क्लोज़ अप में ली गयी फोटो होती है प्रभावशाली : बाबी रमाकांत

"फोटो को अधिक अच्छी और प्रभावशाली बनाने के लिए लांग शाट के बजाये क्लोज़ अप में लें और हमेशा लक्ष्य को ध्यान में रखें" यह कहना है प्रख्यात लेखक एवं फोटो पत्रकार बाबी रमाकांत का. सन 1991 से लेखन क्षेत्र से जुड़े नागरिक पत्रकार बाबी रमाकांत फोटो पत्रकारिता की बारीकियों के बारे में बता रहे थे. उन्होंने बताया कि किस प्रकार एक साधारण कैमरे या मोबाइल कैमरे से फोटो ली जाये जोकि अच्छी और उपयोगी हो, फोटो लेने से पहले प्रकाश का विशेष ध्यान रखें क्योंकि प्रकाश की अनुपस्थिति में ली गयी फोटो साफ़ नहीं आती है. 

बाबी रमाकांत ने आगे बताया कि यदि आप फ्लैश  कैमरे का प्रयोग कर रहे हैं तो लांग शाट या किसी प्रकाश वाली वस्तु की फोटो लेते समय फ्लैश बंद कर दें. वरना लांग शाट की फोटो में आगे वाली वस्तु की फोटो तो साफ़ आएगी लेकिन पीछे की साफ़ नहीं आएगी, क्योंकि फ्लैश की लाइट  दूर तक नहीं जा सकती है, और प्रकाश वाली वस्तु, जैसे दिये या फिर रंगीन प्रकाश से सजे घर की फोटो में फ्लैश के कारण प्रकाश के आसपास की चीज़ें तो दिखाई देंगी लेकिन प्रकाश वाली वस्तु नहीं आएगी.

एक अंग्रेजी कहावत  है "One photo is better than 100 words." इसी दिशा में अपनी बात को बढ़ाते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन के अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार 2008 द्वारा पुरुस्कृत बाबी रामकान्त ने बताया क़ि जब कोई फोटो लें तो हमेशा ध्यान रखें की आप चिन्हित किस बात को कर रहे हैं, और उसकी एक से अधिक फोटो लें. अलग -अलग कोण से फोटो लेना भी अच्छा रहता है. उन्होंने कैमरे में मौजूद नाईट मोड का प्रयोग करना भी बताया और कहा कि इसके प्रयोग से भी अच्छी फोटो ली जा सकती है. 

बाबी रमाकांत "नागरिकों का स्वस्थ लखनऊ " द्वारा आयोजित एक ग्रीष्म शिविर में "नागरिक पत्रकारिता" विषय पर बोल रहे थे.  

(प्रस्तुत लेखक सी.एन.एस. द्वारा आयोजित छः दिवशीय  "अधिकार व दायित्व "  शिविर में प्रशिक्षित एक प्रशिक्षार्थी नदीम सलमानी  द्वारा  लिखा  गया हैं)

मंहगाई, गरीबी व खाद्य सुरक्षा

[English] [फोटो] अभी यह बात हो ही रही थी कि गरीबी रेखा 28.3 प्रतिशत से बढ़ा कर तेंदुलकर समिति की सिफारिशों के अनुसार 41.8 पर तय हो जबकि सरकार द्वारा ही नियुक्त सक्सेना समिति ने 49 प्रतिशत की संस्तुति की है और योजना आयोग के अजुन सेनगुप्ता ने 77 प्रतिशत असंगठित मजदूर को 20 रुपए से कम पर गुजारा करने की बात उजागर की, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने यह कहकर सबको चौंका दिया कि शहर में 20 रु. प्रतिदिन व गांव में 15 रु. प्रतिदिन की प्रति व्यक्ति आय को गरीबी रेखा मान लेना चाहिए। क्या मोंटेक सिंह खुद 20 रु. प्रति दिन की आय पर जी कर दिखा सकते हैं?

सरकार द्वारा गरीबी रेखा पर एक सीमा तय कर देने से बहुत से गरीब इस श्रेणी को मिलने वाली सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं। गांव-गांव की कहानी है कि पात्र गरीब गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों की सूची से बाहर हैं तथा तमाम अपात्र लोग इसमें शामिल हैं। यदि मनरेगा की तरह यह छूट मिले कि कोई भी जरूरतमंद अपना कार्ड बनवा सकता है तभी यह समस्या हल हो पाएगी। इसको दूसरे तरीके से सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लोक व्यापीकरण की मांग के रूप में भी उठाया जा रहा है।

अब सरकार ने नया शिगूफा छोड़ा है। वह कह रही है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में अनाज के बदले नकद देगी। उ. प्र. में हरदोई व लखीमपुर खीरी को प्रयोग के लिए चुना गया है। हाल ही में हरदोई में कराए गए एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि गरीब व्यक्ति अनाज ही चाहता है। फिर सार्वजनिक वितरण प्रणाली की वजह से अनाज की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद से किसान को सम्मानजनक नहीं तो एक न्यूनतम मूल्य तो मिल ही जाता है। कृषि पर सरकार ने ध्यान नहीं दिया है यह तो स्पष्ट है। 1950 व ‘60 में कृषि विकास दर हुआ करती थी 3.2 प्रतिशत जो अब 1.3 प्रतिशत है। कृषि का सकल घरेलू उत्पाद में हिस्सा हुआ करता था 60 प्रतिशत जो अब घटकर मात्र 13 प्रतिशत रह गया है।

हाल ही में भू अधिग्रहण के इतने मामले सामने आए हैं जहां किसानों की जमीनें जबरदस्ती निजी व्यवसायिक हितों की पूर्ति के लिए ली जा रही हैं। महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों, जैसे जल, जंगल, जमीन व खनिज, जिस पर गरीब लोगों का जीवन व जीविका निर्भर है के लूट की खुली छूट पैसे वालों को मिली हुई है और हमारे लोकतंत्र में सरकार ताकतवर लोगों के साथ मिल कर गरीब का दमन करती नजर आती है।

सरकार ने जो आर्थिक नीतियां अपनाई हुई हैं उससे गरीब व अमीर का फर्क बढ़ता जा रहा है। नई आर्थिक नीतियों के लागू हाने के बाद से जबकि सेवा क्षेत्र में तनख्वाहें 15 गुना से भी ज्यादा बढ़ गई हैं तो दैनिक मजदूर की मजदूरी दोगुनी ही हुई है। सेवा क्षेत्र, जिसका प्रतिशत कुल आबादी का 3-5 होगा, के लोगों के वेतन बढ़ते ही बाजार में जरूरी उपभोक्ता वस्तुओं के दाम बढ़ जाते हैं और इसकी गाज गिरती है 70-80 प्रतिशत दैनिक मजदूरी करने वाले पर। यही कारण है कि आजादी के समय से प्रति व्यक्ति अनाज व दाल की खपत में भारी गिरावट आई है। यानी हमारी विकास दर भले ही अच्छी दिखाई देती हो किन्तु खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से हमारी अधोगति हुई है।

अरुंधती धुरू, 9415022772, रोमा, जयशंकर पाण्डेय, केशव चंद, नंदलाल, अनिल मिश्र, शंकर सिंह, रामबाबू, राजेश मौर्य, जे.पी. सिंह, एस. आर. दारापुरी, संदीप पाण्डेय

अगर पाकिस्तान के पास परमाणु बम न होता तो क्या होता?

डाक्टर अब्दुल कादिर, जो अपने आपको पाकिस्तान के परमाणु बम का जनक मानते हैं, पिछले कुछ सालों से पाकिस्तानी सेना की निगरानी में अपने इस्लामाबाद स्थित आलीशान मकान में ज़िन्दगी गुज़ार रहे हैं. उनका अधिकतर समय अखबारों के लिए साप्ताहिक कॉलम लिखने में व्यतीत होता है. अपने हाल ही के एक लेख में उन्होंने कहा है कि, " यदि हमारे पास १९७१ के पहले आणविक क्षमता होती तो हमें एक शर्मनाक हार का सामना करते हुए अपना आधा देश (वर्त्तमान बांगला देश) खोना नहीं पड़ता."
ऐसा लिखते समय वे शायद यह भूल गए कि ३०,००० आणविक हथियार भी सोवियत यूनियन को पतन, विघटन, और हार से नहीं बचा पाए. तो फिर क्या एक बम पाकिस्तान को १९७१ की हार से बचा पाता? क्या वर्त्तमान में भी बचा पायेगा?
चलिए एक बार फिर से १९७१ की यादें ताज़ा करते हैं. हमारे जैसे लोग जो उस दौर में पले बढ़े, वे सभी यह जानते हैं कि पूर्वी एवम् पश्चिमी पाकिस्तान एक ही देश के हिस्से ज़रूर थे, पर वे कभी भी एक राष्ट्र नहीं बन पाए. आज की युवा पीढी इस बात का अंदाजा भी नहीं लगा सकती कि उन दिनों, पश्चिम पाकिस्तान में बंगालियों के प्रति कितना जातीय विरोध व्याप्त था. आज मैं शर्म से सर झुका कर यह बात स्वीकार करता हूँ, कि उस समय मेरे बाल मन में भी पूर्वी पाकिस्तान के छोटे और काले बाशिंदों के प्रति घृणा के ही भाव थे. हम सभी को यह भ्रम था कि कद्दावर, गोरे और बढ़िया उर्दू बोलने वाले ही अच्छे पाकिस्तानी और मुसलमान हो सकते हैं. मेरे कुछ स्कूली दोस्त रेडियो पाकिस्तान से बंगाली   में प्रसारित होने वाले समाचारों की अजीब भाषा का मज़ाक उड़ाते थे. पश्चिम पाकिस्तान के शासन में बंगाली जनता बहुत प्रताड़ित हुई. वह यह मानती थी कि उसकी ऐतिहासिक नियति एक बंगला भाषी राष्ट्र कि नागरिकता हैं, न कि एक उर्दू भाषी पूर्वी पाकिस्तान की-- जैसा कि जिन्ना चाहते थे.
भाषा के अलगाव के अलावा भी परेशानी वाले कई मुद्दे थे. पूर्वी पाकिस्तान के इलाके में पूरे पाकिस्तान की ५४% आबादी रहती थी, और यही भाग विदेशी पूंजी का सबसे बड़ा अर्जक भी था. परन्तु पश्चिम पाकिस्तान के सेना नायक,अफसर एवम् जुल्फिकार अली भुट्टो जैसे राजनीतिज्ञ इस बात से डरते थे कि प्रजातांत्रिक प्रणाली के रहते सारी राष्ट्रीय सम्पदा, एवम् सत्ता पूर्वी पाकिस्तान के हाथों में चली जाएगी. लोकतंत्र और न्याय से वंचित, पूर्वी पाकिस्तान की असहाय जनता अपने क्षेत्र की पूंजी को पश्चिमी पाकिस्तान के उद्योग, स्कूल, और बाँध बनाने के कार्यों पर खर्च होते हुए बेबसी से देखती रही. १९७० में जब 'भोला साइक्लोन ने ५ लाख लोगों की जान ली, तब भी रावलपिंडी में बैठे हुए राष्ट्रपति याहिया खान एवम् साथी सेनानायकों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ा. ऐसे माहौल में चुनावी नतीजों ने निर्णायक अवसर प्रदान किया. अवामी लीग को पाकिस्तानी संसद में बहुमत प्राप्त हुआ, परन्तु भुट्टो तथा अन्य सेनानायकों ने जनता के निर्णय को नहीं माना. बंगालियों के सब्र का बाँध टूट गया और वे आज़ादी की जंग में कूद पड़े. पश्चिम पाकिस्तान की सेना ने नरसंहार मचा दिया. राजनैतिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी, एवम् विद्यार्थी चुन चुन कर मारे गए. खून कि नदियाँ बहने लगीं और लाखों लोग सरहद पार भाग निकले. जब  भारत ने हस्तक्षेप करके पूर्व को सहयोग प्रदान किया, तब सेना ने हथियार डाल दिये और एक  नए राष्ट्र बांग्लादेश का जन्म हुआ.
उस समय १९७१ में पाकिस्तान के पास बम न होना एक वरदान से कम नहीं था. पता नहीं डा. खान क्या सोच कर कह रहे हैं कि बम पाकिस्तान को विघटन से बचा सकता था. क्या माननीय डॉक्टर साहब ने ढाका की जनता पर बमबारी करी होती? या फिर कोलकाता और दिल्ली को जला दिया होता, ताकि प्रतिशोध में भारत भी कराची और लाहौर से बदला लेता? या फिर हमने भारत को आणविक हमले की धमकी दे कर उसे युद्ध से बाहर रखने का प्रयत्न किया होता?
बम के बगैर भी हज़ारों की तादाद में निरीह जनता मारी गयी. पाकिस्तान के विघटन को रोकने के लिए और कितने पूर्वी पाकिस्तानियों की कुर्बानी देनी पड़ती ? कुछ लोग यह कह सकते हैं कि विध्वंस के बावजूद भी यदि पाकिस्तान एक राष्ट्र ही बना रहता तो कालांतर में पूर्व पाकिस्तानियों का फायदा ही होता. परन्तु विकास के आंकड़े कुछ और ही कहते हैं. लन्दन स्थित लेगाटुम  इंस्टीट्यूट द्वारा ११० देशों के लिए बनायी गयी २०१० की समृद्धि तालिका  में  बांग्लादेश का स्थान ९६ हैं, जबकि पाकिस्तान १०९ वें स्थान पर है. यह तालिका शासन प्रणाली, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, निजी स्वतंत्रता, एवम् सामाजिक पूंजी के आधार पर बनायी गयी है. इस हिसाब से तो पूर्व की जनता को स्वतंत्रता से लाभ ही हुआ है. यूं.एन.ओ. के १८२ राष्ट्रों के मानवीय विकास सूचकांक में पाकिस्तान का स्थान १४१ है, जो  बांग्लादेश के १४६ से कुछ ही ऊपर है. तात्पर्य यह कि यदि बांग्लादेशी पाकिस्तान में ही रहते तो उनका अधिक फायदा न होता.
इसके अलावा, आंकड़े पूरी कहानी नहीं बताते हैं.  बांग्लादेश गरीब अवश्य है, परन्तु अधिक सुखी एवम् आशावादी है. वहां, पाकिस्तान के मुकाबले कहीं बेहतर तरीके से संस्कृति पनप रही है, शिक्षा में सुधार हो रहा है, तथा जनसँख्या नियंत्रण प्रयत्न कारगर हो रहे हैं. वहां न तो आत्मघाती बमबारी हो रही है है, न ही सरकारी संस्थानों एवम् सेना पर दैनिक  प्रहार.

