तम्बाकू और नशों से दूर रहें, स्वस्थ और इमानदार नागरिक बने

[English] [फोटो] रानी लक्ष्मी बाई इंटर कॉलेज, सेक्टर-१४, इंदिरा नगर में विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक द्वारा पुरुस्कृत प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त और मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता डॉ संदीप पाण्डेय, जो परिचर्चा में मुख्य अथिति थे, छात्रों एवं शिक्षकों को 'स्वस्थ एवं जिम्मेदार नागरिक बनने विषय पर संबोधित कर रहे थे.

छ०श०म० चिकित्सा विश्वविद्यालय के भूतपूर्व मुख्य चिकित्सा अधीक्षक एवं सर्जरी विभाग के भूतपूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने कहा कि "लान्सेट चिकित्सा जर्नल अप्रैल २०११ में प्रकाशित शोध के अनुसार, जन स्वास्थ्य सुधरने के लिये, तम्बाकू नियंत्रण सबसे अत्यावश्यक प्राथमिकता है. लांसेट ने २०४० तक विश्व को तम्बाकू मुक्त करने का आह्वान किया है. जब तक बच्चे और युवा तम्बाकू रहित जीवन नहीं अपनाएंगे यह मुहीम नाकाम रहेगी."

आर.सी.टी.सी. के निदेशक प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने कहा कि "तम्बाकू धीमा ज़हर है और खतरनाक नशा है. अनेक जानलेवा बीमारियों, विक्रित्यों एंड मृत्यु का जनक तम्बाकू से दूर रहने में ही विवेक है. जो लोग, तम्बाकू कंपनियों के भ्रामक तम्बाकू प्रचार की वजह से तम्बाकू का सेवन कर रहे हैं, वो बिना विलम्ब तम्बाकू सेवन त्याग दें".

अखिल भारतीय सर्जनों के संघ के नव-निर्वाचित अध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने कहा कि "अनेक गैर संक्रामक रोगों के सामान खतरा-पैदा करने वाले कारक हैं जैसे कि तम्बाकू सेवन, भोजन जिसमें संतृप्त या 'ट्रांस-फैटी' चर्बी, नमक, चीनी (खासतौर पर मीठे पेय में), शारीरिक व्यायाम न करना, और शराब सेवन, जिसकी वजह से विश्व में से हर ३ में होनी वाली मौतों में से २ इन गैर संक्रामक रोगों की वजह से हैं. गैर संक्रामक रोगों से हर ६ मौतों में से होनी वाली १ मौत तम्बाकू सेवन की वजह से होती है."

डॉ संदीप पाण्डेय ने छात्रों-शिक्षकों को प्रोत्साहित किया कि वें जिम्मेदार और ईमानदार नागरिक बन और न तो घूस ले, और न ही घूस दें. डॉ संदीप पाण्डेय ने छात्रों को शपथ दिलवाई कि वें अपने जीवन में कभी घूस नहीं लेंगे. उन्होंने छात्रों को सूचना अधिकार अधिनियम के अंतर्गत आवेदन पत्र लिखना सिखाया और कहा कि वो अपने स्कूल का प्रोजेक्ट करते समय सूचना अधिकार के अंतर्गत आवेदन पत्र लिख कर सूचना पा सकते हैं. डॉ संदीप पाण्डेय ने भ्रष्टाचार विरोधी जन अभियान में सूचना अधिकार अधिनियम पर भी अपने विचार रखे.

राहुल कुमार द्विवेदी, रितेश आर्य एवं रानी लक्ष्मी बाई इंटर कॉलेज की प्रधानाचार्य सुश्री अरोरा ने कार्यक्रम का समन्वयन किया. इसको नागरिकों का स्वस्थ् लखनऊ अभियान, इंडियन सोसाइटी अगेंस्ट स्मोकिंग,  अभिनव भारत फाउनडेशन, और आशा परिवार द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था.
सी.एन.एस.


लोकपाल बिल का विरोध करना राजनीतिज्ञ बंद करें

[English] जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (उत्तर प्रदेश) एवं लोक राजनीति मंच ने मांग की है कि लोकपाल बिल का विरोध करना राजनीतिज्ञ बंद करें क्योंकि इस बिल से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा, प्रशासन व्यवस्था में जवाबदेही बढ़ेगी एवं देश की राजनीति का चरित्र भी बदलेगा। मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि जिस दिन से लोकपाल बिल के मसौदा तैयार करने की समिति का गठन हुआ है, तब से ही इस समिति में जनता की ओर से आमंत्रित सदस्यों पर आरोप मढ़े जा रहे हैं. ऊपर से लगता है कि आरोप लगाने वाले लोग राजनीतिज्ञ हैं, परन्तु यह भी संभव है कि परदे के पीछे से दफ्तरशाह अधिकारी इसको पूरा समर्थन प्रदान कर रहे हों.

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि पहले कपिल सिबल ने लोकपाल बिल का उपहास किया जब उन्होंने कहा कि इससे हर बच्चे को शिक्षा और हर नागरिक को पीने का पानी तो नहीं मिल जायेगा. अब सिबल से यह पूछना चाहिए कि मानव संसाधन विकास मंत्री होने के नाते,  क्या यह उनकी जिम्मेदारी नहीं थी कि वें यह सुनिश्चित करें कि हर बच्चे को शिक्षा मिले? उन्होंने शिक्षा अधिकार आधिनियम तो पारित करवा दिया पर सामान स्कूल प्रणाली को शिक्षा अधिकार अधिनियम से बाहर रख कर उन्होंने लोगों को धोखा ही दिया है, खासकर कि गरीब लोगों को. जब तक सामान स्कूल प्रणाली नहीं लागू की जाएगी, जिसका तात्पर्य यह है कि हर बच्चा एक ही तरह के स्कूल में शिक्षा प्राप्त करे, शिक्षा अधिकार अधिनियम के क्या मायने हैं?

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि दिग्विजय सिंह ने अन्ना हजारे के उपवास पर हुए खर्च पर जांच की मांग की. क्या उन्हें यह नहीं लगता कि २-जी, राष्ट्रमंडल खेल या आदर्श सोसाइटी घोटाला आदि अधिक महत्वपूर्ण और संगीन मुद्दे हैं? यह और बात है कि अरविन्द केजरीवाल के दल ने भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के आय-व्यय का ब्यौरा सार्वजनिक कर दिया है. यही नहीं, लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने वाली समिति में जनता से सदस्यों ने अपनी परिसंपत्ति भी घोषित कर दी है. राजनीतिज्ञ तो भ्रष्टाचार पर ही टिके हुए हैं. शयद ही कोई सांसद मिले जिसने चुनाव आयोग द्वारा तय की हुई चुनाव खर्चा सीमा (२५ लाख रूपये) में ही चुनाव लड़ा हो. इस तरह के भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिये ही लोकपाल बिल आवश्यक है.

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि अमर सिंह जिस सी.डी. की बात कर रहे हैं, वो सिर्फ शरारत है. यह तो कल्पना से परे है कि जिस प्रशांत और शांति भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के १५ में से आधे मुख्य न्यायाधीशों को भ्रष्ट करार किया हो, वो किसी न्यायाधीश को प्रभावित करने की कोशिश करें. अमर सिंह एक ऐसे राजनेता हैं जो अपना सन्दर्भ खो चुके हैं. उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में आम लोगों से जुड़ा एक भी मुद्दा नहीं उठाया है, जब कि प्रशांत और शांति भूषण ने बिना कोई फीस लिये, अनेक जनहित में मुद्दों को उठाया है. चूँकि इस सी.डी. विवाद के पीछे अमर सिंह हैं, इसीलिए इसको संजीदगी से नहीं लेना चाहिए.

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि दिग्विजय सिंह ने न्यायाधीश संतोष हेगड़े पर टिपण्णी की है कि कर्णाटक में वो प्रभावशील लोकायुक्त नहीं रहे हैं. दिग्विजय सिंह ने कहा कि यदि अन्ना हजारे उत्तर प्रदेश में मायावती के भ्रष्टाचार के विरोध में अभियान छेड़ेंगे तब उनकी पार्टी उनका समर्थन करेगी. लगता है दिग्विजय सिंह अपनी पार्टी के लोगों के अलावा सबके विरोध में कारवाई चाहते हैं और सबकी इमानदारी को परखना चाहते हैं.

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि मनमोहन सिंह ने दफ्तरशाह अधिकारियों को यही सिद्धांत बताया है कि वें अपने भ्रष्ट सहकर्मियों का बहिष्कार करें. परन्तु यह सुझाव मनमोहन सिंह अपने ऊपर नहीं लागू करते. यदि उन्होंने अपनी पार्टी में भ्रष्ट सदस्यों और मंत्रियों का बहिष्कार किया होता तो स्थिति इतनी गंभीर नहीं होती.

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि एक प्रभावकारी और मजबूत लोकपाल बिल के विचार से सभी राजनीतिज्ञ परेशान है क्योंकि यह उनकी सबसे बड़ी कमजोरी पर चोट कर रहा है. यदि कल को एक मजबूत कारगर लोकपाल बिल आ गया तो इन राजनीतिज्ञों का राजनीति में रहना मुश्किल हो जायेगा. इसीलिए यह सब इतने घबरा रहे हैं. और यही वजह है कि उनके पीछे की उद्योग एवं दफ्तार्शाहों की ताकत पूरा प्रयास कर रही है कि लोकपाल  बिल का मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया खंडित हो जाये.

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि लोकपाल बिल सिर्फ भ्रष्टाचार को ही नहीं रोकेगा बल्कि इस देश की राजनीतिक चरित्र को ही बदल कर रख देगा. हम लोग, धनाढ्य लोगों के बजाय जमीन से जुड़े हुए लोगों को मुख्यधार की राजनीति में देखेंगे जो अपनी सीमित आये में ही जीवन-यापन कर रहे होंगे और अपनी राजनीति भी पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ करते होंगे. ऐसे लोगों पर अनुचित दबाव बनाना, लुभाना आदि असंभव होगा. इसीलिए उद्योग एवं दफ्तरशाह भी राजनीतिज्ञों के साथ बहुत चिंतित हैं.

जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (उत्तर प्रदेश) एवं लोक राजनीति मंच द्वारा जारी पत्र पर अनेक हस्ताक्षर हैं जिनमें अलोक अगरवाल, जीपी सिंह, मधुरेश कुमार, संदीप पाण्डेय, अजित झा, अरुंधती धुरु, एस.एर.दारापुरी, गौतम बंदोपाध्याय, कविता श्रीवास्तव, महेश कुमार, अधिवक्ता रवि किरण जैन, अधिवक्ता मोहम्मद शोएब, अरविन्द मूर्ति, केशव चाँद, आर सुनीलम, जयशंकर पाण्डेय, नन्दलाल मास्टर, मनीष गुप्ता, राजीव यादव, शाहनवाज़ आलम, आदि प्रमुख हैं.

बाबी रमाकांत - सी.एन.एस

धुआं-रहित तम्बाकू भी उतनी घातक है जितना धूम्रपान

[English] धुआं-रहित तम्बाकू (गुटखा, खैनी आदि) भी जान-लेवा बीमारियों, विकृतियों और मृत्यु का जनक है, तम्बाकू किसी भी रूप में ली जाए, धुआं-रहित या धूम्रपान हो - स्वास्थ्य के लिये घातक हो सकती है. अखिल भारतीय सर्जनों के संगठन के निर्वाचित अध्यक्ष एवं विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक द्वारा पुरुस्कृत प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त, डी-ब्लाक इंदिरा नगर स्थित डैफ़ोडिल्स कॉन्वेंट इंटर कॉलेज में मुख्य-वक्ता थे और छात्रों एवं शिक्षकों को संबोधित कर रहे थे.

प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त, छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के भूतपूर्व मुख्य-चिकित्सा अधीक्षक एवं सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष रहे हैं एवं वर्तमान में 'पाइल्स तो स्माइल्स केंद्र' और सिप्स अस्पताल के निदेशक हैं.

डैफ़ोडिल्स कॉन्वेंट इंटर कॉलेज के प्रधानाचार्य पियूष मिश्रा के साथ प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने छात्रों एवं शिक्षकों को किसी भी रूप में तम्बाकू का सेवन न करने की शपथ दिलवाई.

प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने बताया कि "अमरीका की सी.डी.सी. के अनुसार धुआं रहित तम्बाकू में भी २८ कैंसर पैदा करने वाले तत्व होते हैं और धुआं-रहित तम्बाकू कैंसर का एक जनक है, खासतौर पर मुहं का कैंसर होने की सम्भावना कई गुना बढ़ जाती है."

पुरुस्कृत पुस्तक "राख के ढेर पर" के लेखक प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने कहा कि "धुआं-रहित तम्बाकू से ल्यूकोप्लेकिया (कैंसर से पहले वाली स्थिति जिसमें गाल के अन्दर की त्वचा सख्त और सफ़ेद धब्बे युक्त हो जाती है) होने का खतरा सर्वाधिक है. जबड़ों और दाँतों के अन्य रोग भी इसी से होते है."

प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने बताया कि "धुआं-रहित तम्बाकू से भी गर्भावस्था में कु-प्रभाव पड़ता है - जैसे कि प्रे-क्लैम्पसिया (उच्च रक्त चाप, सूजन आदि), समय से पहले ही बच्चे का जन्म, और जन्म से समय बच्चे का वजन कम होना आदि शामिल हैं."

प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने कहा कि "पुरुषों में धुआं रहित तम्बाकू से भी वीर्य-संख्या का कम होना आदि कुप्रभाव शामिल हैं."

प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने बताया कि "जो बच्चे और युवा धुआं-रहित तम्बाकू का सेवन करते हैं उनकी धूम्रपान करने की सम्भावना अधिक होती है. तम्बाकू कर रूप में घातक है, इससे दूर रहे और जो लोग इसका इस्तेमाल कर रहे हैं वो इसको बिना विलम्ब त्यागें जिससे कि स्वास्थ्य पर तम्बाकू जनित  कुप्रभावों का असर कम-से-कम हो सके."

इस कार्यक्रम में लखनऊ के अन्य जाने-माने लोग उपस्थित थे जिनमें राहुल कुमार द्विवेदी, शोभा शुक्ला, रितेश आर्य, आनंद पाठक, प्रमुख थे. इस कार्यक्रम को नागरिकों का स्वस्थ लखनऊ अभियान, इंडियन सोसाइटी अगेंस्ट स्मोकिंग, अभिनव भारत फाउनडेशन, और आशा परिवार ने संयुक्त रूप से आयोजित किया था.

सी.एन.एस. 

बाल उत्पीड़न के अपराधियों को दण्डित करने के लिए कड़े क़ानून का अभाव

अंजलि सिंह -सी.एन.एस

भारत में यौन उत्पीड़न के शिकार बच्चों कि संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है. हाल ही में नई दिल्ली में हुए एक हादसे में एक युवक ने अपने पड़ोसी की पांच वर्षीय बच्ची का बलात्कार करके उसक क़त्ल कर दिया. इसी प्रकार कुछ समय पूर्व, कानपुर की एक बालिका अपने शिक्षक की यौन अमानुषिकता की शिकार होकर मृत्यु का ग्रास बनी.

