किशोरियों में माहवारी संबन्धित स्वच्छता व् प्रबन्धन

विश्वपति वर्मा , सिटीज़न न्यूज़ सर्विस - सीएनएस
उत्तर प्रदेश में माहवारी संबन्धित समस्याओं से किशोरियों को निजात दिलाने के लिये चलाई जा रही तमाम प्रकार की योजनाएँ सिर्फ कागजों तक सीमित होती दिखाई दे रही हैं। शासन द्वारा सरकारी एवं परिषदीय विद्यालयों में पढ़ने वाली किशोरियों को माहवारी के विषय से जुडी गलत धारणाओं व मिथकों को दूर करने एवं उन्हें व्यक्तिगत स्वच्छता के प्रति जागरूक किये जाने के उद्देश्य से चलाई जा रही किशोरी सुरक्षा योजना के सम्बन्ध में जब खंड शिक्षाधिकारी सल्टौआ अखिलेश सिंह से बातचीत हुई तो उन्होंने बताया कि इस तरह की योजनायें शिक्षा विभाग के सहयोग से चलायी जा रही हैं।

किशोरी सुरक्षा योजना

सुभाषिनी  चौरसिया, सिटीजन न्यूज सर्विस - सीएनएस
किशोरावस्था बाल्यावस्था और प्रौढ़ावस्था के बीच की अवस्था है| इस अवस्था के दौरान किशोरों और किशोरियों (10-19) में बहुत से शारीरिक और मानसिक बदलाव होते हैं| जिसके बाद वे प्रौढ़ावस्था में प्रवेश करते हैं| खासकर किशोरियों में इस अवस्था के दौरान मासिक धर्म की शुरुआत हो जाती है| लेकिन समाज में इस विषय से जुड़ी गलत अवधारणाओं और मिथकों के कारण किशोरियों को इस विषय में सही जानकारी नहीं दी जाती है| जिससे उन्हें बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है और कभी-कभी तो किशोरियां गलत साधनों से इस विषय में जानकारी प्राप्त कर लेती हैं जो उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है और उनमें प्रजनन सम्बन्धी बीमारियाँ एवं संक्रमण हो सकता है |

किशोरी सुरक्षा योजना ‎के उचित अनुपालन से आएगा बदलाव

बृहस्पति कुमार पाण्डेय, सिटीज़न न्यूज़ सर्विस - सीएनएस
प्रदेश में 10-19 वर्ष की किशोरियों की संख्या कुल जनंसख्या का लगभग 11 प्रतिशत है, ‎‎एन.एफ.एच.एस.-3 के सर्वे के अनुसार इन ‎में 40 प्रतिशत स्कूल जाने वाली किशोरियां सातवीं ‎के बाद माहवारी की वजह से स्कूल जाना छोड़ देती हैं। इसका एक कारण ‎किशोरियों में अपनी ‎माहवारी को लेकर एक विशेष तरह की  भ्रान्ति या भय का होना भी है। ‎जो किशोरियां स्कूल जाती भी हैं वे माहवारी के दौरान एक ही कपड़े को बार-बार ‎‎धोकर अपने इस्तेमाल में लाती हैं जिसके चलते  उन्हें ‎स्वास्थ्य समस्याओं के साथ प्रजनन तंत्र के संक्रमण ‎से भी जूझना पड़ता है। ऐसे में इन किशोरियों के परिवार के सदस्यों व ‎अध्यापकों द्वारा इन्हें ‎सही मार्गदर्शन व देखभाल न मिलने से इनका स्वास्थ्य का स्तर दिनों दिन गिरता जाता ‎है।

मासिक धर्म के प्रति समाज का नजरिया

सुभाषिनी  चौरसिया, सिटीजन न्यूज सर्विस - सीएनएस
मासिक धर्म की प्रक्रिया हमारे भारतीय समाज का एक ऐसा संवेदनशील मुद्दा है जिसके साथ  बहुत सी गलत धारणाएं जुड़ी हुई हैं. मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को अशुद्ध माना जाता है.  उनका स्नान करना, मंदिर जाना और किसी भी धार्मिक कार्य में भाग लेना वर्जित हो जाता है. इन सब कारणों से मासिक धर्म के दिनों में उनकी साधारण दिनचर्या भी बाधित हो जाती है.  इसके चलते लडकियों की पढाई में भी विघ्न पड़ता है. कक्षा में उनकी उपस्थिति कम हो जाती है|

