माँ का दूध - नवजात शिशु का प्रथम टीका

माँ का दूध नवजात-शिशुओं एवं बच्चों के लिये एक आदर्श पौष्टिक आहार है। यह शिशु के लिये ग्रास के समान है एवं इसे शिशु को दिये जाना वाला प्रथम टीका (वैक्सीन) भी कहा जा सकता है। माँ के दूध में बच्चों को पोषित करने की अद्वितीय क्षमता होती है। इसके अतिरिक्त माँ के दूध में अनेकों रोग प्रतिकारक (इम्यून ग्लोबिन) पाये जाते है जो शिशुओं को बचपन की आम बीमारियों से, जिनमें निमोनिया एक बीमारी है, रक्षा प्रदान करते है। निमोनिया से विश्व भर में प्रतिदिन 4,300 से अधिक शिशुओं की मृत्यु होती है। माँ का दूध पूर्णतया से सुरक्षित, पचने में आसानी से उपलब्ध होता है।

 स्तन-पान शिशु के स्वास्थ्य एवं जीवन के लिये सबसे सस्ता एवं प्रभावकारी उपाय है। जन्म के प्रथम छ: महीनों तक शिशुओं को स्तन-पान से वंचित रखने के कारण विश्व में लाखों शिशुओं की प्रतिवर्ष मृत्यु होती है जो रोकी जा सकती है। स्तन-पान शिशुओं को तात्कालिक लाभ देने के अतिरिक्त उन्हें जीवन भर शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ रहने की क्षमता भी देता है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि विश्व स्वास्थय संगठन शिशु जन्म के प्रथम 6 महीनों तक केवल स्तन-पान को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित करता है।

प्रसूति व स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. नीलम सिंह, जो ‘वात्सल्य रिसोर्स सेन्टर फॉर हेल्थ' की मुख्य कार्यवाहक भी हैं, के अनुसार, "पूर्ण रूप से स्तन-पान का तात्पर्य है कि शिशु को मात्र केवल माँ का दूध ही देना चाहिये, माँ के दूध के अतिरिक्त कोई भी और चीज जैसे पानी, ग्राइप वाटर अथवा शहद आदि नहीं देना चाहिये। माँ के दूध में रोग प्रतिरोधक तत्व पाये जाते है जो शिशुओं को अनेक प्रकार की बीमारियों, विशेष कर निमोनिया व अतिसार की प्रतिरोधकता प्रदान करते हैं।"

इसके अतिरिक्त माँ का दूध, शिशुओं की मानसिक क्षमता का विकास करने में भी सहायता प्रदान करता है। यह पाया गया है कि स्तन-पान करने वाले बच्चों का बौद्धिक स्तर ऊपर का दूध पीने वाले बच्चों की अपेक्षा 10 गुना अधिक होता है। स्तन-पान करने वाले बच्चों में जीवन में आगे चलकर चर्म रोग, अस्थमा एवं ह्रदय सम्बन्धित रोग  भी कम होते हैं।

अपना एक निजी क्लीनिक चलाने वाले प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. एस.एन. रस्तोगी के अनुसार केवल माँ का दूध ही नवजात शिशुओं का सबसे उत्तम भोजन है।

डॉ. एस. के. सेहता, जो लखनऊ की एक प्रसिद्ध बाल एवं नवजात शिशु विशेषज्ञ है, के अनुसार स्तनपान माँ एवं बच्चे के बीच एक भावनात्मक संबंध स्थापित करता है जिससे माँ व बच्चे के संबंध और मजबूत हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त माँ के दूध में कुछ विशेष हारमोन्स पाये जाते हैं जो गाय या भैंस के दूध में नहीं होते है। ये हारमोन्स बच्चें में अनेक बीमारियों के प्रति प्रतिरोधकता प्रदान करते हैं, जिनमें से निमोनिया एक है।