उत्तर प्रदेश में इस प्रकार के हादसों की कमी नहीं है. सितम्बर २००९ में १३ वर्षीय नौरा को लखनऊ के मानकनगर रेलवे स्टेशन के पास मृत अवस्था में पाया गया. उसकी ७ वर्षीय सहेली नूर बानो वहीं पर बेहोश अवस्था में पायी गयी तथा उसके शरीर पर चाकू के घाव और जलने के निशान पाए गए. गरीब बस्ती में रहने वाली उन दोनों बच्चियों के परिवार वालों ने जब पुलिस में शिकायत दर्ज करने की कोशिश की तो कृष्णा नगर थाने के इंचार्ज ने उन्हें भगा दिया. ४ महीनों तक ने तो कोई भी पुलिस कार्यवाही की गयी न ही नूर बानो को किसी मजिस्ट्रेट या चाइल्ड वेलफेयर कमीशन के समक्ष पेश किया गया. नूर के शरीर के निशानों से यौन उत्पीड़न का मामला साफ़ ज़ाहिर था, परन्तु मेडिकल परीक्षण की रिपोर्ट ने केवल सिर पर चोट की बात कही. नौरा की संदिग्ध मौत के बारे में भी कोई छान बीन नही करी गयी.

नूर बानो के अनुसार, दोनों को कुछ व्यक्तियों ने एक सफ़ेद गाड़ी के अन्दर घसीट लिया था. उसके बाद उसे कुछ याद नहीं. पुलिस ने यह कह कर केस बंद कर दिया की बच्चियां चलती ट्रेन से गिर गयी थीं. मई २००५ में, कूड़ा बीनने वाली एक १३ वर्षीय बालिका के साथ कुछ लड़को ने घंटों बलात्कार कर के आशियाना पुलिस स्टेशन के सामने फ़ेंक दिया. ५ वर्षों के बाद भी आशियाना रेप केस के नाम से मशहूर इस केस का अभी तक कोई निपटारा नहीं हुआ है. बच्ची अभी तक एक डरी और सहमी हुई गुमनामी की ज़िन्दगी जी रही है, और अपराधी स्वछंद घूम रहे हैं. मुक़दमा नाबालिग अपराधियों के न्यायालय में चल रहा है.

खेद की बात है कि भारत में अभी भी बच्चों के साथ हुए इस प्रकार की वारदातों को अपराधिक नहीं करार किया जाता.  अध्ययनों द्वारा यह पता चलता है कि भारत में घरों में काम करने वाले, या फिर सड़कों पर अथवा संरक्षण गृहों में रहने वाले बच्चों में ७५% ऐसे हैं जो कभी न कभी यौन उत्पीड़न का शिकार हुए हैं. महिला एवम् बाल विकास मंत्रालय द्वारा २००७ में किये गए एक अध्ययन से पता चलता है कि विश्व भर में सबसे अधिक उत्पीड़ित बच्चे भारत में ही हैं (५३%). अधिकाँश हादसों में उत्पीड़क कोई अनजान नहीं, वरन जान पहचान  वाला व्यक्ति ही होता है.  केंद्र सरकार की २००८ की एक रिपोर्ट ने भी इस बात की पुष्टि की है. यह वास्तव में लज्जा का विषय है की यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन ऑफ चाइल्ड राइट्स पर हस्ताक्षर करने के बावजूद, भारत सरकार अपने देश के बच्चों को यौन उत्पीड़न से बचाने में असक्षम है. भारतीय दंड संहिता में भी इन हादसों को किसी विशेष प्रकार के अपराध का नाम नहीं दिया गया है.  फिर जो संस्थाएं बच्चों के अधिकारों को लेकर काम कर रही हैं, वो कानून की मदद किस प्रकार लें? 'यू.पी. स्टेट लीगल सर्विसेस अथॉरिटी' की सचिव जी श्री देवी के अनुसार, ' हमारी राष्ट्रीय नीति के अनुसार, बच्चे देश की अनमोल धरोहर हैं, और हम सबका कर्तव्य है कि उन्हें हर प्रकार के उत्पीड़न एवम् शोषण से बचाएं. यह सच है कि भारतीय दंड संहिता में इसके लिए विशेष प्रावधान नहीं है, पर रुचिका बलात्कार केस के बाद, माननीय गृह  मंत्री  चिदंबरम जी के संरक्षण में एक नया 'यौन अपराध क़ानून' प्रस्तावित है. यदि यह कानून पास हो गया तो बलात्कारी को २ वर्ष कि जेल हो सकती है.'

परन्तु ऐसे घृणित अपराधों के लिए क्या दो वर्ष कि सजा काफी है?

श्री देवी जी का कहना है कि, ' ड्राफ्ट बिल में अवयस्क के साथ किये गए बलात्कार के मामलों में अधिकतम १०साल कि कैद हो सकती है. बिल में अवयस्क की आयु सीमा भी १६ वर्ष से बढ़ा कर १८ वर्ष कर दी गयी है. इससे बाल विवाह, एवम् अवयस्क विवाहित के साथ किये गए बलात्कार के मामलों को भी अपराध की श्रेणी में लाया जा सकेगा.

बाल कल्याण कमिटी नई दिल्ली की भूतपूर्व अध्यक्ष भारती शर्मा के अनुसार, ' ऐसे सभी मामलों में तुरंत पुलिस कार्यवाही आवश्यक है, और अपराधी को तुरंत पकड़ना भी ज़रूरी है ताकि वो अन्य बच्चों के साथ यही कुकर्म दोबारा न कर सके. साथ ही बच्चों को भी इस विषय की उचित जानकारी एवम् परामर्श देना आवश्यक है ताकि वे स्वयं अपनी रक्षा कर सकें. बच्चों में यह विश्वास पैदा करना भी ज़रूरी है कि कोई ऐसी दुर्घटना हो जाने की स्थिति  में वे किसी समझदार और विश्वसनीय व्यक्ति से इस बारे में बात कर सकें, तथा बच्चे की शिकायत पर उचित कार्यवाही की जा सके.

एक धनात्मक बात यह है कि शीघ्र ही एक इंटिग्रेटेड चाइल्ड प्रोटेक्शन योजना को कार्यान्वित किया जाने वाला है जिसके अंतर्गत बाल संरक्षण का एकीकृत कार्यक्रम बड़े और छोटे शहरों में उपलब्ध हो पायेगा.'

 बच्चों के हितों के लिए काम करने वाली 'साथी' नामक संस्था से सम्बद्ध अनुराधा वर्मा का कहना है कि, ' उत्पीड़न के शिकार बच्चों को बहुत अधिक देखभाल एवम् संरक्षण की आवश्यकता होती है. अधिकतर मामलों में अपराधी कोई जानने वाला  व्यक्ति ही होता है. ऐसी स्थिति में बच्चे को बार बार उसी व्यक्ति के हाथों यौन उत्पीड़न का शिकार तब तक होना पड़ता है जब तक उसे उस परिवेश से बाहर निकाल कर बचाया नहीं जाता. ऐसे बच्चे जीवन भर के लिए भावात्मक रूप से घायल हो जाते हैं, तथा उन्हें लम्बे समय तक उचित मनोवैज्ञानिक परामर्श की आवश्यकता होती है. परन्तु दुर्भाग्यवश, बाल संरक्षण अथवा बचाव केन्द्रों पर इस प्रकार की सुविधा उपलब्ध नहीं होती. इन केन्द्रों पर प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिकों की कमी, समस्या को और गंभीर बना देती है. इस कमी का निराकरण तुरंत होना चाहिए'.

अंजलि सिंह -सी.एन.एस
(अनुवाद: शोभा शुक्ल - सी.एन.एस)

ज़िन्दगी चुने, तम्बाकू नहीं!

चूँकि अधिकाँश तम्बाकू नशा युवावस्था में आरंभ होता है, इसीलिए आवश्यक है कि बच्चों और युवतियों/ युवाओं को तम्बाकू-जनित रोगों, विकृतियों और मृत्यु से सम्बंधित जानकारी हो जिससे कि वो ज़िन्दगी चुने, और तम्बाकू नहीं - कहना है प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त का जो अखिल भारतीय शल्य-चिकित्सकों के संगठन के निर्वाचित अध्यक्ष हैं. प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त, इंदिरा नगर बी-ब्लाक स्थित स्प्रिंग डेल कॉलेज में आयोजित "तम्बाकू मुक्त जीवनशैली पर परिचर्चा" में छात्रों-शिक्षकों को संबोधित कर रहे थे. प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त भारत के पहले सर्जन हैं जिन्हें विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक ने २००५ में अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार से नवाज़ा.

छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के भूतपूर्व सर्जरी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने कहा कि "अनेक जान लेवा और गंभीर रोगों का तम्बाकू जनक है जैसे कि हृदय रोग, कैंसर, फेफड़े के रोग, आदि, जिससे पूर्णतया: बचाव मुमकिन है."

सी-ब्लाक चौराहे इंदिरा नगर पर स्थित "पाइल्स (बवासीर) टू स्माइल्स" क्लिनिक एवं शाहमीना रोड स्थित सिप्स अस्पताल के निदेशक प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने कहा कि "हर वर्ष भारत में ही दस लाख लोगों की तम्बाकू के कारण मृत्यु होती है. मौजूदा जो लोग तम्बाकू का सेवन कर रहे हैं, उनमें से ५० प्रतिशत लोगों की मृत्यु तम्बाकू जनित कारणों से ही होगी."

मुंबई की दंत विशेषज्ञ डॉ शिवानी शर्मा ने कहा कि "मुंह के कैंसर का तम्बाकू एक बड़ा कारण है. तम्बाकू-जनित मुंह-के-कैंसर के खतरे को कम करने के लिये तम्बाकू सेवन को बिना-विलम्ब त्यागना आवश्यक है."

डॉ शिवानी शर्मा ने कहा कि "जिन लोगों में कैंसर-से-पहले वाली स्थिति होती है, उन्हें तुरंत तम्बाकू सेवन बंद करना चाहिए और दन्त विशेषज्ञ से जांच करवानी चाहिए जिससे कि मुंह के कैंसर होने की सम्भावना कम हो सके."

प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने कहा कि "तम्बाकू व्यसनियों को नशा मुक्ति के लिये विशेषज्ञों से मदद लेनी चाहिए. शोध के अनुसार अक्सर तम्बाकू सेवन करने वाले लोग तम्बाकू-जनित रोगों, विकृतियों और मृत्यु से अनभिज्ञ होते हैं. जो तम्बाकू व्यसनी इन खतरों को संजीदगी से समझते हैं, उनकी नशा-मुक्त होने की सम्भावना अधिक होती है."

इस कार्यक्रम में लखनऊ के अन्य जाने-माने लोग उपस्थित थे जिनमें राहुल कुमार द्विवेदी, शोभा शुक्ला, रितेश आर्य, आनंद पाठक, प्रमुख थे. इस कार्यक्रम को नागरिकों का स्वस्थ लखनऊ अभियान, इंडियन सोसाइटी अगेंस्ट स्मोकिंग,  अभिनव भारत फाउनडेशन, और आशा परिवार ने संयुक्त रूप से आयोजित किया था.

सी.एन.एस

योगी की राजनीति सामाजिक ताने-बाने के लिए खतरा

तस्वीर: राजीव यादव
[प्रोफेसर (डॉ) रूप रेखा वर्मा के वक्तव्य की ऑडियो रेकॉर्डिंग सुनने के लिए यहाँ क्लिक कीजिये] 
[English] न केवल गोरखपुर को बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश को जिस तरह से उग्र हिंदुत्ववाद जकड़ता जा रहा है वो नि:संदेह भारत के समक्ष एक जटिल चुनौती है कि कैसे हर नागरिक के लिए भले ही वो किसी भी धर्म-जाति की (का) हो, उसको सभी संवैधानिक अधिकार प्राप्त हो सकें और सम्मानजनक सुरक्षित और बिना-खौफ जीवन-यापन कर सके. उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब में प्रदर्शित वृत्तचित्र "भगवा युद्ध: एक युद्ध राष्ट्र के विरुद्ध" के दौरान यही बात स्पष्ट थी.

लखनऊ विश्वविद्यालय की भूतपूर्व उप-कुलपति एवं 'साझी दुनिया' से जुड़ीं प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता प्रोफेसर (डॉ) रूप रेखा वर्मा ने कहा: "एक समय में पूर्वी उत्तर प्रदेश प्रगतिशील विचारों की सरजमीन मानी जाती थी, जहां पर राही मासूम रज़ा जैसे साहित्यकार पैदा हुए और वहाँ से एक लम्बे समय तक लिखा, और वामपंथी आन्दोलन की, प्रगतिशील विचारों की, समतावादी आन्दोलन की वजह से पूर्वी उत्तर प्रदेश की सरजमीं जानी जाती थी. फिरकापरस्ती को घुसने न देने की ताकत थी उस जमीन में, उसके लिए पूर्वांचल जाना जाता था."

प्रोफेसर (डॉ) रूप रेखा वर्मा ने कहा कि "किस तरह से गोरखपुर फिरकापरस्त लोगों के कब्जे में हुआ यह समझने की जरुरत है. जब गोरखपुर में यह नारा लगना शुरू-शुरू ही हुआ था कि: "गोरखपुर में रहना है तो योगी योगी कहना होगा", और शायद तब तक पूरा गोरखपुर भी उसके शिकंजे में नहीं आ पाया था, तो यहाँ लखनऊ में बैठक हुई थी जिसमें ये चिंता व्यक्त की गयी थी कि हम लोग जो गोरखपुर से इतनी दूर बैठे हैं जिनकी जड़ें गोरखपुर में नहीं हैं, जिनका कोई 'काडर' गोरखपुर में नहीं है, वो लोग कैसे इसको वहीँ-का-वहीँ रोक के, इस हवा को तहसनहस कर सकते हैं. उस समय देश में जगह-जगह फिरकापरस्त ताकतें पनप रही थीं और हस्तछेप भी हो रहे थे, और इतना वक़्त नहीं था कि हम लोग गोरखपुर में नए सिरे से अपनी कोई टीम बनाये और इस लड़ाई को लड़ें. बात यह हुई कि वो राजनीतिक दल जिनके एजेंडे में फिरकापरस्ती नहीं है और जिनके काडर चुनावी कारणों से हर जगह होने ही चाहिए, उनसे हम सहायता मांग सकते हैं कि वो तत्काल अपने काडर को भेज कर हस्तछेप करें और उनके लिए यह चुनावी दृष्टि से भी फायदेमंद होगा. उनके अपने हितों और हमारे सामाजिक हितों में इस मेल की वजह से हम उनसे मदद लें, यह योजना बनी थी."