पानी के संकट के गहराने से बचने के लिए पेप्सी व कोका कोला के कारखाने बंद करो

पानी की निजीकरण बंद करो: पानी के संकट को लेकर त्राहि त्राहि मची हुई है। संकट सिर्फ महाराष्ट्र, जहां उच्च न्यायालय के फैसले से आई.पी.एल. क्रिकेट के खेल बाहर किए गए, या बंदेलखण्ड में ही नहीं बल्कि सभी जगह मुंह बाए खड़ा है। पेप्सी व कोका कोला के कारखाने बड़ी मात्रा में भू-गर्भ जल का अनियंत्रित दोहन करते हैं। एक लीटर शीतल पेय बनाने में नौ लीटर पानी खर्च होता है।

८५% चित्रमय चेतावनी और छोटे तम्बाकू पैक पर रोक दोनों जन-स्वास्थ्य के लिए लाभकारी कदम

यह जन स्वास्थ्य के लिए हितकारी कदम है कि भारत सरकार ने तम्बाकू उत्पादनों पर चित्रमय चेतावनी को ८५% लागू न करने की संसदीय समिति की सलाह को दरकिनार कर, १ अप्रैल २०१६ से हर तम्बाकू उत्पाद पर ८५% चेतावनी लागू करने का निर्णय लिया है. सिगरेट एवं अन्य तम्बाकू उत्पाद अधिनियम २००३ के सेक्शन ७ को लागू करने के लिए "ह्रदय-शान" की मार्गनिर्देशिका के अनुसार, हर तम्बाकू उत्पाद पर न केवल चित्रमय चेतावनी का आकार ८५% होगा बल्कि चित्रमय चेतावनी ३.५सेमी चौड़ाई और ४सेमी लम्बाई से छोटी भी नहीं हो सकती - जिसका तात्पर्य यह है कि तम्बाकू छोटे पैक में नहीं बिक सकेगी.

न्यायमूर्ति राजिन्दर सच्चर ने जारी की उ.प्र. विधान सभा चुनाव हेतु सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवारों की पहली सूची

उ.प्र. प्रेस क्लब, लखनऊ में एक प्रेस वार्ता में दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रह चुके न्यायमूर्ति राजिन्दर सच्चर ने उ.प्र. में 2017 में होने वाले विधान सभा चुनाव हेतु सोशलिस्ट पार्टी (इण्डिया) के सम्भावित उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की, जो इस प्रकार है:

सरकारी तनख्वाह लेने वाले व जन प्रतिनिधियों के बच्चों के लिए सरकारी विद्यालय में पढ़ना अनिवार्य हो

मेगसेसे पुरुस्कार से सम्मानित सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ संदीप पाण्डेय ने कहा कि 18 अगस्त, 2015 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2013 की रिट याचिका संख्या 57476 व अन्य के संदर्भ में न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल का आदेश आया जिसके तहत छह माह की अवधि में ऐसी व्यवस्था बनानी थी कि सभी सरकारी तनख्वाह पाने वाले लोगों व जन प्रतिनिधियों के बच्चों को सरकारी विद्यालयों में दाखिला लेना था।

सतत विकास लक्ष्य एवं मासिक धर्म स्वच्छता

विश्वपति वर्मा, सिटीजन न्यूज सर्विस - सीएनएस 
भारत को सतत विकास लक्ष्य 2030 पूरा करने के लिये आम जनता, विशेषकर महिलाओं, के प्रजनन स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है. इसकी एक महत्त्व पूर्ण कड़ी है मासिक धर्म स्वच्छता।  आज के परिवेश मे लड़कियों मे लगभग 12 वर्ष की आयु से माहवारी का सिलसिला शुरू  हो जाता है. माहवारी के दौरान सही जानकारी और उचित परामर्श ना मिलने से लड़कियों को अक्सर अनेक प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है.