बम ने पाकिस्तान को क्या फायदा पहुँचाया है? यह कहना बिलकुल गलत होगा कि यदि पाकिस्तान के पास बम न होता तो भारत उसको निगल जाता. भारत तो अपनी ही समस्याओं से जूझ रहा है. आर्थिक रूप से उन्नतिशील होने के बावजूद वह अपनी वर्तमान १.२ बिलियन जनसँख्या (जिसमें से लगभग ५०% बहुत गरीब है) को नियंत्रित करने में प्रयत्नशील है. वह किसी भी हालत में और १८० मिलियन लोगों का भरण पोषण करने में समर्थ नहीं है. और, यदि भूल से वह ऐसा करना भी चाहे तो एक असममित युद्ध के द्वारा जीत असंभव ही है. अमेरिका द्वारा ईराक और अफगानिस्तान में, तथा भारत द्वारा कश्मीर में झेली जा रही मुसीबतें इस बात को साफ़ कर देती हैं.
यह सच है कि १९९८ के बाद तीन बार बम ने  ही भारत को पाकिस्तान पर दंडात्मक हमले करने से रोका. १९९९ में पाकिस्तान की कारगिल घुसपैठ के बाद, उसी साल १३ दिसंबर को भारतीय संसद में हमले के बाद, तथा २००८ में लश्करे तैबा द्वारा मुंबई हमले के बाद, भारतीय जनता द्वारा इस प्रकार की क्रोधित मांगें करी गयीं कि भारत को पाकिस्तान स्थित मिलिटेंट ग्रुप्स के कैम्पों पर आक्रमण करना चाहिए. परन्तु यह समस्या केवल इसलिए है क्योंकि बम का इस्तेमाल इन आक्रमणकारी दलों की रक्षा के लिए किया गया है. अपनी इसी आणविक छतरी के कारण पाकिस्तान उन सभी लोगों के लिए एक चुम्बकीय आकर्षण रखता है जो इस्लाम के नाम पर युद्ध करते हैं. यहाँ तक कि वो ओसामा बिन लादेन का भी अंतिम सुरक्षा स्थल बना. पाकिस्तान भी धीरे धीरे वही कष्टपूर्ण पाठ पढ़ रहा है जो सोवियत यूनियन और साउथ अफ्रीका की गोरी सरकार पहले ही सीख चुकी है-- बम किसी भी देश कि जनता को सुरक्षा नहीं प्रदान कर सकता. बल्कि बम के कारण ही आज पाकिस्तान ऐसी मुसीबतज़दा हालत मैं है.

२८ मई को ही पाकिस्तान ने परमाणु बम का विस्फोट किया था. हमें यह दिन उत्सव के रूप में न मना कर इस मुसीबत को ख़त्म करने का प्रण करना चाहिए. बम बनाने एवम् उसकी यश गाथा गाने से कहीं अच्छा होगा अगर हम एक चिरस्थायी और सक्रीय लोकतंत्र का निर्माण करें, हमारी अर्थ व्यवस्था शान्ति न कि युद्ध को बढ़ावा दे, हमारी प्रादेशिक समस्याओं का निवारण हो, एक ऐसे  सहनशील समाज की स्थापना हो जहाँ विधि शासन का आदर तथा सामंतवादी व्यवस्था का अन्त हो.

डा. परवेज़ हूदभौय
(लेखक नाभिकीय भौतिकी के प्रोफ़ेसर हैं एवम् इस्लामाबाद और लाहौर में पढ़ाते हैं)

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का दबाव खत्म

डॉ. संदीप पाण्डेय
बाबा रामदेव का रामलीला मैदान से जबरन हटाया जाना एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। सभी कह रहे हैं कि गलत हुआ। खासकर जिस तरह पुलिस ने महिलाओं और बच्चों को भी नहीं बक्शा। किन्तु जो हुआ उसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। बाबा ने एक राजनीतिक मुद्दा उठाया है। सरकार ने पहले बातचीत से हल ढूढ़ने की कोशिश ही। बातचीत विफल हो गई तो उसने बल का सहारा लिया। यह कोई पहली बार तो हुआ नहीं। मेधा पाटकर को 2006 में जंतर मंतर से इससे भी बुरी तरीके से रात के अंधेरे में ही उठाया गया था। उस समय भी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के मंत्री बातचीत के लिए अनशन स्थल तक आए थे। मेधा पाटकर और देश के कई सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता ही नहीं आम जन ने भी पुलिस की बर्बरता को कई बार झेला है। आदिवासी इलाकों में तो जनता का इस कदर दमन हुआ है कि आज देश के एक बड़े हिस्से में सरकार के खिलाफ एक हिंसक प्रतिरोध खड़ा हुआ है। लोग जेल जाते हैं, यातनाएं सहते और मानसिक प्रताड़ना झेलते हैं। उस दृष्टि से तो रामदेव को कोई खास नहीं झेलना पड़ा। रामदेव तो पुलिस आते ही मंच से कूद गए। फिर एक लड़की के वस्त्र पहन पुलिस से भाग बचने की कोशिश की। किन्तु पकड़े गए। रामदेव यदि पुलिस का सामना साहस से करते तो उनकी गरिमा कायम रहती।

यहां यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि बाबा के साथ 4 व 5 जून रात में जो हुआ वह निश्चित रूप से शर्मनाक था तथा भारतीय लोकतंत्र पर एक काले धब्बे के रूप में ही याद किया जाएगा। उसकी जितनी भर्त्सना की जाए वह कम है। दिग्विजय सिंह ने अनशन शुरू होने से पहले कहा था कि कांग्रेस को बाबा से कोई डर नहीं है इसीलिए बाबा स्वतंत्र हैं वर्ना सलाखों के पीछे होेते। पर जब सरकार बाबा को मनाने में विफल रही तो कांग्रेस को यह समझ में आ गया कि यदि बाबा का अनशन 4-5 दिन चल गया और अन्ना हजारे को जिस किस्म का जनता का समर्थन मिला था वैसा समर्थन मिल गया तो सरकार के लिए मुश्किल खड़ी हो जाएगी। और सरकार डर गई। किन्तु इस लेख का विषय है हाल में हुए भ्रष्टाचार विरोधी ओदोलनों की समीक्षा।

अप्रैल में अन्ना हजारे का आंदोलन हुआ। अन्ना कहते हैं कि उनके लिए त्याग का मूल्य सबसे महत्वपूर्ण है। यदि अन्ना की कोई एक विशेषता है तो वह है उनकी सादगी। उनका कोई बैंक खाता नहीं है। रालेगण सिद्धी में मंदिर के एक कमरे में रहते हैं जिसमें कोई ताला नहीं लगता। लेकिन उनके आंदोलन का संचालन करने वालों ने 82 लाख रुपए इकट्ठा किए और 32 लाख रुपए खर्च भी कर डाले।

अन्ना हजारे के आंदोलन में लाखों खर्च हुए तो बाबा रामदेव का अनशन शुरू होने से पहले ही करोड़ों खर्च हो चुके थे। बिना उद्योगपतियों या कम्पनियों की मदद के इतना पैसा आ ही नहीं सकता। ऐसे दौर में जहां इंसान के जीवन का हरेक पहलू बाजार की भेंट चढ़ रहा है जन आंदोलनों का भी कारपोरेटीकरण हो गया। इसीलिए अन्ना हजारे और बाबा रामदेव दोनों के आंदोलनों में सिर्फ मध्यम वर्ग आया। गरीब वर्ग न तो आया न ही उसे जोड़ने की कोशिश की गई। यह वर्ग तो दिन प्रति दिन भ्रष्टाचार से दो चार होता है। उसके पास मोमबत्ती जला कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की फुर्सत ही नहीं है।

अन्ना के आंदोलन से शुरू हुई विकृति को रामदेव ने पराकाष्ठा पर पहुंचाया। योग सीखने आए लोगों को आंदोलन में झोंक दिया। वर्ना पचास हजार की भीड़ के रहते पुलिस की तो बाबा तक पहुंचने की हिम्मत ही नहीं होनी चाहिए थी। लेकिन न तो बाबा के पास आंदोलन का कोई अनुभव था और न ही उनके समर्थकों के पास। मंच से बाबा ने कसम खिलवाई थी कि बाबा गिरफ्तार होंगे तो शेष लोग अनशन जारी रखेंगे। किन्तु अनशन की बात तो दूर वहां तो पंडाल में कोई ठहर ही नहीं पाया। बाबा तो भाग गए और समर्थकों ने पुलिस का कोई प्रतिरोध ही नहीं किया।