प्रोफेसर (डॉ) रूप रेखा वर्मा ने कहा कि "मुझे वामपंथी दल और समाजवादी पार्टी जाने को कहा गया था और श्री प्रकाश कारत और श्री अहमद हसन से बात हुई थी. इन सभी ने यह कहा कि हमारे काडर इसको नियंत्रित कर लेंगे, और हम लोग इतनी चिंता नहीं करें. परन्तु हम लोगों के देखते-ही-देखते न केवल पूरा गोरखपुर बल्कि अन्य छेत्र जैसे कि मऊ में भी फिरकापरस्ती जमती गयी. हम लोगों के एक दल ने मऊ जा कर मऊ दंगों की रपट लिखी थी और इसके प्रमाण थे कि कैसे हिन्दू युवा सेना के लोगों ने पहली गोली चलायी थी और उसी से सारा दंगा शुरू हुआ था, वर्ना वहाँ दंगे होने की कोई जमीन बनने न पायी थी. इस तरीके से आज हालत यह है कि पूरा पूर्वी उत्तर प्रदेश फिरकापरस्त ताकतों के चंगुल में है." 

प्रोफेसर (डॉ) रूप रेखा वर्मा ने बताया कि "पहले तो फिरकापरस्त ताकतें सूक्ष्म या महीन तरीकों से लम्बे समय तक काम करने की कोशिशें कर रही थी जिसके बाद ही उनका जहर घुल पाता था. परन्तु अब तो एक दबंग फिरकापरस्त 'मूवमेंट' है जिसने पूर्वी उत्तर प्रदेश को अपना शिकार बनाया है, जिसमें उस महीन तरीके से काम करने की न तो शिद्दत है, न अक्ल है, न तमीज है, सिर्फ दबंगई की वजह से और गोरखनाथ पीठ का धार्मिक लाभ उठा कर के और गोरखनाथ पीठ के पूरे स्वरुप को बदल कर ही यह पनप राही हैं."

स्त्री विरोधी मुद्दे और फिरकापरस्ती ताकतें कैसे आसानी से जुड़ जाती है, इस पर भी प्रोफेसर (डॉ) रूप रेखा वर्मा ने प्रकाश डाला. प्रोफेसर वर्मा ने कहा कि "उत्तर प्रदेश की बड़ी अजीब स्थिति है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश पूरी तरह से फिरकापरस्त दबंगों के गिरफ्त में है और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में स्त्री-विरोधी पितृसत्ता व्याप्त है - यूँ तो पूरे भारत में ही पितृसत्ता है पर जिस तरह की पितृसत्ता, जिस तरह का स्त्री-विरोधी मौहौल, हमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश में देखने को मिलता है वो चिंताजनक है. स्त्री-विरोधी पितृसत्ता का तानाबाना फिरकापरस्ती से होना बहुत आसान हो जाता है."

प्रोफेसर (डॉ) रूप रेखा वर्मा, उत्तर प्रदेश प्रेस क्लब में वृत्तचित्र "भगवा युद्ध: एक युद्ध राष्ट्र के विरुद्ध" के प्रदर्शन से पहले सत्र में अपने विचार रख रही थीं. भाजपा सांसद और गोरखनाथ पीठ के उत्तराधिकारी योगी आदित्यनाथ द्वारा पूर्वांचल में की जा रही साम्प्रदायिक आतंकी राजनीति पर यह वृत्तचित्र आधारित है. 

फिल्म के बाद आयोजित परिचर्चा को संबोधित करते हुए मागसेसे पुरुस्कार से सम्मानित मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ० संदीप पाण्डे ने कहा कि पूर्वांचल में यह प्रयोग लम्बे समय से चल रहा है और इसे लगातार सरकार व प्रशासन द्वारा नजरअंदाज किया जा रहा है। एडवोकेट मुहम्मद शुएब ने कहा कि भगवा युद्ध न केवल एक समुदाय विशेष के खिलाफ की जा रही आतंकी गतिविधियों को सामने लाती है, बल्कि बहुसंख्यक हिंदू समुदाय के दलितों, महिलाओं व बच्चों में साम्प्रदायिकता के विषरोपण को सामने लाती है। अयोध्या के महंत युगल किशोर शरण शास्त्री ने कहा कि आदित्य नाथ योगी परम्परा के विरुद्ध ऐसी परम्परा की रचना कर रहे हैं जिसमें योगी, बदमाश के रूप में सामने आया रहा है। उन्होंने कहा कि यह फिल्म ऐसे प्रयोगों का पर्दाफाश करती है।

हिंदी में बनी 43 मिनट की इस फिल्म का निर्देशन युवा फिल्मकार राजीव यादव, शाहनवाज आलम और लक्ष्मण प्रसाद ने किया है। इस प्रदर्शन में नर्मदा बचाओ आन्दोलन की वरिष्ठ कार्यकर्ता अरुधंती धुरू, अयोध्या-फैजाबाद की वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता, वरिष्ठ पत्रकार अम्बरीश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस, रवि शेखर सहित शहर के विभिन्न सामाजिक संगठनों के लोग और बुद्धिजीवियों ने भाग लिया।

बाबी रमाकांत - सी.एन.एस

खाद्य सुरक्षा व जलवायु परिवर्तन पर एक वर्ष का क्षमतावर्धन प्रशिक्षण कार्यक्रम

गोरखपुर एनवायरन्मेन्टल एक्शन ग्रुप, भारत एवं विमेन्स अर्थ एलायन्स, अमरीका की संयुक्तत्वाधान में भारतीय महिलाओं की खाद्य सुरक्षा व जलवायु परिवर्तन पर एक वर्ष का क्षमतावर्धन प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। इस तरह का प्रशिक्षण पहली बार भारत देश में आयोजित किया जा रहा है। प्रशिक्षण प्रक्रिया इस वर्ष 3 चरणों में आयोजित होगी। प्रथम चरण का प्रशिक्षण 6 दिन का होगा जो 18 अप्रैल से 23 अप्रैल तक जी0ई0ए0जी0 प्रशिक्षण केन्द्र कैम्पियरगंज में आयोजित होगा। उसके बाद 3 दिन का प्रशिक्षण सितम्बर और नवम्बर में किया जायेगा। इस प्रशिक्षण कार्यक्रम को करने का उद्देश्य है कि गावों की अग्रणी महिलाएं अपने समुदाय को खाद्य सुरक्षा टिकाऊ कृषि पारिस्थितिक और आर्थिक सुरक्षा की तरफ ले जा सकें।

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में 5 राज्यों उ0प्र0, बिहार, उत्तरांचल, उड़ीसा एवं पश्चिम बंगाल की 41 महिला किसान प्रतिभाग करेगीं जो कि बाढ प्रभावित क्षेत्र की होगीं। इस प्रशिक्षण की प्रतिभागी गांव की अग्रणी महिलाएं होंगी जो कि लिंग, टिकाऊ कृषि, खाद्य सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन की समस्याओं व समाधानों पर विभिन्न विषय विशेषज्ञों द्वारा प्रशिक्षण प्राप्त करेंगी। इस प्रशिक्षण की खास विशेषता यह है कि अलग-अलग क्षेत्रों के किसानों में ज्ञान व अनुभव में सामंजस्य बनाते हुए तकनीकी ज्ञान को आगे बढ़या जा सके जिससे कि प्रशिक्षित महिला किसान अपने अनुभव को अपने क्षेत्र के किसानों में बाट सके।

इस सम्पूर्ण प्रशिक्षण को प्राप्त करने से प्रतिभागी महिलाओं को ऐसी दक्षता व संसाधन प्राप्त हो सकेंगे जिससे वे-अपने समुदाय हेतु एक परियोजना को तैयार कर सकें और इसे क्रियान्वित कर सके जैसे खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु देसी फसलों का अनाज भंडारण या विविधापूर्ण फसलों का उत्पादन।आपदा के खतरों को कम कर सकें ताकि बाढ़ जैसी स्थितियों से निपटा जा सके। टिकाऊ खेती तकनीकों को कार्यान्वित कर सके।

खेती के क्षेत्र में निपुण लोगों के साथ एक साझा नेटवर्क बना सकें जिससे महिला किसानों के हित-अधिकारों पर सशक्त पैरवी हो सके। महिलाओं की कृषि क्षेत्र में स्थिति सुधारने के लिए अन्य अभियानों से उनका जुड़ाव हो सके।

विशेषज्ञ के रूप में श्री अरूधेन्दू चटर्जी कोलकाता से, सुश्री अदिती कपूर दिल्ली से, सुश्री शबनम सिद्दीकी मुम्बई से, मेलिण्डा क्रेमर कैलीफोर्निया से एवं सुश्री रंजनी कृष्ण मूर्ति चेन्नई से उपस्थित रहेगीं।

जितेन्द्र द्विवेदी

मिस्र का क्रांति के बाद का भविष्य

अजीत साही
(मौलिक रूप से वरिष्ठ पत्रकार अजीत साही ने यह लेख अंग्रेजी में लिखा है जिसका हिंदी अनुवाद करने की कोशिश की गयी है, त्रुटियों के लिये क्षमा कीजियेगा-सी.एन.एस)

१९ मार्च २०११ को मिस्र की तीन-चौथाई जनता ने जनमत-संग्रह में भाग लिया जिससे कि मिस्र के संविधान में बदलाव लाया जा सके। अरब-दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा जिसने २५ जनवरी से लेकर ११ फरवरी तक ऐतिहासिक जनांदोलन देखा? अनेक युवा 'धर्म-निरपेक्ष' क्रांतिकारी जिन्होंने लाखों लोगों के साथ मिस्र में २९ साल पुरानी होस्नी मुबारक की हुकूमत को ११ फरवरी को सत्ताच्युत करने में भरपूर सहयोग दिया, उनके लिये जनमत-संग्रह में 'हाँ' एक धक्का है। इनमें से अनेक लोग इसलिये बदलाव के लिये संघर्ष कर रहे थे कि मिस्र में एकदम नया संविधान रचित किया जाए, न कि पुराने में ही बदलाव किये जाएँ।

जनमत-संग्रह से तीन दिन पहले, मिस्र की राजधानी काहिरा में मेरे निवास के दौरान बनी मेरी एक मित्र, अमीना खैरात, जो युवा 'ओपेरा' नर्तकी हैं, उन्होंने फोन पर सन्देश भेजा कि 'मिस्र की क्रांति एकदम नए संविधान के लिये थी, इसीलिए पुराने संविधान को पूरा ही हटाना होगा'। अमीना खैरात उस समय मिस्र के सुप्रीम कोर्ट के बाहर दर्जन भर से अधिक मुकदमों के नतीजे का इंतजार कर रही थीं जो जनमत-संग्रह को रोकने के लिये किये गए थे।

मिस्र के सबसे प्रमुख अंग्रेजी अखबार के अनुसार, उनके दो मुख्यधारा के राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखने वाले लोग - अरब लीग के महासचिव अमर मौस्सा और अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के भूतपूर्व प्रमुख मोहम्मद एल बारादेई - दोनों ने एकदम नए संविधान की मांग का समर्थन किया था। दूसरी तरफ, पिछले ३० साल से अबतक प्रतिबंधित इस्लामिक समूह, 'मुस्लिम भाईचारा', जिसके कट्टरवादी इरादों से पश्चिम के राष्ट्र भी भयभीत रहते हैं, संविधान में संशोधन की मांग का समर्थन कर रहा था।

तो क्या जिस जनमत-संग्रह में तीन-चौथाई मिस्र के नागरिकों ने भाग लिया, उसकी 'हाँ' को धर्म-निरपेक्ष और आधुनिकतावादी लोगों के लिये धक्का ही माना जाए? क्या संशोधित संविधान, धर्म-निरपेक्ष और आधुनिकतावादी लोगों के लिये भारी पड़ेगा? क्या इसका यह मतलब होगा कि व्यवस्था में जो राजनीतिज्ञ हैं - जिनमें से अधिकाँश भ्रष्ट और भूतपूर्व सैन्य अधिकारी हैं - उनके लिये मिस्र की राजनीति और प्रशासन पर पकड़ बनाये रखना मुमकिन रहेगा?

अब हम लोग एक नजर डाल लें कि मिस्र के संविधान में क्या संशोधन प्रस्तावित हैं। कुल मिला कर ११ संशोधन प्रस्तावित हैं। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण यह है कि राष्ट्रपति के कार्यकाल की समय-सीमा ४ साल निर्धारित हो जिसके पश्चात पुनः चुनाव होंगे और राष्ट्रपति को भी दोबारा चुनाव लड़ने दिया जाएगा। राष्ट्रपति के पद पर दो बार से अधिक कोई भी नहीं रह सकेगा - जिसका सीधा तात्पर्य यह है कि किसी भी व्यक्ति का राष्ट्रपति कार्यकाल ८ साल से अधिक हो ही नहीं सकेगा। यह बहुत बड़ा बदलाव है क्योंकि अक्टूबर १९८१ में मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादत की हत्या के बाद पुराने संविधान की आड़ में होस्नी मुबारक ने लगभग ३० साल तक बिना किसी अवरोध के राज्य किया।

हालाँकि जो पात्रताएं राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने के दावेदारों के लिये रखी गयीं हैं, वो ऐसी हैं कि आम मिस्र के नागरिक का यह चुनाव लड़ना असंभव सा है। अधिकाँश पात्रताएं ऐसी है कि जो लोग पहले से ही राजनीति में हैं, उनके लिये ही यह चुनाव लड़ना संभव हो सकेगा। उदाहरण के तौर पर एक पात्रता यह है कि राष्ट्रपति पद के दावेदार को संसद के सदस्यों का समर्थन प्राप्त हो। नए संशोधित संविधान में यह भी प्रावधान है कि कोई भी मिस्र का नागरिक राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ सकती (या सकता) है यदि उसको अनेक शहरों से ३०,००० मिस्र के मतदाता नागरिकों का हस्ताक्षर के साथ समर्थन प्राप्त हों। न्यूनतम उम्र राष्ट्रपति पद के लिये ४० साल निर्धारित की गयी है जिसकी वजह से अधिकाँश मिस्र के नागरिक यूँ भी राष्ट्रपति पद का चुनाव नहीं लड़ सकते क्योंकि मिस्र की ८.५० करोड़ की जनता में से तीन-चौथाई की उम्र ३० साल से कम है। अन्य नए नियमों में से एक है जो मिस्र में राजनीतिक पार्टियाँ बनाने की अनुमति प्रदान करता हैं।

मिस्र में क्या घटित हुआ है यह समझने के लिये सबसे बेहतर तरीका संवैधानिक संशोधनों को बूझना नहीं है, बल्कि यह समझने की आवश्यकता है कि उन १८ दिनों की क्रांति के दौरान आम नागरिक की सोच पर कितना गहरा असर पड़ा है। जब २५ जनवरी २०११ को मिस्र क्रांति आरंभ हुई थी, तब की यदि आप विश्वव्यापी मीडिया में पुरानी रपट और समाचार विश्लेषण पढ़ें तो आप देखेंगे कि कोई यह मानने को ही तैयार नहीं था कि इस क्रांति से कोई महत्त्वपूर्ण बदलाव आ सकेगा। परन्तु, मेरी तरह, यदि आप तहरीर चौक में होते, जो काहिरा शहर के केंद्र में है, और जिसके विशाल क्षेत्र में १८ दिन की क्रांति के दौरान लाखों लोगों ने एक नए मिस्र की धुन को ले कर डेरा डाला हुआ था, तो आपको स्वयं ही आभास हो जाता कि दुनिया की कोई भी ताकत अब मिस्र में होने वाले इस अवश्यम्भावी लोकतान्त्रिक बदलाव को नहीं रोक पायेगी।

