रामरती को मिला सी0आई0आई0 आदर्श महिला अवार्ड 2011

गोरखपुर एनवायरन्मेन्टल एक्शन ग्रुप से पिछले 15 वर्षो से जुड़कर स्थायी कृषि के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बना चुकी कैम्पियरगंज के सरपतहा गांव की 50 वर्षीय महिला किसान श्रीमती रामरती को लघु उद्दम एवं स्थायी कृषि के क्षेत्र में किये गये इनके विशेष योगदान पर Confederation of Indian Industry(CII) ने राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार "सी0आई0आई0 आदर्श महिला अवार्ड २०११" से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। यह पुरस्कार आगामी 8-9 अप्रैल 2011 को दिल्ली में आयोजित सी0आई0आई0 के राष्ट्रीय सम्मेलन में दिया जायेगा। पुरस्कार राशि के रूप में इनको एक लाख रूपया मिलेगा। सी0आई0आई0 1895 से सामाजिक मुद्दों पर काम कर रही है। 2005 से सी0आई0आई0 सम्पूर्ण भारत में महिला सशक्तीकरण पर काम करने वाली ग्रामीण महिलाओं को राष्ट्रीय स्तर पर तीन क्षेत्रों-- शिक्षा एवं साक्षरता, स्वास्थ्य और लद्यु उद्दम-- में  विशेष योगदान हेतु यह पुरस्कार देती आ रही हैं। इस पुरस्कार के लिए पूरे भारत वर्ष से हजारों की संख्या में आवेदन आये थे, लेकिन श्रीमती रामरती द्वारा ग्रामीण स्तर पर अपने सीमित संसाधनों में स्थायी कृषि एवं लघु उद्दम के क्षेत्र में किये जा रहे प्रयास बाकी के सभी आवेदको के प्रयासो से ज्यादा बेहतर पाये गए। रामरती यह पुरस्कार पाने वाली 0प्र0 की पहली महिला किसान है

रामरती के 11 सदस्यी परिवार में इनके पति, तीन बेटे, दो बहुएं एवं 5 नाती है। रामरती के जीवन पर दृष्टिपात करे तो स्पष्ट होता है कि इनका जीवन काफी मुश्किलों से भरा था. खेती करना तो दूर बीज डालने भर का भी पैसा नही हुआ करता था। अपनी आजीविका चलाने के लिए दूसरे के खेतों में मजदूरी करती थी। लगभग 15 वर्ष पूर्व जी0ई0ए0जी0 द्वारा सरपतहा गांव में गठित 'स्वयं सहायता समूह' के माध्यम से इनका जुड़ाव इस  संस्था से हुआ। खेती से इनका लगाव हमेशा से रहा है. लिहाजा अपनी खेती के प्रति रूचि के चलते जल्दी ही ये चयनित किसान के रूप में संस्था द्वारा चुन ली गयी। जी0ई0ए0जी0 द्वारा  समय-समय पर प्राप्त तकनीकी सहयोग एवं प्रेरणा और अपने स्वयं के ज्ञान व कौशल को जोड़ते हुए बहुत कम समय में इन्होंने अपने आप को एक सफल किसान के रूप में स्थापित कर दिया। घर/परिवार,  एवं खेत खलिहान के बेहतर सामंजस्य, और समय एवं स्थान के बेहतर प्रबन्धन ने उन्हें छोटे से खेत के टुकडे में भी बेहतर आजीविका के साधन उपलब्ध कराये। वे एक ही खेत में एक साथ कई फसलें उगाने का कौशल जानती है। पढ़ी लिखी नहीं हैं लेकिन नामचीन कृषि वैज्ञानिकों को खेती किसानी के अपने ज्ञान से हत प्रभ कर दिया है।

वे संसाधन की मार, मौसम की अनियमितता, लोगों के कटाक्ष से बेपरवाह आगे बढ़ती गयी। अपनी एक एकड़ जमीन में अपनी पूरी दुनिया सजा ली। आज इनके पास सब कुछ है-- पक्का घर, खेती में काम आने वाले औजार, सिंचाई का पम्प सेट। प्रगतिशील किसानों में उनकी गिनती होती है। रामरती का खेत जैव विविधता का पार्क लगता है। ये साल में 32 से अधिक फसलें उगाती है। रामरती के पास कुल एक एकड़ की खेती है जो पूर्ण रूप से जैविक है। वे अपने चार अदद दुधारू जानवरों के गोबर,बगीचे के पत्तों और सब्जियों के अपशिष्ट से जैविक खाद बनाती है। तम्बाकू, लहसुन आदि से कीटनाशक बनाती है। रसायनिक खादों व कीटनाशकों का प्रयोग उन्होंने वर्षो पहले छोड़ दिया।

इन्होंने विभिन्न लद्यु उद्योगों जैसे मोमबत्ती और अगरबत्ती बनाना, सब्जी एवं मसाले की खेती, बीज उत्पादन इत्यादि से अपनी आजीविका के विभिन्न विकल्प तो तैयार किये ही, साथ ही अन्य लोगों को भी इसके लिये प्रेरित किया।

आज रामरती अष्टभुजी स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष एवं कृषि सेवा केन्द्र एवं किसान विद्यालय की संचालिका हैं. इसके साथ ही ये एक मास्टर ट्रेनर भी हैं। वह छोटी जोत वाले किसानों को कम लागत और कम संसाधन में लाभकारी खेती के गुर सिखाती है।

जितेन्द्र द्विवेदी
(लेखक, उत्तर प्रदेश में कृषि मुद्दों पर विशेष रूप से लिखते रहे हैं और स्वतंत्र पत्रकार हैं। ईमेल: jitendraabf@gmail.com, फोन: 9415790126)

क्या है जन लोकपाल बिल

कुछ जागरूक  नागरिकों द्वारा शुरू की गई एक पहल का नाम है 'जन लोकपाल बिल'. इस कानून के अंतर्गत, केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त का गठन होगा. जस्टिस संतोष हेगड़े, प्रशांत भूषण और अरविन्द केजरीवाल द्वारा बनाया गया यह विधेयक लोगो के द्वारा वेबसाइट पर दी गयी प्रतिक्रिया और जनता के साथ विचार विमर्श के बाद तैयार किया गया है. यह संस्था निर्वाचन आयोग और सुप्रीम कोर्ट की तरह सरकार से स्वतंत्र होगी. कोई भी नेता या सरकारी अधिकारी जांच की प्रक्रिया को प्रभावित नहीं कर पायेगा. इस बिल को शांति भूषण, जे. एम. लिंगदोह, किरण बेदी, अन्ना हजारे आदि का भारी समर्थन प्राप्त हुआ है.

इस बिल की मांग है कि भ्रष्टाचारियो  के खिलाफ किसी भी मामले की जांच एक साल के भीतर पूरी की जाये. परिक्षण एक साल के अन्दर पूरा होगा और दो साल के अन्दर ही भ्रष्ट नेता व आधिकारियो को सजा सुनाई जायेगी . इसी के साथ ही भ्रष्टाचारियो का अपराध सिद्ध होते ही उनसे सरकर को हुए घाटे की वसूली भी  की जाये. यह बिल एक आम नागरिक के लिए मददगार जरूर साबित होगा, क्यूंकि यदि किसी नागरिक का काम तय समय में नहीं होता तो लोकपाल बिल दोषी अफसर पर जुरमाना लगाएगा और वह जुरमाना शिकायत कर्ता को मुआवजे के रूप में मिलेगा. इसी के साथ अगर आपका राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, पासपोर्ट आदि तय समय के भीतर नहीं बनता है या पुलिस आपकी शिकायत दर्ज नहीं करती है तो आप इसकी शिकायत लोकपाल से कर सकते है.  आप किसी भी तरह के भ्रष्टाचार की शिकायत लोकपाल से कर सकते है जैसे कि सरकारी राशन में काला बाजारी, सड़क बनाने में गुणवत्ता की अनदेखी,  या फिर पंचायत निधि का  दुरूपयोग.

लोकपाल के सदस्यों  का चयन जजों, नागरिको और संवैधानिक संस्थायो द्वारा किया जायेगा. इसमें कोई भी नेता की कोई भागीदारी नहीं होगी.  इनकी नियुक्ति पारदर्शी तरीके से, जनता की भागीदारी से होगी.
सीवीसी, विजिलेंस विभाग, सी बी आई  की भ्रष्टाचार निरोधक विभाग (ऐन्टी करप्शन डिपार्ट्मन्ट) का लोकपाल में विलय कर दिया जायेगा. लोकपाल को किसी जज, नेता या अफसर के खिलाफ जांच करने व मुकदमा चलाने के लिए पूर्ण अधिकार प्राप्त होंगें.

इस बिल की प्रति प्रधानमंत्री एवं सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को १ दिसम्बर २०१० को भेजी गयी थी, जिसका अभी तक कोई जवाब नहीं मिला है. इस मुहीम के बारे  में आप ज्यादा जानकारी  के लिए www.indiaagainstcorruption.org पर जा सकते हैं. इस तरह की पहल से समाज में ना सिर्फ एक उम्दा सन्देश जाएगा बल्कि, एक आम नागरिक का समाज के नियमों पर विश्वास भी बढेगा. हर सरकार जनता के प्रति  जवाबदेह है, और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाना हर नागरिक का हक है.

निधि शाह
(लेखिका सिम्बोयोसिस इंस्टिट्यूट ऑफ़ मीडिया एंड  कम्युनिकेशन की छात्रा  हैं )

क्या भ्रष्टाचारी राजद्रोही नहीं हैं ?

२४ दिसम्बर २०१० को बिनायक सेन को छत्तीसगढ़ कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई. बिनायक सेन ने काले कानूनों  के खिलाफ न्याय मांगने  की हिम्मत जताई थी.  हमारे कानून के मुताबिक राजद्रोह का मतलब है  देश व सरकार के खिलाफ लोगों को भड़काना एवं अनचाही हिंसा जागरूक करना. तो अगर सेन राजद्रोही हुए तो उन  विरोधी पार्टियों को हम क्या कहेंगे जो हमेशा सरकार की खिल्ली उड़ाती रहती हैं?  वहीं  दूसरी ओर उन भ्रष्टाचारियों को भी राजद्रोही करार देना चाहिए जिन्होनें  सरकार का इतना नुक्सान कराया है. बिनायक सेन जैसे कार्यकर्ता तो समाज के उस वर्ग की आवाज़ बनना चाहते थे, जो वर्ग हमारे समाज में अल्पसंख्य है. सेन ने छत्तीसगढ़ के उन आदिवासियों  के विकास में मदद की जिनकी कोई पहचान भी नही थी. पर ऐसी जगहों पर संघर्ष करने वाले लोगों को माओवादी करार कर दिया जाता है.
     
बिनायक सेन के साथ भी यही हुआ. उन्हें माओवादी, आतंकवादी व  राजद्रोही जैसे अपमानजनक संबोधन  सहने पड़े. उनकी कोशिश बस इतनी थी कि सरकार द्वारा शुरू किये गए बाज़ार वार में वे इन छोटी जातियों को जिंदा रखना चाहते थे. सरकार और मल्टीनेशनल कम्पनियों की साझेदारी ने आदिवासियों से उनकी ज़मीन व उनके हक तक छीन लिए थे. जब बिनायक ने इसके खिलाफ आवाज़ ऊँची करी तो उन्हें राज्यद्रोह के मामले में उम्रकैद की सजा सुना दी गई.

उन पर यह भारी इलज़ाम लगाते समय उनके द्वारा किये गए अनेकों सामाजिक कार्य भुला दिए गए. बिनायक सेन ने १९८१ में छत्तीसगढ़ में शहीद अस्पताल बनवाया था. यह इस राज्य का पहला ऐसा अस्पताल है जहाँ सही इलाज़ के साथ साथ स्वास्थ्य सम्बंधित शिक्षा भी दी जाती है. इसकी एक और खासियत यह है कि यहाँ काम करने वाले सभी कर्मचारियों को कम्युनिटी ट्रेनिंग द्वारा तैयार किया गया है. यानी स्वास्थ्य  के साथ साथ रोजगार का जरिया भी बनाया गया. बिनायक ने मलेरिया और टी. बी. के क्षेत्र में भी कई योगदान दिए है. पर सरकार को यह मंजूर नहीं हुआ कि कोई उसकी गलत कार्यप्रणाली के खिलाफ आवाज़ उठा कर  जवाब मांगे.

 बिनायक सेन की पत्नी इलिना सेन,बताती हैं कि  "कोर्ट कहता है कि  बिनायक बहुत असहज प्रश्न उठाते हैं  इसलिए उन्हें रोकना चाहिए." कोर्ट की माने तो बिनायक के खिलाफ कई सबूत हासिल हुए है जिससे वो दोषी पाए गए हैं , पर बिनायक के सहयोगी इन सभी सबूतों को फर्जी बताते  है. इलिना सेन ने बताया कि पुलिस उनके घर छानबीन करने पहुँची और बहुत सा सामान जब्त कर लिया. बिनायक के कंप्यूटर में मिले हर एक मुस्लिम के नाम को आतंकवाद के साथ जोड़ा गया और बिनायक को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी करार ठहराया गया. बिनायक की कोर्ट में पेशी के दौरान दो विधवा महिलायें बिनायक को फाँसी देने की मांग करने लगीं. बाद में यह पता चला क़ि  उनके पति माओवादी हमले में मारे गए थे और पुलिस ने उन ममहिलाओं को सेन के खिलाफ भड़काया था . सवाल ये है क़ि राज्य का इस तरह से लोगो की भावनाओं का इस्तेमाल करना कितना उचित है? यह तो हमारे जीवन एवं स्वतंत्रता पर राज्य का हमला हुआ. ऐसे कई और उदाहरण है जिसमें  अपने अधिकार  के लिए उठाई गयी आवाज़े दबा दी गयी हैं .