उससे पहले बाबा ने यह अपरिपक्वता दिखाई कि बातचीत में किसी अनुभवी व्यक्ति को नहीं रखा। कम से कम अरविंद केजरीवाल से यह सबक सीख लिया होता। अरविंद ने शांति भूषण, प्रशांत भूषण, स्वामी अग्निवेश, किरण बेदी जैसे लोगों को साथ में रखा जो सरकार के मंत्रियों के साथ बराबरी के स्तर पर बातचीत तो कर पाए। कपिल सिबल व सुबोध कांत सहाय ने बाबा पर दबाव बनाया के वे उनकी मांगों को आंशिक रूप से माने जाने के बदले लिखित रूप में अपने अनशन को वापस लेने का वचन दें। बाबा के शिष्य बालकृष्ण ने लिखित दे दिया। किन्तु बाहर आकर बाबा अपनी बात से पलट गए। उसके बाद जो हुआ वह इतिहास है।

बाबा ने जो मांगें रखी थीं उसमें में कुछ विसंगतियां थीं। उदाहरण के लिए बाबा चाह रहे थे कि भ्रष्टाचारी को फांसी दी जाए। अब दुनिया भर में जघन्यतम अपराध के लिए फांसी की सजा पर रोक लग रही है। कई देशों में फांसी पर प्रतिबंध लग चुका है। फांसी की सजा की बात करना मध्यकालीन युग में जाने जैसी बात है। काश बाबा ने दो-चार कानूनविदों से सलाह मश्विरा कर लिया होता।

बाबा ने आंदोलन को बहुत हल्के में लिया। अभी लोकपाल विधेयक बना भी नहीं था और उन्होंने बीच में ही अपना आंदोलन छेड़ दिया। क्या जल्दी थी? अब लाकपाल विधेयक निर्माण की प्रक्रिया भी प्रभावित हो गई है क्योंकि अन्ना हजारे समूह ने बाबा के साथ हुए अत्याचार के विरोध में विधेयक पर बातचीत की बैठक का पहले तो बहिष्कार किया और जब सरकार ने कहा कि वह बिना नागरिक समाज की मदद के काम जारी रखेगी तो बहिष्कार का निर्णय वापस लिया गया।

सरकार को भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को कुचलने का मौका देकर बाबा रामदेव ने आंदोलन को बहुत नुकसान पहुंचाया है। सरकार के ऊपर जो दबाव बना था उसकी हवा फिलहाल तो निकल गई है।

डॉ संदीप पाण्डेय
लेखक मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता हैं. ईमेल: ashaashram@yahoo.com

युवाओं ने किया लखनऊ में तम्बाकू कानून के परिपालन पर रिपोर्ट कार्ड जारी

[हिंदी रपट कार्ड] [English Report Card] यह रपट कार्ड 'अधिकार एवं दायित्व प्रशिक्षण शिविर' के प्रतिभागी युवाओं ने बनाया है: सचिदानंद पाण्डेय, जतिन अरोरा, सर्वेश कुमार शुक्ला, दिलीप शर्मा, नदीम सलमानी, आनंद पाठक, रितेश आर्य और राहुल द्विवेदी. इसके सलाहकार मंडल में थे प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त, डॉ संदीप पाण्डेय, शोभा शुक्ला एवं बाबी रमाकांत.

सिगरेट एवं अन्य तम्बाकू उत्पाद अधिनियम, २००३, के ५ नियमों के परिपालन को आँका:
१) किसी भी शैक्षिक संस्थान के १०० गज के भीतर तम्बाकू विक्रय पर प्रतिबन्ध
२) सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान प्रतिबंधित
३) १८ साल से कम उम्र के बच्चे एवं युवा न तो तम्बाकू खरीद सकते हैं और न ही बेच
४) तम्बाकू उत्पादनों पर चित्रमय चेतावनी
५) प्लास्टिक के पाउच में गुटखा बेचने पर प्रतिबन्ध

कुछ सुझाव: 
१. चूँकि अधिकाँश तम्बाकू सेवन १८ साल से पहले आरंभ होता है, यह अतिआवश्यक है कि १८ साल से कम उम्र के बच्चे और युवाओं को तम्बाकू न तो बेचनी चाहिए और न ही खरीदनी. दूसरा सवाल यह है कि शिक्षा अधिकार अधिनियम के युग में १८ साल से कम उम्र के बच्चे और युवा क्यों तम्बाकू बेचने पर विवश हैं? वें शिक्षा क्यों नहीं प्राप्त कर पा रहे हैं? बहुत कम तम्बाकू दुकानों पर यह बोर्ड लगा है कि १८ साल से कम उम्र के बच्चे और युवाओं का तम्बाकू खरीदना प्रतिबंधित है.

२. किसी भी शैक्षिक संस्थान के १०० गज के भीतर तम्बाकू विक्रय प्रतिबंधित है - इसको सख्ती से परिपालित करना चाहिए.

३. जो विदेशी सिगरेट लखनऊ में बिक रही है, जैसे कि गुदंग गरम (इंडोनेसिया), मार्लबोरो (अमरीका) आदि उनपर कोई भी चित्रमय चेतावनी क्यों नहीं है? यदि वो कानूनन रूप से आयात की गयी हैं तो उनको भारतीय कानून का अनुपालन करना चाहिए और यदि वो कानूनन रूप से आयात नहीं की गयी हैं तो न केवल भारत के लोगों के स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़ रहा है बल्कि भारत के राजस्व का भी नुक्सान हो रहा है. क्या यह तम्बाकू तस्करी है? यदि है तो इसके खिलाफ सख्त कारवाई होनी चाहिए

४. पर्यावरण संगरक्षण के लिये प्लास्टिक पैकट में किसी भी तम्बाकू उत्पाद को बेचने पर प्रतिबन्ध लगना चाहिए जिनमें बिना तम्बाकू का पान मसाला, स्वीट सुपारी आदि भी शामिल हों

५. सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान सख्ती से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए - और उपयुक्त बोर्ड लगे हों (बहुत कम निजी परिसरों में ऐसे बोर्ड लगे हैं जो कानूनन अनिवार्य है). एक प्रकाशित समाचार के अनुसार, लखनऊ में २०११ में अबतक सिर्फ रुपया ६००० हर्जाना इकठ्ठा हुआ है - यानि कि सिर्फ ३० लोगों को सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान करते हुए पकड़ा गया है! इस कानून को सख्ती से लागू किया जाए क्योंकि बिना सक्रियता और प्रभावकारी तरीके से कानून को लागू किये लखनऊ प्रशासन की घोषणा कि इस साल के अंत तक लखनऊ "धूम्रपान रहित" हो जायेगा, खोखला दावा लगता है.

सी.एन.एस.

तम्बाकू नियंत्रण कानून के उल्लंघन के खिलाफ़ युवाओं ने दाखिल किए सूचना अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन पत्र

[नौ सूचना अधिकार अधिनियम के तहत दाखिल हुए आवेदन पत्र पढने के लिए यहाँ पर क्लिक कीजिये]
प्रोफेसर डॉ0 रमा कान्त के सेन्टर पर हुए ‘अधिकार एवं दायित्व प्रशिक्षण शिविर - 25-31 मई 2011’ के दौरान मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता डॉ संदीप पाण्डेय ने प्रतिभागी युवाओं को सूचना अधिकार अधिनियम, २००५ से जन-हितैषी तम्बाकू नियंत्रण कानून को सख्ती से लागू करने एवं भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को सशक्त करने पर बात की. उन्होंने छात्रों को सूचना अधिकार अधिनियम के अंतर्गत आवेदन पत्र लिखना सिखाया और उनसे अनुरोध किया कि वें न तो कभी घूस लें, न कभी दें.

डॉ संदीप पाण्डेय ने बताया कि ‘आवेदन पत्र जिस विभाग से आप जानकारी मांग रहे हैं, उसके जन-सूचना अधिकारी को संबोधित किया जाता है. सूचना अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी मांगते हुए आवेदन पत्र में यह बात स्पष्ट लिखे कि जानकारी सूचना अधिकार अधिनियम, २००५, के अंतर्गत मांगी जा रही है. १० रूपए का नोट या ‘मनी-आर्डर’ संग्लग्न करें और नोट का नंबर भी आवेदन पत्र में लिख दें. इस आवेदन पत्र को पंजीकृत डाक द्वारा भी भेजा जा सकता है.’

प्रतिभागी युवाओं ने सूचना अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन पत्र लिख कर यह पूछा कि सिगरेट एवं अन्य तम्बाकू उत्पाद अधिनियम २००३ को क्यों लागू नहीं किया गया है? क्यों शैक्षिक संस्थानों के १०० गज के अन्दर तम्बाकू विक्रय दुकानें हैं? क्यों सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान हो रहा है? क्यों फिल्मों में तम्बाकू सेवन को प्रदर्शित किया जा रहा है? प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष विज्ञापन हो रहा है? क्यों 18 वर्ष से कम आयु के बच्चे-युवा तम्बाकू खरीद या बेच रहे हैं? आदि

यह अधिकार एवं दायित्व प्रशिक्षण शिविर नागरिकों के स्वस्थ लखनऊ अभियान, इण्डियन सुसाइटी अगेंस्ट स्मोकिंग, आशा परिवार, अभिनव भारत फाउंडेशन एवं सिटिज़न न्यूज़ सर्विस द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था।

सी.एन.एस.

युवाओं तम्बाकू सेवन आरम्भ न करें

‘‘अधिकांश तम्बाकू सेवन 18 वर्ष से पहले ही आरम्भ होता है। इसीलिए बच्चों एवं युवाओं को तम्बाकू जनित जानलेवा रोगों एवं व्याधियों के बारे में जानकारी देना अनिवार्य है जिससे कि वें ज़िन्दगी चुनें, तम्बाकू नहीं’’ कहा एसोसिएशन ऑफ सर्जन्स ऑफ इण्डिया के 2012 नव-निर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष, प्रोफेसर डॉ0 रमा कान्त ने जो नागरिक अधिकार एवं दायित्व प्रशिक्षण शिविर, 25-31 मई 2011 के प्रतिभागियों को सम्बोधित कर रहे थे।

प्रोफेसर डॉ0 रमा कान्त, विश्व स्वास्थ्य संगठन अंतर्राष्ट्रीय पुरूस्कार विजेता हैं एवं छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के सर्जरी विभाग के भूतपूर्व विभागाध्यक्ष एवं भूतपूर्व मुख्य चिकित्सा अधीक्षक हैं।

प्रो0 डॉ0 रमा कान्त जो वर्तमान में ‘पाइल्स टू स्माइल्स’ क्लीनिक के निदेशक हैं, उन्होंने कहा कि ‘‘बच्चों एवं युवाओं में तम्बाकू नियंत्रण करना व्यापक तम्बाकू नियंत्रण योजना का एक अहम भाग है’’।

प्रो0 डॉ0 रमा कान्त ने कहा कि ‘‘भारत में तम्बाकू से हर वर्ष 10 लाख से अधिक लोग मृत्यु को प्राप्त होते हैं। बच्चों और युवाओं को तम्बाकू कम्पनियों के प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष भ्रामक प्रचार से दूर रहना चाहिए और उससे प्रभावित नहीं होना चाहिए। उनको तम्बाकू सेवन की असली तस्वीर जो जानलेवा बीमारियों से जुड़ी है उससे परिचित होना चाहिए जिससे कि वें ज़िन्दगी चुनें, तम्बाकू नहीं’’।

प्रो0 डॉ0 रमा कान्त जिनको केन्द्रिय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय का अनुशंसा पुरूस्कार भी 1997 में मिल चुका है उन्होंने कहा कि ‘‘लगभग आधी तम्बाकू जनित मृत्यु 35-69 वर्ष के दौरान होती है। धूम्रपान से अधिकांश मरने वाले लोगों ने तम्बाकू सेवन युवावस्था में आरम्भ किया था। 30-40 साल के लोग जो तम्बाकू सेवन करते हैं, उनको हृदय रोग होने का पॉंच गुणा अधिक खतरा रहता है। तम्बाकू जनित हृदय रोग एवं कैंसर तम्बाकू व्यसनियों की मौत का सबसे बड़ा कारण है’’।

प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने कहा कि ‘तम्बाकू व्यसनियों को नशा मुक्ति के लिये विशेषज्ञों से मदद लेनी चाहिए. शोध के अनुसार अक्सर तम्बाकू सेवन करने वाले लोग तम्बाकू-जनित रोगों, विकृतियों और मृत्यु से अनभिज्ञ होते हैं. जो तम्बाकू व्यसनी इन खतरों को संजीदगी से समझते हैं, उनकी नशा-मुक्त होने की सम्भावना अधिक होती है.’