मैं मिस्र ४ फरवरी को पहुंचा जो क्रांति आरंभ होने के बाद का दूसरा शुक्रवार था। पहले शुक्रवार को (२८ जनवरी २०११) मिस्र पुलिस ने हमला कर शांतिप्रिय प्रदर्शनकारियों को बेरहमी से जान से मार दिया था। मेरे मिस्र पहुँचने के दो दिन पहले भी इससे भी अधिक नृशंस घटना में घोड़े और ऊंट पर सवार सादे-कपड़ों में सैन्यबलों ने हमला बोला था जिससे कि क्रांति को कुचला जा सके। परन्तु इन सब हमलों का विपरीत प्रभाव पड़ा व क्रांतिकारी और अधिक संघर्षशील और दृढ-संकल्पी हो गए। तहरीर चौक पर, जहां मैंने कई दिन और कुछ रात भी बितायी हैं, मैं अनेक लोगों से मिला जो भोजन की तलाश में एक भूखे शेर के समान थे जिन्होंने निश्चय कर लिया था कि क्रांति के अंत तक वो अडिग रहेंगे और होस्नी मुबारक की पीठ ही देख कर दम लेंगे जब उन्हें २९ साल पुराना राष्ट्रपति पद छोड़ना पड़ेगा। मिस्र के इन क्रांतिकारियों और बाकी विश्व में जो अंदाजा लगाया जा रहा था, उसमें काफी अंतर था। एक ओर इन क्रांतिकारियों को पूरा विश्वास था कि होस्नी मुबारक को हटा कर ही दम लेंगे, वहीं दूसरी ओर पश्चमी विश्लेषक और सरकारें यह मानने से ही इन्कार कर रही थीं कि जिस होस्नी मुबारक ने २९ साल तक तानाशाह की तरह राज किया है, उसको हटाना मुमकिन होगा। बिडेन ने कहा था कि मुबारक 'तानाशाह' नहीं है। अमरीका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने कहा था कि होस्नी मुबारक का राजकाल स्थिर रहा है (इन्हीं हिलेरी क्लिंटन ने बिना शर्म के मध्य-मार्च में तहरीर चौक पर क्रांति के गीत गाए)।

हम सबको, मिस्र के अलावा विश्व को, यह समझने की जरुरत है कि मिस्र का भविष्य संविधान में नहीं है। संशोधित हो या नया संविधान हो. मिस्र का भविष्य वहाँ के लोगों की नई चेतना में है जिनमें दबाये जाने का डर कई पीढ़ियों तक समाप्त हो चुका है। बीसों साल तक मिस्र के लोग सर झुकाए इस भय से आतंकित रहते थे कि कब उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाए, डराया-धमकाया जाए, जेल भेज दिया जाए या अन्य प्रताड़नाओं का सामना करना पड़े। आपातकालीन कानून जो मुबारक ने १९८१ में पद सँभालते ही बनाया था, वे अब जा कर समाप्ति की ओर है। इन २९ सालों में यदि ५ लोग एक साथ सड़क पर पैदल जाते दिख जाते थे, तो खतरा मंडराता था कि उन्हें गैर-कानूनी सभा के जुर्म में गिरफ्तार किया जा सकता है।

अब और नहीं. 'हमें तहरीर चौक का रास्ता पता चल गया है' कहना है अशरफ तमन्ज का, जो ३० वर्षीय भूतपूर्व राष्ट्रीय दर्जे के बास्केटबाल खिलाड़ी हैं और वर्तमान में क्रांतिकारी, जिनसे मेरा संवाद मुबारक हुकूमत के विस्थापन के बाद हुआ।

यह तो निश्चित है कि लोकतंत्र की राह पथरीली होती है और मिस्र की क्रांतिकारी सभाओं में संख्या और बढ़ेगी। सालों-साल तक, मुबारक की हुकूमत से भी पहले से पश्चिमी ताकतों ने, खासकर तेल के लिये, पश्चिम एशिया के देशों पर नियंत्रण रखा है। मिस्र के सन्दर्भ में अमरीका विशेष परेशान है क्योंकि उसको यह डर है कि मिस्र में पहले से अधिक लोकतान्त्रिक और राष्ट्रवादी सरकार आएगी वो उत्तर में रेड और 'मेडीटेरिनियन' समुद्र को जोड़ने वाली 'सुएज कैनाल' पर अधिक नियंत्रण रखेगी, जो दक्षिण में यूरोप का प्रवेश बिंदु है। उत्तरी अमरीका एवं यूरोप के देशों ने 'सुएज कैनाल' का इस्तेमाल कर के सैंकड़ों बिलियन डालर बचाए हैं, वर्ना उन्हें पूरे अफ्रीका का चक्कर लगा कर जाना पड़ता। उसी तरह से अमरीका और उसके दबदबे में आने वाले पश्चिम एशिया के देश जैसे कि इजराइल को भी डर है कि मिस्र में कहीं राष्ट्रवादी और अधिक-स्वतंत्र सरकार न स्थापित हो जाए। ३० साल से मिस्र ने, अरब दुनिया के अन्य राष्ट्रों को निराश कर, अमरीका और इजराइल के हितों की पूर्ति की है। अरब देशों को यह तक लगता है कि मिस्र ने फिलीस्तीन के मामले में धोखा दिया है।

यह नासमझी ही होगी यदि हम यह मान लें कि अमरीका-इजराइल और यूरोप यूँ ही हार मान कर बैठ जायेंगे। आप देखिये कि वें लीबिया में क्या कर रहे हैं - पहले 'क्रांतिकारियों' को अस्त्र-शास्त्र दिए और फिर ऐसी स्थिति पैदा की कि उनको सैन्य हस्तक्षेप करने का मौका मिला जिससे कि मिस्र के पश्चिम पड़ोसी राज्य (लीबिया) पर नियंत्रण रह सके जिसके पास काफी मात्र में तेल है और यूरोपी देशों, विशेषकर इटली के लिये, वो एक प्रमुख पेट्रोल आपूर्तिकर्ता हैं। यह तो बिलकुल साफ है कि अमरीका और यूरोप दोनों ही मिस्र के कामकाज में हस्तक्षेप करते रहेंगे।

दुनिया को, विशेषकर कि पश्चिम राष्ट्रों को, यह साफ समझ लेना चाहिए कि मिस्र में खेल के नियम अब हमेशा के लिये बदल गए हैं। जैसा कि तमन्ज ने कहा, ‘हमें तहरीर चौक का रास्ता पता चल गया है’। जन शक्ति अब हमेशा मिस्र की सरकार पर निगरानी रखेगी। इसीलिए मिस्र के बाहर व्याप्त खौफ, कि कहीं सैन्य शक्ति उभर कर न आ जाए, के बावजूद, सैन्य शक्तियां ऐसा कुछ भी करने में असफल रहीं और अब चुनाव करवा के लोगों के हाथ में ही हुकूमत देने को हैं। लोकतंत्र एक रात में नहीं कायम हो जाता, और निःसंदेह १८ दिन की क्रांति में तो यह संभव नहीं है। परन्तु, मैं अब और भी अधिक विश्वास के साथ कह सकता हूँ, कि जो हमने १८ दिनों में देखा है वो आने वाले २० साल की क्रांति की शुरुआत है।

मैंने अपने पड़ाव के दौरान काहिरा में अनेक लोगों से बात की और पाया कि लोकतंत्र से उनको क्या हासिल होगा इसकी लोगों में बहुत ही कम समझ है। लगभग सभी लोगों को पूरा यकीन था कि जैसे ही चुनाव हो जायेंगे, और राष्ट्रवादी सरकार केंद्र में आ जाएगी, सब ठीक हो जायेगा। एक मिस्र नागरिक ने यह तक मुझसे कहा कि 'हम आपके भारत जैसा बनना चाहते हैं'। मैंने तुरंत जवाब दिया, 'मैं मनाता हूँ कि ऐसा न हो!'. पर यह पाठ तो मिस्र के लोगों को स्वयं ही सीखना पड़ेगा जिसके लिये वो अपना समय लेंगे, और अधिक कुरबानी देंगे, काफी संघर्ष करेंगे जिससे कि जनवरी २०११ की क्रांति का फल आने वाले सालों में एक नीव बन सके।

और इसके लिये, आज और आने वाले कल में, उनको कोई भी नहीं रोक सकेगा।

अजीत साही

(मौलिक रूप से वरिष्ठ पत्रकार अजीत साही ने यह लेख अंग्रेजी में लिखा है जिसका हिंदी अनुवाद करने की कोशिश की गयी है, त्रुटियों के लिये क्षमा कीजियेगा-सी.एन.एस)

"युवाओं को तम्बाकू सेवन से दूर रहना चाहिए": प्रो० रमा कान्त

[English] अधिकांश तम्बाकू सेवन 18 वर्ष से पहले ही आरम्भ होता है। इसीलिए बच्चों एवं युवाओं को तम्बाकू जनित जानलेवा रोगों एवं व्याधियों के बारे में जानकारी देना अनिवार्य है जिससे कि वें ज़िन्दगी चुनें, तम्बाकू नहीं. एसोसिएशन ऑफ सर्जन्स ऑफ इण्डिया के 2012 निर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष, प्रोफेसर डॉ० रमा कान्त ने मुंशीपुलिया, इन्दिरा नगर स्थित एस०जे०एस० पब्लिक स्कूल के छात्रों-शिक्षकों को यही मूल सन्देश दिया. प्रोफेसर डॉ० रमा कान्त, छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के सर्जरी विभाग के भूतपूर्व विभागाध्यक्ष हैं।

प्रो० डॉ० रमा कान्त, जो नागरिकों के स्वस्थ लखनऊ अभियान के संरक्षक हैं, वें भारत के पहले सर्जन हैं जिनको वर्ष 2005 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक का विशेष अंतर्राष्ट्रीय पुरूस्कार मिला है।


एस०जे०एस० पब्लिक स्कूल की प्राधानाचार्या सुश्री अफशान ने कहा कि "मैं अपने शैक्षिक संस्थान परिसर को तम्बाकू मुक्त रखने का पूरा प्रयास करती हूँ। बच्चों और युवाओं को तम्बाकू से दूर रहना चाहिए क्योंकि यह धीमा जहर है।"


प्रो० डॉ० रमा कान्त जो वर्तमान में 'पाइल्स टू स्माइल्स' क्लीनिक के निदेशक हैं, उन्होंने कहा कि "बच्चों एवं युवाओं में तम्बाकू नियंत्रण करना व्यापक तम्बाकू नियंत्रण योजना का एक अहम भाग है"।


प्रो० डॉ० रमा कान्त ने कहा कि "भारत में तम्बाकू से हर वर्ष 10 लाख से अधिक लोग मृत्यु को प्राप्त होते हैं। बच्चों और युवाओं को तम्बाकू कम्पनियों के प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष भ्रामक प्रचार से दूर रहना चाहिए और उससे प्रभावित नहीं होना चाहिए। उनको तम्बाकू सेवन की असली तस्वीर जो जानलेवा बीमारियों से जुड़ी है उससे परिचित होना चाहिए जिससे कि वें ज़िन्दगी चुनें, तम्बाकू नहीं"।


प्रो० डॉ० रमा कान्त जिनको केन्द्रिय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय का अनुशंसा पुरूस्कार भी 1997 में मिल चुका है उन्होंने कहा कि "लगभग आधी तम्बाकू जनित मृत्यु 35-69 वर्ष के दौरान होती है। धूम्रपान से अधिकांश मरने वाले लोगों ने तम्बाकू सेवन युवावस्था में आरम्भ किया था। 30-40 साल के लोग जो तम्बाकू सेवन करते हैं, उनको हृदय रोग होने का पॉंच गुणा अधिक खतरा रहता है। तम्बाकू जनित हृदय रोग एवं कैंसर तम्बाकू व्यसनियों की मौत का सबसे बड़ा कारण है"।

 इस अवसर पर छात्रों के लिए एक वृत्तचित्र 'तम्बाकू सेवन से होने वाले नुकसान' भी प्रदर्शित किया गया जिसमें तम्बाकू के जानलेवा रोगों से ग्रसित लोगों की दास्तान है।


इस परिचर्चा को नागरिकों के स्वस्थ लखनऊ अभियान, इण्डियन सोसायटी अगेंस्ट स्मोकिंग, अभिनव भारत फाउंडेशन एवं आशा परिवार द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था।


सी.एन.एस.

जब लाख लोग सड़क पर उतरे, असम सरकार ने अखिल गोगोई को किया रिहा

[English] असम में जब अखिल गोगोई की रिहाई मांगते हुए लगभग लाख लोग सड़क पर उतर आये, असम सरकार को अखिल गोगोई को रिहा करना पड़ा. असम सरकार ने अखिल गोगोई और १०० अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया था जब वें गुवाहटी में जन लोकपल बिल की मांग को और अन्ना हजारे के देश-व्यापी भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलन के समर्थन को लेकर प्रेस वार्ता संबोधित कर रहे थे. अखिल गोगोई, कृषक मुक्ति संग्राम समिति का नेत्रित्व कर रहे हैं और कर्मठ सूचना-का-अधिकार (RTI) कार्यकर्ता भी हैं.

असम सरकार ने उनको १०० अन्य लोगों के साथ गिरफ्तार किया था जिनमें ५० महिलाएं भी थीं. चंद घंटों में ही लाख लोग सड़क पर उतर आये और अखिल गोगोई और अन्य की रिहाई की मांग का दबाव बढ़ता ही गया. अंतत: सरकार ने उनको रिहा कर दिया.

जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय ने असम सरकार द्वारा लोकतान्त्रिक तरीके से अहिंसक आन्दोलन को दबाने के इस अवांछनीय कृत की आलोचना की है.

रोमा

विश्व स्वास्थ्य दिवस, ७ अप्रैल २०११

लखनऊ में खुली दवाओं का बिना-डाक्टरी पर्चे के अनियंत्रित विक्रय, दवाओं का ज्ञान रहित और अनुचित उपयोग, दवाओं को पूरी अवधि तक न लेना, आदि कुछ  मुद्दे हैं जो हम सब विश्व स्वास्थ्य दिवस पर उठाना  चाहते हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस वर्ष विश्व स्वास्थ्य दिवस इस केंद्रीय विचार पर मनाया है: यदि आज कोई कदम नहीं उठाया गया, तो कल कोई इलाज न रहेगा (Antimicrobial resistance: no action today, no cure tomorrow).

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार प्राप्त प्रोफेसर डॉ रमा कान्त का कहना है कि "विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, अगर यूँ ही दवाओं के प्रति प्रतिरोधकता बढती रही, तो दवाएं बेइलाज हो जाएँगी. अनेक बीमारियों और अवस्थाओं के लिये इलाज के विकल्प सीमित होते जा रहे हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दवा प्रतिरोधकता कोई नयी समस्या नहीं है, बल्कि पुरानी समस्या है जो अब अधिक विकराल रूप ले रही है, और यदि पर्याप्त कदम न उठाये गए तो हम लोग उस युग में पहुँच जायेंगे जब एंटी-बायोटिक दवाओं का आविष्कार ही नहीं हुआ था.

