णय हैं जो हम अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों अथवा अमीर देशों जैसे अमरीका के दबाव में लेते हैं। इतना ही नहीं कई बार तो देशी-विदेशी बड़ी कम्पनियां ही निर्णयों को प्रभावित करती हैं।

वैसे तो हमारा लोकतंत्र धीरे-धीरे संविधान की भावना और उसमें निहित मूल्यों से दूर जा ही रहा था, नरेन्द्र मोदी की सरकार ने उस गति को और तेज कर दिया है। संविधान के पहले वाक्य में ही भारतीय गणराज्य के जो चार आधार स्तंम्भ बताए गए हैं - सम्प्रभुता, समाजवाद, धर्मनिर्पेक्षता व लोकतंत्र - वे ही डगमगाने लगे हैं। सम्प्रभुता का अर्थ है हम अपने निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं या हम स्वायत्त हैं। लेकिन कितने ऐसे आर्थिक नीतियों से सम्बंधित निर्णय हैं जो हम अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों अथवा अमीर देशों जैसे अमरीका के दबाव में लेते हैं। इतना ही नहीं कई बार तो देशी-विदेशी बड़ी कम्पनियां ही निर्णयों को प्रभावित करती हैं।
गांधी होने का मतलब
डॉ संदीप पाण्डेय, सीएनएस स्तंभकार और मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता
इधर खादी व ग्रामोद्योग आयोग के कैलेण्डर पर चरखे के साथ महात्मा गांधी की जगह नरेन्द्र मोदी की तस्वीर छपने से कुछ विवाद खड़ा हुआ है। मोदी समर्थक पूछ रहे हैं कि जब नरेन्द्र मोदी की तस्वीर झाड़ू के साथ छप रही थी तब इतना बवाल क्यों नहीं मचा क्यों कि झाड़ू का प्रतीक भी मोदी ने गांधी से ही लिया है? गांधी का चश्मा स्वच्छ भारत अभियान के प्रतीक चिन्ह के रूप में जगह जगह छप रहा है।
| गाँधी प्रिंटिंग प्रेस,दक्षिणअफ्रीका:गांधीजी यहाँ से अखबार निकलते थे |
नए टीबी शोध ने जन-स्वास्थ्य जगत को चेताया: बुनियादी संक्रमण नियंत्रण अत्यंत आवश्यक!
टीबी से बचाव मुमकिन है और यदि टीबी रोग हो जाए तो सफल इलाज भी सरकारी स्वास्थ्य सेवा में नि:शुल्क उपलब्ध है. परन्तु यदि टीबी की दवाओं से प्रतिरोधकता उत्पन्न हो जाए, यानि कि, दवाएं टीबी बैक्टीरिया पर बेअसर हो जाए, तो इलाज कठिन होता जाता है. जैसे-जैसे टीबी दवाओं से प्रतिरोधकता बढ़ती जाती है वैसे वैसे इलाज भी कठिन होता जाता है और गंभीर प्रतिरोधकता के कारण मृत्यु तक हो सकती है.
क्या सरकारें 2020 तक सड़क दुर्घटनाओं और सम्बंधित मृत्यु दर को 50% कम कर पाएंगी?
हिंदुस्तान टाइम्स (20 जनवरी 2017) में प्रकाशित समाचार के अनुसार सड़क दुर्घटनाएं और इनमें मृत लोगों विशेषकर कि बच्चों की संख्या बढ़ती जा रही है. ये एक और उदहारण हैं जब सरकारें वादें कुछ और करती हैं और जमीनी हकीकत ठीक विपरीत होती है. भारत सरकार एवं अन्य १९२ देशों की सरकारों ने वादा किया है कि 2020 तक सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मृत्युदर आधा हो जायेगा परन्तु मृत्यु दर तो बढ़ता जा रहा है!
हॉर्न ध्वनि-तीव्रता कम करना ठीक है पर सोचने की बात है कि हमें हॉर्न बजाने की जरुरत क्यों है?
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| हिंदुस्तान टाइम्स (अंग्रेजी दैनिक) |
हाईटि देश में 2010 तक हैजा था ही नहीं: विश्व शांति, सैन्य और स्वास्थ्य नीतियों में तालमेल जरुरी
विभिन्न सरकारी संस्थाएं और वर्ग एकजुट हो समन्वयन करें कि हर प्रकार की लिंग जनित हिंसा समाप्त हो
सिटीजन न्यूज सर्विस - सीएनएस
अनेक सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लखनऊ कार्यालय में युवाओं के लिए स्वास्थ्य सेवाएँ बेहतर करने के आशय से कैसे अंतर-विभागीय और अंतर-वर्गीय समन्वयन में सुधार हो इस पर चर्चा की. हर प्रकार की लिंग जनित हिंसा को समाप्त करने के लिए फॅमिली प्लानिंग एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया ने राष्ट्रीय स्तर पर पहल ली हुई है. स्वास्थ्य को वोट अभियान और अन्य संस्थाओं ने इस पहल को समर्थन दिया है और सरकार से अपील की कि बिना अंतर-विभागीय समन्वयन में सुधार हुए लिंग जनित हिंसा पर विराम लगाना मुश्किल होगा.