अधिकार एवं दायित्व प्रशिक्षण शिविर के सत्रों में युवाओं को नागरिक पत्रकारिता (ऑनलाइन एवं प्रकाशन), मौजूदा तम्बाकू नियंत्रण कानून, हिंदी एवं अंग्रेजी में ब्लॉगिंग, मुद्दों पर रपट लिखना, फोटो-पत्रकारिता एवं अपने लेखों एवं तस्वीरों को ऑनलाइन माध्यमों से विस्तृत करना आदि पर प्रशिक्षण मिल रहा है. यह युवा लखनऊ शहर में तम्बाकू नियंत्रण कानून पर रपट कार्ड भी बना रहे हैं जो अधिकारियों को विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर दिया गया।

यह अधिकार एवं दायित्व प्रशिक्षण शिविर नागरिकों के स्वस्थ लखनऊ अभियान, इण्डियन सुसाइटी अगेंस्ट स्मोकिंग, आशा परिवार, अभिनव भारत फाउंडेशन एवं सिटिज़न न्यूज़ सर्विस द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था।
सी.एन.एस.

नागरिक पत्रकारिता एवं तम्बाकू नियंत्रण पर युवाओं के लिये शिविर

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार विजेता एवं लखनऊ के वरिष्ठ सर्जन (शल्य-चिकित्सक) प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने नागरिक पत्रकारिता एवं तम्बाकू नियंत्रण पर युवाओं के लिये २५-३१ मई २०११ के दौरान शिविर का उद्घाटन किया. 

२५ मई २०११ के सत्र में युवाओं को नागरिक पत्रकारिता (ऑनलाइन एवं प्रकाशन), मौजूदा तम्बाकू नियंत्रण कानून, के बारे में सीखने को मिला. मुद्दों पर रपट लिखना, फोटो-पत्रकारिता एवं अपने लेखों एवं तस्वीरों को ऑनलाइन माध्यमों से विस्तृत करना आदि पर बात हुई. सिगरेट एवं अन्य तम्बाकू उत्पाद अधिनियम २००३ एवं अंतर्राष्ट्रीय तम्बाकू नियंत्रण संधि (फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन टोबाको कण्ट्रोल) पर भी सत्र हुआ. लोरेटो कॉन्वेंट की वरिष्ठ शिक्षक एवं www.citizen-news.org की संपादिका शोभा शुक्ला एवं विश्व स्वास्थ्य संगठन के २००८ पुरुस्कार प्राप्त बाबी रमाकांत ने सत्र का संचालन किया.

२५-३१ मई २०११ के दौरान युवाओं को सूचना अधिकार अधिनियम २००५ का इस्तेमाल करने का अवसर भी मिला जिसमें  मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता डॉ संदीप पाण्डेय ने सूचना अधिकार अधिनियम का उपयोग करना सिखाया.

इस कार्यशाला के दौरान युवाओं ने लखनऊ शहर में लागू तम्बाकू नियंत्रण कानून पर एक रपट कार्ड प्रस्तुत किया जो सरकारी अधिकारीयों को दिया गया.

इसका आयोजन नागरिकों का स्वस्थ लखनऊ अभियान, इंडियन सोसाइटी अगेंस्ट स्मोकिंग, आशा परिवार, अभिनव भारत फौंडेशन एवं सी.एन.एस.: www.citizen-news.org द्वारा किया गया.
सी.एन.एस.

लखनऊ में जन-स्वास्थ्य की सबसे बड़ी प्राथमिकता है तम्बाकू नियंत्रण

लखनऊ शहर में सबसे अधिक मृत्यु होती हैं ह्रदय रोग एवं कैंसर से जिनका सबसे बड़ा कारण है तम्बाकू सेवन, कहा विश्व स्वास्थ्य संगठन अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार विजेता प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने जो लखनऊ कॉलेज ऑफ़ सुर्गेओंस द्वारा आयोजित कार्यक्रम के मुख्य वक्ता थे जो चौक स्थित सिप्स सुपर-स्पेशलिटी अस्पताल में संपन्न हो रहा था. उत्तर प्रदेश सरकार के भूतपूर्व मधनिषेध मंत्री श्री सूर्य प्रताप शाही जी ३१ मई २०११ ने विश्व तम्बाकू निषेध दिवस कार्यक्रम का उद्घाटन किया जिसमें पोस्टर प्रदर्शनी, वृत्त-चित्र, स्लाइड-शो, नाट्य-मंचन, आदि प्रस्तुत होंगे. इस वर्ष विश्व तम्बाकू निषेध दिवस का केंद्रीय विचार है: विश्व तम्बाकू नियंत्रण संधि (फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन टोबाको कण्ट्रोल- ऍफ़.सी.टी.सी).

लखनऊ कॉलेज ऑफ़ सर्जन्स के अध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने कहा कि ऍफ़.सी.टी.सी. को भारत के संसद ने भी पारित किया है और उसके अनुसार तम्बाकू उत्पादनों पर कर एवं कीमत बढ़नी चाहिए जिससे तम्बाकू सेवन कम हो, सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान प्रतिबंधित हो और कानून लागू हो, तम्बाकू उत्पादनों को बनाने में उपयोग हुई सामग्री तम्बाकू पैकट पर प्रकाशित होनी चाहिए, तम्बाकू उत्पाद में कितनी तम्बाकू है, निकोटीन है, टार है, यह नियंत्रित की जानी चाहिए, तम्बाकू उत्पादों के पैकट पर चित्रमय चेतावनी प्रकाशित होनी चाहिए, तम्बाकू नशा मुक्ति सेवाएँ उपलब्ध हों, प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष तम्बाकू विज्ञापन पर व्यापक प्रतिबन्ध लगे, तम्बाकू तस्करी बंद हो, तम्बाकू अवयस्क को न बेचीं जाए और न ही अवयस्क खरीद पाए.

इस कार्यक्रम में छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति प्रोफेसर (डॉ) के.एम.सिंह, सिप्स अस्पताल के प्रबंध निदेशक डॉ राज कुमार मिश्रा, लोरेटो कॉन्वेंट की शिक्षिका शोभा शुक्ला, लखनऊ विश्वविद्यालय की प्रोफेसर (डॉ) निशी पाण्डेय, मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता डॉ संदीप पाण्डेय, लखनऊ कॉलेज ऑफ़ सर्जन्स के सचिव डॉ विनोद जैन,  डैबल कॉलेज के प्रधानाचार्य ए.के. गोयल, लोरेटो कॉन्वेंट से डॉ नीरा शुक्ला, अरविन्द अकादेमी की प्रधानाचार्य डॉ वीणा शर्मा, आदि भी शामिल थे.

युवाओं ने लखनऊ में तम्बाकू कानून के परिपालन पर रिपोर्ट कार्ड जारी किया. यह रपट कार्ड 'अधिकार एवं दायित्व प्रशिक्षण शिविर' के प्रतिभागी युवाओं ने बनाया है: सचिदानंद पाण्डेय, जतिन अरोरा, सर्वेश कुमार शुक्ला, दिलीप शर्मा, नदीम सलमानी, आनंद पाठक, रितेश आर्य और राहुल द्विवेदी.
सी.एन.एस.

भारत में बीड़ी तम्बाकू-जनित मृत्यु का सबसे बड़ा कारण

भारत में १० करोड़ लोगों से भी अधिक बीड़ी का सेवन करने वाले लोग हैं. जितने लोग बीड़ी पीने की वजह से तम्बाकू-जनित मृत्यु को प्राप्त होते हैं, उतने अन्य सभी प्रकार के तम्बाकू उत्पादनों द्वारा जनित बीमारियों से भी नही मरते. विश्व स्वास्थ्य संगठन पुरुस्कार विजेता प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने बताया कि यह तथ्य बीड़ी मोनोग्राफ नामक रपट में सामने आए जो स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने जारी की थी.

भारत में ८० करोड़ से अधिक बीड़ी प्रति वर्ष बिकती हैं. चौकाने वाला तथ्य यह है कि भारत में ५३ प्रतिशत तम्बाकू सेवन बीड़ी के रूप में होता है, जब कि सिर्फ़ १९ प्रतिशत तम्बाकू सेवन सिगरेट के रूप में होता है. औसतन हर एक बिकने वाली सिगरेट पर ८ बीड़ी बिकती हैं, कहा प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने जो अखिल भारतीय शल्य-चिकित्सकों (सर्जनों) के संघ के नव-निर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.

"तम्बाकू हर रूप में घातक है. वर्त्तमान में बीड़ी पीने का दर कई प्रदेशों में अधिक है, जैसे कि मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड और सिक्किम में १०.६ - १४.२ प्रतिशत, अरुणाचल प्रदेश, असाम, बिहार, चंडीगढ़ और मेघालय में ४.६ - ९.२ प्रतिशत, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, त्रिपुरा, उड़ीसा, उत्तराखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश में १.1 - २.९ प्रतिशत, और गोया, तमिल नाडू, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, कर्नाटक, गुजरात, हिमाचल प्रदेश और पंजाब में १० प्रतिशत है" कहा प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने. भारत में मिजोरम में बीड़ी सेवन का दर सबसे अधिक है और पंजाब में सबसे कम.

प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने कहा कि "जिन घरों में शराब या पान का सेवन होता हो, वहाँ पर बीड़ी पीने की सम्भावना अधिक होती है, ऐसा इस रपट में निकल के आया है."

"बीड़ी में तम्बाकू की मात्रा सिगरेट की तुलना में कम होती है पर निकोटीन, टार और अन्य हानिकारक पदार्थों की मात्रा काफी अधिक होती है. इनमें से कई ऐसे पदार्थ हैं जिनसे कैंसर होने की सम्भावना बढ़ जाती है" कहना है प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त का.

बीड़ी पीने से स्वास्थ्य पर जान-लेवा कु-प्रभावों में से मुह के कैंसर, खाने की नली के कैंसर आदि प्रमुख हैं, जो तम्बाकू-जनित कैंसर के कुल अनुपात का ७५ प्रतिशत हैं!इस रपट में यह भी प्रमाणित हुआ है कि बीड़ी पीने और तपेदिक या टीबी के मध्य सीधा सम्बन्ध है.

चंद तथ्य:
- ८५ प्रतिशत बीड़ी में इस्तेमाल होने वाली तम्बाकू भारत में ही उगाई जाती है
- गुजरात, कर्नाटक और महाराष्ट्र में ३५ प्रतिशत कृषि योग्य खेतों में बीड़ी बनाने के लिए तम्बाकू और तेंदू पत्ते आदि की खेती होती है
- बीड़ी बनाने के लिए १०,५०,००० टन तम्बाकू और ३,००० टन तेंदू पत्ता लगता है
- मध्य प्रदेश और राजस्थान से अधिकांश बीड़ी बनाने के लिए तेंदू पत्ता आता है.

सी.एन.एस.