प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने कहा कि "विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, हम इस युग में रह रहे हैं जहां अक्सर दवाओं की वजह से उन बीमारियों और अवस्थाओं का इलाज मुमकिन है जो पहले घातक थीं. यदि दवा प्रतिरोधकता हो जाती है, तो ये जीवन बचाने वाली दवाएं कारगर नहीं रहती".

उदाहरण के तौर पर तपेदिक या टी.बी. में दवा प्रतिरोधकता सबसे अधिक चुनौती दे रही है जहां लगभग ५ लाख लोग दवा प्रतिरोधक तपेदिक या टी.बी. के शिकार हैं. इनमें से ५० प्रतिशत की मृत्यु हो जाती है, जिससे बचाव तभी मुमकिन है यदि तपेदिक की जांच और इलाज समय से कराया जाय..

स्वस्थ्य लखनऊ के लिये नागरिक, आशा परिवार, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, अभिनव भारत फाउनडेशन, इंडियन सोसाइटी अगैंस्ट स्मोकिंग

रामरती को मिला सी0आई0आई0 आदर्श महिला अवार्ड 2011

गोरखपुर एनवायरन्मेन्टल एक्शन ग्रुप से पिछले 15 वर्षो से जुड़कर स्थायी कृषि के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बना चुकी कैम्पियरगंज के सरपतहा गांव की 50 वर्षीय महिला किसान श्रीमती रामरती को लघु उद्दम एवं स्थायी कृषि के क्षेत्र में किये गये इनके विशेष योगदान पर Confederation of Indian Industry(CII) ने राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार "सी0आई0आई0 आदर्श महिला अवार्ड २०११" से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। यह पुरस्कार आगामी 8-9 अप्रैल 2011 को दिल्ली में आयोजित सी0आई0आई0 के राष्ट्रीय सम्मेलन में दिया जायेगा। पुरस्कार राशि के रूप में इनको एक लाख रूपया मिलेगा। सी0आई0आई0 1895 से सामाजिक मुद्दों पर काम कर रही है। 2005 से सी0आई0आई0 सम्पूर्ण भारत में महिला सशक्तीकरण पर काम करने वाली ग्रामीण महिलाओं को राष्ट्रीय स्तर पर तीन क्षेत्रों-- शिक्षा एवं साक्षरता, स्वास्थ्य और लद्यु उद्दम-- में  विशेष योगदान हेतु यह पुरस्कार देती आ रही हैं। इस पुरस्कार के लिए पूरे भारत वर्ष से हजारों की संख्या में आवेदन आये थे, लेकिन श्रीमती रामरती द्वारा ग्रामीण स्तर पर अपने सीमित संसाधनों में स्थायी कृषि एवं लघु उद्दम के क्षेत्र में किये जा रहे प्रयास बाकी के सभी आवेदको के प्रयासो से ज्यादा बेहतर पाये गए। रामरती यह पुरस्कार पाने वाली उ0प्र0 की पहली महिला किसान है।

रामरती के 11 सदस्यी परिवार में इनके पति, तीन बेटे, दो बहुएं एवं 5 नाती है। रामरती के जीवन पर दृष्टिपात करे तो स्पष्ट होता है कि इनका जीवन काफी मुश्किलों से भरा था. खेती करना तो दूर बीज डालने भर का भी पैसा नही हुआ करता था। अपनी आजीविका चलाने के लिए दूसरे के खेतों में मजदूरी करती थी। लगभग 15 वर्ष पूर्व जी0ई0ए0जी0 द्वारा सरपतहा गांव में गठित 'स्वयं सहायता समूह' के माध्यम से इनका जुड़ाव इस  संस्था से हुआ। खेती से इनका लगाव हमेशा से रहा है. लिहाजा अपनी खेती के प्रति रूचि के चलते जल्दी ही ये चयनित किसान के रूप में संस्था द्वारा चुन ली गयी। जी0ई0ए0जी0 द्वारा  समय-समय पर प्राप्त तकनीकी सहयोग एवं प्रेरणा और अपने स्वयं के ज्ञान व कौशल को जोड़ते हुए बहुत कम समय में इन्होंने अपने आप को एक सफल किसान के रूप में स्थापित कर दिया। घर/परिवार,  एवं खेत खलिहान के बेहतर सामंजस्य, और समय एवं स्थान के बेहतर प्रबन्धन ने उन्हें छोटे से खेत के टुकडे में भी बेहतर आजीविका के साधन उपलब्ध कराये। वे एक ही खेत में एक साथ कई फसलें उगाने का कौशल जानती है। पढ़ी लिखी नहीं हैं लेकिन नामचीन कृषि वैज्ञानिकों को खेती किसानी के अपने ज्ञान से हत प्रभ कर दिया है।

वे संसाधन की मार, मौसम की अनियमितता, लोगों के कटाक्ष से बेपरवाह आगे बढ़ती गयी। अपनी एक एकड़ जमीन में अपनी पूरी दुनिया सजा ली। आज इनके पास सब कुछ है-- पक्का घर, खेती में काम आने वाले औजार, सिंचाई का पम्प सेट। प्रगतिशील किसानों में उनकी गिनती होती है। रामरती का खेत जैव विविधता का पार्क लगता है। ये साल में 32 से अधिक फसलें उगाती है। रामरती के पास कुल एक एकड़ की खेती है जो पूर्ण रूप से जैविक है। वे अपने चार अदद दुधारू जानवरों के गोबर,बगीचे के पत्तों और सब्जियों के अपशिष्ट से जैविक खाद बनाती है। तम्बाकू, लहसुन आदि से कीटनाशक बनाती है। रसायनिक खादों व कीटनाशकों का प्रयोग उन्होंने वर्षो पहले छोड़ दिया।

इन्होंने विभिन्न लद्यु उद्योगों जैसे मोमबत्ती और अगरबत्ती बनाना, सब्जी एवं मसाले की खेती, बीज उत्पादन इत्यादि से अपनी आजीविका के विभिन्न विकल्प तो तैयार किये ही, साथ ही अन्य लोगों को भी इसके लिये प्रेरित किया।

आज रामरती अष्टभुजी स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष एवं कृषि सेवा केन्द्र एवं किसान विद्यालय की संचालिका हैं. इसके साथ ही ये एक मास्टर ट्रेनर भी हैं। वह छोटी जोत वाले किसानों को कम लागत और कम संसाधन में लाभकारी खेती के गुर सिखाती है।

जितेन्द्र द्विवेदी
(लेखक, उत्तर प्रदेश में कृषि मुद्दों पर विशेष रूप से लिखते रहे हैं और स्वतंत्र पत्रकार हैं। ईमेल: jitendraabf@gmail.com, फोन: 9415790126)

क्या है जन लोकपाल बिल

कुछ जागरूक  नागरिकों द्वारा शुरू की गई एक पहल का नाम है 'जन लोकपाल बिल'. इस कानून के अंतर्गत, केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त का गठन होगा. जस्टिस संतोष हेगड़े, प्रशांत भूषण और अरविन्द केजरीवाल द्वारा बनाया गया यह विधेयक लोगो के द्वारा वेबसाइट पर दी गयी प्रतिक्रिया और जनता के साथ विचार विमर्श के बाद तैयार किया गया है. यह संस्था निर्वाचन आयोग और सुप्रीम कोर्ट की तरह सरकार से स्वतंत्र होगी. कोई भी नेता या सरकारी अधिकारी जांच की प्रक्रिया को प्रभावित नहीं कर पायेगा. इस बिल को शांति भूषण, जे. एम. लिंगदोह, किरण बेदी, अन्ना हजारे आदि का भारी समर्थन प्राप्त हुआ है.

इस बिल की मांग है कि भ्रष्टाचारियो  के खिलाफ किसी भी मामले की जांच एक साल के भीतर पूरी की जाये. परिक्षण एक साल के अन्दर पूरा होगा और दो साल के अन्दर ही भ्रष्ट नेता व आधिकारियो को सजा सुनाई जायेगी . इसी के साथ ही भ्रष्टाचारियो का अपराध सिद्ध होते ही उनसे सरकर को हुए घाटे की वसूली भी  की जाये. यह बिल एक आम नागरिक के लिए मददगार जरूर साबित होगा, क्यूंकि यदि किसी नागरिक का काम तय समय में नहीं होता तो लोकपाल बिल दोषी अफसर पर जुरमाना लगाएगा और वह जुरमाना शिकायत कर्ता को मुआवजे के रूप में मिलेगा. इसी के साथ अगर आपका राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, पासपोर्ट आदि तय समय के भीतर नहीं बनता है या पुलिस आपकी शिकायत दर्ज नहीं करती है तो आप इसकी शिकायत लोकपाल से कर सकते है.  आप किसी भी तरह के भ्रष्टाचार की शिकायत लोकपाल से कर सकते है जैसे कि सरकारी राशन में काला बाजारी, सड़क बनाने में गुणवत्ता की अनदेखी,  या फिर पंचायत निधि का  दुरूपयोग.

लोकपाल के सदस्यों  का चयन जजों, नागरिको और संवैधानिक संस्थायो द्वारा किया जायेगा. इसमें कोई भी नेता की कोई भागीदारी नहीं होगी.  इनकी नियुक्ति पारदर्शी तरीके से, जनता की भागीदारी से होगी.
सीवीसी, विजिलेंस विभाग, सी बी आई  की भ्रष्टाचार निरोधक विभाग (ऐन्टी करप्शन डिपार्ट्मन्ट) का लोकपाल में विलय कर दिया जायेगा. लोकपाल को किसी जज, नेता या अफसर के खिलाफ जांच करने व मुकदमा चलाने के लिए पूर्ण अधिकार प्राप्त होंगें.

इस बिल की प्रति प्रधानमंत्री एवं सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को १ दिसम्बर २०१० को भेजी गयी थी, जिसका अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है. इस मुहीम के बारे  में आप ज्यादा जानकारी  के लिए www.indiaagainstcorruption.org पर जा सकते हैं. इस तरह की पहल से समाज में ना सिर्फ एक उम्दा सन्देश जाएगा बल्कि, एक आम नागरिक का समाज के नियमों पर विश्वास भी बढेगा. हर सरकार जनता के प्रति  जवाबदेह है, और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाना हर नागरिक का हक है.

निधि शाह
(लेखिका सिम्बोयोसिस इंस्टिट्यूट ऑफ़ मीडिया एंड  कम्युनिकेशन की छात्रा  हैं )

क्या भ्रष्टाचारी राजद्रोही नहीं हैं ?

२४ दिसम्बर २०१० को बिनायक सेन को छत्तीसगढ़ कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई. बिनायक सेन ने काले कानूनों  के खिलाफ न्याय मांगने  की हिम्मत जताई थी.  हमारे कानून के मुताबिक राजद्रोह का मतलब है  देश व सरकार के खिलाफ लोगों को भड़काना एवं अनचाही हिंसा जागरूक करना. तो अगर सेन राजद्रोही हुए तो उन  विरोधी पार्टियों को हम क्या कहेंगे जो हमेशा सरकार की खिल्ली उड़ाती रहती हैं?  वहीं  दूसरी ओर उन भ्रष्टाचारियों को भी राजद्रोही करार देना चाहिए जिन्होनें  सरकार का इतना नुक्सान कराया है. बिनायक सेन जैसे कार्यकर्ता तो समाज के उस वर्ग की आवाज़ बनना चाहते थे, जो वर्ग हमारे समाज में अल्पसंख्य है. सेन ने छत्तीसगढ़ के उन आदिवासियों  के विकास में मदद की जिनकी कोई पहचान भी नही थी. पर ऐसी जगहों पर संघर्ष करने वाले लोगों को माओवादी करार कर दिया जाता है.
     
बिनायक सेन के साथ भी यही हुआ. उन्हें माओवादी, आतंकवादी व  राजद्रोही जैसे अपमानजनक संबोधन  सहने पड़े. उनकी कोशिश बस इतनी थी कि सरकार द्वारा शुरू किये गए बाज़ार वार में वे इन छोटी जातियों को जिंदा रखना चाहते थे. सरकार और मल्टीनेशनल कम्पनियों की साझेदारी ने आदिवासियों से उनकी ज़मीन व उनके हक तक छीन लिए थे. जब बिनायक ने इसके खिलाफ आवाज़ ऊँची करी तो उन्हें राज्यद्रोह के मामले में उम्रकैद की सजा सुना दी गई.

उन पर यह भारी इलज़ाम लगाते समय उनके द्वारा किये गए अनेकों सामाजिक कार्य भुला दिए गए. बिनायक सेन ने १९८१ में छत्तीसगढ़ में शहीद अस्पताल बनवाया था. यह इस राज्य का पहला ऐसा अस्पताल है जहाँ सही इलाज़ के साथ साथ स्वास्थ्य सम्बंधित शिक्षा भी दी जाती है. इसकी एक और खासियत यह है कि यहाँ काम करने वाले सभी कर्मचारियों को कम्युनिटी ट्रेनिंग द्वारा तैयार किया गया है. यानी स्वास्थ्य  के साथ साथ रोजगार का जरिया भी बनाया गया. बिनायक ने मलेरिया और टी. बी. के क्षेत्र में भी कई योगदान दिए है. पर सरकार को यह मंजूर नहीं हुआ कि कोई उसकी गलत कार्यप्रणाली के खिलाफ आवाज़ उठा कर  जवाब मांगे.

 बिनायक सेन की पत्नी इलिना सेन,बताती हैं कि  "कोर्ट कहता है कि  बिनायक बहुत असहज प्रश्न उठाते हैं  इसलिए उन्हें रोकना चाहिए." कोर्ट की माने तो बिनायक के खिलाफ कई सबूत हासिल हुए है जिससे वो दोषी पाए गए हैं , पर बिनायक के सहयोगी इन सभी सबूतों को फर्जी बताते  है. इलिना सेन ने बताया कि पुलिस उनके घर छानबीन करने पहुँची और बहुत सा सामान जब्त कर लिया. बिनायक के कंप्यूटर में मिले हर एक मुस्लिम के नाम को आतंकवाद के साथ जोड़ा गया और बिनायक को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी करार ठहराया गया. बिनायक की कोर्ट में पेशी के दौरान दो विधवा महिलायें बिनायक को फाँसी देने की मांग करने लगीं. बाद में यह पता चला क़ि  उनके पति माओवादी हमले में मारे गए थे और पुलिस ने उन ममहिलाओं को सेन के खिलाफ भड़काया था . सवाल ये है क़ि राज्य का इस तरह से लोगो की भावनाओं का इस्तेमाल करना कितना उचित है? यह तो हमारे जीवन एवं स्वतंत्रता पर राज्य का हमला हुआ. ऐसे कई और उदाहरण है जिसमें  अपने अधिकार  के लिए उठाई गयी आवाज़े दबा दी गयी हैं .

