सुपोषण से निमोनिया का बचाव मुमकिन

बच्चों को निमोनिया और कुपोषण से बचाने के लिए पौष्टिक आहार की जरूरत होती है। गोरखपुर के बाल-रोग विशेषज्ञ डॉ कें.एन.द्विवेदी का कहना है कि: "पौष्टिक आहार तो जीवन की धुरी है, जैसे पेट्रोल आप कार में डालते हैं। बच्चे के लिए सबसे अच्छा पोषण 6 महीने तक मां का दूध है।  6 महीने के बाद ठोस आहार की शुरुआत करनी चाहिए। फिर धीरे-धीरे कर के 1 वर्ष तक भोजन बढ़ाना चाहिए। एक साल का बच्चा वह सभी खाना खा सकता है जो बड़े लोग खा सकते है। इसको कई चरणों में बांटा गया है। 0 से 6 महीने तक केवल स्तन पान, 6-9 महीने, 9-11 महीने,11-12 महीने के बीच में खाने की मात्रा थोड़ी-थोड़ी बढ़ाते है। पोषण तो किसी भी शरीर की आधार शिला है।"

डॉ द्विवेदी बताते हैं कि बच्चे के लिए नुकसानदायक आहार क्या है: "शुरू से ही बच्चों को ऊपर का दूध पिला देना, मां का दूध न देना, फास्टफूड खिलाना, खाने में पोषक तत्वों की कमी होना, अच्छा भोजन नहीं देना, संतुलित आहार न देना, समय पर खाना न खिलाना, ये सब नुकसानदेह हैं। बच्चों के विकास के लिए संतुलित आहार अति आवश्यक है।  6 माह तक के शिशु के लिए केवल मां का दूध ही संतुलित आहार है।"

नवजात शिशुओं को जन्म के उपरांत ६ महीने तक एकमात्र माँ का दूध मिलने से उनके शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है. निमोनिया से ही नहीं, बल्कि बहुत सारी बीमारियों से बचाने के लिए स्तनपान जरूरी है। स्तनपान से बच्चों की 'इम्यूनिटी' (प्रतिरोधक क्षमता) अधिक बढ़ती होती है। स्तनपान से निमोनिया होने की सम्भावना कम होती है उस बच्चे की तुलना में जो स्तनपान नहीं कर रहा है। हांलांकि निमोनिया से बचाने के लिए और  भी सावधानियां बरतनी चाहिए जैसे कि ठण्ड से बचाना चाहिए। लेकिन जो  बच्चें स्तनपान कर रहे हैं  उनको निमोनिया होने की सम्भावना कम होती हैं क्योंकि उनकी प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है।

पहले की तुलना में आजकल लोग स्तनपान के बारे में कहीं अधिक जागरूक हैं. "स्तनपान के बारे में जागरूकता बढ़ गयी है। जो महिलाएं पहली बार माँ बनी हैं वें स्तनपान करने का सही तरीका सीखने के लिये बहुत इच्छुक हैं. इस पर जागरूकता अभियान भी चल रहा है। चिकित्सक भी स्तनपान को काफी बढ़ावा देते हैं. देखा जाए तो पहले ली तुलना में, स्तनपानकराने वाली महिलाओं का प्रतिशत बढ़ा है " कहना है डॉ के.एन.द्विवेदी का ।

गोरखपुर की एक बस्ती में रहने वाले श्री प्रदीप श्रीवास्तव बताते हैं कि: "यहां तो अधिकतर माताएं बच्चों को दूध पिलाती हैं, लेकिन कुछ अभी भी नहीं पिलाती हैं। अब तो कई सारे कार्यक्रम चल रहे है जिसकी वजह से माताएं स्तन पान कराने लगी है।"

गोरखपुर की बस्ती में रहने वाली इन्द्रावती बताती है कि उनके नाती को निमोनिया हुआ था. उन्होंने बताया कि: "हमारे नाती को निमोनिया हुआ था। इस बच्चे को मां का दूध 5-6 महीने तक पिलाया गया था और अब उसे गाय का दूध पिला रहे हैं."

समाज में जागरूकता होने के बावजूद भी अनेक समुदाय ऐसे हैं जहां स्तनपान के हितों के बारे में पर्याप्त जागरूकता नहीं पहुंची है. समाज में व्याप्त भ्रांतियां है और ऐसे रीति-रिवाज़ हैं जो बच्चे को एकमात्र स्तनपान से वंचित कर देते हैं. डॉ द्विवेदी का कहना है कि: "स्तनपान न कराने का सबसे बड़ा कारण है कि कुछ परिवारों को नवजात शिशु को स्तनपान कराने के फायदों के बारे में पता नहीं है. ज्यादातर लोगों को स्तनपान का महत्व समझाने से समझ में आ जाता है। अधिकतर लोग रुढ़िवादी हो कर और समझ न होने की वजह से, या फिर समाज में कुछ गलतफहमी होने के कारण शिशु को स्तनपान से वंचित रखते हैं."

जो माताऐं बोतल से दूध पिलाती हैं वह ठीक नहीं है. डॉ द्विवेदी के अनुसार: "बोतल से दूध नहीं पिलाना चाहिए क्योंकि उससे इन्फेक्शन (संक्रमण) होने का खतरा होता है। बोतल से दूध पीने से बच्चे के सांस की नली में दूध जा सकता है। बोतल दूध पीने वाले बच्चे में सामान्य स्तनपान करने वाले बच्चे से चार से पांच गुना अधिक 'एस्पिरेशनल निमोनिया' होने का खतरा होता है। यह निमोनिया बोतल से दूध पीने के दौरान श्वास नली में दूध चला जाता है जिसकी वजह से बच्चे खतरे में आ जाते हैं।"

जीतेन्द्र द्विवेदी - सी.एन.एस.

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