एड्स कार्यकर्ताओं के धरने की वजह से उत्तर प्रदेश में एड्स दवाएं उपलब्ध

[English] राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संस्थान के कार्यालय के भीतर शुक्रवार २० मई २०११ से अनेक एच.आई.वी. के साथ जीवित लोग धरना दे रहे हैं क्योंकि बिहार और उत्तर प्रदेश के एंटी-रेट्रो-वाईरल (ए.आर.टी) केन्द्रों पर एड्स दवा आपूर्ति प्रणाली खंडित चल रही थी और दवाएं नियमित तौर पर उपलब्ध नहीं थीं. २ महीनों से निरंतर प्रयास कर रहे एड्स कार्यकर्ताओं की अपील पर जब राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संस्थान ने नज़रंदाज़ कर दिया, तब जा कर एड्स कार्यकर्ताओं ने नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संस्थान के कार्यालय में ही कल से प्रदर्शन चालू किया.

इनके प्रदर्शन की वजह से अब उत्तर प्रदेश में आज २१ मई २०११ को एड्स दवा उपलब्ध हो गयी हैं, जिनको गुजरात और द्ल्ल्ली के भंडार से लाया गया है, और बिहार में संभवत: शाम तक दवा पहुँच जाए.

दिल्ली नेटवर्क ऑफ़ पोसिटिव पीपल (एच.आई.वी. के साथ जीवित लोगों का समूह) ने राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संस्थान एवं स्वास्थ्य मंत्रालय से अपील की है कि वें एड्स दवाओं की आपूर्ति प्रणाली की अनियमतता को बिना विलम्ब दुरुस्त करें क्योंकि दिल्ली एवं उत्तर प्रदेश के एच.आई.वी. के साथ जीवित लोगों को, जिनको इन दवाओं की आवश्यकता है, यह दवाएं मिल नहीं रही हैं.

कल एच.आई.वी. के साथ जीवित लोगों के स्थानीय समूहों के अनुसार, फरवरी और मई २०११ के मध्य उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद और गोरखपुर जिलों में एवं बिहार के गया, भागलपुर, दरभंगा, मुज़फरपुर, एवं पटना जिलों में एड्स दवाओं की आपूर्ति प्रणाली में अनेक बार व्यवधान आया है. एच.आई.वी. के साथ जीवित लोगों के स्थानीय समूहों के अनुसार, सैकड़ों लोगों पर दवाएं न मिलने के कारण कुप्रभाव पड़ा है.

उत्तर प्रदेश के एच.आई.वी. के साथ जीवित लोगों के समूह के नरेश यादव का कहना है कि "इलाहाबाद में पहले जबरन एड्स दवा का वितरण राशन की तरह होने लगा और एच.आई.वी. के साथ जीवित लोगों को सिर्फ ५ दिन की दवा दी जाती थी पर अब तो दवा उपलब्ध ही नहीं है. अन्य ए.आर.टी. केन्द्रों की स्थिति भी इसी तरह की है." आज दिल्ली में राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संस्थान के कार्यालय में चल रहे धरने के असर में आज से दवा आपूर्ति प्रणाली फिर से चालू हो गयी है.

दिसंबर २०१० में एच.आई.वी. के साथ जीवित लोगों ने सूचित किया था कि उनको एकदम से बिना पूर्व जानकारी के 'नेविरापीन' दवा की बजाय 'एफाविरेंज़' दवा दी जाने लगी थी क्योंकि सरकारी दवा-भंडार में 'एफाविरेंज़' अधिक मात्र में थी और राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संस्थान को 'एक्सपायरी' या दवा कारगर तिथि - मार्च २०११ - के पहले यह 'एफाविरेंज़' दवा समाप्त करनी थी.

आखिर क्या कारण है कि जीवन रक्षक और जीवन अवधि बढ़ने वाली दवाओं की आपूर्ति प्रणाली नियमित ढंग से नहीं चल पा रही है और उसमे आये दिन व्यवधान आता रहता है?

अक्सर इसका कारण अपर्याप्त एवं असंतोषजनक परियोजना, स्थानीय जरूरतों को इमानदारी से न आंकना, कमजोर दवा वितरण प्रणाली और भ्रष्टाचार होता है.

एच.आई.वी. के साथ जीवित लोगों के समूह ने स्वास्थ्य मंत्रालय एवं राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संस्थान से अति-शीघ्र ही जीवन रक्षक दवाओं के आपूर्ति प्रणाली प्रबंधन को दुरुस्त करने का आह्वान किया है जो टी.बी. एवं एड्स जैसे स्वास्थ्य कार्यक्रमों के लिये अतिआवश्यक है.

दिल्ली के एच.आई.वी. के साथ जीवित लोग उत्तर प्रदेश एवं बिहार के एच.आई.वी. के साथ जीवित लोगों के प्रति अतिचिन्तित हैं और इसीलिए राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संस्थान के कार्यालय के बाहर धरने पर हैं. इनकी मांग है कि २४ घंटे के अन्दर एड्स दवाओं का वितरण पुन: सामान्य ढंग से चालू हो और दवा आपूर्ति की अनियमतता की जांच हो.

सी.एन.एस. 

भारतीय एड्स कार्यक्रम - दवा-आपूर्ति प्रणाली अनियमित

दवा-प्रतिरोधकता होने का खतरा एवं दवाएं जरुरतमंदों की पहुँच से बाहर

[English] दिल्ली नेटवर्क ऑफ़ पोसिटिव पीपल (एच.आई.वी. के साथ जीवित लोगों का समूह) ने राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संस्थान एवं स्वास्थ्य मंत्रालय से अपील की है कि वें एड्स दवाओं की आपूर्ति प्रणाली की अनियमतता को बिना विलम्ब दुरुस्त करें क्योंकि दिल्ली एवं उत्तर प्रदेश के एच.आई.वी. के साथ जीवित लोगों को, जिनको इन दवाओं की आवश्यकता है, यह दवाएं मिल नहीं रही हैं.

एच.आई.वी. के साथ जीवित लोगों के स्थानीय समूहों के अनुसार, फरवरी और मई २०११ के मध्य उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद और गोरखपुर जिलों में एवं बिहार के गया, भागलपुर, दरभंगा, मुज़फरपुर, एवं पटना जिलों में एड्स दवाओं की आपूर्ति प्रणाली में अनेक बार व्यवधान आया है. एच.आई.वी. के साथ जीवित लोगों के स्थानीय समूहों के अनुसार, सैकड़ों लोगों पर दवाएं न मिलने के कारण कुप्रभाव पड़ा है.

उत्तर प्रदेश के एच.आई.वी. के साथ जीवित लोगों के समूह के नरेश यादव का कहना है कि "इलाहाबाद में पहले जबरन एड्स दवा का वितरण राशन की तरह होने लगा और एच.आई.वी. के साथ जीवित लोगों को सिर्फ ५ दिन की दवा दी जाती थी पर अब तो दवा उपलब्ध ही नहीं है. अन्य ए.आर.टी. केन्द्रों की स्थिति भी इसी तरह की है."

दिल्ली नेटवर्क ऑफ़ पोसिटिव पीपल के विकास आहूजा के अनुसार "पिछले महीने तपेदिक या टी.बी. की दवा दिल्ली में उपलब्ध नहीं थीं. अब एच.आई.वी. के साथ जीवित लोगों के समूह के अनुसार कई प्रदेशों में एड्स दवा आपूर्ति प्रणाली में अनियमतता सामने आ रही है." "इससे अनेक एच.आई.वी. के साथ जीवित लोगों के जीवन पर खतरा मंडरा रहा है. यदि एड्स एवं टी.बी. की दवाएं नियमित रूप से उपलब्ध नहीं होंगी तो लोगों को दवा प्रतिरोधकता हो जाएगी, जिसके वजह से यह दवा उनपर कारगर नहीं रहेगी" कहना है विकास आहूजा का.

दिसंबर २०१० में एच.आई.वी. के साथ जीवित लोगों ने सूचित किया था कि उनको एकदम से बिना पूर्व जानकारी के 'नेविरापीन' दवा की बजाय 'एफाविरेंज़' दवा दी जाने लगी थी क्योंकि सरकारी दवा-भंडार में 'एफाविरेंज़' अधिक मात्र में थी और राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संस्थान को 'एक्सपायरी' या दवा कारगर तिथि - मार्च २०११ - के पहले यह 'एफाविरेंज़' दवा समाप्त करनी थी.

आखिर क्या कारण है कि जीवन रक्षक और जीवन अवधि बढ़ने वाली दवाओं की आपूर्ति प्रणाली नियमित ढंग से नहीं चल पा रही है और उसमे आये दिन व्यवधान आता रहता है?

अक्सर इसका कारण अपर्याप्त एवं असंतोषजनक परियोजना, स्थानीय जरूरतों को इमानदारी से न आंकना, कमजोर दवा वितरण प्रणाली और भ्रष्टाचार होता है.

एच.आई.वी. के साथ जीवित लोगों के समूह ने स्वास्थ्य मंत्रालय एवं राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संस्थान से अति-शीघ्र ही जीवन रक्षक दवाओं के आपूर्ति प्रणाली प्रबंधन को दुरुस्त करने का आह्वान किया है जो टी.बी. एवं एड्स जैसे स्वास्थ्य कार्यक्रमों के लिये अतिआवश्यक है.

दिल्ली के एच.आई.वी. के साथ जीवित लोग उत्तर प्रदेश एवं बिहार के एच.आई.वी. के साथ जीवित लोगों के प्रति अतिचिन्तित हैं और इसीलिए राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संस्थान के कार्यालय के बाहर धरने पर हैं. इनकी मांग है कि २४ घंटे के अन्दर एड्स दवाओं का वितरण पुन: सामान्य ढंग से चालू हो और दवा आपूर्ति की अनियमतता की जांच हो.


सी.एन.एस .

भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के लिए तैयार युवा

[English][फोटो] 'नागरिकों का स्वस्थ लखनऊ' अभियान के अंतर्गत  सेक्टर-१६, इंदिरा नगर, स्थित ए. एल. एस अकादमी में आयोजित एक जन जागरूकता कार्यक्रम में 'तम्बाकू नियंत्रण और भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई' परिचर्चा का आयोजन किया गया . कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में आये प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता और मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित, डॉ. संदीप पाण्डेय ने बच्चों को  भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई के लिए सूचना अधिकार अधिनियम के प्रयोग के लिए प्रोत्साहित किया. पाण्डेय जी ने बच्चों से यह भी अनुरोध किया कि न तो वे कभी घूस  लें तथा न ही कभी घूस  दें.

डॉ संदीप पाण्डेय ने बच्चों को संबोधित करते हुए कहा कि आज तक देश में जितने ही बड़े घोटाले हुए हैं और जिसके कारण देश कि छवि धूमिल हुई है, इन सभी प्रकार के घोटालों में देश के उच्च पदों पर आसीन अधिकारिओं का ही हाथ है. अतः यह जाहिर बात है कि अधिकांश भ्रष्टाचार पढ़े-लिखे लोग ही करते हैं. इसीलिए यह और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि छात्र भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में सक्रीय हों जिससे कि देश का आने वाला भविष्य भ्रष्टाचार मुक्त हो.

पाण्डेय जी ने आगे कहा कि भ्रष्टाचार के लिए केवल घूस लेने वाला ही जिम्मेदार नहीं है बल्कि घूस देनें वाला भी बराबर का जिम्मेदार है. इसलिए भ्रष्टाचार तभी ख़त्म किया जा सकता है जब हम यह प्रण करें कि न तो हम कभी घूस लेंगें और न ही कभी घूस देंगें. आने वाले समय में ये ही बच्चे सरकारी कार्यालयों में उच्च पदों पर आसीन होंगे, और तब धन और पद के लोभ में घूस लेने की अनैतिक लालसा भी उत्पन्न होगी. इसीलिए युवाओं को अभी से ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध प्रतिज्ञा लेना आवश्यक है.

