एक सुखद परिवर्तन

एक सुखद परिवर्तन

डॉ नूतन ठाकुर

जैसा की हम सभी जानते हैं कि कुलदीप नायर, जस्टिस राजिंदर सचार, सुरेन्द्र मोहन, मेधा पाटकर, अरुणा रॉय, योगेन्द्र यादव, संदीप पांडे जैसे विवेकशील व्यक्तियों ने स्वयं को राजनीति से अलग ही रखा है। हालांकि उनके क्रिया कलापों एवं विचारों ने , न केवल जन मानस को आंदोलित किया है, वरन राजनीति के क्षेत्र में भी हलचल उत्पन्न की है।


परन्तु फिर भी, कतिपय कारणों से, ये व्यक्ति राजनीति से दूर ही रहे हैं, तथा अपने अपने कार्य क्षेत्रों को समाज सेवी कार्य कलापों तक ही सीमित रखा हैं। परन्तु, समय के साथ कदाचित उनकी सोच में बदलाव आया है, और वो यह समझने लगे हैं कि अपने प्रभावकारी कार्यों को समाज के कोने कोने तक पहुंचाने के लिए, राजनैतिक प्रक्रिया में प्रत्यक्ष एवं क्रियात्मक भाग लेना आवश्यक है। जिस प्रकार माओ की दुनिया में अधिकार/ शक्ति प्रदर्शन बन्दूक की नली के द्बारा होता था, उसी प्रकार प्रजातंत्र में यह राजनैतिक प्रक्रियाओं द्बारा ही सम्भव है। अधिकार एवं शक्ति की आवश्यकता दो कारणों से होती है ----१) समाज एवं जनता की भलाई के लिए उचित तरीकों से कार्य करने हेतु, और २) उन सत्ता लोलुप एवं भ्रष्टाचारी जीवों को सत्ता के गलियारों तक पहुँचने से रोकने के लिए, जो अपने अधिकारों का प्रयोग केवल अपने स्वार्थ के लिए करते हैं।


दृष्टिकोण में यह बदलाव वास्तव में सुखद है। ऐसे बुद्धिजीवियों में एक नयी समझ के उदय का प्रत्यक्ष प्रभाव हमारे देश की ढहती हुई राजनैतिक व्यवस्था पर अवश्य पड़ेगा। परन्तु इन सभी को (अपने मित्रों और अनुयायिओं समेत) यह समझना होगा कि यह एक दिवसीय प्रक्रिया नही है। बदलाव आने में काफी वक्त लग सकता है, और इसके लिए निरंतर एवं गहन रूप से कार्य करना होगा। केवल इच्छा भर करने से काम नही चलेगा। राजनीति का सीधा सम्बन्ध जन मानस के दिल और दिमाग से है। जन साधारण को जो जाँत पाँत और धर्म के नाम पर अलगाववाद की अफीम लगातार खिलायी जा रही है, आम आदमी को उससे विमुख करना सरल न होगा। केवल तथ्य उजागर करने वाली रिपोर्टें लिखने या मोमबत्तियां जलाने भर से कुछ नही होगा। समस्या बहुत जटिल है, क्योंकि मानव मन सबसे अधिक जटिल है।


परन्तु फिर भी, यह प्रसन्नता का विषय है कि जब इतने सारे बुद्धिजीवियों ने एक साथ मिल कर ‘लोक राजनीति मंच’ बनाया है, तो देर सबेर इसका प्रत्यक्ष प्रभाव अवश्य पड़ेगा। ये सभी व्यक्ति मानव उत्थान और सामाजिक उन्नति के उद्देश्य के प्रति निष्ठावान हैं, तथा उस क्षेत्र में प्रेरणा के माध्यम हो सकते हैं जहाँ इस प्रकार के सुलझे हुए विचारों वाले व्यक्तियों की आवशकता है।


ज़रूरत इस बात की है कि इन लोगों की रूचि और प्रतिबद्धता कहीं चुनावों के बाद ख़त्म न हो जाए। ऐसा दो कारणों से हो सकता है ---- १) मंच के प्रत्याशियों को अपेक्षानुसार वोट न मिल पायें। इस स्थिति की काफी संभावना है। अपनी आंखों पर जाति/धर्म का चश्मा चढ़ाए हुए भारतीय मतदाता, चुनावी प्रत्याशियों के भ्रामक एवं तड़क भड़क वाले (धन और शारीरिक शक्ति) प्रदर्शनों के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं, कि उन्हें लोक राजनीति मंच के सीधे साधे प्रत्याशी प्रभावित नही कर पायेंगे। इस विज्ञापनी युग में, संचार माध्यम एवं राजनेता, दोनों ने मिलकर प्रत्याशी को एक बिकाऊ वस्तु का रूप दे दिया है। प्रत्याशी का मूल्यांकन करने के मापदंड बदल चुके हैं। प्रत्याशी के मानवीय मूल्यों का विश्लेषण करने के बजाय , उसे फिल्मी अंदाज़ में धर्म, जाति और मिथ्या भावो की स्वर शैली में, दिखावे का तड़का लगा कर पेश किया जाता है। कोई भी यह जानने को उत्सुक नही दिखाई पड़ता कि प्रत्याशी के इरादे नेक हैं या नहीं और उसका घोषणा पात्र क्या कहता है. यह तो निश्चित है कि इस स्थिति में बदलाव आएगा , पर इसमें समय अवश्य लगेगा। बरगद का पेड़ एक या दो दिन में नहीं उगता।


) इन मानवीय सुधार के प्रयासों में लगे हुए मार्गदर्शक, अपने अपने उद्दमी कार्य क्षेत्रों में बहुत व्यस्त हैं। अत: इस बात की भी संभावना है कि, कुछ समय बाद, यह राजनैतिक सुधार का उद्देश्य उनकी प्राथमिकता न रहे और पिछड़ जाए, जब तक की अगला चुनाव सर पर न आ जाए। यह स्थिति वास्तव में अत्यन्त घातक होगी।


(यह लेख मौलिक रूप से डॉ नूतन ठाकुर द्वारा अंग्रेज़ी में लिखा गया है जिसको यहाँ पर क्लिक करने से पढ़ा जा सकता है। इसका अनुवाद सुश्री शोभा शुक्ला ने किया है जिसके हम कृतज्ञ हैं)