२६  जनवरी २०१०  को , सामाजिक  कार्यकर्ता  पियूष  को इसलिए  गिरफ्तार  कर  लिया  गया था  क्यूंकि  उन्होंने  दंतेवाडा  में हुए  बलात्कार  के  आरोपियों  को  गिरफ्तार  करने की मांग की  थी. वहीं कर्नाटक की  पी . यु. सी.एल. की  अध्यक्ष  रति  राव को  भी  गिरफ्तारी  दी  गयी  जब  उन्होंने  सरकार  द्वारा की गए फर्जी मुठभेड़ों   का  खुलासा  किया . डाक्टर   रूपरेखा  वर्मा  कहती  है  "अगर  सरकार  एक  बिनायक  सेन  को  मारेगी  तो  १०००  और  पैदा  होंगे."  डाक्टर  कविता  श्रीवास्तव  का कहना है :  'नरेगा , आर.टी.आई., महिला उत्पीड़न, आदि क्षेत्रों में यदि आप काम  करेंगे  तो  जवाबदेही  तो  मांगेगे ही; आप आन्दोलन  करेंगे  और  सरकार  बोलेगी क़ि आप  आतंकवादी  है ”

पर  इन  सब  के  बावजूद  सरकार  की  जवाबदेही  कम  नहीं  हुई  है . ऐसे  बहुत सारे मुद्दे  हैं  जिन  पर  जवाब  मिलना  बाकी  है  और  सामूहिक मांग से हम जवाब पा कर रहेंगे . 

निधि शाह
(लेखिका सिम्बोयोसिस इंस्टिट्यूट ऑफ़ मीडिया एंड  कम्युनिकेशन की छात्रा है ) 

देश व विदेश की महिला शक्ति

20वीं सदी यानी करीब सौ साल पहले, प्रथम विष्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन में महिलाओं को वोटिंग का हक नहीं था। पर जब सभी पुरूष युद्ध लड़ने के लिए सीमा पर चले गये तो समाज के बाकी व्यवसाय जैसे डॉक्टरी, दुकानदारी, प्रशासनिक कार्य महिलाओं ने संभाले। यह देखते हुए समाज को यह विश्वास  हुआ कि एक नारी भी सशक्त है और समय आने पर लगभग हर वह काम संभाल सकती है जो पुरूष करते हैं। इसके बाद ब्रिटेन में महिलाओं को अपना मत डालने का हक मिल गया।

महिलाओं को हमेशा से समाज का कमजोर वर्ग मानकर दबाया गया है। घर में बेटी पैदा होना तो अभिशाप के बराबर है। समाज के ऐसे दायरे बना दिये गये हैं कि लड़की को बोझ समझा जाता है। 1901 में जब भारत में जनगणना की शुरूआत हुई थी तो लिंग अनुपात  ९७०:१००० था, और आज का लिंग अनुपात ९३२:१००० है। यानी हर हजार लड़कों के मुकाबले 932 लड़कियां। जबकि महिलाओं का पैदा होने का स्तर तो पुरूषों के बराबर है, तो यह असमान्यता क्यों? यह इस लिए क्योंकि महिलाओं की  मृत्यु दर बहुत ज्यादा हो गयी है। भ्रूण हत्या, दहेज प्रथा, स्वास्थ्य एवं अन्य हिंसा महिलाओं के मौत का कारण है। भ्रूण हत्या जैसा घिनौना पाप न केवल समाज के निचले वर्ग में सक्रिय है, बल्कि पढ़े लिखे लोगों में भी यह चलन तेजी पकड़ रहा है।

चीन में जब मार्क्सवादी शासन था तब कहा गया था कि हमारी जनसंख्या हमारी ताकत है। पर समय के साथ उस देश को भी यह समझ आ गया कि बढ़ती जनसंख्या देश के विकास में रोड़ा बन सकती है। तब से वहां परिवार नियोजन को बढ़ावा दिया जाने लगा और ‘‘हम दो हमारा एक’’ के नारे का सख्ती से पालन होने लगा। परन्तु इसका परिणाम यह हुआ कि चीन में लड़कियों का पैदा होना तेजी से कम हो गया। अन्तर्राष्ट्रीय युनिवर्सिटी, वर्धा में कार्यरत, इलिना सेन कहती हैं कि ‘‘समाज अगर औरतों को उनका हक नहीं देगा तो औरतों को उसके लिए संघर्ष करना होगा, जैसे यूरोप और अमेरिका में औरतों ने किया। वे आगे आयीं और तब तक लड़ी जब तक उन्हें उनके अधिकार नहीं मिल गये।’’

हम तो यह उम्मीद करते हैं कि कानून के माध्यम से हमें न्याय मिले।

निधी शाह
(लेखिका सिम्बोयोसिस इंस्टिट्यूट ऑफ़ मीडिया एंड कम्युनिकेशन की छात्रा है ) 

क्यों पढ़ें वूमेन्स स्टडीज़ ?

आधुनिकता ने हमारे समाज को अच्छी तरह जकड़ लिया है। जैसे-जैसे क्षेत्रीय विकास बढ़ा है वैसे-वैसे लोगों की हर क्षेत्र में दिलचस्पी भी जागी है। पहले के मुकाबले कई नये क्षेत्र, पाठ्यक्रम व विषय आ गये हैं। लोगों में नयी चीजों को जानने की जिज्ञासा बढ़ी तो साथ में जानकारी पाने के नये यन्त्र भी उजागर हो गये हैं। विभिन्न तरह की रिसर्च, संवाद, वाद विवाद, फोरम्स, आर0टी0आई0 से लोग नये मुद्दों के साथ जुड़ने लगे तथा समाज के प्रति और जिम्मेदार हुए।

पढ़ाई के क्षेत्र में भी इन मुद्दों को विषय के रूप में लाया गया ताकि लोग जागरूक हों। ऐसा ही एक मुद्दा महिला शोषण का है जिसे वूमेन्स स्टडीज़ के रूप में पाठ्यक्रम में सामिल किया गया है. वूमेन्स स्टडीज़ नाम के कोर्स में महिलाओं से जुड़ी हर तरह की परेशानियों व उनके समाधान के बारे में जानकारी दी जाती है। साथ ही छात्र इतने जागरूक होते हैं कि संगठनों के साथ जुड़कर या स्वंय सेवक बनकर महिलाओं के शोषण के खिलाफ आवाज़  उठाते हैं। इस तरह का कोर्स देश भर की कई युनिवर्सिटियों में पढ़ाया जाता है। पर सवाल यह आता है कि वूमेन्स स्टडीज़ पढ़े क्यों? यह जानकर भी दुख लगता है कि इस पढ़ाई को करने वाले छात्रों में कई छात्र ऐसे हैं जो इसे सिर्फ एक डिग्री मानते हैं और इसलिए पढ़ रहें हैं क्योंकि किसी और कोर्स में दाखिला नहीं मिला। परन्तु इस तरह की पढ़ाई हमारे समाज की अहम जरूरत है। अगर युवा वर्ग जागरूक  होगा तो कार्य प्रणाली में तेजी आयेगी क्योंकि जोशीली आवाजें ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच सकती है।

समाज में कई ऐसे मिथ्य हैं जो महिला हिंसा को बढ़ावा देते हैं। मीडिया भी इसमें अहम भूमिका निभाता है। टी0वी0 पर दिखाये जाने वाले सीरियल्स में अक्सर यह दिखाया जाता है कि किस तरह से एक महिला दूसरी महिला के खिलाफ साजिश करती है। इससे समाज में बहुत ही गलत सन्देश जाता है कि महिलाएं खुद अपनी दुश्मन होती हैं। हमसफर संस्था की अध्यक्ष प्रो0 इलिना सेन का कहना है कि ‘‘बाजारवार लगा हुआ है, लगन का मौसम आते ही आप ढेरों ऐसे  विज्ञापन देखेगें जिनसे दहेज प्रथा को बढ़ावा मिल रहा है जैसे कि 'अपनी बेटी को दें उसके सुखद संसार के लिए यही कार'। समाज में इससे यही सन्देश जायेगा कि अपनी बेटी को खुश देखना है तो उसे दहेज में कार दें।

मीडिया भी समाज का हिस्सा है और हर तरह से हमें प्रभावित करता है। समाज में अगर सही सन्देश जायेगा तभी बदलाव आयेगा।                                                                                              

निधी शाह
(लेखिका सिम्बोयोसिस इंस्टिट्यूट ऑफ़ मीडिया एंड कम्युनिकेशन की छात्रा है ) 

कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा

इक्कसवीं सदी में औरत आदमी से कन्धे से कन्धा मिलाकर तो जरूर चल रही है पर इस सफर में उसके सामने कई चुनौतियां आती हैं। ये हमारे समाज का एक पहलू ही है जो औरत का घर से बाहर निकलकर काम करना स्वीकार नहीं करता। औरत को कई तरह के शोषण का सामना करना पड़ता है जैसे कि बलात्कार, दहेज प्रथा, बाल विवाह, द्वि विवाह, घरेलू हिंसा, मांसिक शोषण एवं कार्य स्थल पर यौन हिंसा।

काम काजी महिलाओं का कार्य स्थल पर की जाने वाली छेड़-छाड़ काफी सक्रिय है। महिलाओं को आज भी समाज का एक कमजोर तबका मानते हुए उनके साथ असमान्य व्यवहार किया जाता है। पर कई महिलाओं और संगठनों के आवाज उठाने पर कार्य स्थल पर यौन हिंसा को लेकर एक कानून बनाया जा रहा है।

1997 में कार्य स्थल पर होने वाली हिंसा के लिए दिशा निर्देष ‘विषाखा’ के नाम से जारी किए गये। इन्हीं निर्देषों को एक सख्त रूप  देते हुए इसे कानून बनाने की कोषिष चल रही है। इसके अन्तर्गत कार्य स्थल पर किसी भी तरह की मौखिक हिंसा, अष्लील संकेत या छेड़छाड़ दण्डनीय होगी। कार्य स्थल पर हिंसामुक्त माहौल रखने की पूरी जिम्मेदारी कार्यस्थल के मालिक की होगी। इस कानून के अन्तर्गत यह मान के चलना होगा कि महिला पक्ष निर्दोष है। उच्चतम न्यायालय ने इस पर कई निर्देष जारी किए हैं और कई संगठन इस कानून के लिए काम कर रहें हैं।

इस कानून की एक धारा के मुताबिक घरेलू महिलाएं इसके दायरे में नहीं आयेंगी। उच्च न्यायालय का मानना है कि घर एक निजी क्षेत्र है और निजी मामले कार्य स्थल की श्रेणी में नहीं आते। इसके अलावा अगर कोई भी महिला की याचिका गलत साबित होती है तो उसे दो साल तक की सजा हो सकती है। इन धाराओं से महिला संगठनों में काफी हलचल है। संगठनों की मांग है कि इन धाराओं को कानून से निकाला जाये। राजस्थान की मानवाधिकार एक्जीक्यूटेट व जनरल सेक्रेटरी पी0यू0सी0एल0 सुश्री कविता श्रीवास्तव का कहना है कि ‘‘जितने ज्यादा कानून महिलाओं के लिए बन रहें हैं महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा भी उतनी ही तेजी से बढ़ रही है क्योंकि कोई भी विभाग अपने कर्तव्य का पालन नहीं कर रहा है बल्कि महिलाओं के चरित्र पर ही तरह-तरह के सवाल किए जाते हैं।’’

निधी शाह
(लेखिका सिम्बोयोसिस इंस्टिट्यूट ऑफ़ मीडिया एंड काम्मुनिकेशन की छात्रा है )

अब नहीं है मुझे डर

महिलाओं के साथ आये दिन होने वाली हिंसा के खिलाफ आवाज उठाते हुए लखनऊ के ‘हमसफर’ समूह ने  "अब नहीं है है मुझे डर" नामक पुस्तक का विमोचन किया। हमसफर एक महिला सहायता केन्द्र है जो कि महिला हिंसा व उत्पीड़न के खिलाफ महिलाओं के संघर्ष में उन्हें समर्थन व सहायता प्रदान करता है।
  
इस पुस्तक का यह पहला संस्करण है और इसमें हिंसा का विरोध करती महिलाओं की कहानियां प्रकाशित हुई हैं। अन्याय के खिलाफ, न्याय के लिए उठायी गई सह अवाजें हमारे समाज का ही हिंस्सा हैं। इसमें प्रकाशित उन तमाम महिलाओं की गाथा और उनके साथ हुई हिंसा वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है। करीब 12 महिलाओं की कहानियों के अलावा इस प्रकाषन में न्याय तक पहुंचने का रास्ता भी बताया गया है। इसमें संघर्षशील महिलाओं की जरूरतें जैसे स्वास्थ्य, विधिक सलाह और सहयोग को सम्बोधित करने के साथ-साथ राज्य की प्रतिक्रियाएं भी समझायी गई हैं। साथ ही इस प्रकाशन में भारतवर्ष में हो रही हिंसा से सम्बन्धित आंकड़े विस्तृत रूप में दिये गये हैं।

उत्तर प्रदेष की सच्चाई यह है कि महिलाओं के साथ अन्याय व उत्पीड़न की घटनाएं आम बात हो चुकी है। इन प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद कुछ हिम्मती महिलाएं आगे आकर हिंसा मुक्त जीवन के अधिकार को पाने के लिए संघर्ष कर रहीं हैं। ऐसी ही एक कहानी है 38 वर्षीय दलित महिला संगीता की। संगीता का पति होमगार्ड कॉन्स्टेबल के पद पर लखनऊ में नियुक्त है। संगीता को उनका पति बहुत मारता-पीटता है। और कई बार घर से निकाल चुका है। ऐसे में वह कई बार सड़कों पर रहीं हैं क्योंकि उनके पास खाने व रहने का खर्चा भी नहीं होता। उनके पति की होमगार्ड कार्यालय में नौकरी होने के कारण कोई भी पुलिस थाना उनकी शिकायत दर्ज करने को नहीं माना। ऐसे में हम सफर संस्था ने संगीता का साथ दिया।
   
राष्ट्रीय क्राईम व्यूरो के अनुसार उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ हिंसा के सर्वाधिक मामले हैं, जिनमें बलत्कार, अपहरण, दहेज हत्या, शारीरिक व मांसिक हिंसा व यौनिक छेड़-छाड़ जैसी घृणित घटनाएं शामिल हैं। इस अवसर पर हमसफर समूह ने इन सभी बहादुर महिलाओं का आभार प्रकट किया और साथ ही प्रकाशन  में वित्तीय सहयोग देने के लिए ‘ओक्सफेम' का भी ध्न्यवाद दिया।

निधी शाह
(लेखिका सिम्बोयोसिस इंस्टिट्यूट ऑफ़ मीडिया एंड काम्मुनिकेशन की छात्रा है )

महिलाओं का घरेलू हिंसा से बचाव कानून क्या हैं?