अनेक सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के लखनऊ कार्यालय में युवाओं के लिए स्वास्थ्य सेवाएँ बेहतर करने के आशय से कैसे अंतर-विभागीय और अंतर-वर्गीय समन्वयन में सुधार हो इस पर चर्चा की. हर प्रकार की लिंग जनित हिंसा को समाप्त करने के लिए फॅमिली प्लानिंग एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया ने राष्ट्रीय स्तर पर पहल ली हुई है. स्वास्थ्य को वोट अभियान और अन्य संस्थाओं ने इस पहल को समर्थन दिया है और सरकार से अपील की कि बिना अंतर-विभागीय समन्वयन में सुधार हुए लिंग जनित हिंसा पर विराम लगाना मुश्किल होगा.
पांच साल से कम उम्र के बच्चों को निमोनिया-मृत्यु से बचाने के लिए बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ आवश्यक
सिटीजन न्यूज सर्विस - सी एन एस
निमोनिया से बचाव मुमकिन है और इलाज भी संभव है. इसके बावजूद भी निमोनिया 5 साल से कम उम्र के बच्चों में मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है. लखनऊ के नेल्सन अस्पताल के निदेशक और बाल-रोग विशेषज्ञ डॉ अजय मिश्र ने वेबिनार में बताया कि "निमोनिया से बचाव और इलाज दोनों संभव है पर इसके बावजूद निमोनिया 5 साल से कम उम्र के बच्चों में मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है. 2015 में 760000 बच्चों की मृत्यु निमोनिया से हुई.
निमोनिया से बचाव मुमकिन है और इलाज भी संभव है. इसके बावजूद भी निमोनिया 5 साल से कम उम्र के बच्चों में मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है. लखनऊ के नेल्सन अस्पताल के निदेशक और बाल-रोग विशेषज्ञ डॉ अजय मिश्र ने वेबिनार में बताया कि "निमोनिया से बचाव और इलाज दोनों संभव है पर इसके बावजूद निमोनिया 5 साल से कम उम्र के बच्चों में मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है. 2015 में 760000 बच्चों की मृत्यु निमोनिया से हुई.
दीपा कर्माकर का सराहनीय फैसला
रियो ओलम्पिक में जिम्नास्टिक में शानदार प्रदर्शन करने के लिए दीपा कर्माकर को भी पी.वी. सिन्धू व साक्षी मलिक, जिन दोनों ने पदक जीते थे, के साथ हैदराबाद बैडमिंटन एसोशिएसन ने सचिन तेन्दुलकर के हाथों दुनिया की मंहगीं कारों में से एक बी.एम.डब्लू. का उपहार देने के लिए चुना। बी.एम.डब्लू. गाड़ी की कीमत पचास लाख से लेकर एक करोड़ तक हो सकती है। दीपा ने खुद कहा है कि बी.एम.डब्लू. जैसी गाड़ियों के लिए त्रिपुरा, जहां वह रहती हैं, की सड़कें उपयुक्त नहीं हैं और न ही वहां इस गाड़ी की मरम्मत करने वाला कोई मिस्त्री। इसलिए उसने कम कीमत की एक गाड़ी खरीदने का फैसला लिया है। बी.एम.डब्लू. लौटाने का फैसला लेते हुए दीपा ने हैदराबाद बैडमिंटन एसोशिएसन के अध्यक्ष वी. चामुण्डेश्वरनाथ, जिन्होंने असल में गाड़ी दी थी, से कहा कि यदि वे बी.एम.डब्लू. के बदले उसकी कीमत दे सकें तो दे दें अथवा जो भी वह देना चाहें दे दें।बढ़ती सड़क दुर्घटनाएं और मृत्युदर ने सरकारी वादे पर उठाये सवाल
भारत सरकार समेत दुनिया के अन्य 192 देशों की सरकारों ने संयुक्त राष्ट्र महासभा 2015 में सतत विकास लक्ष्य (Sustainable Development Goals या SDGs) को 2030 तक पूरा करने का वादा किया है. इन सतत विकास लक्ष्यों में से एक है (SDG 3.6) कि 2020 तक, सड़क दुर्घटनाओं और मृत्युदर को आधा करना. पर आंकड़ों को देखें तो ये चिंता की बात है कि सड़क दुर्घटनाओं और मृत्युदर में गिरावट नहीं बढ़ोतरी हो रही है.
गंभीर जन स्वास्थ्य चुनौती हैं फेफड़े सम्बंधित रोग
भारत में फेफड़े सम्बंधित रोगों के बढ़ते हुए दर ने जन-स्वास्थ्य के समक्ष एक गंभीर चुनौती उत्पन्न कर दी है. यदि मजबूत, पर्याप्त और समोचित कदम नहीं उठाये गए तो स्वच्छ हवा और स्वस्थ फेफड़े हम लोगों के लिए दुर्लभ हो जायेंगे. 18वें फेफड़े रोगों पर राष्ट्रीय अधिवेशन (नेपकॉन 2016) के आयोजक अध्यक्ष, डायरेक्टर प्रोफेसर (डॉ) केसी मोहंती ने बताया, कि “हाल ही में उत्तर-केन्द्रीय भारत में, ‘स्मोग’ ने आम जन-जीवन कुंठित कर दिया था और उसका अत्याधिक आर्थिक व्यय भी सबको उठाना पड़ा था. यह जन स्वास्थ्य के लिए अत्यंत जरुरी है कि आकस्मिक ठोस कदम लिए जाएँ जिससे कि सभी जन मानस स्वच्छ हवा में स्वस्थ फेफड़े से सांस ले और पूर्ण रूप से देश निर्माण में सहयोग कर सके.”
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