२६  जनवरी २०१०  को , सामाजिक  कार्यकर्ता  पियूष  को इसलिए  गिरफ्तार  कर  लिया  गया था  क्यूंकि  उन्होंने  दंतेवाडा  में हुए  बलात्कार  के  आरोपियों  को  गिरफ्तार  करने की मांग की  थी. वहीं कर्नाटक की  पी . यु. सी.एल. की  अध्यक्ष  रति  राव को  भी  गिरफ्तारी  दी  गयी  जब  उन्होंने  सरकार  द्वारा की गए फर्जी मुठभेड़ों   का  खुलासा  किया . डाक्टर   रूपरेखा  वर्मा  कहती  है  "अगर  सरकार  एक  बिनायक  सेन  को  मारेगी  तो  १०००  और  पैदा  होंगे."  डाक्टर  कविता  श्रीवास्तव  का कहना है :  'नरेगा , आर.टी.आई., महिला उत्पीड़न, आदि क्षेत्रों में यदि आप काम  करेंगे  तो  जवाबदेही  तो  मांगेगे ही; आप आन्दोलन  करेंगे  और  सरकार  बोलेगी क़ि आप  आतंकवादी  है ”

पर  इन  सब  के  बावजूद  सरकार  की  जवाबदेही  कम  नहीं  हुई  है . ऐसे  बहुत सारे मुद्दे  हैं  जिन  पर  जवाब  मिलना  बाकी  है  और  सामूहिक मांग से हम जवाब पा कर रहेंगे . 

निधि शाह
(लेखिका सिम्बोयोसिस इंस्टिट्यूट ऑफ़ मीडिया एंड  कम्युनिकेशन की छात्रा है ) 

देश व विदेश की महिला शक्ति

20वीं सदी यानी करीब सौ साल पहले, प्रथम विष्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन में महिलाओं को वोटिंग का हक नहीं था। पर जब सभी पुरूष युद्ध लड़ने के लिए सीमा पर चले गये तो समाज के बाकी व्यवसाय जैसे डॉक्टरी, दुकानदारी, प्रशासनिक कार्य महिलाओं ने संभाले। यह देखते हुए समाज को यह विश्वास  हुआ कि एक नारी भी सशक्त है और समय आने पर लगभग हर वह काम संभाल सकती है जो पुरूष करते हैं। इसके बाद ब्रिटेन में महिलाओं को अपना मत डालने का हक मिल गया।

महिलाओं को हमेशा से समाज का कमजोर वर्ग मानकर दबाया गया है। घर में बेटी पैदा होना तो अभिशाप के बराबर है। समाज के ऐसे दायरे बना दिये गये हैं कि लड़की को बोझ समझा जाता है। 1901 में जब भारत में जनगणना की शुरूआत हुई थी तो लिंग अनुपात  ९७०:१००० था, और आज का लिंग अनुपात ९३२:१००० है। यानी हर हजार लड़कों के मुकाबले 932 लड़कियां। जबकि महिलाओं का पैदा होने का स्तर तो पुरूषों के बराबर है, तो यह असमान्यता क्यों? यह इस लिए क्योंकि महिलाओं की  मृत्यु दर बहुत ज्यादा हो गयी है। भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा, स्वास्थ्य एवं अन्य हिंसा महिलाओं के मौत का कारण है। भ्रूण हत्या जैसा घिनौना पाप न केवल समाज के निचले वर्ग में सक्रिय है, बल्कि पढ़े लिखे लोगों में भी यह चलन तेजी पकड़ रहा है।

चीन में जब मार्क्सवादी शासन था तब कहा गया था कि हमारी जनसंख्या हमारी ताकत है। पर समय के साथ उस देश को भी यह समझ आ गया कि बढ़ती जनसंख्या देश के विकास में रोड़ा बन सकती है। तब से वहां परिवार नियोजन को बढ़ावा दिया जाने लगा और ‘‘हम दो हमारा एक’’ के नारे का सख्ती से पालन होने लगा। परन्तु इसका परिणाम यह हुआ कि चीन में लड़कियों का पैदा होना तेजी से कम हो गया। अन्तर्राष्ट्रीय युनिवर्सिटी, वर्धा में कार्यरत, इलिना सेन कहती हैं कि ‘‘समाज अगर औरतों को उनका हक नहीं देगा तो औरतों को उसके लिए संघर्ष करना होगा, जैसे यूरोप और अमेरिका में औरतों ने किया। वे आगे आयीं और तब तक लड़ी जब तक उन्हें उनके अधिकार नहीं मिल गये।’’

हम तो यह उम्मीद करते हैं कि कानून के माध्यम से हमें न्याय मिले।

निधी शाह
(लेखिका सिम्बोयोसिस इंस्टिट्यूट ऑफ़ मीडिया एंड कम्युनिकेशन की छात्रा है ) 

क्यों पढ़ें वूमेन्स स्टडीज़ ?

आधुनिकता ने हमारे समाज को अच्छी तरह जकड़ लिया है। जैसे-जैसे क्षेत्रीय विकास बढ़ा है वैसे-वैसे लोगों की हर क्षेत्र में दिलचस्पी भी जागी है। पहले के मुकाबले कई नये क्षेत्र, पाठ्यक्रम व विषय आ गये हैं। लोगों में नयी चीजों को जानने की जिज्ञासा बढ़ी तो साथ में जानकारी पाने के नये यन्त्र भी उजागर हो गये हैं। विभिन्न तरह की रिसर्च, संवाद, वाद विवाद, फोरम्स, आर0टी0आई0 से लोग नये मुद्दों के साथ जुड़ने लगे तथा समाज के प्रति और जिम्मेदार हुए।

पढ़ाई के क्षेत्र में भी इन मुद्दों को विषय के रूप में लाया गया ताकि लोग जागरूक हों। ऐसा ही एक मुद्दा महिला शोषण का है जिसे वूमेन्स स्टडीज़ के रूप में पाठ्यक्रम में सामिल किया गया है. वूमेन्स स्टडीज़ नाम के कोर्स में महिलाओं से जुड़ी हर तरह की परेशानियों व उनके समाधान के बारे में जानकारी दी जाती है। साथ ही छात्र इतने जागरूक होते हैं कि संगठनों के साथ जुड़कर या स्वंय सेवक बनकर महिलाओं के शोषण के खिलाफ आवाज़  उठाते हैं। इस तरह का कोर्स देश भर की कई युनिवर्सिटियों में पढ़ाया जाता है। पर सवाल यह आता है कि वूमेन्स स्टडीज़ पढ़े क्यों? यह जानकर भी दुख लगता है कि इस पढ़ाई को करने वाले छात्रों में कई छात्र ऐसे हैं जो इसे सिर्फ एक डिग्री मानते हैं और इसलिए पढ़ रहें हैं क्योंकि किसी और कोर्स में दाखिला नहीं मिला। परन्तु इस तरह की पढ़ाई हमारे समाज की अहम जरूरत है। अगर युवा वर्ग जागरूक  होगा तो कार्य प्रणाली में तेजी आयेगी क्योंकि जोशीली आवाजें ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच सकती है।

समाज में कई ऐसे मिथ्य हैं जो महिला हिंसा को बढ़ावा देते हैं। मीडिया भी इसमें अहम भूमिका निभाता है। टी0वी0 पर दिखाये जाने वाले सीरियल्स में अक्सर यह दिखाया जाता है कि किस तरह से एक महिला दूसरी महिला के खिलाफ साजिश करती है। इससे समाज में बहुत ही गलत सन्देश जाता है कि महिलाएं खुद अपनी दुश्मन होती हैं। हमसफर संस्था की अध्यक्ष प्रो0 इलिना सेन का कहना है कि ‘‘बाजारवार लगा हुआ है, लगन का मौसम आते ही आप ढेरों ऐसे  विज्ञापन देखेगें जिनसे दहेज प्रथा को बढ़ावा मिल रहा है जैसे कि 'अपनी बेटी को दें उसके सुखद संसार के लिए यही कार'। समाज में इससे यही सन्देश जायेगा कि अपनी बेटी को खुश देखना है तो उसे दहेज में कार दें।

मीडिया भी समाज का हिस्सा है और हर तरह से हमें प्रभावित करता है। समाज में अगर सही सन्देश जायेगा तभी बदलाव आयेगा।                                                                                              

निधी शाह
(लेखिका सिम्बोयोसिस इंस्टिट्यूट ऑफ़ मीडिया एंड कम्युनिकेशन की छात्रा है ) 

कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा

इक्कसवीं सदी में औरत आदमी से कन्धे से कन्धा मिलाकर तो जरूर चल रही है पर इस सफर में उसके सामने कई चुनौतियां आती हैं। ये हमारे समाज का एक पहलू ही है जो औरत का घर से बाहर निकलकर काम करना स्वीकार नहीं करता। औरत को कई तरह के शोषण का सामना करना पड़ता है जैसे कि बलात्कार, दहेज प्रथा, बाल विवाह, द्वि विवाह, घरेलू हिंसा, मांसिक शोषण एवं कार्य स्थल पर यौन हिंसा।

काम काजी महिलाओं का कार्य स्थल पर की जाने वाली छेड़-छाड़ काफी सक्रिय है। महिलाओं को आज भी समाज का एक कमजोर तबका मानते हुए उनके साथ असमान्य व्यवहार किया जाता है। पर कई महिलाओं और संगठनों के आवाज उठाने पर कार्य स्थल पर यौन हिंसा को लेकर एक कानून बनाया जा रहा है।

1997 में कार्य स्थल पर होने वाली हिंसा के लिए दिशा निर्देष ‘विषाखा’ के नाम से जारी किए गये। इन्हीं निर्देषों को एक सख्त रूप  देते हुए इसे कानून बनाने की कोषिष चल रही है। इसके अन्तर्गत कार्य स्थल पर किसी भी तरह की मौखिक हिंसा, अष्लील संकेत या छेड़छाड़ दण्डनीय होगी। कार्य स्थल पर हिंसामुक्त माहौल रखने की पूरी जिम्मेदारी कार्यस्थल के मालिक की होगी। इस कानून के अन्तर्गत यह मान के चलना होगा कि महिला पक्ष निर्दोष है। उच्चतम न्यायालय ने इस पर कई निर्देष जारी किए हैं और कई संगठन इस कानून के लिए काम कर रहें हैं।

इस कानून की एक धारा के मुताबिक घरेलू महिलाएं इसके दायरे में नहीं आयेंगी। उच्च न्यायालय का मानना है कि घर एक निजी क्षेत्र है और निजी मामले कार्य स्थल की श्रेणी में नहीं आते। इसके अलावा अगर कोई भी महिला की याचिका गलत साबित होती है तो उसे दो साल तक की सजा हो सकती है। इन धाराओं से महिला संगठनों में काफी हलचल है। संगठनों की मांग है कि इन धाराओं को कानून से निकाला जाये। राजस्थान की मानवाधिकार एक्जीक्यूटेट व जनरल सेक्रेटरी पी0यू0सी0एल0 सुश्री कविता श्रीवास्तव का कहना है कि ‘‘जितने ज्यादा कानून महिलाओं के लिए बन रहें हैं महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा भी उतनी ही तेजी से बढ़ रही है क्योंकि कोई भी विभाग अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर रहा है बल्कि महिलाओं के चरित्र पर ही तरह-तरह के सवाल किए जाते हैं।’’

निधी शाह
(लेखिका सिम्बोयोसिस इंस्टिट्यूट ऑफ़ मीडिया एंड काम्मुनिकेशन की छात्रा है )

अब नहीं है मुझे डर

महिलाओं के साथ आये दिन होने वाली हिंसा के खिलाफ आवाज उठाते हुए लखनऊ के ‘हमसफर’ समूह ने  "अब नहीं है है मुझे डर" नामक पुस्तक का विमोचन किया। हमसफर एक महिला सहायता केन्द्र है जो कि महिला हिंसा व उत्पीड़न के खिलाफ महिलाओं के संघर्ष में उन्हें समर्थन व सहायता प्रदान करता है।
  
इस पुस्तक का यह पहला संस्करण है और इसमें हिंसा का विरोध करती महिलाओं की कहानियां प्रकाशित हुई हैं। अन्याय के खिलाफ, न्याय के लिए उठायी गई सह अवाजें हमारे समाज का ही हिंस्सा हैं। इसमें प्रकाशित उन तमाम महिलाओं की गाथा और उनके साथ हुई हिंसा वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है। करीब 12 महिलाओं की कहानियों के अलावा इस प्रकाषन में न्याय तक पहुंचने का रास्ता भी बताया गया है। इसमें संघर्षशील महिलाओं की जरूरतें जैसे स्वास्थ्य, विधिक सलाह और सहयोग को सम्बोधित करने के साथ-साथ राज्य की प्रतिक्रियाएं भी समझायी गई हैं। साथ ही इस प्रकाशन में भारतवर्ष में हो रही हिंसा से सम्बन्धित आंकड़े विस्तृत रूप में दिये गये हैं।

उत्तर प्रदेष की सच्चाई यह है कि महिलाओं के साथ अन्याय व उत्पीड़न की घटनाएं आम बात हो चुकी है। इन प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद कुछ हिम्मती महिलाएं आगे आकर हिंसा मुक्त जीवन के अधिकार को पाने के लिए संघर्ष कर रहीं हैं। ऐसी ही एक कहानी है 38 वर्षीय दलित महिला संगीता की। संगीता का पति होमगार्ड कॉन्स्टेबल के पद पर लखनऊ में नियुक्त है। संगीता को उनका पति बहुत मारता-पीटता है। और कई बार घर से निकाल चुका है। ऐसे में वह कई बार सड़कों पर रहीं हैं क्योंकि उनके पास खाने व रहने का खर्चा भी नहीं होता। उनके पति की होमगार्ड कार्यालय में नौकरी होने के कारण कोई भी पुलिस थाना उनकी शिकायत दर्ज करने को नहीं माना। ऐसे में हम सफर संस्था ने संगीता का साथ दिया।
   
राष्ट्रीय क्राईम व्यूरो के अनुसार उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ हिंसा के सर्वाधिक मामले हैं, जिनमें बलत्कार, अपहरण, दहेज हत्या, शारीरिक व मांसिक हिंसा व यौनिक छेड़-छाड़ जैसी घृणित घटनाएं शामिल हैं। इस अवसर पर हमसफर समूह ने इन सभी बहादुर महिलाओं का आभार प्रकट किया और साथ ही प्रकाशन  में वित्तीय सहयोग देने के लिए ‘ओक्सफेम' का भी ध्न्यवाद दिया।

निधी शाह
(लेखिका सिम्बोयोसिस इंस्टिट्यूट ऑफ़ मीडिया एंड काम्मुनिकेशन की छात्रा है )

महिलाओं का घरेलू हिंसा से बचाव कानून क्या हैं?