महिलाओं का घरेलू हिंसा से बचाव कानून 2005 एक दिवानी कानून है जिसका मकसद घरेलू रिश्तों में हिंसा झेल रहीं महिलाओं को तत्काल व आपातकालीन राहत पहुंचाना है। इस कानून का मुख्य उद्देष्य किसी भी महिला को हिंसा मुक्त घर में रहने का अधिकार दिलाना है।

हमारे इस समाज में महिलाओं के लिए न मायके में कोई जगह है और नही ससुराल में। यही कारण है कि महिलाएं सर छुपाने के लिए छत और पैर टिकाने के लिए जमीन के एवज में बहुत से अनचाहे समझौते करती रहती हैं। यह भारत में पहला ऐसा कानून है जो महिलाओं को अपने घर में रहने का अधिकार देता है। यह कानून घरेलू हिंसा को रोकने के लिए केन्द्र व राज्य सरकार को जबाबदेह व जिम्मेदार ठहराता है। इस कानून के अनुसार महिला के साथ हुई घरेलू हिंसा के साक्ष्य प्रमाणित किया जाना जरूरी नहीं हैं। महिला के द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों को ही आधार सुनिष्चित माना जायेगा क्योंकि अदालत का मानना है कि घर के अन्दर हिंसा के साक्ष्य मिलना मुश्किल है।

इस कानून के मुताबिक घरेलू हिंसा यानी ऐसी कोई भी हरकत या व्यवहार जो कि महिला के शरीर या स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होकर दर्द या चोट पहुंचाये। ऐसा कोई भी आपत्तिजनक व अनचाहा यौनिक व्यवहार व हरकत जो महिला को शारीरिक कष्ट दे या अपमानित करें या उनके मान-सम्मान पर चोट पहुंचाये। ऐसी समस्त घरेलू संसाधन व सुविधाएं जिसकी महिला व उसके बच्चे को जरूरत हो एवं जिस पर उनका अधिकार बनता हो, पर नियन्त्रण एवं उससे वन्चित रखना।

 इस कानून के तहत घरेलू हिंसा की रोक थाम के लिए जज या अदालत तीन दिन के अन्दर-अन्दर बचावकारी आदेश एवं गिरफ्तारी के वारन्ट जारी करेंगे। घरेलू हिंसा से पीडि़त कोई भी महिला अदालत में जज के समक्ष स्वयं अथवा वकील, सेवा प्रदान करने वाली संस्था या संरक्षण अधिकारी की मदद से अपनी सुरक्षा के लिए बचावकारी आदेष ले सकती है। पीड़ित महिला के अलावा कोई भी पड़ोसी, परिवार का सदस्य, संस्थाएं या फिर खुद भी महिला की सहमति से अपने क्षेत्र के न्यायिक मजिस्ट्रेट के कोर्ट में शिकायत दर्ज कराकर बचावकारी आदेष हासिल किया जा सकता है। घरेलू घटना रपट (डोमेस्ट्रिक इंसिडेंट रिपोर्ट) एक दफ्तरी प्रारूप है जिसमें घरेलू हिंसा की रिपोर्ट दर्ज करायी जाती है। इस कानून के तहत मिलने वाली राहत में बचावकारी आदेष, काउन्सिलिंग, क्षतिपूर्ति, भरण पोषण, बच्चों का संरक्षण और जरूरत पड़े तो रहने की जगह भी दी जाती है। अगर पीडि़त की रिपोर्ट से जज को ऐसा लगे कि पीडि़त को हिंसा कर्ता से आगे भी खतरा हो सकता है तो जज हिंसा कर्ता (पुरूष) को घर से बाहर रहने के आदेष दे सकते हैं। इस कानून के अन्तर्गत नियुक्त प्रोटेक्शन ऑफिसर (संरक्षण अधिकारी) की जिम्मेदारी यह है कि पीडि़त महिला को आवेदन लिखने में मदद करना, आवेदन जज तक पहुंचाना एवं कोर्ट से राहत दिलाना।

परन्तु ये सब जानकारी पीडि़तों तक पहुंचाना एक बहुत बड़ा काम है। महिलाओं के मुद्दों पर काम कर रहे संगठन कई परेशानियों और चुनौतियों का सामना करते हैं। जैसे कि आश्रित गृह की व्यवस्था न होना, संरक्षण अधिकारियों का न मिलना, वकील न मिलना, समय पर जुर्माना न मिलना और केस को गम्भीरता से न लिया जाना। यह भी एक गम्भीर स्थिति है कि पिछले चार सालों में उत्तर प्रदेश को इस काम के लिए केवल साढ़े चार लाख रूपयों का बजट मिला है। कानून के मुताबिक एक केस तीन महीने की भीतर खत्म हो जाना चाहिए, पर 2005 से लेकर आज तक हजारों में से केवल 11 केस ऐसे रहें हैं जो तीन महीने के अन्दर सुलझाये गये हैं। घरेलू हिंसा का शिकार हुई सभी महिलाओं में से केवल एक चैथाई ही रिपोर्ट दर्ज कराती हैं।

इस पर सेवा निवृत्त डी0जी0 श्री ईष्वर चन्द्र द्विवेदी का कहना है कि ‘‘जानकारी की शुरूआत कानून के रखवालों से करनी होगी। पुलिस वालों को ही इस तरह के कानून के बारें में पता नहीं है, तो वह इसे लागू कैसे करेगें?’’

निधी शाह 
(लेखिका सिम्बोयोसिस इंस्टिट्यूट ऑफ़ मीडिया एंड काम्मुनिकेशन की छात्रा है )

पूर्वी उत्तर प्रदेश की महिलाओं की आवाज़ : हम करते हैं अपने अधिकारों की मांग

 पूर्वी उत्तर प्रदेश  की महिलाओं की आवाज़ : हम करते हैं अपने अधिकारों की मांग
                                                     
 मऊ स्थित नगरपालिका सामुदायिक हाल में पूर्वी उत्तर प्रदेश के 10 जिलों की करीब 400 महिला नेताओं का दो दिवसीय सम्मलेन २४ मार्च को आरम्भ हुआ. दलित एवम् पिछड़े वर्ग की ये महिलायें अपनी निडरता और साहसिकता के बल पर समाज में एक नयी क्रान्ति ला रही हैं. 
‘‘ग्रामीण महिला सशस्तिकरण ’’ नामक कार्यक्रम के अंतर्गत, पूर्वी उत्तर प्रदेश के पिछड़े समुदायों की महिलाओं को एकजुट करने का सराहनीय प्रयास किया जा रहा है. अभी तक 40,000 से भी अधिक महिलाओं ने 253 ग्राम पंचायतों में नारी संघ के नाम से समूह गठित किए हैं। ये महिलाएं अपने अधिकारों, विशेषकर भोजन और रोज़गार के अधिकारों को पाने के लिए सामूहिक रूप से संघर्ष कर रहीं हैं। वे अपने राजनीतिक और सामाजिक अधिकारों  को पाने के लिए भी प्रयत्नशील हैं.
सम्मलेन में भाग लेने आयी महिलाओं ने अपने साहसिक और चुनौतीपूर्ण अनुभवों की जानकारी देते हुए बताया कि किस तरह वे विपरीत परिस्थियों में रहते हुए भी अपने अधिकारों के लिए आगे बढ़कर संघर्ष में जुटी हुई हैं। संघर्ष और सफलता की अनेक मिसालें सुनने को मिलीं.
प्रतापगढ़ जिले में मंगरोरा ब्लाक के सलाहीपुर गांव के नारी संघ की अध्यक्षा बड़का देवी ने बताया कि उनके गांव का प्रधान महिलाओं को न तो जॉब कार्ड दे रहा था और न ही काम। तब उन्होंने ने गांव की 200 महिलाओं का संगठन बनाकर जाब कार्ड और काम दिए जाने की मांगों  को  लेकर विरोध -प्रदर्शन किया। महिला समूह ने प्रधान को चेतावनी दी कि अगर वह अपना कार्य सुचारू रूप से नहीं कर सकता तो अपना पद छोड़ दे।बड़का देवी को खुशी है कि 'अब पुरुषों को हम महिलाओं की बातें सुननी पड़ती है।'
बहराइच जिले में मिहिनपुर्बा ब्लाक के छलुहा नारी संघ की भानुमति ने बताया, ‘‘सार्वजनिक वितरण प्रणाली का दुकानदार ‘‘कोटेदार’’ दुर्व्यवहार कर रहा था, लेकिन नारी संघ उसे लाइन पर ले आया। पहले जंगलों  में रहने वाले गांववालों  की कोई  नहीं सुनता था क्योंकि उनके पास कोई अधिकार नहीं थे। हमने जय आजादी आंदोलन शुरु किया और कोटेदार को निलंबित करवा दिया। फिर एक खुली बैठक में ग्राम  सभा की सहमति से एक नए कोटेदार का चयन किया गया।’’

गाजीपुर जिले में सदर ब्लाक के बाबेदी गांव के अम्बेडकर नारी संघ की पुष्पा देवी ने अपने समूह की उपलब्धियों  के बारे में चर्चा करते हुए कहा, ‘‘हमें मनरेगा (महात्मा गाँधी ग्रामीण रोज़गार योजना) के तहत समय पर भुगतान नहीं मिलता था। इसको  लेकर नारी संघ की महिलाओं  ने विकास खण्ड अधिकारी का घेराव किया। उसके बाद एडीओ  ने पंचायत को  समय से भुगतान का निर्देश दिया। अब हमें डरने की जरूरत नहीं है, हमें दूसरों को डराना है। हम नारी संघ के परचम के तले लड़ेंगे।’’
गाजीपुर जिले में सदर ब्लाक के अग्नि नारी महासंघ की नन्हीं देवी ने मांग की, ‘‘विकास खण्ड अधिकारी को या तो हमें मनरेगा के तहत काम देना होगा या फिर बेरोजगारी भत्ता देना होगा।’’

उत्तर प्रदेश में प्रतापगढ़ जिले के लालगंज ब्लाक में अझारा गांव से एक दलित महिला सीमा सरोज पति द्वारा प्रताड़ित थी। अमानुषिक पारिवारिक प्रतिबंधों ने उसका घर से निकलना दूभर कर दिया था.  परंतु नारी संघ से जुड़कर उन्होंने  नरेगा से संबंधित कठिनाइयों को दूर करने के लिए संघर्ष शुरु कर दिया है.
5,000 महिला सदस्यों वाले ब्लाक स्तरीय नारी मंच की अध्यक्षा पूजा, महिला अधिकारों की पैरवी करने में कामयाब रही हैं। उन्होंने  सूचना के अधिकार द्वारा भ्रष्टाचार के  खिलाफ आवाज उठाई, और महिलाओं को मनरेगा के तहत 100 दिनों का  रोजगार दिलवाया। उन्होंने  जन-दबाव के विरुद्ध जागरुकता फैलाते हुए सार्वजनिक वितरण प्रणाली को चुस्त-दुरस्त किया और मध्यान्ह भोजन की गुणवत्ता की जांच की।
 अम्बेडकर नगर जिले के जलालपुर ब्लाक में सल्लाहपुर गांव की एक दलित महिला किस्मती देवी के कुशल नेतृत्व में 153-सदस्यीय नारी संघ महिलाओं  के अधिकारों और हकों के लिए काम कर रहा है।

