बच्चों में निमोनिया का उपचार एक चुनौती

निमोनिया, जो विशेषकर 5 साल से कम आयु के बच्चों में मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है, उसकी रोकथाम, टीकाकरण एवं उपचार के लिए सरकार ने कारगर कदम नहीं उठाए हैं।  उपचार के मानको का न होना, टीकाकरण का कोई उचित स्वास्थ्य कार्यक्रम न होना, राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में निमोनिया टीका का शामिल न होना, ये सभी बातें निमोनिया जैसे प्राणघातक रोगों को और बढ़ावा देती है जो कि एक चिन्ता का विषय है।

हमने जब वात्सल्य क्लीनिक के बाल रोग विषेषज्ञ से डब्लू.एच.ओ. द्वारा मानकों और सरकारी अस्पतालों में निमोनिया रोग के उपचार की उपलब्धता के विषय में बात की तो उन्होंने बताया कि "निमोनिया टीका सरकारी सेवा में निःशुल्क उपलब्ध नहीं है। सरकारी और गैर सरकारी उपचार में भी अन्तर है।  विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निमोनिया उपचार मानकों के अनुसार निमोनिया को तीन भागों में बांटा गया है - ‘माइल्ड’ या सौम्य, ‘मोडरेट’ या मध्यम और ‘सीवियर’ या गम्भीर।  वैसे तो समय-समय पर विश्व स्वास्थ्य संगठन अपने मानको में फेर बदल करती रहती है मगर शहरों की अपेक्षा देहातों में अभी भी यह एक बड़ी समस्या है।"

‘होप मदर एण्ड चाइल्ड केयर सेन्टर’ के बाल-रोग विशेषज्ञ डा. अजय कुमार का भी कहना है कि सरकारी अस्पतालों में निमोनिया का टीका उपलब्ध नहीं है।  किन्तु यह उपचार इनकी क्लीनिक पर उपलब्ध है।  महंगा होने के कारण आज भी यह गरीब लोगों की पहुंच से दूर है।  सरकारी और गैर सरकारी अस्पतालों में उपचार के अन्तर के विषय में वे कहते हैं कि "उपचार में विशेष अन्तर नहीं है दवाईयां वही हैं पर सरकारी तन्त्र सुचारू रूप से कार्य नहीं करता जिससे कि गरीब लोगों को निजी अस्पतालों की तरफ रूख करना पडता है और अधिक पैसा देना पड़ता है।  उनका कहना है कि सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा मानक प्राथमिक स्तर पर उपलब्ध हैं।  अगर परेशानी कहीं है तो प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर।  अधिकतर निजी अस्पतालों में यह उपचार उपलब्ध है।"

‘होप मदर एण्ड चाइल्ड केयर सेन्टर’ की गोल्ड मेडिलिस्ट स्त्री रोग विषेषज्ञा डा. निधि जौहरी भी इस बात से सहमत हैं कि सरकारी और निजी अस्पतालों के उपचार में बडा अंतर है।  उनका मानना है कि निजी अस्पताल में चिकित्सक पूर्ण रूप से जिम्मेदार होता है और उसकी जवाबदेही होती है।  जबकि सरकरी अस्पतालों में ‘अम्ब्रेला ट्रीटमेंट’ होता है जिसमें कि परामर्श के लिए अलग-अलग चिकित्सकों के अलग-अलग दिन नियत होने के कारण मरीज समय-समय पर एक ही चिकित्सक को अक्सर नहीं दिखा पाता जिससे कि व्यक्ति विशेष की जिम्मेदारी नहीं बनती. यह एक बड़ा अन्तर है। वे आगे बताती हैं कि, "देहातों में विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक उपलब्ध नहीं हैं। मगर शहरों में लोग निमोनिया उपचार मानकों के बारे में जानते हैं जो एक बड़ी उपलब्धता है।"

यश अस्पताल की प्रख्यात स्त्री रोग विशेषज्ञा डा. ऋतू गर्ग का मानना है कि सरकारी अस्पतालों में निमोनिया के मरीज को सिर्फ प्राथमिक उपचार के नाम पर ‘एण्टीबायोटिक’ या ‘ब्रन्कोडायलेटर’ इन्जेक्शन ही उपलब्ध हो पाता है जो एक अधूरा उपचार है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों द्वारा निमोनिया का उपचार बहुत कम सरकारी बड़े अस्पतालों में या फिर निजी अस्पतालों में ही उपलब्ध है। निमोनिया का पर्याप्त उपचार उनके निजी अस्पताल में  भी उपलब्ध है।

निमोनिया को एक जटिल समस्या बताते हुए डा. रितू गर्ग बताती हैं कि इस बीमारी की सही पहचान होनी चाहिए क्योंकि बच्चा हमेशा निमोनिया से ही नहीं ग्रसित होता है।  वह मुख्यतः तीन मिलते-जुलते लक्ष्णों वाली बीमारियों से ग्रसित हो सकता है।  पहला है ब्रन्कोलाइटिस जिसमें बच्चे के फेफडे़ में हल्की सूजन आ जाती है जिसे हल्का सा ‘कफ’ या खॉंसी आना कहते हैं।  दूसरा है ब्रन्को निमोनिया जिसमें आला लगाने पर सीने में ‘क्रेप’ सुनाई देते हैं  लेकिन अगर सीटी सी आवाज आती है तो ब्रन्को-अस्थमा  या दमा हो सकता है।

सरकरी तन्त्र और गैर सरकारी अस्पतालों के बीच में आज का सामान्य गरीब मरीज पिस कर रह गया है।  या तो निमोनिया का पूर्ण उपचार उपलब्ध नहीं है, या फिर अस्पतालों में उपचार इतना महंगा है कि सामान्य गरीब मरीज उपचार करा नहीं सकता।  भारत जैसे कम शिक्षा वाले देश में यह स्थिति और भी भयावह हो जाती है।  विश्व स्वास्थ्य संगठन और  यूनिसेफ के अथक प्रयासों से उम्मीद की जा रही है कि विश्व भर में 2015 तक निमोनिया से मरने वाले मरीजों की संख्या 12 लाख तक कम हो सकती है, जो स्वयं में एक बहुतबड़ी चुनौती है।

नीरज मैनाली - सी0एन0एस0
(लेखक, ऑनलाइन पोर्टल सी.एन.एस. www.citizen-news.org के लिये लिखते हैं)

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