महिलाओं का घरेलू हिंसा से बचाव कानून 2005 एक दिवानी कानून है जिसका मकसद घरेलू रिश्तों में हिंसा झेल रहीं महिलाओं को तत्काल व आपातकालीन राहत पहुंचाना है। इस कानून का मुख्य उद्देष्य किसी भी महिला को हिंसा मुक्त घर में रहने का अधिकार दिलाना है।

हमारे इस समाज में महिलाओं के लिए न मायके में कोई जगह है और नही ससुराल में। यही कारण है कि महिलाएं सर छुपाने के लिए छत और पैर टिकाने के लिए जमीन के एवज में बहुत से अनचाहे समझौते करती रहती हैं। यह भारत में पहला ऐसा कानून है जो महिलाओं को अपने घर में रहने का अधिकार देता है। यह कानून घरेलू हिंसा को रोकने के लिए केन्द्र व राज्य सरकार को जबाबदेह व जिम्मेदार ठहराता है। इस कानून के अनुसार महिला के साथ हुई घरेलू हिंसा के साक्ष्य प्रमाणित किया जाना जरूरी नहीं हैं। महिला के द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों को ही आधार सुनिष्चित माना जायेगा क्योंकि अदालत का मानना है कि घर के अन्दर हिंसा के साक्ष्य मिलना मुश्किल है।

इस कानून के मुताबिक घरेलू हिंसा यानी ऐसी कोई भी हरकत या व्यवहार जो कि महिला के शरीर या स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होकर दर्द या चोट पहुंचाये। ऐसा कोई भी आपत्तिजनक व अनचाहा यौनिक व्यवहार व हरकत जो महिला को शारीरिक कष्ट दे या अपमानित करें या उनके मान-सम्मान पर चोट पहुंचाये। ऐसी समस्त घरेलू संसाधन व सुविधाएं जिसकी महिला व उसके बच्चे को जरूरत हो एवं जिस पर उनका अधिकार बनता हो, पर नियन्त्रण एवं उससे वन्चित रखना।

 इस कानून के तहत घरेलू हिंसा की रोक थाम के लिए जज या अदालत तीन दिन के अन्दर-अन्दर बचावकारी आदेश एवं गिरफ्तारी के वारन्ट जारी करेंगे। घरेलू हिंसा से पीडि़त कोई भी महिला अदालत में जज के समक्ष स्वयं अथवा वकील, सेवा प्रदान करने वाली संस्था या संरक्षण अधिकारी की मदद से अपनी सुरक्षा के लिए बचावकारी आदेष ले सकती है। पीड़ित महिला के अलावा कोई भी पड़ोसी, परिवार का सदस्य, संस्थाएं या फिर खुद भी महिला की सहमति से अपने क्षेत्र के न्यायिक मजिस्ट्रेट के कोर्ट में शिकायत दर्ज कराकर बचावकारी आदेष हासिल किया जा सकता है। घरेलू घटना रपट (डोमेस्ट्रिक इंसिडेंट रिपोर्ट) एक दफ्तरी प्रारूप है जिसमें घरेलू हिंसा की रिपोर्ट दर्ज करायी जाती है। इस कानून के तहत मिलने वाली राहत में बचावकारी आदेष, काउन्सिलिंग, क्षतिपूर्ति, भरण पोषण, बच्चों का संरक्षण और जरूरत पड़े तो रहने की जगह भी दी जाती है। अगर पीडि़त की रिपोर्ट से जज को ऐसा लगे कि पीडि़त को हिंसा कर्ता से आगे भी खतरा हो सकता है तो जज हिंसा कर्ता (पुरूष) को घर से बाहर रहने के आदेष दे सकते हैं। इस कानून के अन्तर्गत नियुक्त प्रोटेक्शन ऑफिसर (संरक्षण अधिकारी) की जिम्मेदारी यह है कि पीडि़त महिला को आवेदन लिखने में मदद करना, आवेदन जज तक पहुंचाना एवं कोर्ट से राहत दिलाना।

परन्तु ये सब जानकारी पीडि़तों तक पहुंचाना एक बहुत बड़ा काम है। महिलाओं के मुद्दों पर काम कर रहे संगठन कई परेशानियों और चुनौतियों का सामना करते हैं। जैसे कि आश्रित गृह की व्यवस्था न होना, संरक्षण अधिकारियों का न मिलना, वकील न मिलना, समय पर जुर्माना न मिलना और केस को गम्भीरता से न लिया जाना। यह भी एक गम्भीर स्थिति है कि पिछले चार सालों में उत्तर प्रदेश को इस काम के लिए केवल साढ़े चार लाख रूपयों का बजट मिला है। कानून के मुताबिक एक केस तीन महीने की भीतर खत्म हो जाना चाहिए, पर 2005 से लेकर आज तक हजारों में से केवल 11 केस ऐसे रहें हैं जो तीन महीने के अन्दर सुलझाये गये हैं। घरेलू हिंसा का शिकार हुई सभी महिलाओं में से केवल एक चैथाई ही रिपोर्ट दर्ज कराती हैं।

इस पर सेवा निवृत्त डी0जी0 श्री ईष्वर चन्द्र द्विवेदी का कहना है कि ‘‘जानकारी की शुरूआत कानून के रखवालों से करनी होगी। पुलिस वालों को ही इस तरह के कानून के बारें में पता नहीं है, तो वह इसे लागू कैसे करेगें?’’

निधी शाह 
(लेखिका सिम्बोयोसिस इंस्टिट्यूट ऑफ़ मीडिया एंड काम्मुनिकेशन की छात्रा है )

पूर्वी उत्तर प्रदेश की महिलाओं की आवाज़ : हम करते हैं अपने अधिकारों की मांग

 पूर्वी उत्तर प्रदेश  की महिलाओं की आवाज़ : हम करते हैं अपने अधिकारों की मांग
                                                     
 मऊ स्थित नगरपालिका सामुदायिक हाल में पूर्वी उत्तर प्रदेश के 10 जिलों की करीब 400 महिला नेताओं का दो दिवसीय सम्मलेन २४ मार्च को आरम्भ हुआ. दलित एवम् पिछड़े वर्ग की ये महिलायें अपनी निडरता और साहसिकता के बल पर समाज में एक नयी क्रान्ति ला रही हैं. 
‘‘ग्रामीण महिला सशस्तिकरण ’’ नामक कार्यक्रम के अंतर्गत, पूर्वी उत्तर प्रदेश के पिछड़े समुदायों की महिलाओं को एकजुट करने का सराहनीय प्रयास किया जा रहा है. अभी तक 40,000 से भी अधिक महिलाओं ने 253 ग्राम पंचायतों में नारी संघ के नाम से समूह गठित किए हैं। ये महिलाएं अपने अधिकारों, विशेषकर भोजन और रोज़गार के अधिकारों को पाने के लिए सामूहिक रूप से संघर्ष कर रहीं हैं। वे अपने राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों  को पाने के लिए भी प्रयत्नशील हैं.
सम्मलेन में भाग लेने आयी महिलाओं ने अपने साहसिक और चुनौतीपूर्ण अनुभवों की जानकारी देते हुए बताया कि किस तरह वे विपरीत परिस्थियों में रहते हुए भी अपने अधिकारों के लिए आगे बढ़कर संघर्ष में जुटी हुई हैं। संघर्ष और सफलता की अनेक मिसालें सुनने को मिलीं.
प्रतापगढ़ जिले में मंगरोरा ब्लाक के सलाहीपुर गांव के नारी संघ की अध्यक्षा बड़का देवी ने बताया कि उनके गांव का प्रधान महिलाओं को न तो जॉब कार्ड दे रहा था और न ही काम। तब उन्होंने ने गांव की 200 महिलाओं का संगठन बनाकर जाब कार्ड और काम दिए जाने की मांगों  को  लेकर विरोध -प्रदर्शन किया। महिला समूह ने प्रधान को चेतावनी दी कि अगर वह अपना कार्य सुचारू रूप से नहीं कर सकता तो अपना पद छोड़ दे।बड़का देवी को खुशी है कि 'अब पुरुषों को हम महिलाओं की बातें सुननी पड़ती है।'
बहराइच जिले में मिहिनपुर्बा ब्लाक के छलुहा नारी संघ की भानुमति ने बताया, ‘‘सार्वजनिक वितरण प्रणाली का दुकानदार ‘‘कोटेदार’’ दुर्व्यवहार कर रहा था, लेकिन नारी संघ उसे लाइन पर ले आया। पहले जंगलों  में रहने वाले गांववालों  की कोई  नहीं सुनता था क्योंकि उनके पास कोई अधिकार नहीं थे। हमने जय आजादी आंदोलन शुरु किया और कोटेदार को निलंबित करवा दिया। फिर एक खुली बैठक में ग्राम  सभा की सहमति से एक नए कोटेदार का चयन किया गया।’’

गाजीपुर जिले में सदर ब्लाक के बाबेदी गांव के अम्बेडकर नारी संघ की पुष्पा देवी ने अपने समूह की उपलब्धियों  के बारे में चर्चा करते हुए कहा, ‘‘हमें मनरेगा (महात्मा गाँधी ग्रामीण रोज़गार योजना) के तहत समय पर भुगतान नहीं मिलता था। इसको  लेकर नारी संघ की महिलाओं  ने विकास खण्ड अधिकारी का घेराव किया। उसके बाद एडीओ  ने पंचायत को  समय से भुगतान का निर्देश दिया। अब हमें डरने की जरूरत नहीं है, हमें दूसरों को डराना है। हम नारी संघ के परचम के तले लड़ेंगे।’’
गाजीपुर जिले में सदर ब्लाक के अग्नि नारी महासंघ की नन्हीं देवी ने मांग की, ‘‘विकास खण्ड अधिकारी को या तो हमें मनरेगा के तहत काम देना होगा या फिर बेरोजगारी भत्ता देना होगा।’’

उत्तर प्रदेश में प्रतापगढ़ जिले के लालगंज ब्लाक में अझारा गांव से एक दलित महिला सीमा सरोज पति द्वारा प्रताड़ित थी। अमानुषिक पारिवारिक प्रतिबंधों ने उसका घर से निकलना दूभर कर दिया था.  परंतु नारी संघ से जुड़कर उन्होंने  नरेगा से संबंधित कठिनाइयों को दूर करने के लिए संघर्ष शुरु कर दिया है.
5,000 महिला सदस्यों वाले ब्लाक स्तरीय नारी मंच की अध्यक्षा पूजा, महिला अधिकारों की पैरवी करने में कामयाब रही हैं। उन्होंने  सूचना के अधिकार द्वारा भ्रष्टाचार के  खिलाफ आवाज उठाई, और महिलाओं को मनरेगा के तहत 100 दिनों का  रोजगार दिलवाया। उन्होंने  जन-दबाव के विरुद्ध जागरुकता फैलाते हुए सार्वजनिक वितरण प्रणाली को चुस्त-दुरस्त किया और मध्यान्ह भोजन की गुणवत्ता की जांच की।
 अम्बेडकर नगर जिले के जलालपुर ब्लाक में सल्लाहपुर गांव की एक दलित महिला किस्मती देवी के कुशल नेतृत्व में 153-सदस्यीय नारी संघ महिलाओं  के अधिकारों और हकों के लिए काम कर रहा है।

 पूर्वी उत्तर प्रदेश के विभिन्न गाँवों की बहुत सी कामयाब कहानियां हैं। इन गांवों  की महिलाएं विभिन्न प्रकार की हिंसा का  शिकार होने के बावजूद अपने अडिग और कर्मठ निर्णयों के द्वारा नारी समाज में एक नयी चेतना का उदय कर रही हैं। हम सभी को इनके साहस से प्रेरणा लेनी चाहिए. तथा प्रदेश एवम् देश के अन्य भागों में भी नारी चेतना के इस सामाजिक कार्य में सहयोग देना चाहिए. तभी एक स्वस्थ एवम् भ्रष्टाचार रहित समाज कि कल्पना साकार हो पायेगी.
शोभा शुक्ला
सिटिज़न न्यूज़ सर्विस

विश्व तपेदिक दिवस: २४ मार्च २०११


प्रोजेक्ट अक्षय: ७४४ मिलियन लोगों तक तपेदिक नियंत्रण सेवाएँ विभिन्न कार्यछेत्रों एवं कड़ियों में मिलजुल कर कार्य करने से पहुंचेंगी


नयी दिल्ली: २२ मार्च २०११:  भारत की १.२ अरब जनसंख्या की सेवा करने हेतु जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ बड़ी संख्या के बारे में ही सोचने के आदि है. बड़े स्तर पर लागू हो रहे 'अक्षय प्रोजेक्ट' (अक्षय के मायने हैं तपेदिक या टी.बी. रहित) की योजना रचने वाले भी इससे भिन्न नहीं हैं. अक्षय प्रोजेक्ट की योजना रचनाकर्ताओं के पास कोई विकल्प भी नहीं है क्योंकि विश्व-स्तर पर भारत में सबसे अधिक तपेदिक या टी.बी से ग्रसित लोग हैं. प्रोजेक्ट अक्षय को एड्स, टी.बी (तपेदिक) और मलेरिया से लड़ने के लिये समर्पित ग्लोबल फंड ने काफी भारी मात्रा में आर्थिक अनुदान दिया है. अक्षय प्रोजेक्ट पिछले वर्ष २३ भारतीय प्रदेशों के ३७४ जिलों में लागू हुआ जिससे कि संशोधित राष्ट्रीय तपेदिक नियंत्रण कार्यक्रम में जन-भागीदारी एवं प्रभावित लोगों की प्रतिभागिता बढ़े और तपेदिक सम्बंधित कार्यक्रम एवं सेवाओं की पहुँच और प्रभाव बढ़े, जिससे कि २०१५ तक ७४४ मिलियन लोगों को तक यह सेवाएँ पहुँच पायें.

'इंटरनैशनल यूनियन अगेंस्ट टूबरकुलोसिस एंड लंग डिसीस' (द यूनियन), और 'वर्ल्ड विज़न' इंडिया दोनों भारत सरकार के साथ इस जन-पहल अक्षय प्रोजेक्ट के समन्वयन को नेत्रित्व प्रदान कर रहे हैं. द यूनियन, इस अक्षय प्रोजेक्ट को २१ प्रदेशों के ३०० जिलों में लागू कर रहा है और ५७७ मिलियन जनसंख्या तक प्रोजेक्ट सम्बंधित सेवाओं को पहुंचाएगा, और वर्ल्ड विज़न इंडिया ७ प्रदेशों के ७४ जिलों में इस प्रोजेक्ट को लागू करेगा. पांच प्रदेश ऐसे हैं जिनमें दोनों संस्थाओं के संयुक्त समन्वय से यह प्रोजेक्ट लागू होगा.

'द यूनियन' के दक्षिण-पूर्वी एशिया के छेत्रिय निदेशक डॉ नेविन विल्सन ने कहा कि "प्रोजेक्ट अक्षय का प्रचालन तंत्र अवश्य बड़ा लगता है परन्तु तपेदिक/टी.बी. कार्यक्रमों का प्रभाव बढ़ाने के लिये नए सशक्त समूहों का गठन करना भी आवश्यक है. इस प्रोजेक्ट के प्रबंधन के लिये 'द यूनियन' ने कार्यकुशल लोगों की टीम जुटाई है और विभिन्न छेत्रों में अपनी निपुणता स्थापित करने वाली नौ संस्थाओं के साथ साझेदारी में इस प्रोजेक्ट को लागू किया जा रहा है. इसके अलावा भी अनेक लोगों के साथ कार्य किया जा रहा है."