 पूर्वी उत्तर प्रदेश के विभिन्न गाँवों की बहुत सी कामयाब कहानियां हैं। इन गांवों  की महिलाएं विभिन्न प्रकार की हिंसा का  शिकार होने के बावजूद अपने अडिग और कर्मठ निर्णयों के द्वारा नारी समाज में एक नयी चेतना का उदय कर रही हैं। हम सभी को इनके साहस से प्रेरणा लेनी चाहिए. तथा प्रदेश एवम् देश के अन्य भागों में भी नारी चेतना के इस सामाजिक कार्य में सहयोग देना चाहिए. तभी एक स्वस्थ एवम् भ्रष्टाचार रहित समाज कि कल्पना साकार हो पायेगी.
शोभा शुक्ला
सिटिज़न न्यूज़ सर्विस

विश्व तपेदिक दिवस: २४ मार्च २०११


प्रोजेक्ट अक्षय: ७४४ मिलियन लोगों तक तपेदिक नियंत्रण सेवाएँ विभिन्न कार्यछेत्रों एवं कड़ियों में मिलजुल कर कार्य करने से पहुंचेंगी


नयी दिल्ली: २२ मार्च २०११:  भारत की १.२ अरब जनसंख्या की सेवा करने हेतु जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ बड़ी संख्या के बारे में ही सोचने के आदि है. बड़े स्तर पर लागू हो रहे 'अक्षय प्रोजेक्ट' (अक्षय के मायने हैं तपेदिक या टी.बी. रहित) की योजना रचने वाले भी इससे भिन्न नहीं हैं. अक्षय प्रोजेक्ट की योजना रचनाकर्ताओं के पास कोई विकल्प भी नहीं है क्योंकि विश्व-स्तर पर भारत में सबसे अधिक तपेदिक या टी.बी से ग्रसित लोग हैं. प्रोजेक्ट अक्षय को एड्स, टी.बी (तपेदिक) और मलेरिया से लड़ने के लिये समर्पित ग्लोबल फंड ने काफी भारी मात्रा में आर्थिक अनुदान दिया है. अक्षय प्रोजेक्ट पिछले वर्ष २३ भारतीय प्रदेशों के ३७४ जिलों में लागू हुआ जिससे कि संशोधित राष्ट्रीय तपेदिक नियंत्रण कार्यक्रम में जन-भागीदारी एवं प्रभावित लोगों की प्रतिभागिता बढ़े और तपेदिक सम्बंधित कार्यक्रम एवं सेवाओं की पहुँच और प्रभाव बढ़े, जिससे कि २०१५ तक ७४४ मिलियन लोगों को तक यह सेवाएँ पहुँच पायें.

'इंटरनैशनल यूनियन अगेंस्ट टूबरकुलोसिस एंड लंग डिसीस' (द यूनियन), और 'वर्ल्ड विज़न' इंडिया दोनों भारत सरकार के साथ इस जन-पहल अक्षय प्रोजेक्ट के समन्वयन को नेत्रित्व प्रदान कर रहे हैं. द यूनियन, इस अक्षय प्रोजेक्ट को २१ प्रदेशों के ३०० जिलों में लागू कर रहा है और ५७७ मिलियन जनसंख्या तक प्रोजेक्ट सम्बंधित सेवाओं को पहुंचाएगा, और वर्ल्ड विज़न इंडिया ७ प्रदेशों के ७४ जिलों में इस प्रोजेक्ट को लागू करेगा. पांच प्रदेश ऐसे हैं जिनमें दोनों संस्थाओं के संयुक्त समन्वय से यह प्रोजेक्ट लागू होगा.

'द यूनियन' के दक्षिण-पूर्वी एशिया के छेत्रिय निदेशक डॉ नेविन विल्सन ने कहा कि "प्रोजेक्ट अक्षय का प्रचालन तंत्र अवश्य बड़ा लगता है परन्तु तपेदिक/टी.बी. कार्यक्रमों का प्रभाव बढ़ाने के लिये नए सशक्त समूहों का गठन करना भी आवश्यक है. इस प्रोजेक्ट के प्रबंधन के लिये 'द यूनियन' ने कार्यकुशल लोगों की टीम जुटाई है और विभिन्न छेत्रों में अपनी निपुणता स्थापित करने वाली नौ संस्थाओं के साथ साझेदारी में इस प्रोजेक्ट को लागू किया जा रहा है. इसके अलावा भी अनेक लोगों के साथ कार्य किया जा रहा है."

विभिन्न कार्यछेत्रों से सरकारी, गैर-सरकारी, निजी, तकनीकि संस्थाओं, प्रभावित समुदाओं और मीडिया के प्रतिनिधियों के साथ साझेदारी में कार्य करना ही प्रोजेक्ट अक्षय की मूल कार्यनीति है. तपेदिक (टी.बी.) नियंत्रण के लिये सिर्फ चिकित्सकीय कार्यक्रम पर्याप्त नहीं हैं क्योंकि अनेक अन्य विकास-सम्बंधित छेत्रों और अन्य रोगों या जीवनशैलियों से तपेदिक (टी.बी.) होने का खतरा बढ़ता है, जैसे कि तपेदिक (टी.बी.) और गरीबी, कुपोषण, मधुमेह, तम्बाकू सेवन, एच.आई.वी. आदि से सम्बन्ध, जिनके कारणवश तपेदिक (टी.बी.) नियंत्रण एक पर्वतीय चुनौती बना हुआ है. इन कड़ियों को चिन्हित करना और उनपर तपेदिक (टी.बी.) नियंत्रण कार्यक्रमों के जरिए सक्रीय रूप से कार्य करना ही जन स्वास्थ्य के लिये श्रेयस्कर है.

डॉ विल्सन ने कहा कि "हमारे देश के सरकारी तपेदिक (टी.बी.) नियंत्रण कार्यक्रम ने उल्लेखनीय कार्य किया है परन्तु अब यह सर्वविदित है कि सफलतापूर्वक तपेदिक (टी.बी.) नियंत्रण सिर्फ सरकार द्वारा नहीं किया जा सकता है. विभिन्न कार्यछेत्रों के अनेक साझेदारों को मिलजुल कर तपेदिक (टी.बी.) नियंत्रण में योगदान देना चाहिए जिससे कि सूचना और सेवाएँ दोनों लोगों तक पहुंचे, जवाबदेही बढ़े और प्रभावित समुदाय सशक्त हो कर भागीदार बने. यही प्रोजेक्ट अक्षय करने की कामना करता है."

जिन लोगों तक तपेदिक (टी.बी.) सम्बंधित सूचनाएँ और सेवाएँ वर्तमान में नहीं पहुँच रही हैं, वें प्रोजेक्ट अक्षय के विशेष केंद्रबिंदु हैं, जिनमें जन-जातियां, बच्चे, महिलाएं, जटिल भौगोलिक छेत्रों में जहां आवागमन मुश्किल है वहाँ रहने वाले लोग, और अन्य लोग जैसे कि एच.आई.वी. और तपेदिक (टी.बी.) दोनों से संक्रमित लोग आदि शामिल हैं.

तपेदिक (टी.बी.) और अन्य विकास सम्बंधित या रोगों से जिससे तपेदिक (टी.बी.) का सम्बन्ध है, उन कड़ियों पर प्रभावकारी कार्य हेतु 'द यूनियन' प्रयासरत है.

डॉ विल्सन ने कहा कि "तपेदिक (टी.बी.) एवं गरीबी और गैर-संक्रामक रोगों की कड़ियों पर सफलतापूर्वक कार्य करना और अनेक कार्यछेत्रों के साथ प्रभावकारी तपेदिक (टी.बी.) नियंत्रण के लिये साझेदारी में कार्य करना जिससे कि जन स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभ हो, 'द यूनियन' के लिये सिर्फ अभिलाषा ही नहीं है - बल्कि हमने ठोस व्यवस्था बनायीं है जिससे कि प्रोजेक्ट अक्षय के माध्यम से इन कार्यक्रमों को निपुणता से क्रियान्वित किया जा सके." 'द यूनियन' के दक्षिण-पूर्वी एशिया के कार्यालय से ही विश्व स्वास्थ्य संगठन का तपेदिक (टी.बी.) और गरीबी सह-समूह का सचिवालय, और तपेदिक (टी.बी.) सेवा एवं नियंत्रण के लिये राष्ट्रीय साझेदारी का सचिवालय भी क्रियान्वित है. 'द यूनियन' के लिये गैर-संक्रामक रोग विशेष केंद्रबिंदु रहे हैं जैसे कि तम्बाकू नियंत्रण.

प्रोजेक्ट अक्षय को विभिन्न प्रदेशों में लागू करने के लिये 'द यूनियन' के मुख्य साझेदार, जो ग्लोबल फंड अनुदान के सह-प्राप्तकर्ता है, निम्नलिखित हैं:
 - कैथोलिक बिशप्स कांफेरेंस ऑफ़ इंडिया - कोयालिशन फॉर एड्स एंड रिलेटेड डिसीजेस
- कैथोलिक हेल्थ असोसियेशन ऑफ़ इंडिया
- क्रिश्चियन मेडिकल असोसियेशन ऑफ़ इंडिया
- इमानुएल हॉस्पिटल असोसियेशन
- ममता हेल्थ इंस्टीटयूट फॉर मदर एंड चाइल्ड (ममता)
- ममता सामाजिक संस्था
- पोपुलेशन सर्विसेस इंटरनैशनल
- रिसोर्स ग्रुप फॉर एजूकेशन एंड अड्वोकेसी फॉर कम्युनिटी हेल्थ (रीच)
- वोलंटरी हेल्थ असोसियेशन ऑफ़ इंडिया

डॉ सरबजीत चढ्ढा, जो इस प्रोजेक्ट अक्षय के निदेशक हैं, ने कहा कि "तपेदिक (टी.बी.) सम्बंधित सेवाएँ सर्वव्यापी हों और सबकी पहुँच में हों, इसी उद्देश्य से प्रोजेक्ट अक्षय व्यापक तपेदिक (टी.बी.) नियंत्रण के लिये समर्थन जुटाने, संचार माध्यमों का पर्याप्त और समोचित उपयोग करने, और जनमत जुटाने के लिये प्रयासरत है. साझेदारों के सक्रिय योगदान से प्रोजेक्ट अक्षय, अनेक गतिविधियों के जरिए समुदाय को तपेदिक (टी.बी.) नियंत्रण में समर्थ और सशक्त करेगा, राजनीतिक और प्रशासनिक समर्थन के लिये आवाज़ उठाएगा, समस्त स्वास्थ्यकर्मियों की भागीदारी से तपेदिक (टी.बी.) कार्यक्रमों की समुदाय में पहुँच बढ़ाएगा, दवाओं और जांच के सही और विवेकपूर्ण इस्तेमाल का समर्थन करेगा, और तपेदिक (टी.बी.) से सम्बंधित राष्ट्रीय प्राथमिकता के छेत्रों में प्रशिक्षण आयोजित करेगा."

अपने नौ साझेदारों के साथ 'द यूनियन' सुचारू और पूर्वनियोजित ढंग से प्रोजेक्ट अक्षय को लागू कर सके इसीलिए 'द यूनियन' ने ७३ कार्यक्रम प्रबंधकों, सहायक कार्यक्रम प्रबंधकों, जिला समन्वयकों और वित्तीय प्रबंधकों के लिये ५ दिवसीय प्रशिक्षण आयोजित किया. इस प्रशिक्षण में, तपेदिक (टी.बी.) एवं तपेदिक (टी.बी.) नियंत्रण प्रणाली से सम्बंधित मूल जानकारी, प्रोजेक्ट गतिविधियाँ, रेकॉर्डिंग और रपट आदि विषय शामिल थे. इस प्रशिक्षण में जिन जिलों में प्रोजेक्ट अक्षय लागू होना है, उन जिलों के जिला तपेदिक (टी.बी.) अधिकारी भी सक्रीय रूप से शामिल हुए, और प्रशिक्षण के अंत में हर जिले ने अपनी गतिविधि योजना भी बनायीं.

  डॉ नेविन विल्सन ने कहा कि "तपेदिक (टी.बी.) जैसे संक्रामक रोग एक व्यक्ति से दुसरे को फैलते हैं और धीरे धीरे अनेक लोगों को संक्रमण हो जाता है. प्रोजेक्ट अक्षय के जरिए हम इस प्रक्रिया को उलटने की कोशिश कर रहे हैं - तपेदिक (टी.बी.) सम्बंधित जानकारी फ़ैलाने का प्रयास कर रहे हैं, लोगों को यह बता रहे हैं कि तपेदिक (टी.बी.) का पक्का इलाज उपलब्ध है, और लोगों को सशक्त होकर इन सेवाओं से लाभान्वित होना चाहिए. हमारी आशा है कि इस प्रोजेक्ट के जरिए हम करोड़ों लोगों तक पहुँच पायेंगे और तपेदिक (टी.बी.) से अनेक जीवन बचा पाएंगे."

बाबी रमाकांत - सी.एन.एस.

नागरिकों की मांग: भारत परमाणु कार्यक्रम बंद हो

लोगों में जापान में हुई परमाणु त्रासदी पर संवेदना जगाने, जापान के लोगों के साथ सहानुभूति व्यक्त करने, और भारत के परमाणु कार्यक्रम को बंद करने के लिये लखनऊ में आज पी.एम.टी कॉलेज, हजरतगंज में परिचर्चा और परिवर्तन चौक पर मोमबत्ती प्रदर्शन आयोजित किया गया.