कम उम्र में शादी जीवन की बरबादी

जितेंद्र कौशल सिंह, सिटिज़न न्यूज सर्विस - सीएनएस     
भारत में स्वास्थ्य सेवाओं में उत्तरोत्तर प्रगति हुई है। जहां आजादी से पूर्व जीवन रक्षक दवाओं का मिलना ‎मुश्किल रहता था वहीं आज ग्रामीण क्षेत्रों में भी ब्लाक स्तर पर अच्छे स्वास्थ्य केन्द्र व मुफ्त एम्बुलेंस सुविधा भी उपलब्ध है। देश की स्वास्थ्य सेवाओं में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुआ है। किन्तु महिला स्वास्थ्य सम्बन्धी कई आँकड़े अब भी चौंकाने वाले हैं.  जहां एक ओर हम आर्थिक उन्नति का दावा भरते हैं, वहीँ दूसरी ओर बाल-विवाह के मामले में शीर्ष 10 देशों में भारत भी शामिल है जोकि वैश्विक सतत विकास लक्ष्य को पूरा ‎करने में मूल बाधा नजर आती है।

७०वें नैटकान में टीबी और श्वास रोगों के नियंत्रण का आह्वान

सिटीजन न्यूज सर्विस - सीएनएस [English]
२१ फरवरी २०१६ को ७०वें टीबी और अन्य श्वास सम्बन्धी रोगों के राष्ट्रीय अधिवेशन का समापन दिवस था.
किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग, राष्ट्रीय टीबी संगठन, और उत्तर प्रदेश टीबी संगठन के संयुक्त तत्वाधान में लखनऊ में २०-२१ फरवरी २०१६ के दौरान आयोजित हो रहा है ७०वां टीबी और अन्य श्वास सम्बन्धी रोगों पर राष्ट्रीय अधिवेशन (नैटकान).

सरकार ने २०३० तक टीबी समाप्त करने का वादा किया है: ७०वें नैटकान ने अपील की कि टीबी दर में गिरावट अधिक हो जिससे कि २०३० का लक्ष्य पूरा हो सके

सिटीजन न्यूज सर्विस [English]
भारत सरकार एवं दुनिया की अन्य सरकारों ने संयुक्त राष्ट्र की महासभा में पिछले वर्ष सतत विकास लक्ष्य २०३० को पारित किया है, जिनका लक्ष्य ३.३ है २०३० तक टीबी समाप्त करना. टीबी और अन्य श्वास सम्बन्धी रोगों के विशेषज्ञों ने ७०वें टीबी और श्वास रोगों पर राष्ट्रीय अधिवेशन (नैटकान), जिसका उद्घाटन उत्तर प्रदेश के राज्यपाल श्री राम नाएक ने किया, यह अपील की कि टीबी दरों में गिरावट तेज़ी से आये जिससे कि २०३० के लक्ष्य समय से या समय से पूर्व ही पूरे हो सकें. किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग, राष्ट्रीय टीबी संगठन, और उत्तर प्रदेश टीबी टीबी के रोगियों की जांच जितनी शीघ्र हो सके उतनी जल्दी होनी चाहिए, समुदाय से जुड़ कर साथ में कार्यरत रहना चाहिए जिससे कि रोगी को अपना उपचार सफलतापूर्वक समाप्त करने में मदद मिले.

नैटकान से पूर्व ४ चिकित्सकीय कार्यशालाओं में १०० से अधिक विशेषज्ञों ने भाग लिया

सिटीजन न्यूज सर्विस, सीएनएस [English]
लखनऊ में होने वाले ७०वें टीबी और अन्य श्वास सम्बन्धी रोगों पर राष्ट्रीय अधिवेशन (नैटकान) से पूर्व, १०० से अधिक टीबी और अन्य श्वास सम्बन्धी विशेषज्ञों ने ४ चिकित्सकीय कार्यशालाओं में भाग लिया. यह ४ विशेष कार्यशालाएं इन मुद्दों पर केन्द्रित रहीं: टीबी (आधुनिक जांच, पुनरीक्षित राष्ट्रीय टीबी नियंत्रण कार्यक्रम, दवा प्रतिरोधक टीबी, नॉन-इनवेसिव वेंटिलेशन, स्लीप स्टडी, और पीऍफ़टी.