विभिन्न कार्यछेत्रों से सरकारी, गैर-सरकारी, निजी, तकनीकि संस्थाओं, प्रभावित समुदाओं और मीडिया के प्रतिनिधियों के साथ साझेदारी में कार्य करना ही प्रोजेक्ट अक्षय की मूल कार्यनीति है. तपेदिक (टी.बी.) नियंत्रण के लिये सिर्फ चिकित्सकीय कार्यक्रम पर्याप्त नहीं हैं क्योंकि अनेक अन्य विकास-सम्बंधित छेत्रों और अन्य रोगों या जीवनशैलियों से तपेदिक (टी.बी.) होने का खतरा बढ़ता है, जैसे कि तपेदिक (टी.बी.) और गरीबी, कुपोषण, मधुमेह, तम्बाकू सेवन, एच.आई.वी. आदि से सम्बन्ध, जिनके कारणवश तपेदिक (टी.बी.) नियंत्रण एक पर्वतीय चुनौती बना हुआ है. इन कड़ियों को चिन्हित करना और उनपर तपेदिक (टी.बी.) नियंत्रण कार्यक्रमों के जरिए सक्रीय रूप से कार्य करना ही जन स्वास्थ्य के लिये श्रेयस्कर है.

डॉ विल्सन ने कहा कि "हमारे देश के सरकारी तपेदिक (टी.बी.) नियंत्रण कार्यक्रम ने उल्लेखनीय कार्य किया है परन्तु अब यह सर्वविदित है कि सफलतापूर्वक तपेदिक (टी.बी.) नियंत्रण सिर्फ सरकार द्वारा नहीं किया जा सकता है. विभिन्न कार्यछेत्रों के अनेक साझेदारों को मिलजुल कर तपेदिक (टी.बी.) नियंत्रण में योगदान देना चाहिए जिससे कि सूचना और सेवाएँ दोनों लोगों तक पहुंचे, जवाबदेही बढ़े और प्रभावित समुदाय सशक्त हो कर भागीदार बने. यही प्रोजेक्ट अक्षय करने की कामना करता है."

जिन लोगों तक तपेदिक (टी.बी.) सम्बंधित सूचनाएँ और सेवाएँ वर्तमान में नहीं पहुँच रही हैं, वें प्रोजेक्ट अक्षय के विशेष केंद्रबिंदु हैं, जिनमें जन-जातियां, बच्चे, महिलाएं, जटिल भौगोलिक छेत्रों में जहां आवागमन मुश्किल है वहाँ रहने वाले लोग, और अन्य लोग जैसे कि एच.आई.वी. और तपेदिक (टी.बी.) दोनों से संक्रमित लोग आदि शामिल हैं.

तपेदिक (टी.बी.) और अन्य विकास सम्बंधित या रोगों से जिससे तपेदिक (टी.बी.) का सम्बन्ध है, उन कड़ियों पर प्रभावकारी कार्य हेतु 'द यूनियन' प्रयासरत है.

डॉ विल्सन ने कहा कि "तपेदिक (टी.बी.) एवं गरीबी और गैर-संक्रामक रोगों की कड़ियों पर सफलतापूर्वक कार्य करना और अनेक कार्यछेत्रों के साथ प्रभावकारी तपेदिक (टी.बी.) नियंत्रण के लिये साझेदारी में कार्य करना जिससे कि जन स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभ हो, 'द यूनियन' के लिये सिर्फ अभिलाषा ही नहीं है - बल्कि हमने ठोस व्यवस्था बनायीं है जिससे कि प्रोजेक्ट अक्षय के माध्यम से इन कार्यक्रमों को निपुणता से क्रियान्वित किया जा सके." 'द यूनियन' के दक्षिण-पूर्वी एशिया के कार्यालय से ही विश्व स्वास्थ्य संगठन का तपेदिक (टी.बी.) और गरीबी सह-समूह का सचिवालय, और तपेदिक (टी.बी.) सेवा एवं नियंत्रण के लिये राष्ट्रीय साझेदारी का सचिवालय भी क्रियान्वित है. 'द यूनियन' के लिये गैर-संक्रामक रोग विशेष केंद्रबिंदु रहे हैं जैसे कि तम्बाकू नियंत्रण.

प्रोजेक्ट अक्षय को विभिन्न प्रदेशों में लागू करने के लिये 'द यूनियन' के मुख्य साझेदार, जो ग्लोबल फंड अनुदान के सह-प्राप्तकर्ता है, निम्नलिखित हैं:
 - कैथोलिक बिशप्स कांफेरेंस ऑफ़ इंडिया - कोयालिशन फॉर एड्स एंड रिलेटेड डिसीजेस
- कैथोलिक हेल्थ असोसियेशन ऑफ़ इंडिया
- क्रिश्चियन मेडिकल असोसियेशन ऑफ़ इंडिया
- इमानुएल हॉस्पिटल असोसियेशन
- ममता हेल्थ इंस्टीटयूट फॉर मदर एंड चाइल्ड (ममता)
- ममता सामाजिक संस्था
- पोपुलेशन सर्विसेस इंटरनैशनल
- रिसोर्स ग्रुप फॉर एजूकेशन एंड अड्वोकेसी फॉर कम्युनिटी हेल्थ (रीच)
- वोलंटरी हेल्थ असोसियेशन ऑफ़ इंडिया

डॉ सरबजीत चढ्ढा, जो इस प्रोजेक्ट अक्षय के निदेशक हैं, ने कहा कि "तपेदिक (टी.बी.) सम्बंधित सेवाएँ सर्वव्यापी हों और सबकी पहुँच में हों, इसी उद्देश्य से प्रोजेक्ट अक्षय व्यापक तपेदिक (टी.बी.) नियंत्रण के लिये समर्थन जुटाने, संचार माध्यमों का पर्याप्त और समोचित उपयोग करने, और जनमत जुटाने के लिये प्रयासरत है. साझेदारों के सक्रिय योगदान से प्रोजेक्ट अक्षय, अनेक गतिविधियों के जरिए समुदाय को तपेदिक (टी.बी.) नियंत्रण में समर्थ और सशक्त करेगा, राजनीतिक और प्रशासनिक समर्थन के लिये आवाज़ उठाएगा, समस्त स्वास्थ्यकर्मियों की भागीदारी से तपेदिक (टी.बी.) कार्यक्रमों की समुदाय में पहुँच बढ़ाएगा, दवाओं और जांच के सही और विवेकपूर्ण इस्तेमाल का समर्थन करेगा, और तपेदिक (टी.बी.) से सम्बंधित राष्ट्रीय प्राथमिकता के छेत्रों में प्रशिक्षण आयोजित करेगा."

अपने नौ साझेदारों के साथ 'द यूनियन' सुचारू और पूर्वनियोजित ढंग से प्रोजेक्ट अक्षय को लागू कर सके इसीलिए 'द यूनियन' ने ७३ कार्यक्रम प्रबंधकों, सहायक कार्यक्रम प्रबंधकों, जिला समन्वयकों और वित्तीय प्रबंधकों के लिये ५ दिवसीय प्रशिक्षण आयोजित किया. इस प्रशिक्षण में, तपेदिक (टी.बी.) एवं तपेदिक (टी.बी.) नियंत्रण प्रणाली से सम्बंधित मूल जानकारी, प्रोजेक्ट गतिविधियाँ, रेकॉर्डिंग और रपट आदि विषय शामिल थे. इस प्रशिक्षण में जिन जिलों में प्रोजेक्ट अक्षय लागू होना है, उन जिलों के जिला तपेदिक (टी.बी.) अधिकारी भी सक्रीय रूप से शामिल हुए, और प्रशिक्षण के अंत में हर जिले ने अपनी गतिविधि योजना भी बनायीं.

  डॉ नेविन विल्सन ने कहा कि "तपेदिक (टी.बी.) जैसे संक्रामक रोग एक व्यक्ति से दुसरे को फैलते हैं और धीरे धीरे अनेक लोगों को संक्रमण हो जाता है. प्रोजेक्ट अक्षय के जरिए हम इस प्रक्रिया को उलटने की कोशिश कर रहे हैं - तपेदिक (टी.बी.) सम्बंधित जानकारी फ़ैलाने का प्रयास कर रहे हैं, लोगों को यह बता रहे हैं कि तपेदिक (टी.बी.) का पक्का इलाज उपलब्ध है, और लोगों को सशक्त होकर इन सेवाओं से लाभान्वित होना चाहिए. हमारी आशा है कि इस प्रोजेक्ट के जरिए हम करोड़ों लोगों तक पहुँच पायेंगे और तपेदिक (टी.बी.) से अनेक जीवन बचा पाएंगे."

बाबी रमाकांत - सी.एन.एस.

नागरिकों की मांग: भारत परमाणु कार्यक्रम बंद हो

लोगों में जापान में हुई परमाणु त्रासदी पर संवेदना जगाने, जापान के लोगों के साथ सहानुभूति व्यक्त करने, और भारत के परमाणु कार्यक्रम को बंद करने के लिये लखनऊ में आज पी.एम.टी कॉलेज, हजरतगंज में परिचर्चा और परिवर्तन चौक पर मोमबत्ती प्रदर्शन आयोजित किया गया.

जापान में हुई परमाणु आपात स्थिति के बाद तो इस बात पर किसी संदेह का प्रश्न ही नहीं उठता है कि दुनिया में सभी परमाणु कार्यक्रमों को, चाहे वो सैन्य या उर्जा के लिये हों, उनको जितनी जल्दी संभव हो उतनी जल्दी बंद करना होगा. इन परमाणु ऊर्जा-घरों में दुर्घटनाओं और सैन्य हमले (हिरोशिमा-नागासाकी पर अटम बम) की वजह से मानवजाति ने सिर्फ अपूर्व, भयानक और अदम्य त्रासदी ही देखी है, जिसको असंख्य प्रभावित लोगों ने सदियों तक झेला है. यह तो स्पष्ट है कि परमाणु शक्ति चाहे वो ऊर्जा बनाने में लगे अथवा बम, यह सबसे खतरनाक विकल्प है. इसमें कोई शक नहीं कि समय रहते बिना विलम्ब दुनिया में परमाणु निशस्त्रीकरण हो जाना चाहिए जिससे कि 'सुरक्षा', 'ऊर्जा पूर्ति' या 'तकनीकि विकास' के नाम पर भयावही परमाणु हादसे मानवजाति को अब और न झेलने पड़ें.

हमारी मांग है कि भारत-अमरीका परमाणु समझौता और अन्य परमाणु कार्यक्रमों को भी मानवता और विश्व शान्ति के लिये तुरंत बंद किया जाए.

हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए अटम बम हमले, जो इतिहास के सबसे वीभत्स त्रासदी रहे हैं, के ६५ साल के बाद भी जिस देश ने इन हमलों को अंजाम दिया था, आज तक उस देश अमरीका ने माफ़ी नहीं मांगी है. जिस उत्साह के साथ भारत, भारत-अमरीका परमाणु समझौते को लागू कर रहा है, यह अत्यंत चिंता का विषय है.

पर्यावरण के लिए लाभकारी तरीकों से उर्जा बनाने के बजाय भारत परमाणु जैसे अत्यंत खतरनाक और नुकसानदायक ऊर्जा उत्पन्न करने के तरीकों को अपना रहा है. विकसित देशों में परमाणु ऊर्जा एक असफल प्रयास रहा है. विश्व में अभी तक परमाणु कचरे को नष्ट करने का सुरक्षित विकल्प नही मिल पाया है, और यह एक बड़ा कारण है कि विकसित देशों में परमाणु ऊर्जा के प्रोजेक्ट ठंडे पड़े हुए हैं. भारत सरकार क्यों भारत-अमरीका परमाणु समझौते को इतनी अति-विशिष्ठ प्राथमिकता दे रही है और इरान-पाकिस्तान-भारत तक की गैस पाइपलाइन को नकार रही है, यह समझ के बाहर है.

किसी भी देश क लिए ऊर्जा सुरक्षा के मायने यह हैं कि वर्तमान और भविष्य की ऊर्जा आवश्यकता की पूर्ति इस तरीके से हो कि सभी लोग ऊर्जा से लाभान्वित हो सकें, पर्यावरण पर कोई कु-प्रभाव न पड़े, और यह तरीका स्थायी हो, न कि लघुकालीन. इस तरह की ऊर्जा नीति अनेकों वैकल्पिक ऊर्जा का मिश्रण हो सकती है जैसे कि, सूर्य ऊर्जा, पवन ऊर्जा, छोटे पानी के बाँध आदि, गोबर गैस इत्यादि.

जापान ने कभी भी परमाणु बम नहीं बनाया पर परमाणु शक्ति का ऊर्जा के लिये इस्तेमाल किया था. परमाणु ऊर्जा भी कितनी खतरनाक हो सकती है यह जापान में हुए परमाणु आपात स्थिति से आँका जा सकता है. भारत में न केवल अनेकों परमाणु ऊर्जा-घर हैं बल्कि परमाणु बम भी है - और दुनिया में सबसे अधिक संख्या में गरीब लोग हैं. न केवल परमाणु शक्ति अत्यंत खतरनाक विकल्प है, भारत जैसे देशों के लिये परमाणु शक्ति में निवेश करना, लोगों की मूल-भूत आवश्यकताओं को नज़रंदाज़ करके 'सुरक्षा', 'ऊर्जा' के नाम पर ऐसा समझौता करने जैसा है जिसके कारणवश लोग कई गुना अधिक मार झेल रहे हैं.

भारत में शायद ही कोई ऐसा परमाणु ऊर्जा घर हो जहां कोई न कोई दुर्घटना न हुई हो. जिन स्थानों पर भारत में परमाणु कचरे को डाला जाता है, जहां परमाणु ऊर्जा घर लगे हुए हैं, जहां परमाणु खान हैं, आदि, वहाँ पर रहने वाली आबादी रेडियोधर्मिता का भीषण कुप्रभाव झेल रही है. उदाहरण के तौर पर कुछ महीने पहले ही कईगा परमाणु केंद्र में ५० से अधिक लोग रेडियोधर्मी त्रिशियम का प्रकोप झेले थे.

परमाणु दुर्घटनाओं की त्रासदी संभवत: कई पीढ़ियों को झेलनी पड़ती है जैसे कि भोपाल गैस काण्ड और हिरोशिमा नागासाकी त्रसिदियों को लोगों ने इतने बरस तक झेला. हमारी मांग है कि भारत बिना-देरी शांति के प्रति सच्ची आस्था का परिचय दे और सभी परमाणु कार्यक्रमों को बंद करे.

 [एस.आर.दारापुरी, अरुंधती धुरु, रंजित भार्गव, प्रो० रंजित भार्गव, प्रो० एम.सी.पन्त, प्रो० रमा कान्त, डॉ० संदीप पाण्डेय, आनंद त्रिपाठी, एवं अन्य नागरिक]

 परमाणु निशस्त्रीकरण और शांति के लिये गठबंधन, शांति एवं लोकतंत्र के लिये लखनऊ चिकित्सकों का समूह, जन-आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, आशा परिवार एवं लोक राजनीति मंच के संयुक्त तत्वावधान मे आयोजित