डॉ संदीप पाण्डेय ने छात्रों को सूचना अधिकार अधिनियम के अंतर्गत आवेदन पत्र लिखना सिखाया और  बताया कि आवेदन पत्र संबधित विभाग के जन-सूचना अधिकारी को संबोधित किया जाता है. सूचना अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी मांगते हुए आवेदन पत्र में यह बात स्पष्ट लिखे कि जानकारी सूचना अधिकार अधिनियम, २००५, के अंतर्गत मांगी जा रही है. १० रूपए का नोट या 'मनी-आर्डर' संलग्न करें, और नोट का नंबर भी आवेदन पत्र में लिख दें. इस आवेदन पत्र को पंजीकृत डाक द्वारा भी भेजा जा सकता है. कार्यशाला के अंत में सभी बच्चों ने सूचना अधिकार अधिनियम के अंतर्गत उन अनेकों विषयों पर वास्तविक आवेदन पत्र  लिखे, जो उनके जीवन को प्रभावित कर रहे थे.   

कार्यशाला को  संबोधित करते हुए नागरिकों का स्वस्थ् लखनऊ अभियान के समन्वयक राहुल द्विवेदी ने कहा कि तम्बाकू घातक है. तथा तम्बाकू कम्पनियां अपने उत्पाद को बेचने के लिए युवाओं  को निशाना बना कर, तरह-तरह के लुभावने विज्ञापनों के माध्यम से युवाओं को तम्बाकू उपभोग के लिए उकसाती हैं. अतः यह बहुत जरुरी है कि युवा छात्र तम्बाकू के असली घातक चेहरे से परिचित हों, तथा तम्बाकू जनित जानलेवा रोगों को जान लें जिससे कि वें विवेकपूर्ण निर्णय लेकर  स्वस्थ जीवन चुने, न कि तम्बाकू.

बच्चो को प्रोत्साहित करते हुए राहुल द्विवेदी ने कहा कि  सूचना अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन पत्र लिख कर यह पूछना चाहिए कि सिगरेट एवं अन्य तम्बाकू उत्पाद अधिनियम २००३ को अभी तक पूर्ण रूप से क्यों लागू नहीं किया गया है? क्यों शक्षिक संस्थानों के १०० यार्ड के अन्दर तम्बाकू विक्रय दुकानें हैं? क्यों सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान हो रहा है?

 हम यह उम्मीद करते हैं कि युवा वर्ग सूचना अधिकार अधिनियम का उचित उपयोग करके अपने समाज और देश को स्वस्थ् बनाने का प्रयास करेगा न कि चुपचाप इस प्रकार की नैतिक बुराइयों और भ्रष्टाचार का सहन करता रहेगा. युवा छात्रों के लिए आयोजित इस जन जागरूकता कार्यक्रम से सभी को कुछ नया करने की प्रेरणा मिलेगी, और वे अपने समाज को  शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ् बनाने का प्रयास करेंगे.

शोभा शुक्ल - सी.एन.एस.

धोखा न खाएं! तम्बाकू जानलेवा है!

[English] [फोटो] "अधिकांश तम्बाकू सेवन 18 वर्ष से पहले ही आरम्भ होता है। इसीलिए बच्चों एवं युवाओं को तम्बाकू जनित जानलेवा रोगों एवं व्याधियों के बारे में जानकारी देना अनिवार्य है जिससे कि वें ज़िन्दगी चुनें, तम्बाकू नहीं" कहा एसोसिएशन ऑफ सर्जन्स ऑफ इण्डिया के 2012 निर्वाचित राष्ट्रीय अध्यक्ष, प्रोफेसर डॉ0 रमा कान्त ने जो सेक्टर 19, इन्दिरा नगर स्थित दिल्ली पब्लिक स्कूल के छात्रों-शिक्षकों को बतौर मुख्य अतिथि सम्बोधित कर रहे थे।

प्रोफेसर डॉ0 रमा कान्त, छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के सर्जरी विभाग के भूतपूर्व विभागाध्यक्ष हैं। प्रो0 रमा कान्त भारत के पहले सर्जन हैं जिनको वर्ष 2005 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक का विशेष अंतर्राष्ट्रीय पुरूस्कार मिला है।

प्रो0 डॉ0 रमा कान्त जो वर्तमान में 'पाइल्स टू स्माइल्स' क्लीनिक के निदेशक हैं, उन्होंने कहा कि "बच्चों एवं युवाओं में तम्बाकू नियंत्रण करना व्यापक तम्बाकू नियंत्रण योजना का एक अहम भाग है।"

प्रो0 डॉ0 रमा कान्त ने कहा कि "भारत में तम्बाकू से हर वर्ष 10 लाख से अधिक लोग मृत्यु को प्राप्त होते हैं। बच्चों और युवाओं को तम्बाकू कम्पनियों के प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष भ्रामक प्रचार से दूर रहना चाहिए और उससे प्रभावित नहीं होना चाहिए। उनको तम्बाकू सेवन की असली तस्वीर जो जानलेवा बीमारियों से जुड़ी है उससे परिचित होना चाहिए जिससे कि वें ज़िन्दगी चुनें, तम्बाकू नहीं।"

प्रो0 डॉ0 रमा कान्त जिनको केन्द्रिय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय का अनुशंसा पुरूस्कार भी 1997 में मिल चुका है उन्होंने कहा कि "लगभग आधी तम्बाकू जनित मृत्यु 35-69 वर्ष के दौरान होती है। धूम्रपान से अधिकांश मरने वाले लोगों ने तम्बाकू सेवन युवावस्था में आरम्भ किया था। 30-40 साल के लोग जो तम्बाकू सेवन करते हैं, उनको हृदय रोग होने का पॉंच गुणा अधिक खतरा रहता है। तम्बाकू जनित हृदय रोग एवं कैंसर तम्बाकू व्यसनियों की मौत का सबसे बड़ा कारण है।"

प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने कहा कि "तम्बाकू व्यसनियों को नशा मुक्ति के लिये विशेषज्ञों से मदद लेनी चाहिए. शोध के अनुसार अक्सर तम्बाकू सेवन करने वाले लोग तम्बाकू-जनित रोगों, विकृतियों और मृत्यु से अनभिज्ञ होते हैं. जो तम्बाकू व्यसनी इन खतरों को संजीदगी से समझते हैं, उनकी नशा-मुक्त होने की सम्भावना अधिक होती है."

नागरिकों के स्वस्थ लखनऊ अभियान, इण्डियन सुसाइटी अगेंस्ट स्मोकिंग, अभिनव भारत फाउंडेशन एवं आशा परिवार ने संयुक्त रूप से इस कार्यक्रम को आयोजित किया था.
सी.एन.एस.

सूचना अधिकार अधिनियम के जरिये लागू करें तम्बाकू नियंत्रण

[English] [फोटो] सेक्टर-२५ इंदिरा नगर स्थित शेरवुड एकेडेमी में कार्यशाला का विषय था "सूचना अधिकार अधिनियम के जरिये लागू करें तम्बाकू नियंत्रण." मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता डॉ संदीप पाण्डेय कार्यक्रम में मुख्य अथिति थे जिन्होंने छात्रों एवं शिक्षकों को सूचना अधिकार अधिनियम, २००५ से भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को सशक्त करने पर बात की. उन्होंने छात्रों को सूचना अधिकार अधिनियम के अंतर्गत आवेदन पत्र लिखना सिखाया और उनसे अनुरोध किया कि वें न तो कभी घूस लें, न कभी दें.

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि वो अपने स्कूल का प्रोजेक्ट करते समय सूचना अधिकार के अंतर्गत आवेदन पत्र लिख कर सूचना पा सकते हैं. डॉ संदीप पाण्डेय ने भ्रष्टाचार विरोधी जन अभियान में सूचना अधिकार अधिनियम पर भी अपने विचार रखे. डॉ संदीप पाण्डेय ने बताया कि "आवेदन पत्र जिस विभाग से आप जानकारी मांग रहे हैं, उसके जन-सूचना अधिकारी को संबोधित किया जाता है. सूचना अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी मांगते हुए आवेदन पत्र में यह बात स्पष्ट लिखे कि जानकारी सूचना अधिकार अधिनियम, २००५, के अंतर्गत मांगी जा रही है. १० रूपए का नोट या 'मनी-आर्डर' संग्लग्न करें और नोट का नंबर भी आवेदन पत्र में लिख दें. इस आवेदन पत्र को पंजीकृत डाक द्वारा भी भेजा जा सकता है."

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि "यह जाहिर बात है कि अधिकांश भ्रष्टाचार पढ़े-लिखे लोग ही करते हैं. इसीलिए यह और भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि छात्र भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में सक्रीय हों और भविष्य में भी न तो कभी घूस लें और न ही दें."

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अंतरराष्ट्रीय पुरुस्कार २००८ प्राप्त बाबी रमाकांत ने कहा कि "तम्बाकू घातक है. चूँकि अधिकांश तम्बाकू नशा १८ साल से पहले ही आरंभ होता है, यह बहुत जरुरी है कि युवा छात्र तम्बाकू के असली घातक चेहरे से परिचित हों, तम्बाकू जनित जानलेवा रोगों को जान लें जिससे कि वें विवेकपूर्ण निर्णय ले सके और स्वस्थ जीवन चुने, न कि तम्बाकू."

बाबी रमाकांत ने कहा कि "सूचना अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन पत्र लिख कर यह पूछना चाहिए कि सिगरेट एवं अन्य तम्बाकू उत्पाद अधिनियम २००३ को क्यों लागू नहीं किया गया है? क्यों शक्षिक संस्थानों के १०० यार्ड के अन्दर तम्बाकू विक्रय दुकानें हैं? क्यों सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान हो रहा है? क्यों फिल्मों में तम्बाकू सेवन को प्रदर्शित किया जा रहा है? यदि आप देखें कि किसी तम्बाकू उत्पाद पर ४०% चित्रमय चेतावनी नहीं लगी है तो इसकि रपट करनी भी जरुरी है."

डी-ब्लाक इंदिरा नगर के युवा निवासी राहुल कुमार द्विवेदी ने स्वास्थ्य विभाग के सूचना अधिकारी के नाम सूचना अधिकार अधिनियम २००५ के तहत पंजीकृत डाक से आवेदन पात्र भेजा है. राहुल जानना चाहते हैं कि लखनऊ में और समत उत्तर प्रदेश में सिगरेट एवं अन्य तम्बाकू उत्पाद अधिनियम २००३ के उलंघन में क्यों शक्षिक संस्थानों के १०० यार्ड के भीतर तम्बाकू विक्रय केंद्र हैं, कौन इनको हटाने के लिए जिम्मेदार है, उसके विरोध में क्या करवाई की गयी है, और कबतक सभी शैक्षिक संस्थानों के १०० यार्ड के भीतर तम्बाकू दुकानें हटा दी जाएँगी?
सी.एन.एस.

