निमोनिया से बचाव और धूम्रपानरहित वातावरण

प्रत्येक 20 सेकण्ड में निमोनिया के कारण कहीं न कहीं किसी बच्चे की मुत्यु होती है। पांच वर्ष से कम आयु के 20 प्रतिशत बच्चों की मृत्यु का कारण निमोनिया ही है। यह प्रतिवर्ष 1.3 मिलियन बच्चों का काल है। ज़िन्दगी की यह हानि अधिक दुखदायी इसलिए है क्योंकि इस मृत्यु को पर्याप्त साधनों द्वारा रोका जा सकता है।

विश्व  स्वास्थ्य संगठन द्वारा बच्चों में निमोनिया होने के कारणों को बढ़ावा देने वाले विभिन्न वातावरण सम्बन्धी तथ्यों को सूचिबद्ध किया गया है। ये कारण है:
(1) खाना बनाने तथा गर्म करने हेतु बायोमास ईंधन(ठोस ईंधन) जैसे लकड़ी या गोबर के कारण घर में होने वाला वायूमंडल का प्रदूषण, 
(2) भीड़भरे घरों में निवास करना तथा 
(3) माता-पिता द्वारा धूम्रपान किया जाना। 

विश्व स्वास्थ्य संगठन भी यही सलाह देता है कि घर के अन्दर होने वाले वायुमंडल के प्रदूषण को उपलब्ध साफ स्टोव और भीड़भाड़ वाले घरों में अच्छे स्वास्थ्य विज्ञान को बढ़ावा देकर निमोनिया से बीमार होने वाले बच्चों की संख्या को कम किया जा सकता है।

निमोनिया कई प्रकार से फैलता है। साधारणतय: बच्चों की नाक या गले में पाये जाने वाले जीवाणु और विषाणु को सांस द्वारा लिये जाने पर फेफड़ों मे संक्रमण हो सकता है। खांसने या छींकने से दूषित हवा द्वारा भी यह फैल सकता है। अतः जीवाणु के फैलने को कम करने के लिए रहन सहन के वातावरण में सुधार, निमोनिया के नियंत्रण में एक अहम भूमिका निभाता है।

बच्चों में निमोनिया के नियंत्रण, बचाव और चिकित्सा (उपचार) हेतु, 2009 में विश्व स्वास्थ्य संगठन तथा यूनिसेफ द्वारा ‘‘ग्लोबल एक्शन प्लान फॉर दि प्रेवेंशन एण्ड कंट्रोल ऑफ निमोनिया’’ का आरम्भ किया गया।
विशेषत: स्तनपान और हाथों की स्वच्छता को बढ़ावा देकर तथा घरों के अन्दर वायु प्रदूषण कम करके बच्चों को निमोनिया से बचाया जा सकता है। नवीन तकनीकि जानकारियां घरों का प्रदूषण कम कर सकती हैं। परम्परागत खाना बनाने के लिये प्रयुक्त लकड़ी, कंडे और कोयले (जिनका प्रयोग अभी भी कुछ अविकसित/विकासशील  देशों में किया जाता है) के स्थान पर तरल ईंधन जैसे मिट्टी का तेल, प्राकृतिक गैस, एलपीजी इत्यादि का इस्तेमाल किया जा सकता है। तरल ईंधन के लिये प्रयुक्त होने वाले चूल्हों तथा ठोस ईंधन के उपयोग में प्रयुक्त होने वाले चूल्हों में सुधारोपरान्त प्रयोग करने पर जोखिम में कमी देखी गयी है।

दूसरों के द्वारा प्रयुक्त तम्बाकू के धुंए में सांस लेने की प्रक्रिया परोक्ष धूम्रपान होती है। इसे सेकण्ड हैण्ड स्मोक भी कहते हैं। निष्क्रीय धूम्रपान में सांस लेना बीमारी, अपंगता तथा मृत्यु का कारण है। यह श्वसन क्रिया को प्रभावित करता है और फेफड़ों की शक्ति को कम कर देता है। अमेरिका में, नवजात शिशुओं और 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों में निचली श्वसन नली के संक्रमण के अनुमानित 150,000-300,000 मामले परोक्ष धूम्रपान से प्रभावी हैं, जिसके परिणाम स्वरूप हर वर्ष अस्पतालों में 7,500-15,000 मरीज़ भर्ती किये जाते हैं।

डा. एस.एन. रस्तोगी, प्रख्यात बाल-हृदय रोग विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि ‘‘बच्चे के लिए घर में हुक्का, बीड़ी और सिगरेट का प्रयोग काफी नुकसानदायक होता है। यह परोक्ष धूम्रपान है क्योंकि इसमें बच्चा कमरे में विद्यमान निकोटीन में सांस लेता है जो निमोनिया का खतरा बढ़ा देता है। बच्चे के कक्ष में पिता/परिवार के अन्य सदस्यों को धूम्रपान नहीं करना चाहिये। नवजात शिशु को पृथक कमरे में रखना चाहिये तथा कम से कम संख्या में लोगों उसके पास जाना/स्पर्श करना चाहिये। लेकिन भारत में सामाजिक प्रथा के कारण इस आदत को बन्द करना काफी कठिन है। बच्चे के पैदा होने के प्रथम दिन से ही अनेकों लोग शिशु के साथ खेलते हैं। यह अच्छी आदत नहीं है। यह सामाजिक प्रथा जो कि अच्छे शिक्षित परिवारों में भी है, बन्द होनी चाहिये। कम से कम पहले छः माह तक बच्चे के पास केवल मां एवं उसकी देखरेख करने वाले को ही जाने देना चाहिये।’’