जापान में हुई परमाणु आपात स्थिति के बाद तो इस बात पर किसी संदेह का प्रश्न ही नहीं उठता है कि दुनिया में सभी परमाणु कार्यक्रमों को, चाहे वो सैन्य या उर्जा के लिये हों, उनको जितनी जल्दी संभव हो उतनी जल्दी बंद करना होगा. इन परमाणु ऊर्जा-घरों में दुर्घटनाओं और सैन्य हमले (हिरोशिमा-नागासाकी पर अटम बम) की वजह से मानवजाति ने सिर्फ अपूर्व, भयानक और अदम्य त्रासदी ही देखी है, जिसको असंख्य प्रभावित लोगों ने सदियों तक झेला है. यह तो स्पष्ट है कि परमाणु शक्ति चाहे वो ऊर्जा बनाने में लगे अथवा बम, यह सबसे खतरनाक विकल्प है. इसमें कोई शक नहीं कि समय रहते बिना विलम्ब दुनिया में परमाणु निशस्त्रीकरण हो जाना चाहिए जिससे कि 'सुरक्षा', 'ऊर्जा पूर्ति' या 'तकनीकि विकास' के नाम पर भयावही परमाणु हादसे मानवजाति को अब और न झेलने पड़ें.

हमारी मांग है कि भारत-अमरीका परमाणु समझौता और अन्य परमाणु कार्यक्रमों को भी मानवता और विश्व शान्ति के लिये तुरंत बंद किया जाए.

हिरोशिमा और नागासाकी पर हुए अटम बम हमले, जो इतिहास के सबसे वीभत्स त्रासदी रहे हैं, के ६५ साल के बाद भी जिस देश ने इन हमलों को अंजाम दिया था, आज तक उस देश अमरीका ने माफ़ी नहीं मांगी है. जिस उत्साह के साथ भारत, भारत-अमरीका परमाणु समझौते को लागू कर रहा है, यह अत्यंत चिंता का विषय है.

पर्यावरण के लिए लाभकारी तरीकों से उर्जा बनाने के बजाय भारत परमाणु जैसे अत्यंत खतरनाक और नुकसानदायक ऊर्जा उत्पन्न करने के तरीकों को अपना रहा है. विकसित देशों में परमाणु ऊर्जा एक असफल प्रयास रहा है. विश्व में अभी तक परमाणु कचरे को नष्ट करने का सुरक्षित विकल्प नही मिल पाया है, और यह एक बड़ा कारण है कि विकसित देशों में परमाणु ऊर्जा के प्रोजेक्ट ठंडे पड़े हुए हैं. भारत सरकार क्यों भारत-अमरीका परमाणु समझौते को इतनी अति-विशिष्ठ प्राथमिकता दे रही है और इरान-पाकिस्तान-भारत तक की गैस पाइपलाइन को नकार रही है, यह समझ के बाहर है.

किसी भी देश क लिए ऊर्जा सुरक्षा के मायने यह हैं कि वर्तमान और भविष्य की ऊर्जा आवश्यकता की पूर्ति इस तरीके से हो कि सभी लोग ऊर्जा से लाभान्वित हो सकें, पर्यावरण पर कोई कु-प्रभाव न पड़े, और यह तरीका स्थायी हो, न कि लघुकालीन. इस तरह की ऊर्जा नीति अनेकों वैकल्पिक ऊर्जा का मिश्रण हो सकती है जैसे कि, सूर्य ऊर्जा, पवन ऊर्जा, छोटे पानी के बाँध आदि, गोबर गैस इत्यादि.

जापान ने कभी भी परमाणु बम नहीं बनाया पर परमाणु शक्ति का ऊर्जा के लिये इस्तेमाल किया था. परमाणु ऊर्जा भी कितनी खतरनाक हो सकती है यह जापान में हुए परमाणु आपात स्थिति से आँका जा सकता है. भारत में न केवल अनेकों परमाणु ऊर्जा-घर हैं बल्कि परमाणु बम भी है - और दुनिया में सबसे अधिक संख्या में गरीब लोग हैं. न केवल परमाणु शक्ति अत्यंत खतरनाक विकल्प है, भारत जैसे देशों के लिये परमाणु शक्ति में निवेश करना, लोगों की मूल-भूत आवश्यकताओं को नज़रंदाज़ करके 'सुरक्षा', 'ऊर्जा' के नाम पर ऐसा समझौता करने जैसा है जिसके कारणवश लोग कई गुना अधिक मार झेल रहे हैं.

भारत में शायद ही कोई ऐसा परमाणु ऊर्जा घर हो जहां कोई न कोई दुर्घटना न हुई हो. जिन स्थानों पर भारत में परमाणु कचरे को डाला जाता है, जहां परमाणु ऊर्जा घर लगे हुए हैं, जहां परमाणु खान हैं, आदि, वहाँ पर रहने वाली आबादी रेडियोधर्मिता का भीषण कुप्रभाव झेल रही है. उदाहरण के तौर पर कुछ महीने पहले ही कईगा परमाणु केंद्र में ५० से अधिक लोग रेडियोधर्मी त्रिशियम का प्रकोप झेले थे.

परमाणु दुर्घटनाओं की त्रासदी संभवत: कई पीढ़ियों को झेलनी पड़ती है जैसे कि भोपाल गैस काण्ड और हिरोशिमा नागासाकी त्रसिदियों को लोगों ने इतने बरस तक झेला. हमारी मांग है कि भारत बिना-देरी शांति के प्रति सच्ची आस्था का परिचय दे और सभी परमाणु कार्यक्रमों को बंद करे.

 [एस.आर.दारापुरी, अरुंधती धुरु, रंजित भार्गव, प्रो० रंजित भार्गव, प्रो० एम.सी.पन्त, प्रो० रमा कान्त, डॉ० संदीप पाण्डेय, आनंद त्रिपाठी, एवं अन्य नागरिक]

 परमाणु निशस्त्रीकरण और शांति के लिये गठबंधन, शांति एवं लोकतंत्र के लिये लखनऊ चिकित्सकों का समूह, जन-आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय, आशा परिवार एवं लोक राजनीति मंच के संयुक्त तत्वावधान मे आयोजित

भूमि अधिग्रहण कानून और जनहित

अंग्रेजों ने यह कानून अपनी अंग्रेजी हुकुमत को फायदा पहुँचाने के लिए बनाया था। दुर्भाग्यवश आजादी के वक्त हमने अंग्रेजों द्वारा बनाए गये इस किस्म के दमनकारी कानूनों को रद्द नहीं किया। आजादी के पहले इस तरह के कानून अंग्रेजी हुकुमत को दमनकारी शक्तियाँ प्रदान कर फायदा पहुँचाते थे, आजादी के बाद ये कानून सत्ताधारी नेताओं और अफसरों को फायदा पहुँचाते हैं। जनता आजादी के पहले भी पिसती थी, जनता आजादी के बाद भी पिस रही है !

इसीलिए हमारी केन्द्रीय सरकार से माँग है कि आप भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन करके गाँव के लोगों की खुली बैठक यानि ग्रामसभा को यह अधिकार दें कि ग्राम सभा तय करे कि किसी भी परियोजना के लिए जमीन देनी है या नही देनी और अगर देनी है तो किन शर्तों पर देनी है। ग्राम सभा का निर्णय अंतिम होना चाहिए।

इस विचार को लागू करने के लिए हमारे विस्तृत सुझाव निम्न है :-

१- भूमि अधिग्रहण कानून से कलेक्टर कि भूमि अधिग्रहण करने कि शक्तियाँ रद्द की जाएँ।

२. यदि कोई कम्पनी या केंद्र सरकार या राज्य सरकार किसी गाँव की जमीन अधिग्रहण करना चाहती है, तो वह उस गाँव की पंचायतों में इस बावत के लिए आवेदन दे।

स्वराज
अभियान

आतंक एवं सम्प्रदायक मामलों में निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच आवश्यक

"आतंक एवं सम्प्रदायक मामलों में निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच आवश्यक है" कहना है सुरेश खैरनार का, जो कि वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता हैं और ६० से अधिक आतंक एवं सांप्रदायिक मामलों में तथ्यान्वेषण समिति के सदस्य रहे हैं. भागलपुर दंगे १९८९ के बाद से सुरेश खैरनार सांप्रदायिक सद्भावना के लिये कार्यरत हैं. मालेगांव २००६, नांदेड २००६, नागपुर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मुख्यालय २००६, मालेगांव २००८, खैरलांजी २००८ (दलित उत्पीड़न), मक्का मस्जिद २००६, बटला हाउस २००८ और ६० से अधिक अन्य सांप्रदायिक मामलों में सुरेश खैरनार तथ्यान्वेषण समिति के सदस्य रहे हैं.

बाबरी मस्जिद विध्वंस १९९२ के पहले सांप्रदायिक दंगों को इस्तेमाल किया जाता था जिससे कि हिन्दू-मुस्लिम समुदाय का ध्रुवीकरण हो सके. बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद देश में आतंकी हमलें बढ़ गए हैं जिनसे समुदाओं के बीच ध्रुवीकरण होता रहा है. नान्देद २००६ देश में पहला तथाकथित 'आतंकी हमला' था जो हिंदुत्व कट्टरपंथी दलों ने अंजाम दिया और सामने आया था. यदि भारत सरकार ने पर्याप्त कदम उठाये होते तो मालेगांव, अजमेर शरीफ, समझौता एक्सप्रेस, और मक्का मस्जिद जैसे हादसे नहीं होते और हिन्दू मुस्लिम समुदाओं के बीच जो ध्रुवीकरण हुआ, वो न होता. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के असीमानंद जी के अपराध आत्म-स्वीकार करने के बाद तो ये साफ हो गया है कि किस हद तक हिंदुत्व कट्टरपंथी, आतंकी हमलों में शामिल हैं.

भारत सरकार की जो जांच संस्थाएं है जैसे कि सेंट्रल ब्यूरो आँफ इन्वेस्टीगेशन (सी.बी.आई.) आदि, उन्होंने हमारी सभी रपट को नज़रंदाज़ कर दिया है. यदि उन्होंने इन रपट को जरा भी तवज्जो दी होती तो संभवत: जो नुक्सान हुआ है वो न होता!

हमारा मानना है कि सबसे बड़ा आतंकवाद है किसी भी समुदाय को शक की नज़र से देखना कि वो राष्ट्रद्रोही है. किसी भी समुदाय को असुरक्षित महसूस कराना देश की सुरक्षा को खतरा पैदा करना है. इसीलिए ऐसे कृतियों वाले हिंदुत्व संस्थाओं और व्यक्तियों को राष्ट्र-द्रोही मानना चाहिए और संस्थाओं पर रोक लगनी चाहिए जैसे कि भारत सरकार ने 'सिमी' और कुछ अन्य इस्लामवादी संस्थाओं पर लगायी है. ये इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि आतंकी हमलों के बाद गिरफ्तार हुए मुसलमानों को भारत सरकार ने अधिकाँश महज़ शक की बुनियाद पर पकड़ा है जबकि कुछ ऐसे हादसों में ठोस सबूत सामने आ रहे हैं कि इनमें हिंदुत्व ताकतों का हाथ था.

हमारा मानना है कि ऐसे आतंक और सांप्रदायिक मामलों की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच होनी चाहिए जिससे कि सत्य सार्वजनिक हो सके कि इन हादसों को कौन अंजाम दे रहा है.

सुरेश खैरनार

ग्राम सभा बनाम ग्राम पंचायत

भारत जैसे विशाल और विविधताओं वाले देश में बहुत ही पुराने समय से ग्राम सभाओं का अस्तित्व रहा है। भारत के वेद ऋग्वेद में "सभाओं" के रूप में एक स्वायत्ताशाली लोकतांत्रिक संस्थाओं का उल्लेख मिलता है। वैसे बौद्ध काल में इसकी व्यापकता और स्वीकार्यता सबसे अधिक रही है। उस समय प्रधान/मुखिया/सरपंच को ग्राम भोजक कहा जाता था ग्राम भोजक ग्राम सभा के तय फैसलों का अनुपालन करवाता था वह तालाब, घाट, कुंए, आंतरिक सुरक्षा, न्याय, शिक्षा आदि कार्यों की देख रेख करता था, ग्राम सभा को अधिकार होने से सामूहिक निर्णय लेने से ग्राम समुदाय स्वावलंबी और सुदृढ़ था।

कार्लमार्क्स ने अपनी महानतम रचना "पूंजी" में लिखा है कि "प्राचीन काल से चले आ रहे ये छोटे-छोटे भारतीय ग्राम समुदाय-सामुदायिक ढ़ग से संयुक्त स्वामित्व तथा किसान और मजदूरों के श्रम विभाजन के सिद्धांत पर आधारित है। ये ग्राम समुदाय अपने आप में परिपूर्ण तथा आत्मनिर्भर है। एशियाई समाज में जो सुदृढ़ता, संगठन तथा स्थायितत्व पाया जाता है, उसका मुख्य श्रेय इन स्वावलंबी ग्राम समुदायों की उत्पादन प्रणाली को ही जाता है।

अरविन्द मूर्ति

हम आपको कर्ज देना चाहते हैं

जान पर्किन्स की पुस्तक ‘कन्फ्रेंस ऑफ़ ऐन इकोनोमिक हिट मैन’ प्रकाशित होते ही सारी दुनिया में चर्चित हो गयी। यह पहला अवसर था जब विश्व बैंक तथा अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं से जुड़े किसी वरिष्ट अधिकारी ने बताया था कि किस तरह उसने साम्राज्यवाद के मुनाफे के लिए तमाम देशों की अर्थव्यवस्था को तहस नहस कर दिया। इसने तीसरी दुनिया के समुदाह को एक दृष्टि दी ताकि वे अपने दे के उन ‘गणमान्य योजनाकारों’ की शिनाख्त कर सके जो विदेशी एजेंटों के रूप में काम कर रहे हैं ...प्रस्तुत है इस पुस्तक पर विष्णु र्मा की टिप्पणी...