विश्व अस्थमा या दमा दिवस: अस्थमा या दमा नियंत्रण ज्यादातर देशों में असफल

विश्व अस्थमा या दमा दिवस: ३ मई २०११
दमा नियंत्रण ज्यादातर देशों में असफल है। विश्व के लगभग ३० करोड़ लोग अस्थमा या दमा की समस्या से ग्रसित हैं! अस्थमा या दमा की बीमारी व्यक्तिगत, पारिवारिक, तथा सामुदायिक तीनो स्तरों पर लोगों को प्रभावित करती है।

विश्व स्तर पर अस्थमा या दमा की समस्या पर प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक तमाम बाधाओं और चुनौतियों के बावजूद, अस्थमा या दमा नियंत्रण के विभिन्न कार्यक्रम तेज़ी से फ़ैल रहें हैं।

अस्थमा या दमा को यदि काबू में रखा जाए, और चंद बातों पर विशेष ध्यान दिया जाए, तो नि: संदेह इसका नियंत्रण सम्भव है।

अपर्याप्त और अध-कचरे अस्थमा या दमा नियंत्रण कार्यक्रमों की वजह से लोगों की जीवन शैली भी कुंठित होती दिखाई देती है।

उदाहरण के लिए विश्व में कई छेत्रों में हर चार में से एक अस्थमा या दमा से ग्रसित बच्चा स्कूल नही जा पाता है।

इस बार के विश्व अस्थमा या दमा दिवस का विषय है "आप अस्थमा या दमा पर नियंत्रण पा सकते हैं"।

इस विचार द्वारा यह बात साफ तौर पर जाहिर होती है कि अस्थमा या दमा की सही जांच, इलाज, और नियंत्रण की विधियाँ मौजूद हैं, परन्तु आवश्यकता है जागरूकता जिससे कि प्रभावकारी अस्थमा या दमा नियंत्रण के कार्यक्रम सफल हो सके।

अस्थमा नियंत्रण और प्रबंधन की विश्व स्तर पर निति २००७ के मुताबिक अस्थमा या दमा नियंत्रण का मतलब है कि:

- अस्थमा या दमा का कोई लक्षण न हो और व्यक्ति को अस्थमा या दमा के कारण रात में न टहलना पड़े

- अस्थमा राहत दवा या 'इन्हैलर' का उपयोग न करना पड़े (या न्यूनतम आवश्यकता हो)

- व्यक्ति सामान्य शारीरिक काम कर सकता हो।

- व्यक्ति को अस्थमा या दमा के दौरे बिल्कुल न पड़े या बहुत ही कम पड़े

कुछ लोग जो की अस्थमा से ग्रसित हैं उन लोगों ने कभी भी पर्याप्त अस्थमा की जांच नही करवाई है, इस वजह से उनमें अस्थमा के उपचार और उचित नियंत्रण होने की सम्भावना कम हो जाती है। अस्थमा या दमा के पर्याप्त और सही समय पर जांच न हो पाने की कई सारी वजह हैं। जैसे कि मरीजों में इसके बारे में पर्याप्त जानकारी न होना, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं द्वारा सही समय पर इसकी पहचान न कर पाना और चिकित्सा व्यवस्था तक लोगों की व्यापक पहुँच न हो पाना इत्यादि।

विश्व के कई सारे देशों जैसे कि मध्य पूर्वी एशिया (गल्फ देशों में), मध्य अमरीका, दक्षिण एशिया, उत्तर पश्चिम और पूर्वी अफ्रीका इत्यादि में दमा के लिए आवश्यक दवाओं की उपलब्धता न होने के कारण स्थिति और भी अधिक गंभीर बन जाती है।

विश्व के कई देशों में जो लोग अस्थमा या दमा से ग्रसित है, उनमें वातावरण में व्याप्त प्रदुषण के कारण अस्थमा या दमा अधिक बिगड़ सकता है।

यदि हम अस्थमा नियंत्रण को प्रभावी बनाना चाहतें हैं तो हम सभी को इसकी प्रभावकारी नियंत्रण के लिए व्यापक नीतियाँ बनानी होगी और उस पर अमल भी करना होगा।
सी.एन.एस.

लखनऊ में भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल बिल मसौदे पर खुली चर्चा

[English] अप्रैल २०११ के आरंभ में अन्ना हजारे के नेत्रित्व में भ्रष्टाचार विरोधी ऐतिहासिक क्रांति की लहर दौड़ी थी. जबसे भारत सरकार ने लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने की समिति में भ्रष्टाचार विरोधी जन-अभियान के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया है, तब से इन लोगों के प्रति आरोपों का हमला शुरू हो गया है. अरविन्द केजरीवाल और स्वामी अग्निवेश, जो लोकपाल बिल के मसौदे को तैयार करने वाली समिति के सदस्य हैं, वें उत्तर प्रदेश में लोगों से लोकपाल बिल से सम्बंधित सुझाव लेने आये. 

 १ मई २०११ को भ्रष्टाचार विरोधी जन-अभियान लखनऊ के संत फ्रांसिस कॉलेज में पहुंचा. युवा कार्यकर्ता एवं मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि "कई लोगों को लगता था कि यह भ्रष्टाचार विरोधी अभियान चार दिन की चांदनी है जो मीडिया की वजह से प्रचलित हुआ है - और दिल्ली में कुछ मीडिया ने यह कहा कि इस आन्दोलन की जड़ें गहरी नहीं है. पर जब हम लोग उत्तर प्रदेश में आये तो लोग गाँव-गाँव से भरी मात्रा में निकल कर आये हैं. ऐसा लगता है कि जनता के अन्दर जो रोष था वो इस कार्यक्रम के जरिये उमड़ पड़ा है. जिस तरह से लोग उमड़ कर आये हैं लगता है कि कोई प्राकृतिक शक्ति है जो इस सामाजिक बदलाव को समर्थन दे रही है. जिस तरह से मीडिया ने इस मुद्दे को उठाया, जिस तरह से हमारी टीम को तोड़ने की कोशिश की गयी, जिस तरह से कुछ मीडिया में गलत समाचार 'प्लांट' किये गए, मुझे लगता है कि कोई प्राकृतिक शक्ति है जो हमें सही रास्ते की ओर ले जा रही है और जिस तरह से जन समर्थन उमड़ रहा है कुछ सकारात्मक नतीजा जरूर निकलना चाहिए. हमारे पास सिर्फ हमारी सच्चाई और ईमानदारी है." 

अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि "लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने के लिए जिस समिति का गठन हुआ है हम नहीं चाहते कि बंद कमरे में इसको तैयार किया जाए. हम लोगों ने तो यह प्रस्तावित किया था कि इसकी विडियो रेकॉर्डिंग होनी चाहिए जिससे कि जनता को यह पता चले कि अन्दर क्या बातें हो रही हैं. हम लोग शहर-शहर जा कर जनता से पूछ रहे हैं कि आपके इसके बारे में क्या विचार हैं. www.indiaagainstcorruption.org वेबसाइट के जरिये भी लोग हमको सुझाव दे सकते हैं और जितने भी सुझाव हमारे पास आयेंगे हम लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने वाली समिति की बैठक में ले के जायेंगे."

अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि भ्रष्टाचार पर प्रभावकारी ढंग से अंकुश लगाने के लिये लोकपाल बिल आवश्यक है। लोकपाल बिल जो शिकायत पर संवैधानिक रूप से समय-अवधि के अन्दर ही सजा दिलाने की वादा करता है - उसको पारित होने के लिये अरविन्द केजरीवाल ने जन आन्दोलन को सशक्त करने की मांग की। बिना लोकपाल बिल जैसी नीतियों के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना मुश्किल है - और - भ्रष्ट अधिकारियों एवं जन-प्रतिनिधियों को सजा दिलवाना भी बहुत जटिल कार्य है।

आखिर भ्रष्टाचार को कैसे रोका जाए? केजरीवाल ने संगीन प्रश्न खड़े किये कि जो संस्थाएं भ्रष्टाचार को रोकने के लिये हैं, उदाहरण के तौर पर जैसे कि सेंट्रल विजिलेंस कमिटी (सी०वि०सि०) सिर्फ सरकार को सलाह दे सकती है, और कोई भी कारवाई नहीं कर सकती। केजरीवाल ने भूतपूर्व सी0वि0सि० से साक्षात्कार के बारे में बताया कि पिछले ५ सालों में उस सी०वि०सि० ने जिन सरकारी अधिकारियों को निलंबित से ले के जेल तक भेजने की 'सलाह' दी उन सबको सरकार ने सिर्फ 'चेतावनी' दे कर छोड़ दिया है। इसी तरह सी०बी०आई० भी कोई जांच तब तक नहीं कर सकती है जब तक सरकार की सहमती न प्राप्त हो।

यदि मजबूत लोकपाल बिल संसद से पारित हो गया तो इस कानून के अंतर्गत, केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त का गठन होगा. प्रस्तावित है कि यह संस्था निर्वाचन आयोग और सुप्रीम कोर्ट की तरह सरकार से स्वतंत्र होगी. कोई भी नेता या सरकारी अधिकारी जांच की प्रक्रिया को प्रभावित नहीं कर पायेगा.

अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि इस बिल की मांग है कि भ्रष्टाचारियो  के खिलाफ किसी भी मामले की जांच एक साल के भीतर पूरी की जाये. परीक्षण एक साल के अन्दर पूरा होगा और दो साल के अन्दर ही भ्रष्ट नेता व आधिकारियो को सजा सुनाई जायेगी . इसी के साथ ही भ्रष्टाचारियो का अपराध सिद्ध होते ही उनसे सरकर को हुए घाटे की वसूली भी की जाये. यह बिल एक आम नागरिक के लिए मददगार जरूर साबित होगा, क्यूंकि यदि किसी नागरिक का काम तय समय में नहीं होता तो लोकपाल बिल दोषी अफसर पर जुरमाना लगाएगा और वह जुरमाना शिकायत कर्ता को मुआवजे के रूप में मिलेगा. इसी के साथ अगर आपका राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, पासपोर्ट आदि तय समय के भीतर नहीं बनता है या पुलिस आपकी शिकायत दर्ज नहीं करती है तो आप इसकी शिकायत लोकपाल से कर सकेंगे. आप किसी भी तरह के भ्रष्टाचार की शिकायत लोकपाल से कर सकते है जैसे कि सरकारी राशन में काला बाजारी, सड़क बनाने में गुणवत्ता की अनदेखी,  या फिर पंचायत निधि का  दुरूपयोग.

अभी लोकपाल बिल का मसौदा तैयार होने की प्रक्रिया चल रही है - उसके पश्चात् इस मसौदे को संसद से बिना-कमजोर कराये पारित करना भी एक चुनौती होगी. 


बाबी रमाकांत - सी.एन.एस.

२/३ मृत्यु का कारण है गैर-संक्रामक रोग: तम्बाकू नियंत्रण आपात प्राथमिकता है

[English] [फोटो] ६३ प्रतिशत लोगों में मृत्यु का कारण है गैर-संक्रामक रोग, जैसे कि हृदय रोग, कैंसर, श्वास सम्बन्धी रोग, डाईबीटीस, आदि - यह बताया विश्व स्वास्थ्य संगठन के अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार विजेता प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने जो मल्हौर, चिनहट, स्थित अरविन्द अकादेमी में मुख्य अथिति के रूप में छात्रों एंड शिक्षकों को संबोधित कर रहे थे.

छ०श०म० चिकित्सा विश्वविद्यालय के भूतपूर्व मुख्य चिकित्सा अधीक्षक एवं सर्जरी के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने बताया कि "लांसेट में प्रकाशित अप्रैल २०११ की शोध के अनुसार, गैर-संक्रामक रोगों से बचने के लिये तम्बाकू नियंत्रण सबसे बड़ी आपात प्राथमिकता है. लांसेट ने विश्व को तम्बाकू मुक्त बनाने के लिये २०४० का लक्ष्य रखा है. यह लक्ष तबतक पूरा नहीं किया जा सकता जब तक बच्चे और युवा तम्बाकू सेवन आरंभ करना ही बंद कर दें क्योंकि ८० प्रतिशत से अधिक तम्बाकू सेवन १८ साल से पहले ही आरंभ होता है. ज़िन्दगी चुने, तम्बाकू नहीं!"