चिकित्सकों द्वारा माँ के दूध की गुणवत्ता को प्रमाणित करने के बाद भी 40 प्रतिशत से कम नवजात शिशुओं को केवल माँ का दूध पिलाया जाता है। डॉ. नीलम सिंह की क्लीनिक में आने वाली माताओं में से केवल 15 प्रतिशत या 20 प्रतिशत मातायें ही इस नियम का पालन करती पायी गयी। इस विषय में माताओं को प्रोत्साहित करने की अत्यन्त आवश्यकता है क्योंकि स्तन-पान कराने के संबंध में उन्हें अनेक प्रकार के भ्रम हैं, जैसे स्तन के 'निपुल' में दर्द होना, या पर्याप्त मात्रा में बच्चें के लिये दूध का न होना, स्तन-पान संबंधी उचित जानकारी न होना या कुछ सामाजिक एवं सांस्कृतिक भ्रांतियां इत्यादि।

डॉ. नीलम सिंह के कथनानुसार नवजात शिशु की माँ को स्तन-पान प्रोत्साहित करने के लिये न केवल डॉक्टर वरन नर्स, परिचारिका तथा अन्य लोगों का भी सहयोग आवश्यक है। डॉक्टर को माँ को इस बात का विश्वास दिलाना चाहिये कि केवल स्तन-पान द्वारा ही नवजात शिशु को उचित आहार प्राप्त होता है। डॉक्टर को माँ को शिशु के जन्म के बाद ही स्तन-पान आरम्भ करने की सलाह देनी चाहिये। चिकित्सीय कर्मचारियों (पैरामेडिकल स्टाफ) का कर्तव्य है कि वे भी माँ को नवजात शिशु को केवल स्तन-पान करने के लिये प्रोत्साहित करें। परिवार के सदस्यों का भी कर्तव्य है कि वे माँ को स्तन-पान की महत्ता बतायें व माँ के खानपान व पोषण का भी ध्यान रखें।

कार्यरत माताओं के लिये उनके काम करने के स्थान का वातावरण, एवं कार्य करने की सुविधायें नवजात शिशुओं के अनुकूल होनी चाहिये। कार्यरत माताओं को अपने नवजात शिशुओं को स्तन-पान कराने की सुविधा मिलनी चाहिये - दफ्तर में उन्हें एक एकान्त स्थान मिलना चाहिये जहाँ वे स्तन-पान करा सकें।  कार्यरत महिलाओं को 6 महीनों का मातृ अवकाश मिलना चाहिये। संसार के अनेक राष्ट्रों ने इस प्रकार के ठोस कदम उठाये हैं किन्तु हमारे देश भारत में अभी इस विषय पर बहुत काम होना बाकी है।

डॉ. एस. एन. रस्तोगी का कहना है कि ‘‘कुछ महिलायें अपने शारीरिक सौंदर्य पर अत्यधिक ध्यान देती हैं। वे सोचती हैं कि स्तन-पान कराने से उनकी शारीरिक सुन्दरता कम हो जायेगी । परन्तु ऐसा सोचना बिल्कुल गलत है। इसके अतिरिक्त कुछ गर्भवती महिलायें स्वयं इतनी अल्प पोषित होती है कि उन्हें इस बात का डर बना रहता है कि वे अपने नवजात शिशुओं को उचित मात्रा में अपना दूध नहीं पिला पायेंगी।"

डॉ. एस. के. सेहता का कहना है कि ‘‘भारतवर्ष में अधिकतर गर्भवती महिलायें अल्प-पोषित है और उन्हें इस बात का डर बना रहता है कि वे उचित मात्रा में नवजात शिशुओं को अपना दूध नहीं दे पायेगी। अत: वे डिब्बे का व अन्य प्रकार का ऊपर का दूध शिशुओं को पिलाना आरम्भ कर देती है। माँ के दूध के अतिरिक्त अन्य सभी प्रकार के दूध नवजात शिशु के लिये अत्यन्त हानिकारक होते हैं। यदि नवजात शिशु को प्रथम 6 महीनों तक केवल और केवल स्तन-पान कराया जाये तो उसे अनेक प्रकार के संक्रामक रोगों के होने की संभावना कम हो जाती है। केवल लगभग 1 प्रतिशत उदाहरणों में  पाया गया है कि माँ का दूध उचित मात्रा में नहीं होता है, या गर्भवती महिला किसी गंभीर रोग से पीड़ित है। इन्हीं दशाओं में डाक्टर शिशु को केवल उसके उपयोग के लिये बनाया गया डिब्बे का दूध जो बाजार में उपलब्ध होता है व जिसे माँ-बाप खरीद सकते है, नवजात शिशु को पिलाने की सलाह देते हैं।
परन्तु डिब्बे के दूध व बोतल से दूध पिलाने में अनेक खराबियाँ है। बोतल से दूध पिलाने में स्वच्छता का अत्यधिक ध्यान रखना चाहिये, अन्यथा शिशु को अनेक प्रकार के संक्रमण होने की संभावना रहती है। इसके अतिरिक्त बोतल से दूध पिलाते समय मातायें बहुधा उसमें पानी मिला देती हैं। ऐसा दूध पीने वाला शिशु कुपोषित रहता है।