किसी देश को गुलाम बनाने का आसान उपाय। वल्र्ड बैंक या एशिया विकास बैंक से उसे कर्ज दिलायें। कर्ज बड़ा होना चाहिए। इतना बड़ा कि प्राप्तकर्ता देश इसे कभी चुका ही न सके। फिर कर्ज के साथ यह शर्त भी रख दीजिए कि इसका 90 प्रतिशत हिस्सा विकसित देश की बड़ी कंपनियों को देश के आर्थिक ढांचे का निर्माण करने को दिया जाय। बस फिर देखते ही देखते देश आपकी मुट्ठी में आ जाएगा। जो चाहे कीजिए।

यहां बताया गया प्रयोग भविष्य के लिये नहीं हैं बल्कि इसका इस्तेमाल तो लगातार होता रहा है। बहुत पुरानी बात नहीं है जब अंग्रेजों ने ठीक इसी तरह भारत के रजवाड़ों को कर्ज देकर उन्हें अपना गुलाम बना लिया था। इसलिए जान पर्किन्स की किताब ‘कन्फ्रेंन ऑफ़ ऐन इकोनोमिक हिटमैन’ हमें चौंकाती नहीं हैं। हां, यह पुस्तक कर्ज देने और गुलाम बनाने की नवऔपनिवेशक तकनीक को सरल ढंग से प्रस्तुत जरूर करती है। यह भी बताती है कि उत्तर औपनिवेशिक काल एक बेतुका मजाक है जहां साम्राज्यवादी शराब नये लेबल के साथ तीसरी दुनिया की संसदीय दुकानों को धड़ल्ले से बेची जाती है। अब कर्ज के बदले आपको सिर्फ बाजार नहीं देना है बल्कि एक पूरी की पूरी ‘लोकतांत्रिक’ व्यवस्था को भी अपने यहां लागू करना है जिसका मतलब है बड़ी कंपनियों को देश की लूट की आजादी। फिर चाहे इससे देश की बहु संख्यक जनता गरीबी और भुखमरी से मर ही क्यों न जाय।

उपन्यास की शैली में लिखी अपनी पुस्तक में जान पर्किन्स बताते हैं कि अमरीका और उसकी निजी कंपनियां दो अलग संस्थाएं न होकर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। जो काम वहां की सरकार ‘राजनयिक’ कारणों से नहीं कर सकती उसे वहां की कंपनियां करती हैं। दोनों का मकसद है साम्राज्य का निर्माण करना। इसलिये तो जान पर्किन्स अमरीकी राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी के लिए काम करते हैं लेकिन वेतन एक निजी कंपनी से पाते हैं।

कंपनी में वे अर्थशास्त्री हैं और उनका काम है तीसरी दुनिया के देशों के विकास की संभावनाओं वाली रिपोर्ट तैयार करना और वर्ल्ड बैंक या एशिया विकास बैंक को कर्ज देने के लिए मनाना। उनका काम यहां खत्म नहीं होता बल्कि यहां से तो शुरू होता है। उनका अहम मकसद यह सुनिश्चित करना है कि प्राप्तकर्ता देश दिवालिया हो जाय ताकि वह हमेशा के लिए वर्ल्ड बैंक की मुट्ठी में आ जाय।

1971 में ट्रेनिंग के बाद पार्किन्स इंडोनेशिया पहुँचते है। देश अभी सभी भीषण रक्तपात के दौर से गुजरा है। सेना ने सत्ता पर कब्जा कर लिया है और लगभग 10 लाख लोगों की जानें गई हैं जिसमें से अधिकतर कम्युनिस्ट या समाजवादी हैं। सैनिक तानाशाह जनरल सुहार्तो सत्ता में बने रहने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है और अमरीका को यह पसंद हैं। पहुँचते ही पर्किन्स को समझा दिया जाता है कि किसी भी हालत में इंडोनेशिया चीन या वियतनाम के रास्ते नहीं जाना चाहिए। उनका बोस कहता है ‘हम यहां एक देश को समाजवाद से बचाने के लिए आए है। हमारी जिम्मेदारी है कि हम इंडोनेशिया को वियतनाम, कंबोडिया और लाओस नहीं बनने दें। हम यहां के बच्चों का खून अपने हाथों में नहीं लेंगे। हमारी जिम्मेदारी है कि यहां के मासूम बच्चे हंसिया-हथौड़ा वाले लाल झंडे के नीचे जीने को मजबूर न हों।’

पर्किन्स रिपोर्ट बनाते हैं, वर्ल्ड बैंक कर्ज देता है, और सुहार्तो अमरीका का वफादार बन जाता है। आज इस देश पर 132 बिलियन डॉलर का कर्ज है और अर्थतंत्र पूरी तरह अमरीका के नियंत्रण में है। लेकिन तब क्या होता है कोई देश कर्ज लेना चाहता। अजी, अव्वल तो कर्ज लेना आपका चुनाव नहीं बल्कि विवशता है। दूसरे यदि आप नहीं मानते तो आपकी हत्या भी हो सकती है। पनामा के टोरीजोस का किस्सा याद आया ? 1972 में पर्किन्स को पनामा भेजा जाता हैं। वहाँ के हालात ‘खराब’ हैं क्योंकि वहाँ राष्ट्रप्रमुख, ओमर टोरीजोस, संप्रभुता की बात करता है। उसका मानना है कि देश के संसाधनों पर देश का ही अधिकार होना चाहिए। पर्किन्स अपनी पहली मुलाकात में अमरीका के साथ सहयोग करने के फायदे गिनाते हैं। टोरीजोस का सीधा जवाब है ‘मैं अंतर्राष्ट्रीय ऋण कारोबार को अच्छी तरह समझता हूँ। आप यहां वह नहीं कर सकते जो अभी-अभी इंडोनेशिया में करके आये हैं। मैं समझता हूं कि आपका साथ देने से मैं बहुत मालामाल हो सकता हूँ लेकिन मेरे लिए पनामा की जनता का हित खुद के हित से ज्यादा अहम हैं।’

1977 में टोरीजोस ने अमरीका को टोरीजोस-कार्टर संधि पर हस्ताक्षर करने को मजबूर कर दिया। इसके बाद पनामा ने पनामा नहर पर 1999 तक क्रमश: अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। पर्किन्स बताते हैं कि अमरीका ने इस ‘अपमान’ का बदला 1981 में उनकी हत्या करवा कर लिया।

आगे अपनी पुस्तक में वे उस गुप्त समझौते का ‘खुलासा’ करते हैं ‘जिसने दुनिया की दिशा बदल दी’। यह समझौता सऊदी अरब के सऊद परिवार के साथ था। इस समझौते के तहत यह तय हुआ कि सऊद परिवार अपने पेट्रो-डॉलर (पेट्रोल व्यवसाय से प्राप्त धन) को अमरीकी बांड में निवेश करेगा। बांड पर लगातार फायदा होता रहे इसलिए वह यह भी सुनिश्चित करेगा कि अमरीका को तेल की सप्लाई कभी न रूके। बदले में अमरीका इस बदनाम परिवार को सऊदी अरब की सत्ता पर बनाये रखेगा।

पर्किन्स बताते हैं कि पुस्तक लिखने की योजना उन्होंने बहुत पहले बना ली थी लेकिन जैसे ही उनके बोस को पता चला उसने उन्हें पैसे देकर चुप करा दिया। ‘पैसा’ वह स्वीकारते हैं ‘उनकी कमजोरी रही है।’ लेकिन जब ९/११ का हादसा हुआ तो उसके मलबे के पास खड़े होकर उन्होंने प्रण लिया कि वे सच कह कर रहेंगे।

यहीं आकर हम भी पर्किन्स के उद्देश्यों पर शक किये बगैर नहीं रह सकते। हमें सोचना पड़ता है कि ‘सच’ के खुलासे के लिए क्या इतने लोगों की बलि जरूरी थी। या यह भी हो सकता है कि उनकी ‘कमजोरी’ उनकी प्रेरणा बन गयी हो ? ९/११ ने दुनिया को बदल डाला। अतिरेक में अमरीका ने अफगानिस्तान और इराक के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। लेकिन कुछ समय बाद ही उसे अपनी गलती का एहसास होने लगा। उसके लगातार कमजोर होते अर्थतंत्र को 2006 से शुरू हुई मंदी ने बुरी तरह हिलाकर रख दिया। इसके बाद यह तय था कि अमरीका का साम्राज्यवादी एजेंडा नियोजित प्रतिफल नहीं ला सकता। यह एजेंडा पुराना हो चुका है। पुराने एजेंडे पर कुछ भी लिखने के लिए आप स्वतंत्र थे। और कुछ ‘रहस्योदघाटन’ कर आप बाजार में बिक भी सकते थे।

विष्णु
र्मा

फिरकापरस्ती बनाम युवा कारवाँ

अब इस बात में कोई सन्देह नहीं है कि भारत एक नाजुक दौर से गुजर रहा है, फिरकापरस्त ताकतें हमारी एकता और अखण्डता को क्षीण-क्षीण करना चाहती हैं। वो एक ऐसे मौके की तलाश में घूम रही हैं जिससे वह देश में फिर से एक नई सांप्रदायिक हिंसा का अध्याय जोड़ सकें। यहाँ हर कदम पर सांप्रदायिक सोच के लोग मांस ढूंढ़ते गिद्ध की भांति अपना खेल खेलने को उत्सुक हैं। इन सब के बाद भी हमारे युवाओं ने ‘न हिन्दू न मुसलमान, मेरा भारत महान’ का नारा बुलन्द करके एक सकारात्मक संकेत दिया हैं।

इस मुल्क ने फिरकापरस्ती ताकतों के बहुत से रूप देखें हैं। हमने गुजरात को गोधरा बनते देखा है। हमने उ0 प्र0 का अयोध्या बनते देखा है। हमने महाराष्ट्र को बंबई बनते देखा है। लेकिन इन सभी शहरों के सांप्रदायिक दंगों में एक बात गौर करने वाली यह थी कि युवाओं ने हमेशा इनसे दूरी बनाये रखी है। दंगों के असली गुनाहगार वही लोग यही रहे हैं जो अपने आप को बुद्धजीवी होने का प्रचार-प्रसार हर मंच पर करते रहे हैं। अब तक हुए सांप्रदायिक दंगो का नेतृत्व वरिष्ठ नागरिकों ने किया जबकि युवाओं के जज्बातों को गर्म करके उनकी इच्छा विरूद्ध इसमें जबरदस्ती घसीटा गया है।

हमारे मुल्क के सामने आतंकवाद, उग्रवाद नक्सलवाद, उल्फा व बोडो उग्रवाद आदि की हिंसक गतिविधियाँ मुँह फैलाये हुए खड़ी है। देश का कोई भी राज्य यहाँ तक के राजधानी दिल्ली भी इनकी पहुँच से दूर नहीं है। फिर भी इन सबसे खतरनाक हमारे देश के भीतर सांप्रदायिक सोच के लोगों का मौजूद होना है। आतंकवाद, नक्सलवाद, उग्रवाद और अलगाववाद के खिलाफ तो सारा देश एकजुट दिखाई देता है, किन्तु जब सांप्रदायिकता की हवा चलती है तो फिर धीरे-धीरे उसे आंधी और आंधी से तूफान बनने में बहुत कम समय लगता है। सांप्रदायिकता की आग खोखले पेड़ की तरह चन्द लम्हों में तबाही का मंजर दिखाई देती है। हमारे देश के युवाओं का संगठित प्रयास उन सांप्रदायिक हवाओं के खिलाफ उठ खड़े होना है, जो हमारे आपसी भाईचारे के मिजाज को नफरत के फिजाओं में बदलना चाहती है।

सांप्रदायिकता जैसे अति संवेदनशील मुद्दें पर युवाओं ने जो खामोशी अपनाई है। नि:सन्देह समाज और राष्ट्र के लिये एक प्ररेक संदेश है। लेकिन मुझे लगता है कि फिरकापरस्ती के मुद्दें पर युवाओं की खामोशी से ज्यादा इसके विरूद्ध आवाज उठाने आवश्यकता अधिक है। अब समय आ गया है कि अपने देश से सांप्रदायिकता और फिरकापरस्ती को युवाओं द्वारा जड़ से उखाड़ फेंक दिया जाये।

-आदिल खान ‘सरफरो
'