अरविन्द एकेडमी की संस्थापिका-निदेशिका श्रीमती प्रमिला अग्रवाल एवं प्रधानाचार्या डॉ0 वीना शर्मा भी कार्यक्रम में उपस्थित थे। अरविन्द एकेडमी के छात्रों ने नाटक-मंचन द्वारा स्पष्ट संदेश दिया कि तम्बाकू जानलेवा है और यदि तम्बाकू नशा करने वाले लोग समय रहते नशा मुक्त हो जाए तो स्वास्थ्य पर तम्बाकू जनित जानलेवा रोग होने का खतरा कम हो जाता है।

अखिल भारतीय सर्जनों के संघ के अध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने कहा कि "विश्व स्वास्थ्य संगठन की नयी रपट (२७ अप्रैल २०११) के अनुसार, यह स्पष्ट है कि मृत्यु का सबसे बड़े कारण हैं गैर-संक्रामक रोग जिनमें हृदय रोग, कैंसर, श्वास सम्बन्धी रोग, डाईबीटीस आदि प्रमुख हैं. कुछ समान जीवनशैली से जुड़े कारण हैं जिनकी वजह से इन गैर संक्रामक रोगों का खतरा बढ़ता है जैसे कि तम्बाकू का सेवन, शारीरिक व्यायाम या क्रियाओं का अभाव, नुकसानदायक शराब सेवन, भोजन जिसमें संतृप्त या 'ट्रांस' चर्बी, नमक, चीनी (खासतौर पर मीठे पेय) आदि का सेवन, इतियादि."

"पाइल्स (बवासीर) से स्माइल्स तक" पुस्तक के लेखक प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने बताया कि "गैर संक्रामक रोगों से होने वाली ८० प्रतिशत मृत्यु से बचाव मुमकिन है यदि तम्बाकू सेवन त्यागा जाए, शराब नशाबंदी हो, पर्याप्त व्यायाम या शारीरिक क्रियाएं रोजाना जीवन का हिस्सा बने, और भोजन में संतृप्त या 'ट्रांस' चर्बी, नमक, चीनी आदि से परहेज किया जाए."

प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने बताया कि "धूम्रपान से तो गर्भवती महिलाओं और गर्भस्थ शिशु को नुकसान पहुँचता ही है, धुआं-रहित तम्बाकू से भी गर्भावस्था में कु-प्रभाव पड़ता है - जैसे कि प्रे-क्लैम्पसिया (उच्च रक्त चाप, सूजन आदि), समय से पहले ही बच्चे का जन्म, और जन्म से समय बच्चे का वजन कम होना आदि शामिल हैं."

प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने बताया कि "जो बच्चे और युवा धुआं-रहित तम्बाकू का सेवन करते हैं उनकी धूम्रपान करने की सम्भावना अधिक होती है. तम्बाकू कर रूप में घातक है, इससे दूर रहे और जो लोग इसका इस्तेमाल कर रहे हैं वो इसको बिना विलम्ब त्यागें जिससे कि स्वास्थ्य पर तम्बाकू जनित  कुप्रभावों का असर कम-से-कम हो सके."

राहुल कुमार द्विवेदी और रितेश आर्य ने कार्यक्रम का समन्वयन किया. इसको नागरिकों का स्वस्थ् लखनऊ अभियान, इंडियन सोसाइटी अगेंस्ट स्मोकिंग, अभिनव भारत फाउनडेशन, और आशा परिवार द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था.
सी.एन.एस.

चर्नोबिल दिवस: भारत अपना परमाणु कार्यक्रम बंद करे और खुली जांच करे

चर्नोबिल दिवस: २६ अप्रैल
[English] [फोटो] आज २६ अप्रैल २०११ को चर्नोबिल परमाणु दुर्घटना हुए २५ साल हो गए हैं. चर्नोबिल दिवस के उपलक्ष्य में आज, जहांगीराबाद मीडिया इंस्टीटयूट, जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, आशा परिवार और नागरिकों का स्वस्थ लखनऊ अभियान ने वृत्तचित्र प्रदर्शनी एवं परिचर्चा आयोजित की.

शांति एवं विकास के लिये भारतीय चिकित्सक संघ के अध्यक्ष और विश्व स्वास्थ्य संगठन के अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार विजेता प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त और मग्सेसे पुरुस्कार विजेता डॉ संदीप पाण्डेय इस परिचर्चा के मुख्य वक्ता थे.

अखिल भारतीय सर्जनों के संघ के नव-निर्वाचित अध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने कहा कि "परमाणु रेडियोधर्मिता से कैंसर, विशेषकर खून का कैंसर, आनुवांशिक परिवर्तन, आदि हो जाता है. क्या हमारी चिकित्सकीय व्यवस्था परमाणु आपात स्थिति से निबटने के लिये तैयार है?".

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि "जापान में हुई परमाणु आपात स्थिति के बाद तो इस बात पर किसी संदेह का प्रश्न ही नहीं उठता है कि दुनिया में सभी परमाणु कार्यक्रमों को, चाहे वो सैन्य या उर्जा के लिये हों, उनको जितनी जल्दी संभव हो उतनी जल्दी बंद करना होगा."

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि "पर्यावरण के लिए लाभकारी तरीकों से उर्जा बनाने के बजाय भारत परमाणु जैसे अत्यंत खतरनाक और नुकसानदायक ऊर्जा उत्पन्न करने के तरीकों को अपना रहा है. विकसित देशों में परमाणु ऊर्जा एक असफल प्रयास रहा है. विश्व में अभी तक परमाणु कचरे को नष्ट करने का सुरक्षित विकल्प नही मिल पाया है, और यह एक बड़ा कारण है कि विकसित देशों में परमाणु ऊर्जा के प्रोजेक्ट ठंडे पड़े हुए हैं. भारत सरकार क्यों भारत-अमरीका परमाणु समझौते को इतनी अति-विशिष्ठ प्राथमिकता दे रही है और इरान-पाकिस्तान-भारत तक की गैस पाइपलाइन को नकार रही है, यह समझ के बाहर है."

डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि "किसी भी देश क लिए ऊर्जा सुरक्षा के मायने यह हैं कि वर्तमान और भविष्य की ऊर्जा आवश्यकता की पूर्ति इस तरीके से हो कि सभी लोग ऊर्जा से लाभान्वित हो सकें, पर्यावरण पर कोई कु-प्रभाव न पड़े, और यह तरीका स्थायी हो, न कि लघुकालीन. इस तरह की ऊर्जा नीति अनेकों वैकल्पिक ऊर्जा का मिश्रण हो सकती है जैसे कि, सूर्य ऊर्जा, पवन ऊर्जा, छोटे पानी के बाँध आदि, गोबर गैस इत्यादि."
परमाणु दुर्घटनाओं की त्रासदी संभवत: कई पीढ़ियों को झेलनी पड़ती है जैसे कि भोपाल गैस काण्ड और हिरोशिमा नागासाकी त्रसिदियों को लोगों ने इतने बरस तक झेला. हमारी मांग है कि भारत बिना-देरी शांति के प्रति सच्ची आस्था का परिचय दे और सभी परमाणु कार्यक्रमों को बंद करे.

बाबी रमाकांत - सी.एन.एस.

मलेरिया से निबटने के लिए अधिक संसाधन और राजनीतिक समर्थन जरुरी

विश्व मलेरिया दिवस (२५ अप्रैल)
[English] लखनऊ के प्रख्यात सर्जन एवं विश्व स्वास्थय संगठन के अंतर्राष्ट्रीय पुरुस्कार प्राप्त प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने बताया कि मलेरिया एक ऐसा रोग है जिससे बचाव मुमकिन है और उपचार भी, परन्तु ठोस राजनीतिक समर्थन के और संसाधनों के अभाव में मलेरिया रोकधाम कार्यक्रम सफल नही रहे हैं.

प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त, जो छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय के भूतपूर्व मुख्य चिकित्सा अधीक्षक और सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष रहे हैं, उन्होंने बताया कि दक्षिण पूर्वी एशिया में मलेरिया का दर एक जबरदस्त चुनौती दे रहा है जहाँ ८३ प्रतिशत जनसंख्या को मलेरिया रोग होने का खतरा रहता है. लगभग २ करोड़ लोगों को प्रति वर्ष मलेरिया रोग होता है और इनमे से १००,००० लोग मलेरिया के कारणवश मृत्यु के शिकार हो जाते हैं.

सी-ब्लाक चौराहे पर स्थित पिल्स (बवासीर) टू स्माइल्स क्लिनिक के महानिदेशक प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने बताया कि आज हमारे पास मलेरिया की रोकधाम के लिए प्रभावकारी नए तरीके हैं और कार्यक्रम भी. परन्तु आर्थिक अभाव के कारणवश और पर्याप्त राजनीतिक समर्थन न होने के कारण मलेरिया कार्यक्रम प्रभावकारी ढंग से लागु नही किए जा रहे हैं. आवश्यकता है कि आर्थिक संसाधनों को मलेरिया कार्यक्रमों में निवेश के लिए एकजुट किया जाए और राजनीतिक समर्थन भी इन कार्यक्रमों को प्रदान किया जाए. ढीले-ढाले रवैये से मलेरिया कार्यक्रम लाभकारी नही सिद्ध होंगे.

प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने बताया कि जिन लोगों को मलेरिया का विशेष खतरा रहता है उनमें शामिल हैं: शहरों के स्लम में रहने वाले लोग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग, जन-जाति, जो लोग काम के लिए एक जगह से दूसरी जगह पलायन करते हैं, कम आयु के लोग और जो लोग बॉर्डर पर रहते हैं.

प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने कहा कि दक्षिण-पूर्वी एशिया में अनेकों बार मलेरिया महामारी की तरह फैला है, जो जन-स्वास्थ्य को एक भायावाही चुनौती प्रस्तुत करता रहा है. इसमें से एक बड़ी मात्र में ऐसा मलेरिया है जो जंगल में रहने वाले मच्छरों से फैलता है और संक्रमित लोग जन-स्वास्थ्य कार्यक्रमों के लाभ से अक्सर वंचित रह जाते हैं.

दक्षिण-पूर्वी एशिया के सारे देशों में, सिवाय माल्दीव्स के, मलेरिया महामारी के रूप में फैला हुआ है और मलेरिया की रोकधाम अत्याधिक मुश्किल होती जा रही है.

प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने कहा कि इस छेत्र में ऐसे दो प्रकार के प्रमुख मलेरिया पाये जाते हैं - घातक मलेरिया प्लास्मोदियम फल्सिपरुम और ऐसा मलेरिया जिससे दुबारा मलेरिया होने का खतरा रहता है: प्लास्मोदियम विवक्स. इनसे न केवल स्वास्थ्य को नुकसान होता है बल्कि मलेरिया से लोगों के रोज़गार पर प्रभाव पड़ता है और आर्थिक रूप से भी लोग इस रोग का कु-प्रभाव झेलते हैं.

प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने कहा कि ऐसा मलेरिया जब मलेरिया की दवा - क्लोरो-कुयिन - उसपर असरदायक नही रहती, उसे मलेरिया दवा-प्रतिरोधकता कहते हैं, और यह पूरे दक्षिण पूर्वी एशिया में फ़ैल चुका है. क्लोरो-कुयिन सबसे प्रचलित और सस्ती मलेरिया की दवा है.

प्रोफेसर (डॉ) रमा कान्त ने कहा कि दवा प्रतिरोधक मलेरिया से खतरा कई गुणा बढ़ता जा रहा है. जरुरत है कि हर सम्भव प्रयास किया जाए जिससे मलेरिया रोकधाम के कार्यक्रम अधिक-से-अधिक प्रभावकारी बन सके.
सी.एन.एस