किसी बच्चे के चारों ओर का वातावरण और रहने वाला प्रदूषण बच्चे में अनेकों बीमारियों के होने की  सम्भावना का एक बड़ा कारण है। लखनऊ के बाल रोग विशेषज्ञ डा. एस. के. सेहता का कहना है कि ‘‘यदि घर में हवा और धूप के आने का उचित प्रबन्ध हो, और घर में रहने वालों की संख्या कम हो अर्थात अधिक भीड़भाड़ न हो, जिससे बच्चे के रहने के लिये पर्याप्त तथा पृथक स्थान रहे, तो बच्चे को संक्रमण के अवसर कम रहते हैं। लेकिन, यदि बच्चे के चारों ओर का वातावरण इस प्रकार का हो कि उसमें थोड़े स्थान में रहने वालों की संख्या अधिक हो तथा वातावरण खाना बनाने के ईंधन या तम्बाकू के धुंए से प्रदूषित हो, तो बच्चे में संक्रमण की सम्भावना अधिक हो जाती है। इस प्रकार के परिवारों में तीव्र दमा और क्षयरोग के होने की अधिक सम्भावना रहती है तथा ये रोग बच्चे को भी हो सकते हैं।’’

तम्बाकू के प्रयोग और इससे निमोनिया के बढ़ते मामलों के मध्य सम्बन्ध को मानते हुए बाल रोग एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डा. नीलम सिंह, जो ‘‘वात्सल्य रिसोर्स सेंटर ऑफ हेल्थ’’ की मुख्य कार्यकारी भी हैं, कहती हैं कि ‘‘घरों के अन्दर की दूषित हवा वास्तव में निमोनिया को बढ़ावा देती है। ग्रामीण क्षेत्रों में चूल्हे मे भोजन बनाने के कारण काफी धुआं होता है। तम्बाकू का धुआं भी बच्चों में निमोनिया और अन्य श्वसन सम्बन्धी रोगों का कारण है। तम्बाकू पीने वाले अभिभावकों के कारण घरों के अन्दर अधिक प्रदूषण होता है, और ऐसे दूषित वातावरण में रहने वाले बच्चों में रोगों का अधिक खतरा होता है। जहां तक सम्भव हो, बच्चों को स्वच्छ तथा प्रदूषण रहित वातावरण में रखना चाहिये।’’

डा. रस्तोगी भी मानते हैं कि शहरों में अधिकतर लोग गैस के चूल्हों का प्रयोग करते हैं जिससे तुलनात्मक रूप से वातावरण कम प्रदूषित होता है। लेकिन अभी भी गांवों में लोग भोजन बनाने के लिये लकड़ी और कोयले का इस्तेमाल करते हैं जिससे घरों में हवा अधिक दूषित हो जाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में सफाई और स्वास्थ्य विज्ञान सम्बन्धी ज्ञान की कमी है। लेकिन शहरों में लोग कुछ अधिक जागरूक हैं जिससे वे सतर्क रहते हैं।

डा. एस. के. सेहता का मत है कि ‘‘सरकार घरों के प्रदूषण को कम करने के लिये खाना बनाने के लिये गैस के प्रयोग को बढ़ावा दे रही है। यह घरों के अन्दर की हवा को कम दूषित करेगा। तम्बाकू के प्रयोग के विरोध में पहले से ही नियम है, जो सार्वजनिक स्थलों पर जहां लोग एकत्र होते हैं। तम्बाकू पीने का निषेध करता है। अभिभावकों को यह समझना चाहिये कि जब वे घरों में धूम्रपान करते हैं तो उनके बच्चे परोक्ष रूप से धूम्रपान के सम्पर्क में आ जाते हैं। इसलिये यदि वे धूम्रपान बिल्कुल न करें तो सर्वोत्तम होगा, लकिन कम से कम उन्हें बच्चों के समक्ष धूम्रपान नहीं करना चाहिये।

इस सम्बन्ध में सभी चिकित्सकों का एक मत है कि धुआंरहित वातावरण और बच्चे के समक्ष धूम्रपान न करने से काफी हद तक हवा को स्वच्छ बनाया जा सकता है। अन्य किसी भी प्रकार के प्रदूषण से बचाव भी जरुरी है क्योंकि संक्रमण के लिये यही किसी न किसी प्रकार से जिम्मेदार है। अतः घरों के भीतर के वातावरण की स्वच्छता के लिये उपाय किये जाने चाहिये, क्योंकि इसी के द्वारा निमोनिया से बचाव और इसे रोका भी जा सकता है।

सौम्या अरोरा - सी.एन.एस.
(अनुवाद: सुश्री माया जोशी)

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