कुछ बजट पूर्व सुझाव

भारत दुनिया के कई अन्य देशों की तुलना में, जो न तो अपने लोकतंत्र के लिए जाने जाते हैं और न ही भारत की तरह आर्थिक या सैन्य शक्ति हैं, अपने गरीबों की स्थिति सुधारने में क्यों नाकाम रहा है ? वैश्वीकरण, निजीकरण व उदारीकरण की नई आर्थिक नीति ने पैसे वालों के लिए तो कमाल किया है किन्तु बड़ी संख्या में गरीबों के लिए, जिनके लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना लागू की गई है, तो निराशा ही हाथ लगी है। मनरेगा की गारण्टी उस अर्थ में तो गारण्टी नहीं है जिस अर्थ में सेवा क्षेत्र के किसी व्यक्ति को माह के अंत में अपनी तनख्वाह मिल जाती है अथवा किसी निजी कम्पनी को सार्वजनिक-निजी भागीदारी में निश्चित मुनाफा पहले से ही तय होता है। गरीब कुपोषण व भुखमरी से, ऊँचे मातृ व बाल मृत्यु दर से, कर्ज के बोझ में आत्महत्या से या फिर नक्सल विरोधी कार्यवाइयों में मारा जा रहा है। क्या हमने गरीबी के बजाए अपने गरीबों को खत्म करने के यही रास्ते चुने हैं ? अभी जनवरी, 2011 में कलिंगनगर, उड़ीसा, में 12 वर्षीय जो लड़की पुलिस की गोली का शिकार हुई वह नक्सली कैसे हो सकती है।

हमें अपने बजट व नियोजन का इस दृष्टि से भी मूल्यांकन करने की आवश्यकता है कि उनसे गैर-बराबरी बढ़ेगी या घटेगी, समाज में असंतोष बढ़ेगा या घटेगा ? भोजन, चिकित्सा, शिक्षा, काम व सामाजिक सुरक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं सभी के लिए सार्वभौमिक रूप से उपलब्ध होनी चाहिए। समाज के वंचित तबकों के लिए तो विशेष अवसर उपलब्ध कराने की जरूरत है।

न्यूनतम मजदूरी की दरों को संशोधित किए जाने की जरूरत है। हाल ही में ग्रामीण विकास विभाग द्वारा मनरेगा के तहत दी जाने वाली मजदूरी की दरों में मुद्रा स्फीति व उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर संशोधन किया गया है। मजदूरी दर पर मुद्रा स्फीति के प्रभाव से असल मजदूरी में गिरावट तो समझ में आती है किन्तु मुख्य मुद्दें का समाधान रह जाता है। 1957 में भारतीय मजदूर कांफ्रेंस द्वारा प्रस्तावित तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समर्थित न्यूनतम आवश्यकता आधारित मानकों पर न्यूनतम मजदूरी को तय किया जाना चाहिए। मनरेगा मजदूरों की अलग श्रेणी बनाना चिंताजनक है तथा भेदभाव को संस्थागत रूप देना है। कायदे से तो जो लोग रोटी, कपड़ा व मकान जैसी जरूरतों को पूरा करने के लिए उत्पादन के काम में लगे हैं उनका श्रम मूल्य सबसे अधिक होना चाहिए। सेवा क्षेत्र में काम करने वाले तो दैनिक मजदूरी पर काम कर सकते हैं। यह बात शायद अभी एक जमीन पर न उतारा जा सकने वाला आदर्श ही प्रतीत हो। इसलिए कुछ जन संगठनों व आंदोलनों की व्यवहारिक मांग की न्यूनतम मजदूरी की दर 250 रुपए प्रति दिन कर दी जाए, तो स्वीकार की ही जानी चाहिए।

अपनी खरीद क्षमता की सीमाएं बताते हुए प्रधानमंत्री द्वारा सी. रंगराजन के नेतृत्व में नियुक्त एक विशेषज्ञ समिति ने राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के 75 प्रतित आबादी को कम कीमत पर अनाज दिए जाने के प्रस्ताव को अस्वीकृत कर दिया है। इस दे में गरीब की तादाद जितना सरकार मानने को तैयार है उससे बहुत ज्यादा है। सरकार द्वारा मान्य तेंदुलकर समिति का आंकड़ा ३७.२ प्रतित है जबकि सरकार की ही एक दूसरी एन.सी.सक्सेना समिति के अनुसार यह आंकड़ा 48 प्रतित है। लेकिन सच्चाई शायद राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के आंकड़े के ज्यादा नजदीक है। वर्तमान में अनाज की खरीद 500-550 लाख टन होती है। 2009-10 में खाद्यान्न उत्पादन 2182 लाख टन हुआ। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सुझाव को मानने के लिए खरीद 650 लाख टन होनी चाहिए। यदि सरकार अपनी खरीद नीति में सुधार लाती है तो इस दे के सभी गरीबों को खाद्य सुरक्षा की गारण्टी दी जा सकती है। अभी किसान सरकारी खरीद केन्द्रों पर दिक्कतों का सामना करने के कारण अपना अनाज निजी खरीदारों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी कम दाम में बेच देता है। पिछले रबी सत्र में खरीद ही देर से शुरू हुई। खरीद का विकेन्द्रीयकरण, समय से भुगतान सुनिश्चित करना, किसान से सीधे खरीद, सार्वजनिक वितरण प्रणाली में अन्य मोटे अनाज शामिल किया जाना, आदि, खरीद की प्रक्रिया में और सुधार लाएंगे। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के विस्तार से उत्पादन बढ़ सकता है व कृषि की अर्थव्यवस्था को पुर्नजीवित किया जा सकता है। बिना उत्पादन बढ़ाए खाद्य सुरक्षा की बात नहीं सोची जा सकती है। असल में उत्पादन, खरीद व वितरण को जोड़ कर ही देखा जाना चाहिए। खरीद व वितरण विकेन्द्रित होना चाहिए।

जैसा कि कुछ लोगों द्वारा सुझाव दिया जा रहा है, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के बदले सीधे नकद हतांतरण के विषय में नहीं सोचा जाना चाहिए, क्योंकि परिवारों के स्तर पर खाद्य सुरक्षा मुहैया कराने में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की बहुआयामी भूमिका है। इससे खाद्यान्न उत्पादन को बढ़ावा मिलता है तथा खाद्यान्न के अभाव वाले इलाकों में अनाज उपलब्धता सुनिश्चित होती है। यह भी देखा गया है कि जब अनाज मिलता है तो परिवार के अंदर उसका वितरण ज्यादा ठीक से होता है जबकि नकद पर पुरुष का नियंत्रण रहता है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली को खत्म करने के बजाए उसमें सुधार की आवश्यकता है जैसे खाद्यान्न को उचित कीमत की दुकान तक पहुँचाना, शुरू से अंत तक वितरण की प्रक्रिया का कम्प्यूटरीकरण, पारदर्शिता एवं शिकायत निवारण की व्यवस्थाएं स्थापित करना। तमिलनाडू एवं छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के अनुभव से यह स्पष्ट है कि उपर्युक्त किस्म के कदमों से सार्वजनिक वितरण प्रणाली में होने वाली चोरी को रोका जा सकता है।

यह दुर्भाग्य का विषय है कि कृषि में उद्योग एवं सेवा क्षेत्र से कम वृद्धि दर दर्ज दिखाई जाती है। ऐसा नहीं है कि कृषि में उत्पादन कम है। उत्पादों की जो कीमतें तय की जाती हैं तथा जो मजदूरी दरें व तनख्वाहें तय होती हैं, जो सिर्फ खुले बाजार पर ही निर्भर नहीं हैं, एक विकृत तस्वीर पे करती हैं। बिना सरकार द्वारा विभिन्न किस्म की छूटों को हासिल किए उद्योग जगत एक ँची वृद्धि दर नहीं दर्ज कर सकता। 2009-10 में केंद्र सरकार द्वारा विभिन्न किस्म के आय कर, इत्यादि, पर रुपए 5,02,299 की छूट दी गई जो कुल एकत्रित कर का ७९.५४ प्रतित थी। इसी प्रकार सेवा क्षेत्र बिना बड़ी-बड़ी तनख्वाहों के, जो किए जाने वाले कार्य के समतुल्य नहीं हैं, ँची वृद्धि दर नहीं दर्ज करा सकता। हमें लोगों को कृषि क्षेत्र से उद्योग व सेवा क्षेत्र में ले जाने की कोशि, जो नई आर्थिक नीति का आधार है, छोड़ देनी चाहिए। हमें अपनी ताकत को पहचान कर उसे मजबूत करना चाहिए। कृषि क्षेत्र में अच्छा समर्थन मूल्य व प्राथमिक उत्पादन क्षेत्र में सम्मानजनक आजीविका का अवसर मिलना चाहिए। रेलवे की तरह कृषि का अलग बजट होना चाहिए।

नई आर्थिक नीति मंहगाई व मुद्रा स्फीति की तरह गरीबी को भी नियंत्रित कर पाने में नाकाम है। रु. 500 व रु. 1000 के बड़े नोट 2-3 माह का समय देकर वापस ले लिए जाने चाहिए। इससे सरकार अधिक कर संग्रहित कर पाएगी जो उसे अर्थव्यवस्था में निवेश हेतु चाहिए। भारत में काले धन की अर्थव्यवस्था सफेद धन की अर्थव्यवस्था से तीन गुणा है। बड़े नोटों पर पाबंदी से भ्रष्टाचार पर भी कुछ हद तक रोक लगेगी। वैसे भी इस कदम से 90 प्रतिशत भारतीय प्रभावित नहीं होंगे जो बड़े नोटों का इस्तेमाल ही नहीं करते।

सरकार को अपना काम गैर-सरकारी संस्थाओं को आवंटित नहीं करना चाहिए। राजनेताओं व नौकरशाहों के नजदीक लोग गैर-सरकारी संस्थाएं बना कर बड़े धन वाले काम हड़प लेते हैं तथा भ्रष्ट सरकारी तंत्र का ही विस्तार बन जाते हैं। कायदे से गैर-सरकारी संस्थाओं को तो सरकार का धन मिलना ही नहीं चाहिए क्योंकि वे जनता के प्रति जवाबदेह नहीं हो सकतीं। यदि वे सही अर्थों में गैर-सरकारी संस्थाएं हैं तो उन्हें अपने संसाधन समाज से खड़े करने चाहिए। समाज में ऐसे सम्पन्न लोगों की कमी नहीं है जो अच्छे काम को सहयोग देने को इच्छुक हों।

(ये विचार वित्त मंत्री द्वारा बजट पूर्व सुझाव आमंत्रित करने के लिए गैर-सरकारी संस्थाओं की एक बैठक में 13 जनवरी, 2011, को रखे गए।)

संदीप

भारतीय संविधान में है ग्राम स्वराज्य

उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं लोक राजनीति मंच के प्रदेश अध्यक्षीय मंडल में सदस्य रवि किरण जैन ने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है - और साथ में दुनिया का एक ऐसा देश है जहां पर सबसे अधिक गरीब और कुपोषित लोग हैंकैसे प्रजातंत्र को भागीदारी वाली प्रजातंत्र में परिवर्तित किया जाए, यह एक बड़ा सवाल है

अधिवक्ता जैन लखनऊ में हो रहे पंचायती राज सम्मेलन में व्याख्यान दे रहे थे। पंचायती राज सम्मेलन को लोक राजनीति मंच ने आयोजित किया था जिसमें दो दर्जन से अधिक जन-प्रतिनिधि एवं सौ से अधिक राजनीतिक कार्यकर्ता आये थे।

अधिवक्ता जैन ने कहा कि भारतीय संविधान का आर्टिकल २४३ : कहता है कि "संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी राज्य का विधान मंडल, विधि द्वारा पंचायतों को ऐसी शक्ति एवं प्राधिकार प्रदान कर सकेगा जो उन्हें स्वायत्त शासन की संस्थाओं के रूप में कार्य करने में समर्थ बनाने के लिये आवश्यक हो और ऐसी विधि से पंचायतों को उपयुक्त स्तर पर, ऐसी शर्तों के अधीन रखते हुए, जो उसमें निर्दिष्ट की जाएँ, निम्नलिखित के सम्बन्ध में शक्तियां और उत्तरदायित्व न्याय्गत करने के लिये उपबंध किये जा सकेंगे, अर्थात:
- आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिये योजनायें तैयार करना
- आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय ऐसी स्कीमों को, जो उन्हें सौपी जाएँ, जिनके अंतर्गत वो स्कीमें भी हैं, जो ग्यारहवीं अनुसूची में सूचीबद्ध विषयों के सम्बन्ध में है, कार्यान्वित करना।"

रवि किरण जैन ने कहा कि नगर पालिका और पंचायत दोनों को यह शक्तियां दी गयी हैं कि गाँव और शहर का विकास कितना और कैसा होना चाहिए यह वहाँ के निवासी तय करेंगे

आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के बिना कोई भी योजना तय करना आखिर कहा तक सही है?

बाबी रमाकांत - सी.एन.एस.