भारत में कैंसर दर (और मृत्युदर) १०% बढ़ा (२०११-२०१४): तंबाकू नियंत्रण एक बड़ी प्राथमिकता

[English] [Webinar recording] भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद् के आंकड़ों के अनुसार, भारत में कैंसर के रोगियों की संख्या में और मृत्यु दर में लगभग १०% की बढ़ोतरी हुई है (२०११ और २०१४ के बीच). २०१४ में भारत में कैंसर के लगभग 44% रोगी मृत हुए. सीएनएस की निदेशक शोभा शुक्ला ने बताया कि "भारत में कैंसर रोगियों की संख्या २०११ में १०२८५०३ से बढ़कर 201४ में १११७२६९ हो गयी है. भारत में कैंसर द्वारा मृत्यु की संख्या भी २०११ में ४५२५४१ से बढ़कर २०१४ तक ४९१५९७ हो गयी है. कैंसर दर बढ़ने के अनेक कारण हैं जिनमें प्रमुख है तम्बाकू सेवन, असंतुलित आहार, जनसँख्या की आयुवृद्धि, और हानिकारक जीवनशैली."

यूपी में गैर-संक्रामक रोग कम होने के बजाय बढ़ोतरी पर

शोभा शुक्ला, सीएनएस निदेशक
[English] [सीएनएस फोटो] भारत ने विश्व के अन्य देशों के साथ, सितम्बर २०१५ में सतत विकास लक्ष्य २०३० को पारित किया था, जिनमें से एक लक्ष्य ३.४ है: रोकथाम, नियंत्रण और उपचार के द्वारा, गैर-संक्रामक रोगों से होने वाली मृत्यु दर को २०३० तक १/३ कम करना. परन्तु यदि हम उत्तर प्रदेश के आंकड़ों के देखें तो प्रमुख गैर-संक्रामक रोगों की दर में कमी होने के बजाय बढ़ोतरी हो रही है. सीएनएस की निदेशक शोभा शुक्ला ने कहा कि "उत्तर प्रदेश को २०३० या उससे पहले सभी सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए उपयुक्त कदम उठाने चाहिए."

लखनऊ में होगा ७०वां टीबी और अन्य श्वास सम्बन्धी रोगों पर राष्ट्रीय अधिवेशन

सिटीजन न्यूज सर्विस, सीएनएस [English]
किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग, राष्ट्रीय टीबी संगठन, और उत्तर प्रदेश टीबी संगठन के संयुक्त तत्वाधान में लखनऊ में २०-२१ फरवरी २०१६ के दौरान आयोजित हो रहा है ७०वां टीबी और अन्य श्वास सम्बन्धी रोगों पर राष्ट्रीय अधिवेशन (नैटकान). १९ फरवरी २०१६ को एक-दिवसीय अधिवेशन से पूर्व ४ विशेष कार्यशालाएं आयोजित होंगी. १० साल के पश्चात् नैटकान लखनऊ में आयोजित हो रही है (६० वां नैटकान अधिवेशन २००६ में संपन्न हुआ था).

२०३० सतत् विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में बाल विवाह एक बड़ी बाधा

बृहस्पति कुमार पाण्डेय, सिटीज़न न्यूज़ सर्विस - सीएनएस
वर्ष २००० में भारत समेत विश्व के 192 देशों ने सहस्त्रादि विकास लक्ष्य के अंतर्गत २०१५ ‎तक कुछ बडे लक्ष्यों को प्राप्त करने का वायदा किया था। इन लक्ष्यों में एक प्रमुख लक्ष्य था मातृ एवं नवजात ‎शिशु मृत्यु दर में कमी लाना। लेकिन उसको प्राप्त करने के लिए जो मानक तय किये गये ‎थे उन्हें प्राप्त करने में भारत समेत कई देश विफल रहे। ‎सितम्बर २०१५ में  संयुक्त राष्ट्र संघ के १९३ सदस्य देशों ने १७ सतत विकास लक्ष्यों ‎को पारित किया है जिन्हें वर्ष २०३० तक पूरा करने का समय निर्धारित किया गया है। तय किये गये १७  ‎लक्ष्यों के १६९ टार्गेट्स हैं जो इन लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करेगें। ‎

ग्रामीण परिपेक्ष्य में महिला और बाल स्वास्थ्य

मधुमिता वर्मा, सिटीजन न्यूज़ सर्विस - सीएनएस
यदि हम उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों की बात करें तो कुपोषण, साफ़-सफाई का न  होना, अस्वच्छता, वायु एवं धुएं का प्रदूषण, खुले में शौच, अज्ञानता, उचित स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव, आदि अनेक ऐसे कारण हैं  जिनके चलते ग्रामीण वासियों, विशेषकर महिलाओं और बच्चों को अनेक प्रकार की बीमारियों को झेलना पड़ता है।

यौनिक शो‎षण- चुप्पी तोडनी ही होगी...

बृहस्पति कुमार पाण्डेय, सिटीजन न्यूज सर्विस ‎- सीएनएस 
फोटो क्रेडिट: सीएनएस 
देश में यौनिक एवं प्रजनन स्वास्थ्य से जुडी सामाजिक चुप्पी, भ्रम व मिथक की वजह से हर ‎रोज किशोर व युवा महिलाओं से जुडे यौन उत्पीडन के कई मामले सामने आते है। यह वह ‎मामले होते है जिसमें यौन उत्पीडन की शिकार महिला या तो पुलिस के पास शिकायत के ‎‎रूप में लेकर जाती है, या अत्यन्त जघन्य होने की दशा में ही सामने आ पाते है। लेकिन ‎ज्यादातर मामलों में यह देखा गया है कि यौनिक हिंसा की शिकार होने वाली महिला अपने ‎ऊपर होने वाले यौनिक अत्याचार को या तो चुपचाप सहती रहती है या परिवार के लोगों द्वारा ‎‎ऐसे मामलो को दबा दिया जाता है। ‎

वास्तविकता से इंकार क्यों ?

नीतू यादव, सिटीजन न्यूज़ सर्विस - सीएनएस 
जब हमारे भारतीय समाज में मानव शरीर से जुड़ी प्राथमिक आवश्यकताओं की बात की जाती है तो प्रत्येक व्यक्ति सिर्फ रोटी, कपड़ा, और मकान का जिक्र करता है किन्तु   शरीर  के यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के विषय पर कोई भी  चर्चा नहीं करना चाहता, क्योंकि हमारे समाज में प्रारंभ से ही किशोर-किशोरियों को यह समझाया जाता है कि इस विषय पर चर्चा करना भी पाप है।  लैंगिक व प्रजनन स्वास्थ्य युवा पीढी से जुड़ा हुआ बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है.  अच्छे स्वास्थ्य के अभाव में  जीवन का आनंद कदापि नहीं उठाया जा सकता है। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि हमारे समाज में इस विषय पर बात करना भी वर्जित है।

लैंगिक व प्रजनन स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों की सार्थकता

मधुमिता वर्मा, सिटिज़न न्यूज़ सर्विस - सीएनएस  
फोटो क्रेडिट: सीएनएस 
प्रजनन सृष्टि का मूल है, लैंगिक परिपक्वता के बिना प्रजनन की कल्पना नहीं की जा सकती है। परन्तु फिर भी हमारे देश में आज भी इस विचारधारा के लोगों की कमी नहीं जो लैंगिक व प्रजनन सम्बन्धी विषयों पर बात करना अपराध मानते हैं। यह संकीर्ण मानसिकता, लैंगिक व प्रजनन स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों के प्रचार-प्रसार में बाधक है। नवयुवक-नवयुवतियों में इसको लेकर एक प्रकार का भय व शर्म व्याप्त है जो उन्हें परेशानी होने पर भी छिपाए रहने के लिए बाध्य कर रहा है। यह स्थिति विकास के मार्ग में निश्चित रूप से एक बहुत बड़ी बाधा है।