डॉ. नीलम सिंह का यह भी कहना है कि शिशु के लिये बनाया गया डिब्बें का दूध शिशु को पोषक तत्व तो दे सकता है परन्तु डिब्बे के  दूध में ‘इम्यून ग्लोबिन' नहीं पाये जाते हैं। साथ ही बोतल से दूध पिलाने में अत्यधिक स्वच्छता का ध्यान रखना आवश्यक है जो हमारे देश में संभव नहीं है। भारत एक उष्ण  कटिबन्ध देश है। यहाँ का उच्च तापमान अनेक प्रकार के संक्रामक रोगों को फैलाने में सहायक होता है। डिब्बे का दूध शिशुओं को बीमारियों से लड़ने की क्षमता नहीं प्रदान करता है।

स्तन पान के लाभों के प्रति घोर अज्ञानता के वातावरण में भी, श्रीमती अल्पना सिंह ऐसी कुछ माताओं के विचार उदाहरणीय हैं। श्रीमती अल्पना ने अपने दूसरे शिशु को शहर के प्राइवेट नर्सिग होम (सिटी अस्पताल) में आपरेशन द्वारा जन्म दिया। वे कहती है, ‘‘मैंने आपरेशन द्वारा जन्मे शिशु को जन्म के तुरंत बाद से ही स्तन-पान कराना प्रारम्भ कर दिया तथा 6 महीनों तक मैंने अपने शिशु को पानी या ऊपर का दूध नहीं दिया। मुझे 3 महीनों के मातृत्व अवकाश के बाद अपना कार्यभार संभालना पड़ा। मैं स्तन-पंप की सहायता से अपना दूध 3,4 घंटे तक के लिए संग्रहित कर लेती थी। इस प्रकार मैंने अपने शिशु को कम से कम एक वर्ष तक अपना दुग्ध ही पिलाया।"

स्तन-पान को प्रोत्साहित करने के लिये स्वास्थ्य संबंधी सुविधायें उपलब्ध होनी चाहिये-उदाहरण के लिये नवजात शिशुओं की माताओं को स्तन-पान के विषय के सलाहकार उपलब्ध होने चाहिये। स्तन-पान को अधिक से अधिक प्रोत्साहित करना चाहिये। माताओं एवं शिशुओं को इस प्रकार की सुविधायें उपलब्ध कराने के लिये 150 देशों में 20,000 से अधिक शिशु कल्याणकारी सुविधायें उपलब्ध हैं। इसके लिये हम विश्व स्वास्थ्य संगठन-यूनीसेफ (WHO-UNICEF)  के बहुत आभारी है. स्तनपान संबंधी अनेक प्रकार की अफवाहों एवं सामाजिक सांस्कृतिक अवधारणाओं को दूर करने के लिये जन स्वास्थ्य कल्याण के कार्यकर्ताओं की अत्यन्त आवश्यकता है। हमें केवल माताओं को नहीं अपितु उनके पारिवारिक सदस्यों को भी स्तन-पान के गुणवत्ताओं के प्रति जागरूक करने की आवश्यकता है। स्तन-पान को प्रोत्साहित करने के लिये सम्पूर्ण समाज के सहयोग की आवश्यकता है।


सौम्या अरोरा - सी.एन.एस.
(अनुवाद: श्रीमती विमला मिश्र, लखनऊ)

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