लोकतंत्र स्थापित करने के लिये पंचायतें मजबूत हों

पंचायती राज सम्मेलन के प्रथम सत्र में व्याख्यानमाला का आरंभ दिल्ली विश्वविद्यालय एवं लोक राजनीति मंच से सम्बंधित डॉ० अजीत झा से हुआ। पंचायतें अपने आप में मजबूत हों, इसके अलावा लोकतंत्र स्थापित करने का कोई और विकल्प नहीं है। डॉ झा ने कहा कि पंचायत की चर्चा हमारे लोकतंत्र के केंद्र में होनी चाहिए।

अजित झा लखनऊ में हो रहे पंचायती राज सम्मेलन में व्याख्यान दे रहे थे। पंचायती राज सम्मेलन को लोक राजनीति मंच ने आयोजित किया था जिसमें दो दर्जन से अधिक जन-प्रतिनिधि एवं सौ से अधिक राजनीतिक कार्यकर्ता आये थे।

राजनीति में लोक का महत्व हमेशा से नहीं रहा है। राजनीति हथियार से रही है, जो हथियार पर कब्ज़ा कर सकते थे, वो राजनीति पर कब्ज़ा करते रहे। राष्ट्रीय आज़ादी की लड़ाई और देश में लोकतंत्र स्थापित करने की लड़ाई दोनों भारत में आज़ादी से पूर्व एक साथ हुईं। डॉ झा ने कहा कि सारे दुनिया में ये नहीं हुआ, भारत में जनता की आजादी और लोकतंत्र दोनों साथ आये हैं।

डॉ झा ने कहा कि आजादी के पश्चात् कांग्रेस का सत्ता का पक्ष हावी होने लगा और जन आन्दोलन का पक्ष कमजोर होता चला गया। सन १९८० के बाद यदि देखा जाए, तो सभी मुख्य धरा की राजनीति पार्टियाँ या तो प्रदेश में या फिर राष्ट्रीय-स्तर पर सत्ता में रही हैं। इसका अनुभव अच्छा नहीं रहा है, और वो जमात जिनके बल पर वो सत्ता में आई थीं, उनके लिये भी निराशाजनक ही रहा है।

डॉ झा ने कहा कि जो आज राजनीति कर रहे हैं, वो सिर्फ सत्ता पर काबिज हो कर अपने फायदे के लिये जो कर सकते हैं, वो कर रहे हैं। आजादी से पहले महात्मा गाँधी एवं डॉ० बी०आर० आंबेडकर के नेतृत्व में जन-आन्दोलन एवं राजनीति एक हो गयी थी। आजादी के पश्चात् राजनीति की असफलता की वजह से ही जन-आन्दोलन बढ़ने लगे हैं। राजनीति और जन-आन्दोलन का भेद अच्छा नहीं है। जन-आन्दोलन की राजनीति करने के बिना ये अपेक्षित बदलाव संभव नहीं है।

अक्सर लोग प्रश्न करते हैं कि हमारे पास इतनी शक्ति नहीं है कि हम राजनीतिक मैदान में कूदे। डॉ झा का कहना है कि यह प्रश्न नकली है। संघर्ष बनाम राजनीति का मसला नहीं है हमारे सामने, कहना है डॉ झा का। आजादी के पहले भी जब महात्मा गाँधी एवं डॉ० बी०र० आंबेडकर का नेतृत्व आया था तब सामाजिक कार्य एवं राजनीतिक कार्य में फर्क नहीं रहा था, और लोगों को एहसास हो गया था कि ऐसा सवाल कि 'राजनीति बनाम संघर्ष' नकली हैं।

डॉ झा का कहना है कि जनता खुद को संगठित कर रही है, जनता की ही राजनीति है, और जनता ही संघर्षरत है। पंचायती राज वास्तविक में लोकतंत्र हैं - लोकतंत्र का मतलब होता है लोगों की राजनीति पर नियंत्रण।

डॉ झा ने कहा कि २०-२५ देश छोड़ दिए जाए तो संभवत: हर देश की आबादी भारत के एक जिलों जैसी है - तो फिर इन देश-जैसी भारत के जिलों में एक लोकतान्त्रिक प्रणाली क्यों नहीं है?

बाबी रमाकांत - सी.एन.एस.

भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिये लाज़मी है लोकपाल बिल

युवा कार्यकर्ता एवं मग्सेसे पुरुस्कार से सम्मानित अरविन्द केजरीवाल ने कहा कि भ्रष्टाचार पर प्रभावकारी ढंग से अंकुश लगाने के लिये लोकपाल बिल आवश्यक है। लोकपाल बिल जो शिकायत पर संवैधानिक रूप से समय-अवधि के अन्दर ही सजा दिलाने की वादा करता है - उसको पारित होने के लिये अरविन्द केजरीवाल ने जन आन्दोलन को सशक्त करने की मांग की। बिना लोकपाल बिल जैसी नीतियों के भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना मुश्किल है - और - भ्रष्ट अधिकारियों एवं जन-प्रतिनिधियों को सजा दिलवाना भी बहुत जटिल कार्य है।

केजरीवाल ने सभी उपस्थित से कहा कि मोबाइल नंबर ९२२५५-९२२५५ पर एक एस०एम०एस० भेज कर लोग भ्रष्टाचार के विरोध में अपना वोट दर्ज करें।

केजरीवाल ने कहा कि हम सरकारी योजनाओं को लागू करने वाले एजेंट नहीं हैं। यदि सभी सरकारी योजनाओं को इमानदारी से लागू किया जाये तब भी अपेक्षित बदलाव नहीं होगा - गरीबी नहीं हटेगी, बेरोज़गारी नहीं हटेगी। जब तक ग्राम सभाओं को ताकत नहीं है, बदलाव नहीं आ सकता।

केजरीवाल ने कहा कि हर महीने किसी पूर्व-निश्चित दिन पर क्यों नहीं ग्राम सभा की खुली बैठक हो सकती जिसमें आम नागरिक स्वतंत्र रूप से हिस्सा ले सके। इन्ही बैठक में आय-व्यय भी सार्वजनिक करना चाहिए।

केजरीवाल ने कहा कि ये तय आपको करना है कि आप सरकार के दलाल बनोगे या जनता के सेवक बनोगे।

आखिर भ्रष्टाचार को कैसे रोका जाए? केजरीवाल ने संगीन प्रश्न खड़े किये कि जो संस्थाएं भ्रष्टाचार को रोकने के लिये हैं, उदाहरण के तौर पर जैसे कि सेंट्रल विजिलेंस कमिटी (सि०वि०सि०) सिर्फ सरकार को सलाह दे सकती है, और कोई भी कारवाई नहीं कर सकती। केजरीवाल ने भूतपूर्व सी0वि0सि० से साक्षात्कार के बारे में बताया कि पिछले ५ सालों में उस सी०वि०सि० ने जिन सरकारी अधिकारियों को निलंबित से ले के जेल तक की 'सलाह' दी उन सबको सरकार ने सिर्फ 'चेतावनी' दे कर छोड़ दिया है। इसी तरह सी०बी०आई० भी कोई जांच तब तक नहीं कर सकती है जब तक सरकार की सहमती न प्राप्त हो।

अरविन्द केजरीवाल लखनऊ में हो रहे पंचायती राज सम्मेलन में व्याख्यान दे रहे थे। पंचायती राज सम्मेलन को लोक राजनीति मंच ने आयोजित किया था जिसमें दो दर्जन से अधिक जन-प्रतिनिधि एवं सौ से अधिक राजनीतिक कार्यकर्ता आये थे।

बाबी रमाकांत - सी.एन.एस.

पंचायती राज सम्मेलन: सच्चा लोकतंत्र संभव है

पंचायती राज सम्मेलन में दो प्रमुख मुद्दे उठे: पहला तो यह कि पंचायत के प्रमुख एवं सदस्य सभी फैसले (आय-व्यय भी शामिल है) खुली बैठक में रखे, जिसमें आम नागरिक भी भाग ले सके, और दूसरा यह कि भारतीय संविधान के आर्टिकल २४३ के तहत जो 'ग्राम स्वराज्य' का वादा किया गया है, उसको लागू किया जाए।

पंचायती राज सम्मेलन, लखनऊ, उत्तर प्रदेश में २० फरवरी २०११ को लोक राजनीति मंच के तत्वावधान में कॉमन हाल, दारुल शफा, में संपन्न हुआ। वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता अरविन्द मूर्ति ने कार्यक्रम का आरंभ किया। साथियों ने "तिरंगा उड़ाते बहुत साल बीते" गीत गा के पंचायती राज सम्मेलन का आरंभ किया। वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता एवं मग्सेसे अवार्ड से पुरुस्कृत डॉ० संदीप पाण्डेय ने पंचायती राज सम्मेलन के मुख्य उद्देश्य रखे और कार्यक्रम विस्तार से बताया।

सौ से अधिक प्रतिभागियों ने एवं दो दर्जन से अधिक जन-प्रतिनिधियों ने इस पंचायती राज सम्मेलन में भाग लिया।

पंचायती राज सम्मेलन का पहला सत्र संचालन वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता और लोक राजनीति मंच से सम्बंधित केशव चंद ने किया। इस प्रथम सत्र में व्याख्यानमाला का आरंभ दिल्ली विश्वविद्यालय एवं लोक राजनीति मंच से सम्बंधित डॉ० अजीत झा से हुआ। पंचायतें अपने आप में मजबूत हों, इसके अलावा लोकतंत्र स्थापित करने का कोई और विकल्प नहीं है। डॉ झा ने कहा कि पंचायत की चर्चा हमारे लोकतंत्र के केंद्र में होनी चाहिए।

आज़ादी बचाओ आन्दोलन के डॉ० बनवारी लाल शर्मा ने भी पंचायती राज सम्मेलन को संबोधित किया। डॉ० शर्मा ने कहा कि जब तक उद्योगों को, खासकर कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को, जवाबदेह नहीं ठहराया जायेगा, तब तक न ही भ्रष्टाचार कम होगा और न ही लोकतंत्र सही मायनों में कायम हो सकेगा। बहुराष्ट्रीय कंपनियां ही जन-प्रतिनिधियों के साथ मिलकर प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर के और जल-जंगल-जमीन एवं खनिज आदि को बचाने वाले सभी नियम-कानून को दर-किनार कर के आम लोगों को शोषित करती आई हैं। पंचायतों को मजबूती से इन ताकतों का सामना करना पड़ेगा।

डॉ शर्मा ने कहा कि जल-जंगल-जमीन पर जो कब्ज़ा हो रहा है, उसको तोड़े बिना व्यवस्था नहीं बदलेगी।

पंचायती राज सम्मेलन के समापन की ओर जन-प्रतिनिधियों ने शपथ ली कि वो भ्रष्टाचार नहीं करेंगे, अपनी सुरक्षा के लिये अस्त्र-शास्त्र नहीं रखेंगे, पंचायत के सभी फैसले खुली बैठक में लेंगे जहां आम जन-मानस स्वतंत्र रूप से भाग ले सके और पंचायत का आय-व्यय का बहीखाता भी इन्ही खुली बैठक में रखेंगे

बाबी रमाकांत - सी.एन.एस.

पंचायती राज सम्मेलन

पंचायती राज सम्मेलन
तिथिः 20 फरवरी 2011
स्थानः कॉमन हॉल, बी-ब्लाक, दारूल शफा (विधान सभा के सामने)
समयः 10 बजे सुबह से 5 बजे सॉय

पंचायती राज सम्मेलन का आयोजन 20 फरवरी 2011 को लोक राजनीति मंच के तत्वावधान, कॉमन हॉल, बी-ब्लाक, दारूल शफा में 10 बजे सुबह से 5 बजे सॉय तक हो रहा है।

प्रथम सत्र में, मुख्य वक्ता के रूप में, वरिष्ठ अधिवक्ता रवि किरण जैन, मैगसेसे पुरूस्कार प्राप्त सूचना के अधिकार कार्यकर्ता अर्विन्द केजरीवाल, दिल्ली विश्वविद्यालय के अजीत झा, एवं लोक राजनीति मंच की राज्य समन्वय समिति के सदस्य एवं से0नि0 पुलिस महानिरीक्षक एस0आर0 दारापुरी जी रहेंगे।

दूसरे सत्र में, उत्तर प्रदेश से चुने गए 30-40 पंचायत जन-प्रतिनिधि भाग लेंगे। इनमें से कुछ जन प्रतिनिधि बिना भ्रष्टाचार के एवं खुली बैठक में निर्णय लेने की शपथ लेंगे।

एक फिल्म, ‘स्वाराज - हिवरे बाज़ार गॉव’ भी प्रर्दशित की जाएगी। यह फिल्म महाराष्ट्रा के गॉव हिवरे बाज़ार पर आधारित है जहॅा पंचायत खुली बैठक में फैसले लेती है, और ग्राम स्वाराज्य की नीतियों को लागू करने से विकास के लिए एक आदर्श प्रस्तुत करती है।

अधिक जानकारी के लिए, सम्पर्क करें:
वल्लभाचार्य पाण्डेय, 94152-56848
देवेश पटेल, 92359-77799, 94550-37799
बाबी रमाकांत, ९८३९०-७३३५५

लोक राजनीति मंच

पताः डॉ0 संदीप पाण्डेय, ए-893, इन्दिरा नगर, लखनऊ-226016.
फोनः 2347365, इमेलः ashaashram@yahoo.com

'सही अर्थों में सबकी आज़ादी का रास्ता अभी लम्बा है'

[अरविन्द मूर्ति जी के व्याख्यान की ऑडियो रेकार्डिंग/ पॉडकास्ट सुनने क लिए यहाँ पर क्लिक करें]
"राजनीतिक आजादी हमें १५ अगस्त १९४७ में जरूर मिली थी, मगर मुकम्मल हम इस देश के मालिक हुए थे २६ जनवरी १९५० में. आज के दिन २६ जनवरी १९५० को जो प्रजा थी वो राजा बनी थी. लेकिन इतने दिनों के बाद भी जो आम आदमी है उसको मालिक होने का एहसास ही नहीं है" कहा अरविन्द मूर्ति ने, जो एक वरिष्ठ राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं और हिंदी मासिक सच्ची मुच्ची में संपादक हैं. लखनऊ में २६ जनवरी २०११ को अरविन्द मूर्ति झंडा अवरोहन के बाद गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे.